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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 802 of 1063

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Page 802

सं विशन्त्विह पितरः स्वा नः स्योनं कृण्वन्तः प्रतिरन्त आयुः.
तेभ्यः शकेम हविषा नक्षमाणा ज्योग् जीवन्तः शरदः पुरूचीः. (२९)
हमारे गोत्र में उत्पन्न पिता, पितामह आदि सभी पितर भलीभांति यज्ञ में आ कर बैठें
तथा हमें सुखी बनाएं. वे हमारी आयु की वृद्धि करें. हम भी आयु प्राप्त कर के हवियों द्वारा
पितरों को पूजते हुए चिरकाल तक जीवित रहें. (२९)
यां ते धेनुं निपृणामि यमु ते क्षीर ओदनम्.
तेना जनस्यासो भर्ता यो ऽ त्रासदजीवनः. (३०)
हे प्रेत! मैं तेरे निमित्त गोदान करता हूं. मैं तेरे लिए दूध से बना जो भात देता हूं, उस के
द्वारा तू यमलोक में अपने जीवन को पुष्ट करने वाला हो. (३०)
अश्वावतीं प्र तर या सशेवार्क्षाकं वा प्रतरं नवीयः.
यस्त्वा जघान वध्यः सो अस्तु मा सो अन्यद् विदत् भागधेयम्.. (३१)
हे प्रेत! मैं नए वन मार्ग में रीछ आदि दुष्ट पशुओं से बचता हुआ पार हो जाऊं. तू हमें
अश्वावती नदी के उस पार उतार दे. यह नदी हमें सुख देने वाली हो. जिस ने तेरा वध किया
है, वह वध के योग्य होता हुआ उपभोग के योग्य पदार्थ न पा सके. (३१)
यमः परो ऽ वरो विवस्वान् ततः परं नाति पश्यामि किं चन.
यमे अध्वरो अधि मे निविष्टो भुवो विवस्वानन्वाततान.. (३२)
सूर्य के पुत्र यम अपने पिता से भी अधिक तेजस्वी हैं. मैं किसी भी प्राणी को यम से
श्रेष्ठ नहीं पाता हूं. तेरा यज्ञ उन श्रेष्ठ यम में व्याप्त हो रहा है. यज्ञ की सिद्धि के लिए ही सूर्य ने
भूखंडों को विस्तृत किया है. (३२)
अपागूहन्नमृतां मर्त्येभ्यः कृत्वा सवर्णांमदधुर्विवस्वते.
उताश्विनावभरद् यत् तदासीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः. (३३)
मरणधर्मा मनुष्यों से देवताओं ने अपनेअपने अविनाशी रूप अदृश्य कर लिए. उन्होंने
सूर्य को अन्य वर्ण वाली स्त्री बना कर दी. सरण्यु ने घोड़ी का रूप धारण कर के
अश्विनीकुमारों का पालन किया. त्वष्टा की पुत्री सरण्यु ने सूर्य का घर छोड़ते समय यमयमी
के जोड़े को घर पर ही छोड़ा था. (३३)
ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः.
सर्वांस्तानग्न आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (३४)
जो पिता भूमि में गाड़े जा कर, जो काठ के समान त्यागे जा कर तथा जो अग्नि दाह के
संस्कार के द्वारा ऊपर स्थित पितृलोक को प्राप्त हुए हैं, इस प्रकार के पितरो! हवि भक्षण के
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