अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.
The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.
The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.
यथा सूर्यो मुच्यते तमसस्परि रात्रिं जहात्युषसश्च केतून्.
एवाहं सर्वं दुर्भूतं कर्त्रं कृत्याकृता कृतं हस्तीव रजो दुरितं जहामि.. (३२)
जिस प्रकार सूर्य अंधकार से छूट जाता है और रात्रि तथा उषा के उत्पत्ति के कारणों को
त्याग देता है और हाथी जिस प्रकार अपने शरीर पर लगी हुई धूल झाड़ देता है, उसी प्रकार
मैं कृत्या का निर्माण करने वाले के कर्म को अपने से पूरी तरह दूर करता हूं. (३२)
सूक्त-२ देवता—ब्रह्म-प्रकाशन
केन पाष्णी आभृते पूरुषस्य केन मांसं संभृतं केन गुल्फौ.
केनाङ्गुली: पेशनी: केन खानि केनोच्छ्लङ्खौ मध्यतः कः प्रतिष्ठाम्.. (१)
मनुष्य की एड़ियों को, टखनों को और मांस को किस ने पुष्ट बनाया? मनुष्य की सुंदर
उंगलियों को किस ने पुष्ट किया? उंगलियों के मध्य में नसों को किस ने स्थित किया? (१)
कस्मान्नु गुल्फावधरावकृण्वन्नष्ठीवन्तावुत्तरौ पूरुषस्य.
जङ्घे निर्ऋत्य न्यदधुः स्व स्विज्जानुनोः सन्धी क उ तच्चिकेत.. (२)
नीचे के टखनों को किस से बनाया गया? पुरुष के घुटनों को, जांघों को तथा चरणों के
मध्य को किस से बनाया गया? घुटनों का जोड़ कहां है और उसे कौन जानता है? (२)
चतुष्टयं युज्यते संहितान्तं जानुभ्यामूर्ध्वं शिथिरं कबन्धम्.
श्रोणी यदूरू क उ तज्जजान याभ्यां कुसिन्धं सुदृढं बभूव.. (३)
घुटनों के ऊपर चारों भाग हैं—शिथिल, धड़, कंधे और जंघाएं. इन्हें किस ने बनाया,
जिस से शरीर का भाग धड़ दृढ़ हुआ? (३)
कति देवाः कतमे त असन् य उरो ग्रीवाश्चिक्युः पूरुषस्य.
कति स्तनौ व्यदधुः कः कफोडौ कति स्कन्धान् कति पृष्टीरचिन्वन्.. (४)
वे देव कितने थे, जिन्होंने पुरुष के हृदय को और गरदन को बनाया? कितने देवों ने
पुरुष के स्तन बनाए. फेफड़ों को किस ने बनाया? कंधों की रचना कितने देवों ने की? पीठ
की रचना कितने देवों ने की? (४)
को अस्य बाहू समभरद् वीर्यं करवादिति.
अंसौ को अस्य तद् देवः कुसिन्धे अध्या दधौ.. (५)
किस देव ने मनुष्य के बाहुओं को शक्ति से भर दिया और किस ने उस में वीर्य की रचना
की? पुरुष के कंधों की रचना करने वाला देव कौन है? इसे धड़ पर किस ने स्थापित किया?
(५)
eBook converter DEMO Watermarks*
कः सप्त खानि वि ततर्द शीर्षणि कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्.
येषां पुरुत्रा विजयस्य मह्मानि चतुष्पादो द्विपदो यन्ति यामम्.. (६)
मनुष्य के सिर में सात छेद अर्थात् दो कान, दो नथुने, दो आंखें और एक मुख किस देव
ने बनाया? इन्हीं देवों की महिमा से दो पैरों और चार पैरों वाले प्राणी अनेक स्थानों में गति
करते हुए यमराज के स्थान पर जाते हैं. (६)
हन्वोर्हि जिह्वमदधात् पुरूचीमधा महीमधि शिश्राय वाचम्.
स आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तरपो वसानः क उ तच्चिकेत.. (७)
अनेक स्थलों को छूने वाली जीभ को ठोड़ी में किस ने स्थापित किया? जीभ में वाणी
की स्थापना किस ने की. अपने शरीर के भीतर जल को धारण करता हुआ कौन सा देव
प्राणियों में व्याप्त है? उस का जानने वाला कौन है? (७)
मस्तिष्कमस्य यतमो ललाटं ककाटिकां प्रथमो यः कपालम्.
चित्वा चित्यं हन्वोः पुरुषस्य दिवं रुरोह कतमः स देवः.. (८)
इस का मस्तिष्क, ललाट और जबड़ों के जोड़ एवं कपाल किस ने बनाया? वह देव
कौन सा है? पुरुष की ठोड़ी की हड्डियों को जोड़ कर जो स्वर्ग को गया था, वह देव कौन सा
है? (८)
प्रियाप्रियाणि बहुला स्वप्नं संबाधतन्द्रयः.
आनन्दानुग्रो नन्दांश्च कस्माद् वहति पूरुषः.. (९)
मनुष्य के प्रिय और अप्रिय स्वप्नों को, संबंधित इंद्रियों को, आनंद को तथा दुःख को
कौन सा देव धारण करता है? (९)
आर्तिरवर्तिर्निर्ऋतिः कुतो नु पुरुषे ऽ मतिः.
राद्धिः समृद्धिव्र्युद्धिर्मतिरूदितयः कुतः.. (१०)
पुरुष में पाप, आजीविका विरोधी तत्त्व, दुष्कर्म आदि कहां से प्राप्त होते हैं? इसे ऋद्धि,
सिद्धि, समृद्धि, बुद्धि एवं उन्नति कहां से प्राप्त होती है. (१०)
को अस्मिन्नापो व्यदधाद् विषूवृतः पुरूवृतः सिन्धुसृत्याय जाताः.
तीव्रा अरुणा लोहिनीस्ताम्रधूम्रा ऊर्ध्वा अवाचीः पुरुषे तिरश्चीः.. (११)
इस पुरुष में सर्वत्र विद्यमान सागर को और सदा तेजी से बहने वाले जलों को किस ने
प्रविष्ट किया है जो लाल, लोहित, तांबई एवं धुमेले रंग के हैं? इन जलों को ऊपर, नीचे और
तिरछा जाने की शक्ति किस ने प्रदान की? (११)
ebook converter DEMO Watermarks*
को अस्मिन् रूपमदधात् को मह्मानं च नाम च.
गांतुं को अस्मिन् कः केतुं कश्चरित्राणि पूरुषे.. (१२)
किस देव ने पुरुष में रूप, महिमा एवं नाम को धारण किया? इसे ज्ञान, चरित्र और गति
किस देव ने प्रदान की? (१२)
को अस्मिन् प्राणमवयत् को अपानं व्यानमु.
समानमस्मिन् को देवो ऽ धि शिश्राय पूरुषे.. (१३)
इस पुरुष में प्राण, अपान एवं व्यान वायु को किस ने धारण किया? इस पुरुष में समान
वायु को किस ने आश्रित किया? (१३)
को अस्मिन् यज्ञमदधादेको देवो ऽ धि पूरुषे.
को अस्मिन्सत्यं को ऽ नृतं कुतो मृत्युः कुतो ऽ मृतम्.. (१४)
किस प्रधान देव ने इस पुरुष में यज्ञ रूप कर्म को स्थापित किया है? इस में सत्य,
असत्य, अमृत और मृत्यु की स्थापना किस ने की? (१४)
को अस्मै वासः पर्यदधात् को अस्यायुरकल्पयत्.
बलं को अस्मै प्रायच्छत् को अस्याकल्पयज्जवम्.. (१५)
इस पुरुष के शरीर पर त्वचा रूपी वस्त्र किस ने रखा और इस की आयु की रचना किस
देव ने की? इस पुरुष के लिए बल किस देव ने प्रदान किया और किसने इसे गति दी? (१५)
केनापो अन्वतनुत केनाहरकरोद् रुचे.
उषसं केनान्वैन्ध्द्ध केन सायंभवं ददे.. (१६)
किस देव ने इस पुरुष के लिए जल की रचना की और किस ने इस के लिए प्रकाश
वाला दिवस बनाया? उषा को किस देव ने उज्ज्वल किया तथा सायंकाल किस ने प्रदान
किया? (१६)
को अस्मिन् रेतो न्यदधात् तन्तुरा तायतामिति.
मेधां को अस्मिन्नध्यौहत् को बाणं को नृतो दधौ.. (१७)
इस पुरुष में वीर्य का आधान किस ने किया, जिस से प्रजा रूपी तंतु का विस्तार हो
सके? इस पुरुष में बुद्धि की स्थापना किस देव ने की तथा किस ने इस में बाण धारण किया?
(१७)
केनेमां भूमिमौर्णोत् केन पर्यभवद् दिवम्.
केनाभि मह्ना पर्वतान् केन कर्माणि पूरुषः.. (१८)
ebook converter DEMO Watermarks*
पुरुष ने किस प्रकार से भूमि को आवृत्त किया तथा यह किस प्रभाव से स्वर्ग पर आरूढ़
हुआ? यह पुरुष किस प्रभाव से पर्वतों पर आरोहण करता और कर्म करता है? (१८)
केन पर्जन्यमन्वेति केन सोमं विचक्षणम्.
केन यज्ञं च श्रद्धां च केनास्मिन् निहितं मन:.. (१९)
यह पुरुष किस प्रभाव से बादलों को प्राप्त करता और सोमलता को खोजता है? यह
पुरुष यज्ञ को और श्रद्धा को किस के द्वारा प्राप्त करता है तथा इस के मन को उत्तम कर्मों में
किस ने संलग्न किया है? (१९)
केन श्रोत्रियमाप्नोति केनेमं परमेष्ठिनम्.
केनेममग्निं पूरुषः केन संवत्सरं ममे.. (२०)
यह पुरुष किस के द्वारा श्रोत्रिय ब्राह्मण को प्राप्त करता है? यह किस के द्वारा परमेष्ठी
को पाता है? यह पुरुष अग्नि को किस के द्वारा प्रेरित करता है और संवत्सर की गणना कैसे
कर पाता है? (२०)
ब्रह्म श्रोत्रियमाप्नोति ब्रह्मेमं परमेष्ठिनम्.
ब्रह्मेममग्निं पूरुषो ब्रह्म संवत्सरं ममे.. (२१)
ब्रह्म श्रोत्रिय को प्राप्त करता है और ब्रह्म ही परमेष्ठी को प्राप्त करता है. ब्रह्म ही यह
पुरुष है और अग्नि को प्राप्त करता है तथा संवत्सर की गणना करता है. (२१)
केन देवाँ अनु क्षियति केन दैवजनीर्विशः.
केनेदमन्यन्नक्षत्रं केन सत् क्षत्रमुच्यते.. (२२)
पुरुष किस कर्म के द्वारा देवों की अनुकूलता प्राप्त करता है तथा किस कर्म को देवी
प्रजा के अनुकूल बनाता है. यह पुरुष इस कर्म के द्वारा क्षत्र नहीं बनता और किस कर्म के
द्वारा क्षत्र कहलाता है? (२२)
ब्रह्म देवाँ अनु क्षियति ब्रह्म दैवजनीर्विशः.
ब्रह्मेदमन्यन्नक्षत्रं ब्रह्म सत् क्षत्रमुच्यते.. (२३)
ब्रह्म देवों के अनुकूल रहता है तथा ब्रह्म ही दैवी प्रजाओं के अनुकूल व्यवहार करता है.
ब्रह्म ही क्षत्र का अभाव है और ब्रह्म ही उत्तम धन कहलाता है. (२३)
केनेयं भूमिविर्हिता केन द्यौरुत्तरा हिता.
केनेदमूर्ध्वं तिर्यक् चान्तरीक्षं व्यचो हितम्.. (२४)
इस भूमि को किस ने स्थापित किया है तथा द्यौ को इस के ऊपर किस ने स्थित किया
ebook converter DEMO Watermarks*
है? यह ऊपर का भाग, तिरछा भाग एवं अनेक प्राणियों के लिए हितकारी अंतरिक्ष किस ने
बनाया? (२४)
ब्रह्मणा भूमिर्विहिता ब्रह्म द्यौरुत्तरा हिता.
ब्रह्मेदंमूर्ध्वं तिर्यक् चान्तरिक्षं व्यचो हितम्.. (२५)
ब्रह्म ने भूमि को स्थापित किया है और ब्रह्म ने ही इस के ऊपरी भाग में द्यौ को स्थित
किया है. ब्रह्म ही ऊपर एवं तिरछा है तथा ब्रह्म ने अनेक प्राणियों के हितकारी अंतरिक्ष की
रचना की है. (२५)
मूर्धानमस्य संसीव्याथर्वा हृदयं च यत्.
मस्तिष्कादूर्ध्वः प्रेरयत् पवमानो ऽ धि शीर्षतः.. (२६)
अथर्वा ने मूर्धा और हृदय की एकरूपता स्थापित की. इस ऊपर गमन करने वाले पवन
ने मस्तिष्क के द्वारा उत्तम प्रेरणा प्रदान की. (२६)
तद् वा अथर्वणः शिरो देवकोशः समुब्जितः.
तत् प्राणो अभि रक्षति शिरो अन्नमथो मनः.. (२७)
अथर्वा की वह वाणी देवकोष के रूप में उपस्थित हुई. प्राण और मन उस अन्नमय शीश
की रक्षा करते हैं. (२७)
ऊर्ध्वो नु सृष्टा ३ स्तिर्यङ् नु सृष्टा ३ः सर्वा दिशः पुरुष आ बभूवाँ ३.
पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते.. (२८)
जिस ब्रह्म को पुरुष कहा जाता है, उस की पुरी को जो जानता है, उसी ने ऊपरी और
तिरछे भागों का निर्माण किया है. वही पुरुष समस्त दिशाओं में व्याप्त है. (२८)
यो वै तां ब्रह्मणो वेदामृतेनावृतां पुरम्.
तस्मै ब्रह्म च ब्राह्माश्च चक्षुः प्राणं प्रजां ददुः.. (२९)
जो व्यक्ति ब्रह्म की उस पुरी को जानता है, जो अमृत अर्थात् मरणहीनता से ढकी हुई
है, उस पुरुष को ब्रह्म एवं मंत्र चक्षु, प्राण एवं संतान प्रदान करते हैं. (२९)
न वै तं चक्षुर्जहाति न प्राणो जरसः पुरा.
पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते.. (३०)
जो ब्रह्म की पुरी अर्थात् निवास स्थान को जानता है और उस में शयन करने के कारण
ही ब्रह्म पुरुष कहा जाता है, उसे जो जानता है, वृद्धावस्था तक नेत्र एवं प्राण उस का त्याग
नहीं करते. (३०)
ebook converter DEMO Watermarks*
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या.
तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः.. (३१)
देवों की नगरी आठ चक्रों और नौ द्वारों वाली है. कोई युद्ध कर के उसे जीत नहीं
सकता. उस में हिरण्यमय कोष और प्रकाश से ढका हुआ स्वर्ण है. (३१)
तस्मिन् हिरण्यये कोशे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते.
तस्मिन् यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः.. (३२)
उस नौ द्वारों वाले हिरण्यमय कोष में जो आत्मा स्थित है, वहां जो यज्ञ का विस्तार
करते हैं, वे ही ब्रह्मज्ञानी माने जाते हैं. (३२)
प्रभ्राजमानां हरिणीं यशसा संपरीवृताम्.
पुरं हिरण्ययीं ब्रह्मा विवेशापराजिताम्.. (३३)
उस प्रकाशमान, पाप का विनाश करने वाली, यश से ढकी हुई एवं हिरण्यमय पुरी में
ब्रह्म प्रवेश करता है. (३३)
सूक्त-३ देवता—वरणमणि, वनस्पति
अयं मे वरणो मणिः सपत्नक्षयणो वृषा.
तेना रभस्व त्वं शत्रून् प्र मृणीहि दुरस्यतः.. (१)
यह मेरी वरण वृक्ष की मणि शत्रुओं का नाश करने वाली और अभिलाषा पूरक है. इसे
धारण कर के तू उद्योग कर और दुष्टता करने वाले शत्रुओं का विनाश कर. (१)
प्रैणान्छृणीहि प्र मृणा रभस्व मणिस्ते अस्तु पुरएता पुरस्तात्.
अवारयन्त वरणेन देवा अभ्याचारमसुराणां श्वः श्वः.. (२)
तू इन शत्रुओं का विनाश कर, इन्हें मसल दे और प्रसन्न बन. यह मणि तेरे आगेआगे
चले. वरण वृक्ष से निर्मित इस मणि की सहायता से देवों ने असुरों द्वारा किए गए जादूटोनों
का दूसरे दिन ही निवारण कर दिया था. (२)
अयं मणिवरणो विश्वभेषजः सहस्राक्षो हरितो हिरण्ययः.
स ते शत्रूनधरान् पादयाति पूर्वस्तान् दभ्नुहि ये त्वा द्विषन्ति.. (३)
वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि समस्त रोगों की ओषधि है. यह मणि हजार आंखों वाले
इंद्र के समान शक्तिशालीनी, हरे रंग की और हिरण्यमय है. यह मणि तेरे शत्रुओं को मार
डाले, उस से पहले ही तू उन का विनाश कर दे. (३)
ebook converter DEMO Watermarks*
अयं ते कृत्यां विततां पौरुषेयादयं भयात्.
अयं त्वा सर्वस्मात् पापाद् वरणो वारयिष्यते.. (४)
तेरे निमित्त जो कृत्या बनाई गई है, यह वरण वृक्ष से निर्मित मणि उस को प्रभावहीन
बना देगी एवं तुझे भयरहित कर देगी. दिव्य वनस्पति से निर्मित यह मणि तेरे सभी पापों का
विनाश कर देगी. (४)
वरणो वारयाता अयं देवो वनस्पतिः.
यक्ष्मो यो अस्मिन्नाविष्टस्तमु देवा अवीवरन्.. (५)
दिव्य गुणों से संपन्न यह वरण वृक्ष से निर्मित मणि हमारे शरीर में प्रविष्ट यक्ष्मा रोग के
साथ हमारे शत्रुओं को भी समाप्त कर देगी. (५)
स्वप्नं सुप्त्वा यदि पश्यासि पापं मृगः सृतिं यदि धावादजुष्टाम्.
परिक्षवाच्छकुनेः पापवादादयं मणिवरणो वारयिष्यते.. (६)
हे पुरुष! वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि पापपूर्ण स्वप्न के भय से, अनिच्छित दिशा की
ओर दौड़ने वाले मृग से, छींक से तथा कौआ आदि पक्षी से संबंधित अपशकुनों से तुझे
बचाएगी. (६)
अरात्यास्त्वा निर्ऋत्या अभिचारादथो भयात्.
मृत्योरोजीयसो वधाद् वरणो वारयिष्यते.. (७)
हे पुरुष! यह मणि शत्रु से, निर्ऋति नामक पाप देवता से, जादूटोने के भय से तथा मृत्यु
से तुम्हारी रक्षा करे. (७)
यन्मे माता यन्मे पिता भ्रातरो यच्च मे स्वा यदेनश्चकृमा वयम्.
ततो नो वारयिष्यते ऽ यं देवो वनस्पतिः.. (८)
यह वनस्पति से निर्मित दिव्य गुण वाली मणि मेरी माता, मेरे पिता, मेरे भ्राता और मुझे
किए गए समस्त पापों से बचाएगी. (८)
वरणेन प्रव्यथिता भ्रातृव्या मे सबन्धवः.
असूर्तं रजो अप्यगुस्ते यन्त्वधमं तमः.. (९)
मेरे जो बांधव एवं भतीजे मुझ से शत्रुता रखते हैं, वे वरण वृक्ष से निर्मित इस मणि के
प्रभाव से व्यथित हों. वे कष्टदायिनी धूल को प्राप्त हों तथा घने अंधकार में प्रवेश करें. (९)
अरिष्टो ऽ हमरिष्टगुरायुष्मान्त्सर्वपूरुषः.
तं मा ऽ यं वरणो मणिः परि पातु दिशोदिशः.. (१०)
ebook converter DEMO Watermarks*
हिंसा रहित मैं शांति प्राप्त कर रहा हूं. मेरी संतान, परिवारीजन एवं सेवक अधिक
अवस्था प्राप्त करें. वरण वृक्ष से निर्मित यह शक्तिशालिनी मणि उन की सभी प्रकार रक्षा
करे. (१०)
अयं मे वरण उरसि राजा देवो वनस्पतिः.
स मे शत्रून् वि बाधतामिन्द्रो दस्यूनिवासुरान्.. (११)
वरण वृक्ष से निर्मित यह दिव्य मणि मेरे सीने पर स्थित है. इंद्र ने जिस प्रकार असुरों का
विनाश किया, उसी प्रकार यह मेरे शत्रुओं का विनाश करे. (११)
इमं बिभर्मि वरणमायुष्माञ्छतशारदः.
स मे राष्ट्रं च क्षत्रं च पशूनोजश्व मे दधत्.. (१२)
सौ की आयु प्राप्त करने का इच्छुक मैं इस मणि को धारण करता हूं. यह मणि मेरे राष्ट्र,
बल, पशुओं एवं घोड़े की रक्षा करे. (१२)
यथा वातो वनस्पतीन् वृक्षान् भनक्त्योजसा.
एवा सपत्नान् मे भङ्ग्धि पूर्वान्जाताँ उतापरान् वरणस्त्वा ऽ भि रक्षतु..
(१३)
वायु जिस प्रकार अपनी शक्ति से वृक्षों एवं वनस्पतियों को तोड़ देती है, उसी प्रकार यह
मणि मेरे पूर्ववर्ती और बाद में होने वाले शत्रुओं का विनाश कर के मेरी रक्षा करे. (१३)
यथा वातश्चाग्निश्च वृक्षान् प्सातो वनस्पतीन्.
एवा सपत्नान् मे प्साहि पूर्वान्जाताँ उतापरान् वरणस्त्वा ऽ भि रक्षतु..
(१४)
हे वरण वृक्ष से निर्मित मणि! वायु एवं अग्नि जिस प्रकार वृक्षों के पास जा कर उन्हें
जला डालते हैं, उसी प्रकार तुम मेरे पूर्ववर्ती और बाद में होने वाले शत्रुओं का विनाश करो.
(१४)
यथा वातेन प्रक्षीणा वृक्षाः शेरे न्यर्पिताः.
एवा सपत्नांस्त्वं मम
प्र क्षिणीहि न्यर्पय पूर्वान्जातां उतापरान् वरणस्त्वा ऽ भि रक्षतु.. (१५)
सूखे हुए वृक्ष जिस प्रकार वायु के कारण गिर जाते हैं, उसी प्रकार हे मणि! तुम मेरे
पूर्ववर्ती एवं बाद में होने वाले शत्रुओं का विनाश कर के मेरी रक्षा करो. (१५)
तांस्त्वं प्र च्छिन्द्धि वरण पुरा दिष्टात् पुरायुषः.
य एनं पशुषु दिप्सन्ति ये चास्य राष्ट्रदिप्सवः.. (१६)
ebook converter DEMO Watermarks*
हे वरण वृक्ष से निर्मित मणि! जो इस यजमान के पशुओं एवं राष्ट्र का अपहरण करना
चाहते हैं, तू उन के भाग्य और आयु को उन से छीन कर उन्हें नष्ट कर दे. (१६)
यथा सूर्यो अतिभाति यथा ऽ स्मिन् तेज आहितम्.
एवा मे वरणो मणि: कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा
समनक्तु मा.. (१७)
जिस प्रकार यह सूर्य अत्यधिक प्रकाशित होता है और जिस प्रकार इस में तेज व्याप्त
है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित मणि मुझे कीर्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करे. यह मणि मुझे
तेजस्वी और यशस्वी बनाए. (१७)
यथा यशश्चन्द्रमस्यादित्ये च नृचक्षसि.
एवा मे वरणो मणि:
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (१८)
सभी मनुष्यों के साक्षी चंद्रमा में और सूर्य में जैसा यश व्याप्त है, यह वरण वृक्ष से
निर्मित मणि उसी प्रकार मुझे यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (१८)
यथा यश: पृथिव्यां यथा ऽ स्मिन्जातवेदसि.
एवा मे वरणो मणि:
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (१९)
पृथ्वी और अग्नि में जिस प्रकार यश प्रतिष्ठित है, वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि मुझे
उसी प्रकार यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (१९)
यथा यश: कन्यायां यथास्मिन्सम्भूते रथे.
एवा मे वरणो मणि:
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२०)
कन्या में और भरे हुए रथ में जिस प्रकार यश व्याप्त है, वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि
मुझे उसी प्रकार यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (२०)
यथा यश: सोमपीथे मधुपर्के यथा यश:.
एवा मे वरणो मणि:
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२१)
जिस प्रकार सोमपीथ और मधुपर्क नामक यज्ञ क्रियाओं के करने से यश प्राप्त होता है,
उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित मणि मुझे यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (२१)
यथा यशोऽग्निहोत्रे वषट्कारे यथा यश:.
एवा मे वरणो मणिः
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२२)
अग्निहोत्र एवं वषट् करने से जिस प्रकार यज्ञ प्राप्त होता है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से
निर्मित यह मणि मुझे कीर्ति और ऐश्वर्य प्रदान करे. (२२)
यथा यशो यजमाने यथा ऽस्मिन् यज्ञ आहितम्.
एवा मे वरणो मणिः
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२३)
इस यजमान में एवं इस यज्ञ में जिस प्रकार यश स्थित है, वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि
उसी प्रकार मुझे कीर्ति और ऐश्वर्य प्रदान करे. (२३)
यथा यशः प्रजापतौ यथा ऽस्मिन् परमेष्ठिनि. एवा मे वरणो मणिः
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२४)
जिस प्रकार प्रजापति में और परमेष्ठी में यश व्याप्त है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित
यह मणि मुझ में कीर्ति और ऐश्वर्य स्थापित करे तथा मुझे तेज और यश से सुशोभित करे.
(२४)
यथा देवेष्वमृतं यथैषु सत्यमाहितम्. एवा मे वरणो मणिः
कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२५)
जिस प्रकार देवों में अमृत एवं सत्य प्रतिष्ठित है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित यह
मणि मुझे कीर्ति और ऐश्वर्य प्रदान करे तथा मुझे तेज और यश से सुशोभित करे. (२५)
सूक्त-४ देवता—सर्प, विषापहरण
इन्द्रस्य प्रथमो रथो देवानाम्परो रथो वरुणस्य तृतीय इत्.
अहीनामपमा रथः स्थाणुमारदथार्षत्.. (१)
इंद्र का रथ पहला, देवों का दूसरा और वरुण का तीसरा है. सर्पों का रथ अपमा अर्थात्
निम्न गतिशील नामक है, जो स्थाणु अर्थात् सूखे वृक्षों से अधिक रमणीय है एवं तेज चलता
है. (१)
दर्भः शोचिस्तरूणकमश्वस्य वारः परुषस्य वारः. रथस्य बन्धुरम्.. (२)
दर्भ सर्पों को शोक देने वाला है, यह तरुणक एवं अश्व नामक सर्पों के विष का निरोधक
है. परुष नामक सर्प के विष का निवारण करने वाला दर्भ रथ का बाधक है. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*
अव श्वेत पदा जहि पूर्वेण चापरेण च.
उदप्लुतमिव दार्वहीनामरसं विषं वारुग्रम्... (३)
हे श्वेतपद! तू अपने अगले एवं पिछले पैरों के द्वारा सर्पों का विनाश कर. गिरता हुआ
काष्ठ जिस प्रकार शक्ति से हीन हो जाता है, उसी प्रकार सर्प विष प्रभावहीन हो जाता है. हे
दर्भ! तू इस भयानक सर्प विष का निवारण कर. (३)
अरंघुषो निमज्योन्मज्य पुनरब्रवीत्.
उदप्लुतमिव दार्वहीनामरसं विषं वारुग्रम्.. (४)
अरंघुष नाम की ओषधि ने पानी में डुबकी लगाई और ऊपर आ कर कहा कि जिस
प्रकार गिरता हुआ काष्ठ शक्तिहीन होता है, उसी प्रकार सर्पों का विष भी प्रभावहीन हो जाए.
हे कुश! तू इस भयानक सर्प विष का निवारण कर. (४)
पैद्वो हन्ति कसार्णीलं पैद्वः श्वित्रमुतासितम्.
पैद्वो रथर्व्याः शिरः सं बिभेद पृदाक्वाः.. (५)
पैद्व नामक ओषधि कसार्णील नामक सर्प को, श्वेत सर्प को और काले सर्प को नष्ट
करती है. पैद्व ने रथर्व्या और पृदाकू नामक नागों का सिर तोड़ दिया था. (५)
पैद्व प्रेहि प्रथमो ऽ नु त्वा वयमेमसि.
अहीन् व्यस्यतात् पथो येन स्मा वयमेमसि.. (६)
हे पैद्व! तुम सर्वश्रेष्ठ हो. हम तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. तुम यहां आओ. हम जिस मार्ग से
आतेजाते हैं, तुम उस मार्ग से सर्पों को दूर भगा दो. (६)
इदं पैद्वो अजायतेदमस्य परायणम्.
इमान्यर्वतः पदा ऽ हिघ्न्यो वाजिनीवतः.. (७)
यह पैद्व उत्पन्न हुआ है. यह इस के आश्रय में है. वह इन शीघ्र चलने वाले सर्पों का
निवर्तन करने वाला है. (७)
संयतं न वि ष्वरद् व्यात्तं न सं यमत्.
अस्मिन् क्षेत्रे द्वावही सी च पुमांश्च तावुभावरसा.. (८)
सर्प का बंद मुख हमें डसने के लिए न खुले. इस क्षेत्र में निवास करने वाले नर और
मादा सर्प अर्थात् सांप और सांपिन मंत्र की शक्ति से शक्तिहीन हो जाएं. (८)
अरसास इहाहयो ये अन्ति ये च दूरके.
घनेन हन्मि वृश्चिकमहिं दण्डेनागतम्.. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*
जो सर्प यहां से समीप रहते हैं और जो दूर रहते हैं, वे विषहीन हो जाएं. मैं बिच्छू को
हथौड़ा से मारता हूं और सांप को डंडे से मारता हूं. (९)
अघाश्वस्येदं भेषजमुभयोः स्वजस्य च.
इन्द्रो मे ऽ हिमघायन्तमहिं पैद्वो अरन्धयत्.. (१०)
मेरे पास जो जड़ीबूटियां हैं, वे अघाश्व और स्वज दोनों प्रकार के सर्पों का विष दूर करने
वाली हैं. हिंसा रूपी पाप करने वाले सांप को रोकने के हेतु इंद्र ने पैद्व को मेरे वश में किया
है. (१०)
पैद्वस्य मन्महे वयं स्थिरस्य स्थिरधाम्नः.
इमे पश्चा पृदाकवः प्रदीध्यत आसते.. (११)
स्थिर एवं स्थायी तेज वाले पैद्व को हम मानते हैं. ये पश्च और पृदाकू नामक सर्पों को
शोकमग्न करते हैं. (११)
नष्टासवो नष्टविषा हता इन्द्रेण वज्रिणा. जघानेन्द्रो जघ्निमा वयम्.. (१२)
वज्रधारी इंद्र ने उन सर्पों के प्राण एवं विष को समाप्त कर दिया था, जिन्हें इंद्र ने मारा
था. हम उन का विनाश करते हैं. (१२)
हतास्तिरश्चिराजयो निपिष्टासः पृदाकवः.
दर्विं करिक्रतं श्वित्रं दर्भेष्वसितं जहि.. (१३)
तिरश्चिराजी सांप मार दिए गए हैं और पृदाकू नामक सांप पीस डाले गए हैं. हे दर्वी! तू
दर्भों पर पड़े हुए सफेद और काले करिकृत सांपों का विनाश कर दे. (१३)
कैरातिका कुमारिका सका खनति भेषजम्.
हिरण्ययीभिरभ्रिभिर्गिरीणामुप सानुषु.. (१४)
किरात जाति की कुमारी कुदाल से सर्पों की ओषधि खोजती है. वह पर्वतों की चोटियों
पर सोने के फावड़ों से ओषधि खोदती है. (१४)
आयमगन् युवा भिषक् पृश्निहापराजितः.
स वै स्वजस्य जम्भन उभयोर्वृश्चिकस्य च.. (१५)
कभी पराजित न होने वाला युवा वैद्य मंत्र शक्ति से संपन्न है. यह स्वज नामक सर्प और
बिच्छू का विनाश कर सकता है. (१५)
इन्द्रो मे ऽ हिमरन्धयन्मित्रश्च वरुणश्च. वातापर्जन्यो ३ भा.. (१६)
ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र, मित्र, वरुण, वायु और पर्जन्य अर्थात् बादल ने सर्प को मेरे वश में कर दिया है.
(१६)
इन्द्रो मे ऽ हिमरन्धयत् पृदाकुं च पृदाक्वम्.
स्वजं तिरश्चिराजिं कसर्णीलं दशोनसिम्.. (१७)
इंद्र ने मेरे कल्याण के हेतु पृदाकू, पृदाक्व, स्वज तिरश्चिराजी, कसर्णील एवं दशोनसि
नामक सर्पों को मेरे वश में कर दिया है. (१७)
इन्द्रो जघान प्रथमं जनितारमहे तव.
तेषामु तृह्यमाणानां कः स्वित् तेषामसद् रसः.. (१८)
हे सर्प! इंद्र ने सब से पहले तेरे जन्म देने वालों को मारा था. उन सर्पों के विनाश के
समय किस सर्प में विष शेष रहा? (१८)
सं हि शीर्षाण्यग्रभं पौञ्जिष्ठ इव कर्वराम्.
सिन्धोर्मध्यं परेत्य व्यनिजमहेर्विषम्.. (१९)
केवट जिस प्रकार पतवार को ग्रहण करता है, उसी प्रकार मैं ने सर्प शीश पकड़ लिए
हैं. मैं ने सिंधु के मध्य भाग से लौट कर सर्प के विष को प्रभावहीन बना दिया है. (१९)
अहीनां सर्वेषां विषं परा वहन्तु सिन्धवः.
हतास्तिरश्चिराजयो निपिष्टासः पृदाकवः.. (२०)
सभी नदियां सर्पों के विष को अपने जल के साथ बहा ले जाएं. तिरश्चिराजी नामक सर्प
नष्ट हो गए और पृदाकू नामक सर्प पीस डाले गए. (२०)
ओषधीनामहं वृण उर्वरीरिव साधुया.
नयाम्यर्वतीरिवाहे निरैतु ते विषम्.. (२१)
मैं अपनी उत्तम बुद्धि के द्वारा उपजाऊ भूमि पर उगी हुई जड़ीबूटियों को स्वीकार कर
के उन्हें इस प्रकार प्रेरित करता हूं, जिस प्रकार वेग वाली नदियां बहती हैं. हे सर्प! उन
जड़ीबूटियों से विष समाप्त हो जाए. (२१)
यदग्नौ सूर्ये विषं पृथिव्यामोषधीषु यत्.
कान्दाविषं कनन्ककं निरैत्वैतु ते विषम्.. (२२)
अग्नि में, सूर्य में, पृथ्वी में तथा जड़ीबूटियों में जो विष है, वह तथा कंदों का विष
पूर्णतया नष्ट हो जाए. (२२)
ये अग्निजा ओषधिजा अहीनां ये अप्सुजा विद्युत आबभूवूः.
ebook converter DEMO Watermarks*
येषां जातानि बहुधा महान्ति तेभ्यः सर्पेभ्यो नमसा विधेम.. (२३)
अग्नि, जड़ीबूटियों, जल एवं सर्पों में जो विष है तथा जिन के द्वारा भयानक कर्म हुए
हैं, हम उन सभी सर्पों को हव्य द्वारा तृप्त करते हैं. (२३)
तौदी नामासि कन्या घृताची नाम वा असि.
अधस्पदेन ते पदमा ददे विषदूषणम्.. (२४)
हे जड़ीबूटी! तू तौदी और घृताची नाम वाली हो. नीचे की ओर किए गए अपने पैर के
द्वारा मैं विष समाप्त करता हूं और सभी को वश में करता हूं. (२४)
अङ्गादङ्गात् प्र च्यावय हृदयं परि वर्जय.
अधा विषस्य यत् तेजो ऽ वाचीनं तदेतु ते.. (२५)
हे रोगी! तू अपने प्रत्येक अंग से विष को टपकाता हुआ अपने हृदय की रक्षा कर. विष
का जो तेज है, वह अधोगति को प्राप्त हो कर नष्ट हो जाए. (२५)
आरे अभूद् विषमरीद् विषे विषमप्रागपि.
अग्निर्विषमहेर्निंरधात् सोमो निरणयीत्.
दंष्टारमन्वगाद् विषमहिरमृत्.. (२६)
नवीन विष भी प्राचीन विष में मिल कर रुक गया है. इस प्रकार विष नष्ट हो चुका है.
अग्नि ने सांप के विष को नष्ट कर दिया है. सोम सर्प के विष को दूर ले गया है. काटने वाले
सांप को ही उस का विष प्राप्त हुआ, जिस से उस की मृत्यु हो गई. (२६)
सूक्त-५ देवता—जल
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगाय ब्रह्मयोगैर्वो युनज्मि.. (१)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो
तथा तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें ब्रह्म योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले योग की
क्षमता वाला बनाता हूं. (१)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगाय क्षत्रयोगैर्वो युनज्मि.. (२)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो
ebook converter DEMO Watermarks*
तथा तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें क्षत्रिय संबंधी योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले
योग की क्षमता वाला बनाता हूं. (२)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगायेन्द्रयोगैर्वो युनज्मि.. (३)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति
एवं तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें इंद्र संबंधी योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले योग
की क्षमता वाला बनाता हूं. (३)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगाय सोमयोगैर्वो युनज्मि.. (४)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, वीर्य एवं बल हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति
एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हो. मैं तुम्हें जल संबंधी योग से युक्त करता हूं, जिस से मैं विजय
प्राप्त कर सकूं. (४)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगायाप्सुयोगैर्वो युनज्मि.. (५)
हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो
एवं तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं विजय प्राप्त करने वाले योग के हेतु तुम्हें अपने समीप रखना
चाहता हूं. समस्त प्राणी मेरे समीप रहें. (५)
इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं
स्थ.
जिष्णवे योगाय विश्वानि मा भूतान्युप तिष्ठन्तु युक्ता म आप स्थ.. (६)
हे जलो! तुम अग्नि के भाग हो. जलों से मुक्त भाग को एवं दिव्य तेज को हम में धारण
करो. अग्नि का भाग इस लोक के प्रजापति के तेज से युक्त हो. (६)
अग्नेर्भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽ स्मै लोकाय सादये.. (७)
हे जलो! तुम इंद्र के भाग को, जलों के वीर्य एवं दिव्य तेज को हम में स्थित करो. लोक
का कल्याण करने के लिए प्रजापति का तेज हम में धारण करो. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रस्य भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (८)
हे दिव्य प्रवाह वाले जलो! तुम इंद्र के अंश हो. तेज जल का वीर्य है. तुम हम में तेज
स्थापित करो. तुम प्रजापति के निवास स्थान से पधारे हो. हम तुम्हें इस लोक में निश्चित
स्थान प्रदान करते हैं. (८)
सोमस्य भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (९)
हे जलो! तुम सोम के भाग हो, तुम जलों का वीर्य एवं दिव्य तेज हम में धारण करो.
लोक के कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित हो. (९)
वरुणस्य भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१०)
हे जलो! तुम वरुण के भाग हो. तुम जलों का वीर्य एवं दिव्य तेज हम में धारण करो.
तुम लोक के कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित हो. (१०)
मित्रावरुणयोर्भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (११)
हे जलो! तुम मित्र और वरुण के भाग हो. तुम जलों का वीर्य और दिव्य तेज हमें में
धारण करो. तुम लोक के कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित करो. (११)
यमस्य भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१२)
हे जलो! तुम यम के भाग हो. तुम जलों का वीर्य और दिव्य तेज हम में धारण करो. तुम
लोक कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित करो. (१२)
पितॄणां भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१३)
ebook converter DEMO Watermarks*
हे जलो! तुम पितरों के भाग हो. तुम जलों का वीर्य और दिव्य तेज हम में धारण करो.
लोक के कल्याण के लिए तुम हम में प्रजापति का तेज स्थित करो. (१३)
देवस्य सवितुर्भाग स्थ.
अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त.
प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१४)
हे जलो! तुम सविता देव के भाग हो. तुम जलों का वीर्य एवं दिव्य तेज हम में धारण
करो. लोक कल्याण के निमित्त तुम हम में प्रजापति का तेज स्थित करो. (१४)
यो व आपो ऽ पां भागो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजन:.
इदं तमति सृजामि तं माध्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म:.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१५)
हे जलो! तुम्हारा जो जलीय भाग यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य एवं देवों से
संयुक्त है, उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. वह जलीय भाग मुझे पुष्ट करे. मैं इस मंत्र
से होने वाले जादूटोने के द्वारा और जलरूप वस्त्र से आच्छादित कर के उन्हें नष्ट करता हूं.
(१५)
यो व आपो ऽ पामूर्मिरप्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजन:.
इदं तमति सृजामि तं माध्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म:.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१६)
हे जलो! तुम्हारी जो लहरें यजुर्वेद के मंत्रों से सेवा करने योग्य एवं देवों से संयुक्त हैं, मैं
उन्हें अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. वे लहरें मुझे पुष्ट करें. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले
जादूटोने से और जल की लहरों रूपी शस्त्र से आच्छादित कर के उन्हें नष्ट करता हूं. (१६)
यो व आपो ऽ पां वत्सो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजन:.
इदं तमति सृजामि तं माध्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म:.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१७)
हे जलो! तुम में जो जलों का वत्स है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है एवं
देवों से संयुक्त है. मैं उसे अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जलों के वे वत्स मुझे पुष्ट करें. मैं
इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के वत्स रूपी शस्त्र से आच्छादित कर के
उन्हें नष्ट करता हूं. (१७)
ebook converter DEMO Watermarks*
यो व आपो ऽ पां वृषभो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजनः.
इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१८)
हे जलो! तुम में जो वृषभ अर्थात् बैल है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है
एवं देवों से संयुक्त है. उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का वृषभ मुझे पुष्ट करे.
मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के वृषभ रूपी शस्त्र से उन्हें नष्ट करता हूं.
(१८)
यो व आपो ऽ पां हिरण्यगर्भो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजनः.
इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१९)
हे जलो! तुम्हारे मध्य जो हिरण्यगर्भ है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है
एवं देवों से संयुक्त है. उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का हिरण्यगर्भ अंश मुझे
पुष्ट करे. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के हिरण्यगर्भ रूपी शस्त्र से
उन्हें नष्ट करता हूं. (१९)
यो व आपो ऽ पामश्मा पृश्रिर्दिव्यो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजनः.
इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षे.
तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (२०)
हे जलो! तुम में जो दिव्य पृश्रि अश्मा है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है
एवं देवों से संयुक्त है; उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का दिव्य पृश्रि अश्मा
अंश मुझे पुष्ट करे. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के दिव्य पृश्रि अश्मा
रूपी शस्त्र से उन्हें नष्ट करता हूं. (२०)
यो व आपो ऽ पामग्नयो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्या देवयजनाः.
इदं तानति सृजामि तान् माभ्यवनिक्षि.
तैस्तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (२१)
हे जलो! तुम में जो अग्नियां हैं, वे यजुर्वेद के मंत्रों के द्वारा सेवा करने योग्य एवं देवों
की संगति करने वाली हैं. उन्हें मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जलों की अग्नियां मुझे
पुष्ट करें. इस मंत्र की शक्ति से होने वाले जादूटोने के द्वारा और जल रूपी अस्त्र के द्वारा मैं
ebook converter DEMO Watermarks*
अपने शत्रुओं को नष्ट करता हूं. (२१)
यदवाचीनं त्रैहायणादनृतं किं चोदिम.
आपो मा तस्मात् सर्वस्माद् दुरितात् पान्त्वंहसः.. (२२)
हम ने तीन वर्षों में जो झूठ बोला है, वह नवीन दुर्गति लाने वाला है. जल मुझे इस
समस्त पाप से बचाएं. (२२)
समुद्रं वः प्र हिणोमि स्वां योनिमपीतन.
अरिष्टाः सर्वहायसो मा च नः किं चनाममत्.. (२३)
हे जलो! मैं तुम्हें सागर की ओर जाने की प्रेरणा देता हूं. सागर तुम्हारा उत्पत्ति स्थान है.
तुम उस में मिल जाओ. सभी ओर गति वाले तुम हिंसा समाप्त करने वाले हो. हमें कोई नष्ट
न करे. (२३)
अरिप्रा आपो अप रिप्रमस्मत्.
प्रास्मदेनो दुरितं सुप्रतीकाः प्र दुष्वप्न्यं प्र मलं वहन्तु.. (२४)
हे शत्रुओं का विनाश करने वाले जलो! हमारे शत्रुओं का विनाश करो. तुम हमारे पाप
का विनाश करो एवं बुरे स्वप्न रूपी मैल को हम से दूर कर दो. (२४)
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा पृथिवीसंशितो ऽ ग्नितेजाः.
पृथिवीमनु वि क्रमे ऽ हं पृथिव्यास्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२५)
तू विश्व का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू पृथ्वी पर आश्रित एवं
अग्नि का तेज है. मैं पृथ्वी पर विक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा पृथ्वी से उसे हटाता हूं. जो
हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उसे त्याग दें.
(२५)
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा ऽ न्तरिक्षसंशितो वायुतेजाः.
अन्तरिक्षमनु वि क्रमे ऽ हमन्तरिक्षात् तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं
वयं द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२६)
तू विश्व का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू अंतरिक्ष पर आश्रित एवं
विश्व का तेज है. मैं अंतरिक्ष में पराक्रम दिखाता हूं एवं उसे अंतरिक्ष से दूर भगाता हूं. जो हम
से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उस का त्याग कर
दें. (२६)
ebook converter DEMO Watermarks*
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा द्यौसंशितः सूर्यतेजाः.
दिवमनु वि क्रमे ऽ हं दिवस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२७)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू द्युलोक में आश्रित एवं
सूर्य का तेज है. मैं द्युलोक में पराक्रम प्रदर्शित करता और उसे द्युलोक से बाहर निकालता हूं.
जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उसका
त्याग कर दें. (२७)
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा दिक्संशितो मनस्तेजाः.
दिशो ऽ नु वि क्रमे ऽ हं दिग्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२८)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू दिशाओं में स्थित है एवं
मन का तेज है. मैं दिशाओं में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा दिशाओं से उसे हटाता हूं.
जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिससे द्वेष करते हैं, उसका विनाश हो. प्राण उसका
त्याग कर दें. (२८)
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहाशासंशितो वाततेजाः.
आशा अनु वि क्रमे ऽहमाशाभ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२९)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू आकाश में स्थित है एवं
वायु का तेज है. मैं आकाश में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं और आकाश से उसे हटाता हूं.
जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं, उन का विनाश हो. प्राण उन का
त्याग कर दें. (२९)
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नह ऋक्संशितः सामतेजाः.
ऋचो ऽनु वि क्रमे ऽहमृग्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३०)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रु का विनाश करने वाला है. तू ऋचाओं में स्थित है. सोम
तेरा तेज है. मैं आकाश के मध्य ऋचाओं में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं और ऋचाओं से
उसे हटाता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, उस का विनाश हो.
प्राण उस का त्याग कर दें. (३०)
ebook converter DEMO Watermarks*