अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 814 of 1063
Read in contextउदपूरसि मधुपूरसि वातपूरसि.. (३७)
हे अग्नि! तुम उदक को पूर्ण करने वाले, मधु को पूर्ण करने एवं प्राण वायु को पूर्ण
करने वाले हो. (३७)
इतश्च मामुतश्चावतां यमे इव यतमाने यदैतम्.
प्र वां भरन् मानुषा देवयन्तो आ सीदतां स्वमु लोकं विदाने.. (३८)
हे पुरुष! जिन से हविर्धान होता है अर्थात् हवि दी जाती है, ऐसे द्यावा पृथ्वी, भूलोक
और स्वर्गलोक से होने वाले भय से तेरी रक्षा करें. हे द्यावा पृथ्वी! तुम जुड़वां संतानों के
समान सर्वत्र व्याप्त होने वाले हो, इसलिए तुम जगत् के पोषण के लिए आओ. स्तुतियों का
समूह तुम्हें इस प्रकार प्राप्त होता है. तुम जुड़वां संतान के समक्ष जगत् के पोषण हेतु प्रयत्न
करो. देवों की कृपा प्राप्त करने वाले पुरुष जब तुम्हें हवि प्रदान करें, तब तुम उस स्थान को
जानती हुई, वहां प्रतिष्ठित हो जाओ. (३८)
स्वासस्थे भवतमिन्दवे नो युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिः.
वि श्लोक एति पथ्येव सूरिः शृण्वन्तु विश्वे अमृतास एतत्.. (३९)
हे हविर्धान! तुम हमारे सोम के लिए सुख के आसन पर बैठी हुई एवं स्थिर होओ. तुम
से पूर्व काल में उत्पन्न नमकारात्मक मंत्रों का समूह तुम्हें विशेष रूप से प्राप्त हो. धर्म पथ पर
चलने वाला विद्वान् जिस प्रकार इच्छित फल प्राप्त करता है, उसी प्रकार मैं स्तोत्रों के सहित
तुम्हें नमस्कार करता हूं. ये स्तोत्र तुम्हें प्राप्त होते हैं. तुम हमारे सोम के लिए स्थिर बनो. हमारे
इस स्तोत्र को मरण रहित सभी देव सुनें. (३९)
त्रीणी पदानि रुपो अन्वरोहच्चतुष्पदीमन्वैतद् व्रतेन.
अक्षरेण प्रति मिमीते अर्कमृतस्य नाभावधि सं पुनाति.. (४०)
मृत पुरुष स्वर्ग में स्थित तीन सीढ़ियों को क्रम से चढ़ गया था. वह इस अनुत्तरणी गौ
को ध्यान में रखता हुआ द्युलोक के तीनों स्थानों में पहुंचा. तुम अपने द्वारा अर्जित विनाश
रहित पुण्य से सूर्यलोक को प्राप्त करो. इस प्रकार व्यक्ति सूर्य के समान हो जाता है. सूर्य में
फल सभी ओर से पूर्ण है. (४०)
देवेभ्यः कमवृणीत मृत्युं प्रजायै किममृतं नावॄणीत.
बृहस्पतिर्यज्ञमतनुत ऋषिः प्रियां यमस्तन्व १ मा रिरेच.. (४१)
सृष्टि के आरंभ में विधाता ने इंद्र आदि देवों के निमित्त किस प्रकार की मृत्यु की
व्यवस्था की थी? इस के बाद सूर्य पुत्र यम ने बृहस्पति के कृपा पात्र मनुष्यों की देह को सभी
ओर से खींच कर प्राण हीन किया. (४१)
त्वमग्न ईडितो जातवेदो ऽ वाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वा.
ebook converter DEMO Watermarks*