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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 806 of 1063

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Page 806

पूषा त्वेतश्च्यावयतु प्र विद्वाननष्टपशुर्भुवनस्य गोपाः.
स त्वैतेभ्यः परि ददत् पितृभ्योऽग्निर्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः.. (५४)
हे प्रेत! पशुओं की हिंसा न करने वाले पशुपालक पूषा तुझे यहां से उस स्थानों से ले
जाएं. प्राणियों की रक्षा करने वाले ये दोनों तुझे पितरों को अर्पण करें. अग्नि देव तुझे ऐश्वर्य
वाले देवताओं को सौंपें. (५४)
आयुर्विश्वायुः परि पातु त्वा पूषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात्.
यत्रासते सुकृतो यत्र त ईयुस्तत्र त्वा देवाः सविता दधातु.. (५५)
जीवन का अभिमानी देवता आयु तेरा रक्षक हो. पूषा देव तेरे उस मार्ग की रक्षा करें जो
पूर्व की ओर जाता हो. हे प्रेत! पुण्य आत्माओं के निवास रूप स्वर्ग में सविता देव तुझे
पहुंचाएं. (५५)
इमौ युनज्मि ते वह्नी असुनीताय वोढवे.
ताभ्यां यमस्य सादनं समितींश्चाव गच्छतात्.. (५६)
हे मृतक! भार ढोने वाले इन बैलों को मैं तेरे लिए छोड़ रहा हूं. मैं इन्हें प्राणों का वहन
करने के लिए बैलगाड़ी में जोड़ता हूं. बैलों से युक्त इस गाड़ी के द्वारा तू यम के घर को प्राप्त
हो. (५६)
एतत् त्वा वासः प्रथमं न्वागन्नपैतदूह यदिहाबिभः पुरा.
इष्टापूर्तमनुसंक्राम विद्वान् यत्र ते दत्तं बहुधा विबन्धुषु.. (५७)
हे मृतक! तू अपने पहने हुए मुख्य वस्त्र को त्याग. जिन इच्छाओं की पूर्ति के लिए तूने
अपने बांधवों को धन दिया था, उस इष्ट कर्म के फल के रूप बावड़ी, कुआं, तालाब आदि को
प्राप्त हो. (५७)
अग्नेर्वर्म परि गोभिर्व्ययस्व सं प्रोर्णुष्व मेदसा पीवसा च.
नेत् त्वा धृष्णुर्हरसा जर्हृषाणो दधृग् विधक्षन् परीङ्खयातै.. (५८)
हे प्रेत! इंद्रियों संबंधी अवयवों से तू अग्नि का पाप निवारक कवच पहन. अपने भीतर
विद्यमान स्थूल चरबी से ये अग्नि तुझे अधिक भस्म करने की इच्छा रखते हुए इधरउधर न
गिराएं. (५८)
दण्डं हस्तादाददानो गतासोः सह श्रोत्रेण वर्चसा बलेन.
अत्रैव त्वमिह वयं सुवीरा विश्वा मृधो अभिमातीर्जयेम.. (५९)
ब्राह्मण के हाथ से बांस के दंड को ग्रहण करता हुआ मैं कानों के तेज तथा उस से प्राप्त
बल से युक्त रहूं. हे प्रेत! तू इस चिता में ही रह. हम इस पृथ्वी पर सुख से रहते हुए अपने