अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextशत्रुओं तथा उन के उपद्रवों को दबाएं. (५९)
धनुर्हस्तादाददानो मृतस्य सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन.
समागृभाय वसु भूरि पुष्टमर्वाङ् त्वमेह्युप जीवलोकम्.. (६०)
मृतक क्षत्रिय के हाथ से धनुष ग्रहण करता हुआ मैं तेज और बल से युक्त होऊं. हे
धनुष! तू इस जीवित लोक में ही हमारे सामने आ तथा हमें देने के लिए धन ला. (६०)
सूक्त-३ देवता—यम
इयं नारी पतिलोकं वृणाना नि पद्यत उप त्वा मर्त्य प्रेतम्.
धर्मं पुराणमनुपालयन्ती तस्यै प्रजां द्रविणं चेह धेहि.. (१)
यह स्त्री धर्म का पालन करने के लिए तेरे दान आदि की इच्छा करती हुई तेरे समीप
आती है. इस प्रकार तेरा अनुकरण करने वाली इस स्त्री को तू अगले जन्म में भी संतान वाली
बनाना. (१)
उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि.
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ.. (२)
हे नारी! तू इस प्राणहीन पति के पास बैठी है. अब तू इस के पास से उठ. तू अपने पति
से उत्पन्न हुए पुत्र, पौत्र आदि को प्राप्त हो गई है. (२)
अपश्यं युवतिं नीयमानां जीवां मृतेभ्यः परिणीयमानाम्.
अन्धेन यत् तमसा प्रावृतासीत् प्राक्तो अपाचीमनयं तदेनाम्.. (३)
मैं तरुण अवस्था वाली जीवित गौ को मृतक के समीप ले जाई जाती हुई देखता हूं. यह
भी अज्ञान से ढकी हुई है, इसलिए मैं इसे शव के पास से हटा कर अपने सामने लाता हूं. (३)
प्रजानत्यघ्न्ये जीवलोकं देवानां पन्थामनुसंचरन्ती.
अयं ते गोपतिस्तं जुषस्व स्वर्गं लोकमधि रोहयैनम्.. (४)
हे गौ! तू पृथ्वीलोक को भलीभांति जानती तथा यज्ञ मार्ग को देखती है. तू दूध, दही
आदि से युक्त हो कर जा. तू अपने उस स्वामी का सेवन कर जो गायों का स्वामी है. तू इस
मृतक को स्वर्ग की प्राप्ति करा. (४)
उप द्यामुप वेतसमवत्तरो नदीनाम्. अग्ने पित्तमपामसि.. (५)
जल में उगी हुई काई और बेंत में जल का सार अंश है जो उन का रक्षक है. हे अग्नि! तू
जल संबधी पित्त है. इसलिए मैं तुझे बेंत की शाखा, नदी के फेन और दूब आदि से शांत
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