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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 801 of 1063

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Page 801

उदह्रमायुरायुषे क्रत्वे दक्षाय जीवसे.
स्वान् गच्छतु ते मनो अधा पितँरुप द्रव.. (२३)
हे प्रेत! प्राणन अर्थात् सांस लेने और अपानन अर्थात् अपान वायु छोड़ने के व्यापार
अर्थात् कार्य के लिए मैं तेरी आयु का आह्वान करता हूं. तेरा मन संस्कार से उत्पन्न नवीन
शरीर को प्राप्त हो. इस के बाद तू पितरों के समीप पहुंच. (२३)
मा ते मनो मासोर्माङ्गानां मा रसस्य ते.
मा ते हास्त तन्व १: किं चनेह.. (२४)
हे प्रेत! तेरा मन और तेरी इंद्रियां तेरा त्याग न करें. तेरे प्राण के किसी अंश का क्षय न
हो. तेरे शरीर के अंगों में किसी प्रकार का विकार न हो. तेरे शरीर में रुधिर रस आदि भी पूरी
मात्रा में रहें. तेरा कोई भी भाग तुझ से अलग न हो. (२४)
मा त्वा वृक्षः सं बाधिष्ट मा देवी पृथिवी मही.
लोकं पितृषु वित्त्वैधव्व यमराजसु.. (२५)
हे प्रेत! तू जिस वृक्ष के नीचे बैठे, वह तुझे व्यथित न करे. तू जिस धरती का आश्रय ले,
वह भी तुझे पीड़ा न पहुंचाए. तू यम की प्रजा रूप पितरों के स्थान पर जा कर वृद्धि प्राप्त
कर. (२५)
यत् ते अङ्गमतिहासितं पराचैरपानः प्राणो य उ वा ते परेतः.
तत् ते संगत्यू पितरः सनीडा घासाद् घासं पुनरा वेशयन्तु.. (२६)
हे प्रेत! तेरा जो अंग तेरे शरीर से अलग हो गया था, जो प्राण वापस न होने के लिए तेरे
शरीर से निकल गए थे, उन सब को एक स्थान पर स्थित पितर तुझे एक शरीर से दूसरे शरीर
में प्रविष्ट करें. (२६)
अपेमं जीवा अरुधन् गृहेभ्यस्तं निर्वहत परि ग्रामादितः.
मृत्युर्यमस्यासीद् दूतः प्रचेता असून् पितृभ्यो गमयां चकार.. (२७)
हे जीवित बंधुओ! इस प्रेत को घर से ले जाओ. उसे उठा कर ग्राम से बाहर ले जाओ.
यम के दूत रूप मृत्यु ने इस के प्राणों को पितर के रूप में करने के लिए ले लिया है. (२७)
ये दस्यवः पितृषु प्रविष्टा ज्ञातिमुखा अहुतादश्चरन्ति.
परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टानस्मात् प्र धमाति यज्ञात्.. (२८)
जो राक्षसों के समान पिता, पितामह आदि पितरों में मिल कर बैठ जाते हैं, माया कर
के हवि का भक्षण करते हैं तथा पिंडदान करने वाले पुत्रों और पौत्रों की हिंसा करते हैं, उन
मायावी राक्षसों को पितृयाग से अग्नि देव बाहर निकालें. (२८)
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