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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

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सौंप दे. जब इस के प्राण निकल जाते हैं, तब यह प्रेत देवों के वश में हो जाता है. (५)
त्रिकद्रुकेभिः पवते षडुर्वीरिकमिद् बृहत्.
त्रिष्टुब् गायत्री छन्दांसि सर्वा ता यम आर्पिता.. (६)
यह सब का नियंत्रण करने वाला तथा महान यम कद्रुक नाम के तीन यंत्रों से छह
उर्वियों को प्राप्त होता है. त्रिष्टुप, गायत्री आदि छंद सब का नियंत्रण करने वाले परमात्मा में
स्थित हैं. (६)
सूर्य चक्षुषा गच्छ वातमात्मना दिवं च गच्छ पृथिवीं च धर्मभिः.
अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रति तिष्ठा शरीरैः.. (७)
हे प्रेत! तू नेत्र द्वार से सूर्य को प्राप्त हो. तू आत्मा के द्वारा वायु को प्राप्त हो तथा वन्य
इंद्रियों से आकाश और पृथ्वी को प्राप्त हो तथा अंतरिक्ष और जल को प्राप्त हो. यदि इन
स्थानों में जाने की तेरी इच्छा हो तो जा अथवा ओषधि आदि में प्रविष्ट हो जा. (७)
अजो भागस्तपसस्तं तपस्व तं ते शाचिस्तपतु तं ते अर्चिः.
यास्ते शिवास्तन्वो जातवेदस्ताभिर्वहैनं सुकृतामु लोकम्.. (८)
हे अग्नि! इस प्रेत का जो जन्म न लेने वाला भाग अर्थात् आत्मा है, उसे तुम अपने तप
से संतप्त करो. तेरी दीप्त होती हुई ज्वाला इस प्रेत की आत्मा को तपाए. हे जातवेद अग्नि!
तेरा जो ज्वलारूपी कल्याणकारी शरीर है, उस के द्वारा इस प्रेत की आत्मा को उत्तम कर्म
करने वालों के लोक में ले जा. (८)
यास्ते शोचयो रंहयो जातवेदो याभिरापृणासि दिवमन्तरिक्षम्.
अजं यन्तमनु ताः समृण्वतामथेतराभिः शिवतमाभिः शृतं कृधि.. (९)
हे जातवेद अग्नि! तेरा जो ज्वलारूपी शरीर है, उस से तू द्युलोक तथा अंतरिक्ष लोक
व्याप्त करता है. तेरा ज्वलारूपी शरीर द्युलोक को जाती हुई इस प्रेत की आत्मा के पीछे
जाए तथा दूसरे कल्याणकारी शरीरों के पीछे रह गई इस प्रेत की मृत देह को पूरी तरह जला
दे. (९)
अव सृज पुनरग्ने पितृभ्यो यस्त आहुतश्चरति स्वधावान्.
आयुर्वसान उप यातु शेषः सं गच्छतां तन्वा सुवर्चाः.. (१०)
हे अग्नि! हवि के रूप में जो प्रेत तुम्हें दिया गया है तथा हमारे प्रति स्वधा से संपन्न हो
कर तुम्हारे द्वारा जलाया जा रहा है, उसे तुम पितृलोक के लिए छोड़ दो. उस का पुत्र आयु से
संपन्न होता हुआ अपने घर को लौटे. यह प्रेत सुंदर शक्ति वाला तथा पितृलोक में निवास
करने वाला हो. (१०)
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अति द्रव श्वानौ सारमेयौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा.
अधा पितृन्त्सुविदत्राँ अपीहि यमेन ये सधमादं मदन्ति.. (११)
हे प्रेत! तू पितृलोक को जाने वाला है. तू सरमा नाम की देवों की कुतिया के श्याम और
शबल नाम वाले दोनों पुत्रों के साथ प्रसन्न रहने वाले एवं हव्य संपन्न पितरों के पास पहुंचे.
(११)
यौ ते श्वानौ यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिषदी नृचक्षसा.
ताभ्यां राजन् परि धेह्येनं स्वस्त्यस्मा अनमीवं च धेहि.. (१२)
हे पितरों के प्रभु! पितर मार्ग में स्थित चार नेत्रों वाले जो कुत्ते यमपुर की रक्षा करने के
हेतु तुम्हारे द्वारा नियुक्त किए गए हैं, इस प्रेत की रक्षा के लिए उन्हें सौंप दो. यह तुम्हारे लोक
में रहने को आया है. इसे बाधा रहित स्थान दो. (१२)
उरूणसावसुतृपावुदुम्बलौ यमस्य दूतौ चरतो जनाँ अनु.
तावस्मभ्यं दृशये सूर्याय पुनर्दातामसुमद्येह भद्रम्.. (१३)
बड़ीबड़ी नाक वाले प्राणियों के प्राणों से तृप्ति को प्राप्त हुए तथा प्राणों का अपहरण
करने वाले महाबली यमदूत सभी जगह घूमते हैं. ये दोनों दूत सूर्य दर्शन के निमित्त पांच
इंद्रियों वाले प्राण को हमारे शरीर में पुनः स्थापित करें. (१३)
सोम एकेभ्यः पवते घृतमेक उपासते.
येभ्यो मधु प्रधावति तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१४)
कुछ पितरों के लिए नदी के रूप में सोमरस बहता है. अन्य पितर घृत का उपभोग
करते हैं. ब्रह्म याग में अथर्ववेद के मंत्रों का पाठ करने वालों के लिए मधु अर्थात् शहद की
नदी है. हे मृतात्मा को प्राप्त प्रेत! तू उन सब को प्राप्त हो. (१४)
ये चित् पूर्व ऋतसाता ऋतजाता ऋतावृधः.
ऋषीन् तपस्वतो यम तपोज़ाँ अपि गच्छतात्.. (१५)
जो पूर्व पुरुष सत्य से युक्त थे, जो साम से उत्पन्न हो कर सत्य की वृद्धि करते थे, हे यम
के निमित्त पुरुष! उन तपोबल वाले ऋषियों को तू प्राप्त हो. (१५)
तपसा ये अनाधृष्यास्तपसा ये स्वर्ययुः.
तपो ये चक्रिरे महस्तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१६)
तप के द्वारा, यज्ञ आदि साधनों के द्वारा, दुष्कर कर्म और उपासना के द्वारा महान तप
करते हुए जो पुरुष पुण्य लोकों को जाते हैं, हे पुरुष! तू उन तपस्वियों के लोकों को जा.
(१६)
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ये युध्यन्ते प्रधनेषु शूरासो ये तनूत्यजः.
ये वा सहस्रदक्षिणास्तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१७)
जो वीर पुरुष युद्धों में शत्रुओं पर प्रहार करते हैं, जो रणक्षेत्र में शरीर का त्याग करते हैं
तथा जो अन्न, दक्षिणा आदि वाले यज्ञों को पूर्ण करते हैं, उन्हें जो फल प्राप्त है, तू उन सभी
फलों को प्राप्त कर. (१७)
सहस्रणीथाः कवयो ये गोपायन्ति सूर्यम्.
ऋषीन् तपस्वतो यम तपोजाँ अपि गच्छतात्.. (१८)
जो अनंत द्रष्टा ऋषि सूर्य की रक्षा करते हैं, हे पुरुष! तू यम के पास ले जाने वाला हो
कर उन तपस्वी ऋषियों के कर्म फल को प्राप्त कर. (१८)
स्योनास्मै भव पृथिव्यनृक्षरा निवेशनी.
यच्छास्मै शर्म सप्रथाः.. (१९)
हे वेदी रूपिणी पृथ्वी! तू मरने वाले पुरुष के लिए कंटकहीन बन जा तथा इसे सभी
प्रकार का सुख प्रदान कर. (१९)
असंबाधे पृथिव्या उरौ लोके नि धीयस्व.
स्वधा याश्चकृषे जीवन् तास्ते सन्तु मधुश्चतः.. (२०)
हे मरने वाले पुरुष! तू यज्ञ आदि की वेदी के विस्तृत स्थान में प्रतिष्ठित हो. पहले तू ने
जिन उत्तम हवियों को दिया है, वे तुझे मधु आदि रसों के रूप में प्राप्त हों. (२०)
ह्वयामि ते मनसा मन इहेमान् गृहाँ उप जुजुषाण एहि.
सं गच्छस्व पितृभिः सं यमेन स्योनास्त्वा वाता उप वान्तु शग्माः.. (२१)
हे प्रेत पुरुष! मैं अपने मन के द्वारा तेरे मन को इस लोक में बुलाता हूं. जिन घरों में तेरे
लिए और्ध्वदैहिक अर्थात् देह त्याग के बाद का कर्म किया जाता है, तू हमारे उन घरों में जा
तथा संस्कार के बाद पिता, पितामह, प्रपितामह आदि के साथ सपिण्डीकरण की विधि के
अनुसार मिल. यम के पास पहुंचा हुआ तू पितृलोक में जा कर श्रम को दूर करने वाली वायु
को प्राप्त कर. (२१)
उत् त्वा वहन्तु मरुत उदवाहा उदप्रुतः.
अजेन कृण्वन्तः शीतं वर्षेणोक्षन्तु बालिति.. (२२)
हे प्रेत! मरुद्गण तुझे व्योम में धारण करें. वायु तुझे ऊर्ध्वलोक में पहुंचाए. जल को
धारण करने वाले तथा वर्षा करने वाले मेघ समीप में भी अज अर्थात् अजन्मा आत्मा सहित
तुझे वर्षा के जल से सींचें. (२२)
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उदह्रमायुरायुषे क्रत्वे दक्षाय जीवसे.
स्वान् गच्छतु ते मनो अधा पितँरुप द्रव.. (२३)
हे प्रेत! प्राणन अर्थात् सांस लेने और अपानन अर्थात् अपान वायु छोड़ने के व्यापार
अर्थात् कार्य के लिए मैं तेरी आयु का आह्वान करता हूं. तेरा मन संस्कार से उत्पन्न नवीन
शरीर को प्राप्त हो. इस के बाद तू पितरों के समीप पहुंच. (२३)
मा ते मनो मासोर्माङ्गानां मा रसस्य ते.
मा ते हास्त तन्व १: किं चनेह.. (२४)
हे प्रेत! तेरा मन और तेरी इंद्रियां तेरा त्याग न करें. तेरे प्राण के किसी अंश का क्षय न
हो. तेरे शरीर के अंगों में किसी प्रकार का विकार न हो. तेरे शरीर में रुधिर रस आदि भी पूरी
मात्रा में रहें. तेरा कोई भी भाग तुझ से अलग न हो. (२४)
मा त्वा वृक्षः सं बाधिष्ट मा देवी पृथिवी मही.
लोकं पितृषु वित्त्वैधव्व यमराजसु.. (२५)
हे प्रेत! तू जिस वृक्ष के नीचे बैठे, वह तुझे व्यथित न करे. तू जिस धरती का आश्रय ले,
वह भी तुझे पीड़ा न पहुंचाए. तू यम की प्रजा रूप पितरों के स्थान पर जा कर वृद्धि प्राप्त
कर. (२५)
यत् ते अङ्गमतिहासितं पराचैरपानः प्राणो य उ वा ते परेतः.
तत् ते संगत्यू पितरः सनीडा घासाद् घासं पुनरा वेशयन्तु.. (२६)
हे प्रेत! तेरा जो अंग तेरे शरीर से अलग हो गया था, जो प्राण वापस न होने के लिए तेरे
शरीर से निकल गए थे, उन सब को एक स्थान पर स्थित पितर तुझे एक शरीर से दूसरे शरीर
में प्रविष्ट करें. (२६)
अपेमं जीवा अरुधन् गृहेभ्यस्तं निर्वहत परि ग्रामादितः.
मृत्युर्यमस्यासीद् दूतः प्रचेता असून् पितृभ्यो गमयां चकार.. (२७)
हे जीवित बंधुओ! इस प्रेत को घर से ले जाओ. उसे उठा कर ग्राम से बाहर ले जाओ.
यम के दूत रूप मृत्यु ने इस के प्राणों को पितर के रूप में करने के लिए ले लिया है. (२७)
ये दस्यवः पितृषु प्रविष्टा ज्ञातिमुखा अहुतादश्चरन्ति.
परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टानस्मात् प्र धमाति यज्ञात्.. (२८)
जो राक्षसों के समान पिता, पितामह आदि पितरों में मिल कर बैठ जाते हैं, माया कर
के हवि का भक्षण करते हैं तथा पिंडदान करने वाले पुत्रों और पौत्रों की हिंसा करते हैं, उन
मायावी राक्षसों को पितृयाग से अग्नि देव बाहर निकालें. (२८)
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सं विशन्त्विह पितरः स्वा नः स्योनं कृण्वन्तः प्रतिरन्त आयुः.
तेभ्यः शकेम हविषा नक्षमाणा ज्योग् जीवन्तः शरदः पुरूचीः. (२९)
हमारे गोत्र में उत्पन्न पिता, पितामह आदि सभी पितर भलीभांति यज्ञ में आ कर बैठें
तथा हमें सुखी बनाएं. वे हमारी आयु की वृद्धि करें. हम भी आयु प्राप्त कर के हवियों द्वारा
पितरों को पूजते हुए चिरकाल तक जीवित रहें. (२९)
यां ते धेनुं निपृणामि यमु ते क्षीर ओदनम्.
तेना जनस्यासो भर्ता यो ऽ त्रासदजीवनः. (३०)
हे प्रेत! मैं तेरे निमित्त गोदान करता हूं. मैं तेरे लिए दूध से बना जो भात देता हूं, उस के
द्वारा तू यमलोक में अपने जीवन को पुष्ट करने वाला हो. (३०)
अश्वावतीं प्र तर या सशेवार्क्षाकं वा प्रतरं नवीयः.
यस्त्वा जघान वध्यः सो अस्तु मा सो अन्यद् विदत् भागधेयम्.. (३१)
हे प्रेत! मैं नए वन मार्ग में रीछ आदि दुष्ट पशुओं से बचता हुआ पार हो जाऊं. तू हमें
अश्वावती नदी के उस पार उतार दे. यह नदी हमें सुख देने वाली हो. जिस ने तेरा वध किया
है, वह वध के योग्य होता हुआ उपभोग के योग्य पदार्थ न पा सके. (३१)
यमः परो ऽ वरो विवस्वान् ततः परं नाति पश्यामि किं चन.
यमे अध्वरो अधि मे निविष्टो भुवो विवस्वानन्वाततान.. (३२)
सूर्य के पुत्र यम अपने पिता से भी अधिक तेजस्वी हैं. मैं किसी भी प्राणी को यम से
श्रेष्ठ नहीं पाता हूं. तेरा यज्ञ उन श्रेष्ठ यम में व्याप्त हो रहा है. यज्ञ की सिद्धि के लिए ही सूर्य ने
भूखंडों को विस्तृत किया है. (३२)
अपागूहन्नमृतां मर्त्येभ्यः कृत्वा सवर्णांमदधुर्विवस्वते.
उताश्विनावभरद् यत् तदासीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः. (३३)
मरणधर्मा मनुष्यों से देवताओं ने अपनेअपने अविनाशी रूप अदृश्य कर लिए. उन्होंने
सूर्य को अन्य वर्ण वाली स्त्री बना कर दी. सरण्यु ने घोड़ी का रूप धारण कर के
अश्विनीकुमारों का पालन किया. त्वष्टा की पुत्री सरण्यु ने सूर्य का घर छोड़ते समय यमयमी
के जोड़े को घर पर ही छोड़ा था. (३३)
ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः.
सर्वांस्तानग्न आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (३४)
जो पिता भूमि में गाड़े जा कर, जो काठ के समान त्यागे जा कर तथा जो अग्नि दाह के
संस्कार के द्वारा ऊपर स्थित पितृलोक को प्राप्त हुए हैं, इस प्रकार के पितरो! हवि भक्षण के
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लिए यहां आओ. (३४)
ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते.
त्वं तान् वेत्थ यदि ते जातवेदः स्वधया यज्ञं स्वधितिं जुषन्ताम्.. (३५)
जो पितर अग्नि के द्वारा संस्कृत हुए, जो गाड़ने आदि के द्वारा संस्कृत हुए और जो
पिंड, पितृयाग आदि से तृप्त हुए आकाश में निवास करते हैं, हे अग्नि! तुम उन्हें भलीभांति
जानते हो. वे अपनी संतानों के द्वारा किए जाने वाले पितृयाग आदि का सेवन करें. (३५)
शं तप माति तपो अग्ने मा तन्वं १ तपः.
वनेषु शुष्मो अस्तु ते पृथिव्यामस्तु यद्धरः.. (३६)
हे अग्नि! इस प्रेत के शरीर को अधिक मत जलाओ. जिस प्रकार इसे सुख मिले, वैसा
करो. शोषण करने वाली तुम्हारी ज्वालाएं जंगल में जाएं तथा रस का हरण करने वाला तेज
पृथ्वी में रहे. तुम हमारे शरीरों को भस्म मत करो. (३६)
ददाम्यस्मा अवसानमेतद् य एष आगन् मम चेहभूदिह.
यमश्चिकित्वान् प्रत्येतदाह ममैष राय उप तिष्ठतामिह.. (३७)
यम का वचन—यह आया हुआ पुरुष मेरा हो तो मैं उसे स्थान दूं. अब यह मेरे पास
आया है. यदि यह मेरा स्तवन करता रहे तो यहां रह सकता है. (३७)
इमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (३८)
हम इस श्मशान को नापते हैं, क्योंकि ब्रह्मा ने हमें सौ वर्ष की आयु प्रदान की है.
इसलिए बीच में ही श्मशान हमें अपने कर्म के द्वारा प्राप्त न हो. (३८)
प्रेमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै.
शते शरत्सु नो पुरा.. (३९)
हम इस श्मशान को अच्छी प्रकार नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में ही
श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (३९)
अपेमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै.
शते शरत्सु नो पुरा.. (४०)
हम इस श्मशान के नाप संबंधी दोषों को हटाते हुए नापते हैं, जिस से हमें सौ से पहले
बीच में ही दूसरा मृतक कर्म प्राप्त न हो. (४०)
वी ३ मां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४१)
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हम इस श्मशान भूमि को विशेष प्रकार से नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच
में ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४१)
निरिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४२)
हम दोष रहित करते हुए इस श्मशान को नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में
ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४२)
उदिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४३)
उत्कृष्ट साधन वाली नाप से हम इस श्मशान को नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले
बीच में ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४३)
समिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४४)
इस श्मशान भूमि को हम भलीभांति नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में ही
दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४४)
अमासि मात्रां स्व रगामायुष्मान् भूयासम्.
यथापरं न मासातै शते शरत्सु नो पुरा.. (४५)
मैं ने श्मशान की भूमि को नाप लिया है, उसी नाप के द्वारा मैं इस प्रेत को स्वर्ग भेज
चुका हूं. उस कर्म से ही मैं सौ वर्ष की आयु प्राप्त करूं तथा सौ वर्ष से पहले बीच में ही मुझे
अन्य श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४५)
प्राणो अपानो व्यान आयुश्चक्षुर्द्दशये सूर्याय.
अपरिपेरेण पथा यमराज्ञः पितॄन् गच्छ.. (४६)
प्राण, अपान, व्यान, आयु तथा चक्षु—सब आदित्य के दर्शन करने वाले हों. हे पुरुष! तू
भी यमराज के प्रत्यक्ष मार्ग के द्वारा पितरों को प्राप्त हो. (४६)
ये अग्रवः शशमानाः परेयुर्हित्वा द्वेषांस्यनपत्यवन्तः.
ते द्यामुरुदित्याविदन्त लोकं नाकस्य पृष्ठे अधि दीध्यानाः.. (४७)
जो पितर संतान रहित होने पर भी पापों का त्याग करते हुए परलोक में गए, वे अंतरिक्ष
को लांघ कर स्वर्ग के ऊपरी भाग में निवास करते हैं तथा पुण्य का फल प्राप्त करते हैं. (४७)
उदन्वती द्यौरवमा पीलुमतीति मध्यमा.
तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आस्ते.. (४८)
सब से नीचे उदंचती नाम का द्युलोक है, जिस में जल रहता है. उस के ऊपर अर्थात्
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बीच में पीलुमती नाम का द्युलोक है, जिस में नक्षत्र आदि रहते हैं. सब से ऊपर तीसरा प्रद्यौ
नाम का द्युलोक है, जिस के इसी तीसरे भाग में पितर निवास करते हैं. (४८)
ये नः पितुः पितरो ये पितामहा य आविविशुरुर्व १ न्तरिक्षम्.
य आक्षियन्ति पृथिवीमुत द्यां तेभ्यः पितृभ्यो नमसा विधेम.. (४९)
हमारे पिता के जन्मदाता पितर, पितामह के जन्मदाता पितर, वे पितर जो विशाल
अंतरिक्ष में प्रविष्ट हुए हैं तथा जो पितर स्वर्ग अथवा पृथ्वी पर निवास करते हैं, हम इन सभी
लोकों में निवास करने वाले पितरों का नमस्कारों के द्वारा पूजन करते हैं. (४९)
इदमद् वा उ नापरं दिवि पश्यसि सूर्यम्.
माता पुत्रं यथा सिचाभ्ये नं भूम ऊर्णुहि.. (५०)
हे मृतक! हम श्राद्ध आदि में जो कुछ देते हैं, वही तेरा जीवन है. तेरे जीवन का अन्य
कोई साधन नहीं है. इस श्मशान को प्राप्त हुआ तू सूर्य के दर्शन करता है. हे पृथ्वी! जिस
प्रकार माता अपने पुत्र को आंचल से ढकती है. उसी प्रकार तुम इस मृतक को अपने तेज से
ढक लो. (५०)
इदमद् वा उ नापरं जरस्यन्यदितो ऽ परम्.
जाया पतिमिव वाससाभ्ये नं भूम ऊर्णुहि.. (५१)
जीर्ण होते हुए इस शरीर ने जो भोजन किया था, उस के अतिरिक्त इस के लिए कुछ भी
अनुकूल नहीं है. इस के लिए इस श्मशान के अतिरिक्त कोई अन्य स्थान भी नहीं है. हे भूमि!
श्मशान को प्राप्त हुए पितर को तुम उसी प्रकार ढक लो, जिस प्रकार पत्नी वस्त्र से अपने
पति को ढकती है. (५१)
अभि त्वोर्णोमि पृथिव्या मातुरुस्त्रेण भद्रया.
जीवेषु भद्रं तन्मयि स्वधा पितृषु सा त्वयि. (५२)
हे मृतक! सब की मंगलमयी माता पृथ्वी के वस्त्र से मैं तुझे ढकता हूं. जीवित अवस्था
में दान करने के लिए जो सुंदर वस्तु प्राणी के पास होती है, वह मुझ संस्कार करने वाले के
पास हो. स्वधाकार जो अन्न पितरों में होता है, वह तुझ में हो. (५२)
अग्नीषोमा पथिकृता स्योनं देवेभ्यो रत्नं दधथुर्वि लोकम्.
उप प्रेष्यन्तं पूषणं यो वहात्यज्ज्योयानैः पथिभिस्तत्र गच्छतम्.. (५३)
हे अग्नि एवं सोम! तुम पुण्यलोक के मार्ग का निर्माण करते हो. तुम ने सुख देने वाले
स्वर्गलोक की रचना की है. जो लोक सूर्य को अपने में धारण करता है, इस प्रेत को सरल
मार्गों द्वारा उस लोक में पहुंचाओ. (५३)
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पूषा त्वेतश्च्यावयतु प्र विद्वाननष्टपशुर्भुवनस्य गोपाः.
स त्वैतेभ्यः परि ददत् पितृभ्योऽग्निर्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः.. (५४)
हे प्रेत! पशुओं की हिंसा न करने वाले पशुपालक पूषा तुझे यहां से उस स्थानों से ले
जाएं. प्राणियों की रक्षा करने वाले ये दोनों तुझे पितरों को अर्पण करें. अग्नि देव तुझे ऐश्वर्य
वाले देवताओं को सौंपें. (५४)
आयुर्विश्वायुः परि पातु त्वा पूषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात्.
यत्रासते सुकृतो यत्र त ईयुस्तत्र त्वा देवाः सविता दधातु.. (५५)
जीवन का अभिमानी देवता आयु तेरा रक्षक हो. पूषा देव तेरे उस मार्ग की रक्षा करें जो
पूर्व की ओर जाता हो. हे प्रेत! पुण्य आत्माओं के निवास रूप स्वर्ग में सविता देव तुझे
पहुंचाएं. (५५)
इमौ युनज्मि ते वह्नी असुनीताय वोढवे.
ताभ्यां यमस्य सादनं समितींश्चाव गच्छतात्.. (५६)
हे मृतक! भार ढोने वाले इन बैलों को मैं तेरे लिए छोड़ रहा हूं. मैं इन्हें प्राणों का वहन
करने के लिए बैलगाड़ी में जोड़ता हूं. बैलों से युक्त इस गाड़ी के द्वारा तू यम के घर को प्राप्त
हो. (५६)
एतत् त्वा वासः प्रथमं न्वागन्नपैतदूह यदिहाबिभः पुरा.
इष्टापूर्तमनुसंक्राम विद्वान् यत्र ते दत्तं बहुधा विबन्धुषु.. (५७)
हे मृतक! तू अपने पहने हुए मुख्य वस्त्र को त्याग. जिन इच्छाओं की पूर्ति के लिए तूने
अपने बांधवों को धन दिया था, उस इष्ट कर्म के फल के रूप बावड़ी, कुआं, तालाब आदि को
प्राप्त हो. (५७)
अग्नेर्वर्म परि गोभिर्व्ययस्व सं प्रोर्णुष्व मेदसा पीवसा च.
नेत् त्वा धृष्णुर्हरसा जर्हृषाणो दधृग् विधक्षन् परीङ्खयातै.. (५८)
हे प्रेत! इंद्रियों संबंधी अवयवों से तू अग्नि का पाप निवारक कवच पहन. अपने भीतर
विद्यमान स्थूल चरबी से ये अग्नि तुझे अधिक भस्म करने की इच्छा रखते हुए इधरउधर न
गिराएं. (५८)
दण्डं हस्तादाददानो गतासोः सह श्रोत्रेण वर्चसा बलेन.
अत्रैव त्वमिह वयं सुवीरा विश्वा मृधो अभिमातीर्जयेम.. (५९)
ब्राह्मण के हाथ से बांस के दंड को ग्रहण करता हुआ मैं कानों के तेज तथा उस से प्राप्त
बल से युक्त रहूं. हे प्रेत! तू इस चिता में ही रह. हम इस पृथ्वी पर सुख से रहते हुए अपने

सूक्त-३ देवता—यम

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शत्रुओं तथा उन के उपद्रवों को दबाएं. (५९)
धनुर्हस्तादाददानो मृतस्य सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन.
समागृभाय वसु भूरि पुष्टमर्वाङ् त्वमेह्युप जीवलोकम्.. (६०)
मृतक क्षत्रिय के हाथ से धनुष ग्रहण करता हुआ मैं तेज और बल से युक्त होऊं. हे
धनुष! तू इस जीवित लोक में ही हमारे सामने आ तथा हमें देने के लिए धन ला. (६०)
सूक्त-३ देवता—यम
इयं नारी पतिलोकं वृणाना नि पद्यत उप त्वा मर्त्य प्रेतम्.
धर्मं पुराणमनुपालयन्ती तस्यै प्रजां द्रविणं चेह धेहि.. (१)
यह स्त्री धर्म का पालन करने के लिए तेरे दान आदि की इच्छा करती हुई तेरे समीप
आती है. इस प्रकार तेरा अनुकरण करने वाली इस स्त्री को तू अगले जन्म में भी संतान वाली
बनाना. (१)
उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि.
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ.. (२)
हे नारी! तू इस प्राणहीन पति के पास बैठी है. अब तू इस के पास से उठ. तू अपने पति
से उत्पन्न हुए पुत्र, पौत्र आदि को प्राप्त हो गई है. (२)
अपश्यं युवतिं नीयमानां जीवां मृतेभ्यः परिणीयमानाम्.
अन्धेन यत् तमसा प्रावृतासीत् प्राक्तो अपाचीमनयं तदेनाम्.. (३)
मैं तरुण अवस्था वाली जीवित गौ को मृतक के समीप ले जाई जाती हुई देखता हूं. यह
भी अज्ञान से ढकी हुई है, इसलिए मैं इसे शव के पास से हटा कर अपने सामने लाता हूं. (३)
प्रजानत्यघ्न्ये जीवलोकं देवानां पन्थामनुसंचरन्ती.
अयं ते गोपतिस्तं जुषस्व स्वर्गं लोकमधि रोहयैनम्.. (४)
हे गौ! तू पृथ्वीलोक को भलीभांति जानती तथा यज्ञ मार्ग को देखती है. तू दूध, दही
आदि से युक्त हो कर जा. तू अपने उस स्वामी का सेवन कर जो गायों का स्वामी है. तू इस
मृतक को स्वर्ग की प्राप्ति करा. (४)
उप द्यामुप वेतसमवत्तरो नदीनाम्. अग्ने पित्तमपामसि.. (५)
जल में उगी हुई काई और बेंत में जल का सार अंश है जो उन का रक्षक है. हे अग्नि! तू
जल संबधी पित्त है. इसलिए मैं तुझे बेंत की शाखा, नदी के फेन और दूब आदि से शांत
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करता हूं. (५)
यं त्वमग्ने समदहस्तमु निर्वापया पुनः.
क्याम्बूरत्र रोहतु शाण्डदूर्वा व्यल्कशा.. (६)
हे अग्नि! जिस पुरुष को तुम ने भस्म किया है, उसे सुखी करो. इस स्थान पर
दुःखनाशक दूब घास उग सके, उस के लिए यहां कितना जल डालना चाहिए? (६)
इदं त एकं पर ऊ त एकं तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व.
संवेशने तन्वा ३ चारुरेधि प्रियो देवानां परमे सधस्थे.. (७)
हे प्रेत! यह गार्हपत्य अग्नि तुझे परलोक पहुंचाने वाली ज्योति है. न रुकने वाली पवन
दूसरी तथा आहवनीय अग्नि तीसरी ज्योति है. तू आहवनीय अग्नि से मिल तथा अग्नि में
प्रवेश करने के कारण देव शरीर को प्राप्त कर के बढ़. इस के बाद तू इंद्र आदि देवताओं का
प्रिय पात्र होगा. (७)
उत्तिष्ठ प्रेहि प्र द्रवौकः कृणुष्व सलिले सधस्थे.
तत्र त्वं पितृभिः संविदानः सं सोमेन मदस्व सं स्वधाभिः.. (८)
हे प्रेत! तू इस स्थान से उठ और चल. शीघ्रता से चलता हुआ तू अंतरिक्ष को अपना
निवास स्थान बना तथा पितरों से मिल कर सोमरस का पान करता हुआ हर्षित हो. (८)
प्र च्यवस्व तन्वं १ सं भरस्व मा ते गात्रा वि हायि मो शरीरम्.
मनो निविष्टमनुसंविशस्व यत्र भूमेर्जुषसे तत्र गच्छ.. (९)
हे प्रेत! तू अपने शरीर के सब अंगों को एकत्र कर. तेरा कोई भी अंग यहां न छूट जाए.
तेरा मन जिन स्वर्ग आदि स्थानों में रमा है, तू वहां प्रवेश कर. तू जिस भूमि से प्रेम करता है,
उसी भूमि को प्राप्त हो. (९)
वर्चसा मां पितरः सोम्यासो अञ्जन्तु देवा मधुना घृतेन.
चक्षुषे मा प्रतरं तारयन्तो जरसे मा जरदृष्टिं वर्धन्तु.. (१०)
सोमरस पीने के अधिकारी पितर मुझे तेजस्वी बनाएं. विश्वे देव मुझे मधुर घृत से युक्त
करें. मैं दीर्घकाल तक देखता रहूं, इसलिए तू मुझे रोगों से मुक्त करते हुए बढ़. (१०)
वर्चसा मां समनक्त्वग्निर्मेधां मे विष्णुर्न्य नक्त्वासन्.
रयिं मे विश्वे नि यच्छन्तु देवाः स्योना मापः पवनैः पुनन्तु.. (११)
अग्नि देव मुझे तेजस्वी बनाएं तथा विष्णु मेरे मुख में बुद्धि को भलीभांति स्थापित करें.
विश्वे देव मुझे सुख देने वाले धन का स्वामी बनाएं. जल अपने शुद्ध साधन वायु के द्वारा मुझे
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पवित्र करें. (११)
मित्रावरुणा परि मामधातामादित्या मा स्वरवो वर्धयन्तु.
वर्चो म इन्द्रो न्यनक्तु हस्तयोरूर्जरदष्टिं मा सविता कृणोतु.. (१२)
दिवस के अभिमानी देवता मित्र अर्थात् सूर्य तथा रात्रि के अभिमानी देव वरुण मुझे
वस्त्र आदि प्रदान करें. आदित्य देव हम सब की वृद्धि करते हुए हमारे शत्रुओं को संतप्त
बनाएं. इंद्र मुझे भुजाओं का बल दें तथा सविता मुझे दीर्घ आयु वाला बनाएं. (१२)
यो ममार प्रथमो मर्त्यानां यः प्रेयाय प्रथमो लोकमेतम्.
वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविषा सपर्यत.. (१३)
यम मरणधर्मा मनुष्यों में उत्पन्न हुए थे. सब से पहले उन्हीं की मृत्यु हुई थी. इस के
पश्चात ये दूसरे लोक में पहुंचे. यम सूर्य के पुत्र हैं. सभी प्राणी मृत्यु के पश्चात इन्हीं के पास
जाते हैं. हे ऋत्विजो! इन यम का पूजन करो जो सब को पाप और पुण्य के अनुसार फल देते
हैं. (१३)
परा यात पितर आ च यातायं वो यज्ञो मधुना समक्तः.
दत्तो अस्मभ्यं द्रविणेह भद्रं रयिं च नः सर्ववीरं दधात.. (१४)
हे पितरो! तुम हमारे पितृयाग नामक कर्म से संतुष्ट हो कर अपने स्थान की ओर जाओ.
हम जब तुम्हारा पुनः आह्वान करें, तब आना. हम ने तुम्हें मधु और घृत से युक्त यज्ञ दिया है.
तुम इस यज्ञ को स्वीकार कर के हमारे घर में मंगलमय ऐश्वर्य तथा पुत्रों, पौत्रों, पशुओं आदि
को स्थापित करो. (१४)
कण्वः कक्षीवान् पुरुमीढो अगस्त्यः श्यावाश्वः सोभर्यर्चननाः.
विश्वामित्रो ऽ यं जमदग्निरत्रिरवन्तु नः कश्यपो वामदेवः.. (१५)
पूजा के योग्य कण्व, कक्षीवान, पुरुमीढ, अगस्त्य, श्यावाश्व, सौभरि, विश्वामित्र,
जमदग्नि, अग्नि, कश्यप तथा वामदेव नाम वाले अनेक ऋषि हमारे रक्षक हैं. (१५)
विश्वामित्र जमदग्ने वसिष्ठ भरद्वाज गोतम वामदेव.
शर्द्दिनों अत्रिरग्रभीन्नमोभिः सुसंशासः पितरो मृडता नः.. (१६)
हे विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ, भारद्वाज, गौतम, वामदेव नामक महर्षियो! तुम हमें
सुख प्रदान करो. महर्षि अत्रि ने हमारे घर रक्षा करना स्वीकार कर लिया है. हे पितरो! तुम
हमारे नमस्कार आदि के द्वारा पूजने के योग्य हो. तुम भी हमें सुख प्रदान करो. (१६)
कस्ये मृजाना अति यन्ति रिप्रमायुर्दधानाः प्रतरं नवीयः.
आप्यायमानाः प्रजया धनेनाध स्याम सुरभयो गृहेषु.. (१७)
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हम श्मशान में अपने बांधव की मृत्यु के दुःख का त्याग करते हुए तथा शव के स्पर्श के
पाप से मुक्त होते हुए अपने घर जाते हैं. इस प्रकार हम दुःख से छूट गए हैं. इस कारण हम
पुत्र, पौत्र, पशु, सुवर्ण, धन, सुंदर गंध और वायु से संपन्न रहें. (१७)
अञ्जते व्यञ्जते समज्‍जते क्रतुं रिहन्ति मधुनाभ्यञ्जते.
सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षणं हिरण्यपावाः पशुमासु गृह्णते.. (१८)
ऋत्विज् सोमयाग के आरंभ में यजमान की आंखों में अंजन लगाते हैं. सागर की वृद्धि
के समय उदय होने वाले, रश्मियों द्वारा देखने वाले तथा प्रकाशमय चंद्रमा की रक्षा करने
वाले सोम के रूप में स्थापित करते हुए हम चार थालियों में उस का शोधन करते हैं. (१८)
यद् वो मुद्रं पितरः सोम्यं च तेनो सचध्वं स्वयशसो हि भूत.
ते अर्वणः कवय आ शृणोत सुविदत्रा विदथे हूयमानाः.. (१९)
हे पितरो! तुम अपने सोमरूपी धन के सहित हम से मिलो, क्योंकि तुम अपने यज्ञ के
कारण यशस्वी हो. तुम हमें हमारा अभीष्ट प्रदान करो और बुलाए जाने पर हमारे आह्वान को
सुनो. (१९)
ये अत्रयो अङ्गिरसो नवग्वा इष्टावन्तो रातिषाचो दधानाः.
दक्षिणावन्तः सुकृतो य उ स्थासद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम्.. (२०)
हे पितरो! तुम अत्रि और अंगिरा गोत्र वाले हो. तुम नौ महीने तक सत्र याग करने के
कारण स्वर्ग में आरोहण करने वाले होता हो. तुम दस मास वाला याग पूर्ण करने पर दक्षिणा
देने वाले पुण्य आत्मा हो. इस कारण इस विस्तृत कुश पर बैठ कर हमारी हवि से तृप्ति करो.
(२०)
अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऋतमाशशानाः.
शुचीदयन् दीध्यत उक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन्.. (२१)
हे अग्नि! जिस प्रकार हमारे श्रेष्ठ पितर स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं, उसी प्रकार उक्थों का
गान करने वाले पितर रात्रि के अंधकार को अपने तेज से दूर कर के उषाओं को प्रकाशित
करते हैं. (२१)
सुकर्माणः सुरुचो देवयन्तो अयो न देवा जनिमा धमन्तः.
शुचन्तो अग्निं वावृधन्त इन्द्रमुर्वीं गव्यां परिषदं नो अक्रन्.. (२२)
सुंदर कर्म तथा सुंदर तेज वाले देव काम्य तप से अपने जन्म का शोधन करने वाले
देवत्व को प्राप्त हुए. गार्हपत्य अग्नि को प्रदीप्त करते हुए तथा अपनी स्तुतियों से इंद्र को
प्रबुद्ध बनाते हुए वे पितर गायों को हमारे यहां निवास करने वाली बनाएं. (२२)
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आ यूथेव क्ष्मति पश्वो अख्यद् देवानां जनिमान्त्युग्रः.
मर्तासश्चिदुर्वशीरकृप्रन् वृधे चिदर्य उपरस्यायोः.. (२३)
हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा भस्म किया जाता हुआ यह यजमान देवताओं के प्रादुर्भाव को
देखे. मरणधर्मा मनुष्य तुम्हारी कृपा से उर्वशी आदि अप्सराओं को भोगने वाले होते हैं.
तुम्हारी कृपा से देवत्व को प्राप्त मनुष्य भी गर्भाशय में स्थित जीवन की वृद्धि वाला होता है.
(२३)
अकर्म ते स्वपसो अभूम ऋतमवसन्न्ुषसो विभातीः.
विश्वं तद् भद्रं यदवन्ति देवा बृहद् वदेम विदथे सुवीराः.. (२४)
हे अग्नि! हम तुम्हारे सेवक हैं और तुम हमारा पालन करने वाले हो. इस कारण हम
शोभन कर्म करने वाले बनें. उषा काल हमारे कर्मों को सत्य बनाए. देवताओं द्वारा रक्षित कर्म
हमारे लिए कल्याणकारी हो. हम भी सुंदर पुत्र आदि से युक्त रहते हुए यज्ञ में विस्तृत स्तोत्रों
का उच्चारण करें. (२४)
इन्द्रो मा मरुत्वान् प्राच्या दिशः पातु बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२५)
मरुतों के स्वामी इंद्र पूर्व दिशा से मेरी रक्षा करें. बाहुओं में प्राप्त पृथ्वी जिस प्रकार
ऊपर स्थित स्वर्ग की रक्षा करती है, उसी प्रकार लोकों तथा मार्गों के निर्माताओं की पूजा हम
यज्ञ द्वारा करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२५)
धाता मा निर्ऋत्या दक्षिणाया दिशः पातु बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२६)
दक्षिण के धाता देव पाप की देवी निर्ऋति के भय से मेरी रक्षा करें. दाता के द्वारा दी गई
पृथ्वी जिस प्रकार स्वर्ग के उपभोक्ता की रक्षा करती है, उसी प्रकार मेरी रक्षा करने वाली हो.
पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों को हम हवि के द्वारा पूजते हैं. हे
देवगण! इस यज्ञ में तुम भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२६)
अदितिर्मादित्यैः प्रतीच्या दिशः पातु बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२७)
देव माता अदिति पश्चिम दिशा के भय से मेरी रक्षा करें. दाता के द्वारा दी गई पृथ्वी
जिस प्रकार दाता और दान ग्रहण करने वाले के स्वर्ग संबंधी उपभोग की रक्षा करती है, उसी
प्रकार मेरी रक्षा करने वाली बने. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों
को हम हवि के द्वारा पूजते हैं. हे देवगण! इस यज्ञ में तुम भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२७)
सोमो मा विश्वैर्देवैरुदीच्या दिशः पातु बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि.

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लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२८)
सभी देवों के साथ सोम उत्तर दिशा में स्थित राक्षस आदि से मेरी रक्षा करें. पुण्य के
फल के रूप में स्वर्ग में मार्ग का प्रवर्तन करने वालों की हम हवि के द्वारा पूजा करते हैं. हे
देवगण! इस यज्ञ में तुम भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२८)
धर्ता ह त्वा धरुणो धारयाता ऊर्ध्वं भानुं सविता द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (२९)
हे प्रेत! संपूर्ण जगत् को धारण करने वाले तथा ऊपर की दिशा का स्वामी धाता देव
ऊपर के लोक को जाने के लिए इच्छुक तेरी उसी प्रकार रक्षा करें, जिस प्रकार सब के प्रेरक
सूर्य दीप्त आकाश को धारण करते हैं. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने
वालों को हम हवि के द्वारा पूजते हैं. हे देवगण! तुम हमारे इस यज्ञ में भाग प्राप्त करने वाले
बनो. (२९)
प्राच्यां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी
द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३०)
हे प्रेत! दहन के स्थान से पूर्व दिशा में कंबल से लिपटा हुआ मैं शरीर वाला रहा हूं, उस
दिशा में मैं तुझे पितरों की तृप्ति करने वाली स्वधा नाम की देवी पर स्थापित करता हूं.
दाताओं द्वारा ब्राह्मणों को दान की गई पृथ्वी जिस प्रकार ऊपर की दिशा में स्थित स्वर्ग का
पालन करती है, हम हवि के द्वारा तुम्हारा स्वागत करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग
लेने वाले बनो. (३०)
दक्षिणायां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी
द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३१)
हे प्रेत! हम दहन के स्थान से दक्षिण दिशा में पहले से स्थित तथा कंबल से ढकी हुई
स्वधा नाम की पितृ देवता में तुझे स्थापित करते हैं. दाताओं द्वारा ब्राह्मणों को दान की गई
पृथ्वी जिस प्रकार ऊपर की दिशा में स्वर्ग का पालन करती है, उसी प्रकार स्वधा नाम की
पितृ देवता तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों
की पूजा हम हवि द्वारा करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३१)
प्रतीच्यां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी
द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३२)
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हे प्रेत! हम दहन के स्थान से पश्चिम दिशा में पहले से स्थित तथा कंबल से ढकी हुई
स्वधा नाम की पितृदेवता में तुझे स्थापित करते हैं. दाताओं द्वारा ब्राह्मणों को दान में दी गई
पृथ्वी जिस प्रकार ऊपर की दिशा में स्वर्ग का पालन करती है, उसी प्रकार स्वधा नाम की
पितृदेवता तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों
की पूजा हम हवि के द्वारा करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३२)
उदीच्यां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी
द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३३)
हे प्रेत! हम दहन के स्थान से उत्तर दिशा में पहले से स्थित तथा कंबल से ढकी हुई
स्वधा नाम की पितृ देवता में तुझे स्थापित करते हैं. दाताओं द्वारा ब्राह्मणों को दान की गई
पृथ्वी जिस प्रकार ऊपर की दिशा में स्वर्ग का पालन करती है उसी प्रकार स्वधा नाम की
पितृदेवता तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल में रूप में स्वर्ग का प्रवर्तन करने वालों की पूजा
हम हवि के द्वारा करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३३)
ध्रुवायां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी
द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३४)
हे प्रेत! स्थिर रहने वाली नीचे की दिशा में हम तुझे पहले से स्थित तथा कंबल से ढकी
हुई स्वधा नाम की पितृ देवता में स्थापित करते हैं. जिस प्रकार दाताओं द्वारा ब्राह्मणों के
लिए दान की गई पृथ्वी ऊपर की दिशा में स्वर्ग की रक्षा करती है, उसी प्रकार स्वधा नाम की
पितृ देवता तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों
की पूजा हम हवि के द्वारा करते हैं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३४)
ऊर्ध्वायां त्वा दिशि पुरा संवृतः स्वधायामा दधामि बाहुच्युता पृथिवी
द्यामिवोपरि.
लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ.. (३५)
हे प्रेत! मैं तुझे ऊपर की दिशा में स्थित स्वधा नाम की पितृ देवता में स्थापित करता हूं.
मैं पहले से ही कंबल से ढका हुआ हूं. जिस प्रकार पुण्य करने वालों द्वारा ब्राह्मणों को दान
की हुई पृथ्वी ऊपर की दिशा में स्थित स्वर्ग का पालन करती है, उसी प्रकार स्वधा देवी
तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों की पूजा मैं
हवि के द्वारा करता हूं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३५)
धर्तासि धरुणो ऽ सि वंसगो ऽ सि.. (३६)
हे अग्नि! तुम सब के धारणकर्ता एवं धरुण हो. (३६)
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उदपूरसि मधुपूरसि वातपूरसि.. (३७)
हे अग्नि! तुम उदक को पूर्ण करने वाले, मधु को पूर्ण करने एवं प्राण वायु को पूर्ण
करने वाले हो. (३७)
इतश्च मामुतश्चावतां यमे इव यतमाने यदैतम्.
प्र वां भरन् मानुषा देवयन्तो आ सीदतां स्वमु लोकं विदाने.. (३८)
हे पुरुष! जिन से हविर्धान होता है अर्थात् हवि दी जाती है, ऐसे द्यावा पृथ्वी, भूलोक
और स्वर्गलोक से होने वाले भय से तेरी रक्षा करें. हे द्यावा पृथ्वी! तुम जुड़वां संतानों के
समान सर्वत्र व्याप्त होने वाले हो, इसलिए तुम जगत् के पोषण के लिए आओ. स्तुतियों का
समूह तुम्हें इस प्रकार प्राप्त होता है. तुम जुड़वां संतान के समक्ष जगत् के पोषण हेतु प्रयत्न
करो. देवों की कृपा प्राप्त करने वाले पुरुष जब तुम्हें हवि प्रदान करें, तब तुम उस स्थान को
जानती हुई, वहां प्रतिष्ठित हो जाओ. (३८)
स्वासस्थे भवतमिन्दवे नो युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिः.
वि श्लोक एति पथ्येव सूरिः शृण्वन्तु विश्वे अमृतास एतत्.. (३९)
हे हविर्धान! तुम हमारे सोम के लिए सुख के आसन पर बैठी हुई एवं स्थिर होओ. तुम
से पूर्व काल में उत्पन्न नमकारात्मक मंत्रों का समूह तुम्हें विशेष रूप से प्राप्त हो. धर्म पथ पर
चलने वाला विद्वान् जिस प्रकार इच्छित फल प्राप्त करता है, उसी प्रकार मैं स्तोत्रों के सहित
तुम्हें नमस्कार करता हूं. ये स्तोत्र तुम्हें प्राप्त होते हैं. तुम हमारे सोम के लिए स्थिर बनो. हमारे
इस स्तोत्र को मरण रहित सभी देव सुनें. (३९)
त्रीणी पदानि रुपो अन्वरोहच्चतुष्पदीमन्वैतद् व्रतेन.
अक्षरेण प्रति मिमीते अर्कमृतस्य नाभावधि सं पुनाति.. (४०)
मृत पुरुष स्वर्ग में स्थित तीन सीढ़ियों को क्रम से चढ़ गया था. वह इस अनुत्तरणी गौ
को ध्यान में रखता हुआ द्युलोक के तीनों स्थानों में पहुंचा. तुम अपने द्वारा अर्जित विनाश
रहित पुण्य से सूर्यलोक को प्राप्त करो. इस प्रकार व्यक्ति सूर्य के समान हो जाता है. सूर्य में
फल सभी ओर से पूर्ण है. (४०)
देवेभ्यः कमवृणीत मृत्युं प्रजायै किममृतं नावॄणीत.
बृहस्पतिर्यज्ञमतनुत ऋषिः प्रियां यमस्तन्व १ मा रिरेच.. (४१)
सृष्टि के आरंभ में विधाता ने इंद्र आदि देवों के निमित्त किस प्रकार की मृत्यु की
व्यवस्था की थी? इस के बाद सूर्य पुत्र यम ने बृहस्पति के कृपा पात्र मनुष्यों की देह को सभी
ओर से खींच कर प्राण हीन किया. (४१)
त्वमग्न ईडितो जातवेदो ऽ वाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वा.
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प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषी.. (४२)
हे अग्नि! तुम उत्पन्न होने वाले मनुष्यों को जानने वाले हो. हमारे द्वारा स्तुति किए गए
तुम हमारे सुगंधित एवं रस युक्त चरु, पुरोडाश आदि को देवों के लिए वहन करो. तुम ने पितृ
देवताओं के लिए स्वधा शब्द के साथ काव्य नामक इंद्रियों को दिया है. उन पितरों ने तुम्हारे
द्वारा दी हुई हवियों का उपभोग किया है. हे प्रकाश युक्त अग्नि! तुम हमारे द्वारा अधिक मात्रा
में दी हुई हवियों का भक्षण करो. (४२)
आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय.
पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात.. (४३)
हे पितरो! लाल रंग की माताओं की गोद में बैठे हुए एवं हवि का दान करने वाले
मरणधर्मा यजमान के लिए धन प्रदान करो. वह प्रसिद्ध धन हम पुत्रों को प्रदान करो. हे
पितरो! तुम इस भूलोक में हमारे लिए बलकारक अन्न धारण करो. (४३)
अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः.
अत्तो हवींषि प्रयतानि बर्हिषि रयिं च नः सर्ववीरं दधात.. (४४)
पितर दो प्रकार के होते हैं. बर्हिषद एवं अग्निष्वात्त. इस मंत्र में अग्निष्वात्त पितरों को
संबोधित किया गया है. हे अग्निष्वात्त पितरो! इस यज्ञ में आओ. हम ने पिता, पितामह और
प्रपितामह आदि के लिए जो स्थान निश्चित किया है, उसे प्राप्त करो. कुशाओं पर जो हवियां
शुद्ध की गई हैं, उन चरु, पुरोडाश आदि हवियों का भक्षण करो. हवि भक्षण से संतुष्ट तुम
हमारे लिए सभी वीरों से युक्त धन प्रदान करो. (४४)
उपहूता नः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु.
त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु ते ऽ वन्त्वस्मान्.. (४५)
हमारे द्वारा बुलाए गए पितर सोमरस पान के अधिकारी हैं. वे अपनी हवियों के रखे
होने पर आएं एवं हमारे इस यज्ञ में हमारे स्तोत्र सुनें, हमारे प्रति पक्षपात पूर्ण वचन करें एवं
हमारी रक्षा करें. (४५)
ये नः पितुः पितरो ये पितामहा अनूजहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः.
तेभिर्यमः संरणणो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु.. (४६)
हमारे पिता के जो पितर हैं, उन को जन्म देने वाले अर्थात् हमारे बाबा अधिक धन वाले
थे और क्रम से सोम पान करते थे. उन पितरों के साथ रमण करते हुए यम कामना करते हुए
उन पितरों को हमारे द्वारा दिए हुए चरु, पुरोडाश आदि का भक्षण करें. (४६)
ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविद स्तोमतष्टासो अर्कैः.
आग्ने याहि सहस्रं देववन्दैः सत्यैः कविभिर्ऋषिभिर्घर्मसद्भिः.. (४७)
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देवों में व्याप्त होने वाले, सात परिक्रमा करने वालों के द्वारा किए हुए यज्ञों को जानते
हुए, अर्चनीय स्तुति करने वाले जो पितर प्यासे हैं, देवों को प्रणाम करने वाले, उन देवों के
साथ तथा सत्य फल एवं क्रांतदर्शी ऋषियों के साथ सोमयाग में बैठने वाले हे अग्नि! हमारे
लिए अपरिमित धन ले कर आओ. (४७)
ये सत्यासो हविर्दो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं तुरेण.
आग्ने याहि सुविद्वत्रेभिरर्वाङ् परैः पूर्वैर्ऋषिभिर्घर्मसद्भिः.. (४८)
जो पितर सत्य का भाषण करने वाले, चरु, पुरोडाश आदि हवियों का भक्षण करने
वाले, सोमरस का पान करने वाले इंद्र तथा अन्य देवों के साथ एक रथ पर बैठे हुए हैं. उन
शोभन धनों वाले एवं उत्कृष्ट पूर्व पुरुषों के साथ यज्ञ में बैठने वाले हे अग्नि! तुम शीघ्र हमारे
सामने आओ. (४८)
उप सर्प मातरं भूमिमेतामुरुव्यचसं पृथिवीं सुशेवाम्.
ऊर्णम्रदाः पृथिवी दक्षिणावत एषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात्.. (४९)
हे प्रेत! विस्तीर्ण व्याप्ति वाली, सुख देने वाली माता भूमि के समीप आओ. यह पृथ्‍वी
यज्ञ संबंधी बहुत सी दक्षिणाओं से युक्त तुम्हारे लिए ऊनों से बने हुए कंबल प्रदान करने वाली
एवं सुखकारी हो कर पूर्व दिशा के निमित्त मार्गों में तुम्हारी रक्षा करे. (४९)
उच्छ्वञ्चस्व पृथिवि मा नि बाधथाः सूपायनास्मै भव सूपसर्पणा.
माता पुत्रं यथा सिचाभ्येनं भूम ऊर्णुहि.. (५०)
हे भू देवता! तुम पुलकित हो जाओ और अपने समीप आए हुए पुरुष को बाधा मत दो.
अपितु इस पुरुष के सुख से प्राप्त होने वाली बनो. माता जिस प्रकार अपने पुत्र को आंचल से
ढकती है, उसी प्रकार अपने पास आए इस पुरुष को चारों ओर से ढक लो. इस से इसे शीत,
उष्ण आदि दुःख नहीं होंगे. (५०)
उच्छ्वञ्चमाना पृथिवी सु तिष्ठतु सहस्रं मित उप हि श्रयन्ताम्.
ते गृहासो घृतश्चुतः स्योना विश्वाहास्मै शरणाः सन्वत्र.. (५१)
पुलिकत पृथ्‍वी सुखपूर्वक स्थिर रहे. श्मशान में उगी हुई हजारों ओषधियां अर्थात्
जड़ीबूटियां तुम्हारे आश्रित हों, तुम्हारे लिए ही टपकाने वाली हों. इस मृत पुरुष के लिए सभी
दान सुख देने वाली पृथ्‍वी को गृह निर्माण के लिए धारण करते हैं. वे श्मशान देश में रक्षक
बनें. (५१)
उत्ते स्तभ्नामि पृथिवीं त्वत् परीमं लोगं निदधन्मो अहं रिषम्.
एतां स्थूणां पितरो धारयन्ति ते तत्र यमः सादना ते कृणोतु.. (५२)
हे मृत पुरुष! तेरे लिए मैं इस पृथ्वी को ऊंची बनाता हूं. तेरे चारों ओर सभी प्राणियों से
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युक्त इस भूलोक को धारण करता हुआ मैं हिंसा का आधार न बनूं. पितृ देवता उस प्रसिद्ध
यूनी को तुम्हारे घर का निर्णायक करने के लिए स्थापित करते हैं. (५२)
इममग्ने चमसं मा वि जिह्वरः प्रियो देवानामुत सोम्यानाम्.
अयं यश्चमसो देवपानस्तस्मिन् देवा अमृता मादयन्ताम्.. (५३)
हे अग्नि! खाने के इस साधन को टेढ़ा मत करो. यह चमचा देवों तथा मनुष्यों और
सोमरस के पात्र देवों को प्रसन्न करने वाला है. देवता इस चमस के द्वारा अमृत पीते हैं. इस
चमचे से मृत्यु रहित इंद्र आदि सभी देव प्रसन्न हैं. अथवा ऋषि के द्वारा बनाए हुए इस चम्मच
में स्थिति स्वादिष्ट स्वाद होने के कारण सभी देव प्रसन्न हैं. (५३)
अथर्वा पूर्ण चमसं यमिन्द्रायोबिभर्वाजिनीवते.
तस्मिन् कृणोति सुकृतस्य भक्षं तस्मिन्निन्दुः पवते विश्वदानीम्.. (५४)
अथर्वा नाम के ऋषि ने यज्ञ क्रिया वाले इंद्र को प्रसन्न करने के लिए सोमरस पीने का
साधन यह चमस भरा है. ऋत्विजों का समूह इस चमस से हवन से बची हुई हवि का भक्षण
करता है. अथर्वा ऋषि द्वारा बनाए हुए इस चम्मच के लिए चंद्रमा सदा सोमरस टपकाता है.
(५४)
यत् ते कृष्णः शकुन आतुतोद पिपीलः सर्प उत वा श्वापदः.
अग्निष्टद् विश्वादगदं कृणोतु सोमश्च यो ब्राह्मणां आविdefault/वेश.. (५५)
हे पुरुष! तेरे जिस अंग को काले रंग के पक्षी कौवे ने काट लिया है तथा विषैले दांतों
वाली विशेष चींटियों ने, सांप ने अथवा बाघ ने काट लिया है, तेरे उस अंग को सर्वभक्षक
अग्नि रोग रहित बनाएं. जिस सोम ने रस के रूप में ऋषियों में प्रवेश किया है, वह सोम तुझे
रोग रहित बनाए. (५५)
पयस्वतीरोषधयः पयस्वन्मामकं पयः.
अपां पयसो यत् पयस्तेन मा सह शुम्भतु.. (५६)
फल पकने पर समाप्त होने वाली ओषधियां हमारे लिए सार वाली हों. मेरे शरीर में
स्थित जो बल है, वह भी सार वाला बने. जलों से संबंधित दूध का जो सार अंश है, वह
फसलों और जड़ीबूटियों में स्थित सार अंश के साथ मुझे शोभन बनाए. जल के अधिकारी
देव वरुण स्नान से मुझे शुद्ध करें. (५६)
इमा नारीरविधवाः सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सं स्पृशन्ताम्.
अनश्रवो अनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे.. (५७)
प्रेत के कुल में उत्पन्न ये नारियां वैधव्य से हीन श्रेष्ठ पतियों वाली होती हुई घृत से मिले
हुए अंजन से स्पर्श प्राप्त करें. ये आंसू न बहाने वाली, रोगरहित और शोभन आभरणों वाली
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