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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

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तया गृणन्तः सधमादेषु वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (२)
हे मनुष्यो! वैश्वानर अग्नि से संबंधित तथा प्रिय तत्त्व से पूर्ण स्तुति को आरंभ करो. उस
वाणी का शरीर बने हुए ऊपर के भाग विस्तृत हैं. उस वैश्वानर अग्नि की स्तुति करते हुए हम
संग्रामों में धन के स्वामी बनें. (२)
वैश्वानरीं वर्चस आ रभध्वं शुद्धा भवन्तः शुचयः पावकाः.
इहेडया सधमादं मदन्तो ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तम्.. (३)
हे मनुष्यो! तेज पाने के लिए वैश्वानर अग्नि की स्तुति आरंभ करो. हम वैश्वानर अग्नि
की कृपा से शुद्ध तथा ब्रह्मवर्चस्व के द्वारा दीप्त हो कर दूसरों को भी पवित्र करें. हम अन्न से
पुष्ट हो कर परस्पर प्रसन्नता के हेतु बनें तथा इस लोक में स्थित रह कर उदय होते हुए सूर्य के
दर्शन करें. (३)
सूक्त-६३ देवता—निर्ऋति
यत् ते देवी निर्ऋतिराबबन्ध दाम ग्रीवास्वविमोक्यं यत्.
तत् ते वि ष्याम्यायुषे वर्चसे बलायादोमदमन्नमद्धि प्रसूतः.. (१)
हे पुरुष! अनिष्टकारिणी देवी ने तेरे सभी अंगों में पाप रूपी फंदा डाला है और तेरी
गर्दन में ऐसी रस्सी बांधी है, जिस से छूटना असंभव है. मैं उस निर्ऋति रूपी फंदे से तुझे
चिर काल तक जीवित रहने के लिए, बल के लिए एवं तेज के लिए छुड़ाता हूं. मेरे द्वारा
छुड़ाया हुआ तू मेरी प्रेरणा से सदा अन्न का भक्षण कर. (१)
नमो ऽ स्तु ते निर्ऋते तिग्मतेजो ऽ यस्मयान् वि चृता बन्धपाशान्.
यमो मह्यं पुनरित् त्वां ददाति तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे.. (२)
हे तीक्ष्ण दीप्ति वाली एवं अनिष्टकारिणी देवी निर्ऋति! तुझे नमस्कार है. नमस्कार से
प्रसन्न हो कर तू लोहे के बने बंधन के फंदों से हमें छुड़ा. हे साधक पुरुष! पाप से मुक्त होने
पर यम ने तुम्हें इसी लोक को दे दिया है. मृत्यु के देव उन यम को नमस्कार है. (२)
अयस्मये द्रुपदे बेधिष इहाभिहितो मृत्युभिर्ये सहस्रम्.
यमेन त्वं पितृभिः संविदान उत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (३)
हे निर्ऋति! लोहे की श्रृंखलाओं में अथवा लकड़ी के बने चरण बंधन में जब तुम किसी
पुरुष को बांधती हो, तब वह इस लोक में मृत्यु के द्वारा बंधा हो जाता है. प्रसिद्ध ज्वर आदि
रोग और राक्षस, पिशाच आदि मृत्यु के हजारों कारण हैं. हे निर्ऋति! तुम मृत्यु देव यम से
और देवता, पितर आदि से तालमेल कर के इस पुरुष को उत्तम सुख प्रदान करो. (३)
संसमिद् युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ.
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सूक्त-६४ देवता—सौमनस्य

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इडस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर.. (४)
हे अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले अग्नि देव! तुम समस्त प्रकार के धन प्राप्त कराते हो.
तुम यज्ञवेदी में प्रज्वलित होते हो. तुम हमें धन दो. (४)
सूक्त-६४ देवता—सौमनस्य
सं जानीध्वं सं पृच्यध्वं सं वो मनांसि जानताम्.
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते.. (१)
हे सौमनस्य के इच्छुक जनो! तुम समान ज्ञान वाले बनो और समान कार्य में संलग्न हो
जाओ. ज्ञान की उत्पत्ति के निमित्त तुम्हारे अंतःकरण समान हों. इंद्र आदि देव जिस प्रकार
एक ही कार्य को जानते हुए यजमानों द्वारा दिए गए हवि को ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार तुम
भी विरोध त्याग कर इच्छित फल पाओ. (१)
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं व्रतं सह चित्तमेषाम्.
समानेन वो हविषा जुहोमि समानं चेतो अभिसंविशध्वम्.. (२)
हमारा गुप्त भाषण एकरूप हो. हमारे कार्यों में प्रवृत्ति समान हो. हमारा कर्म भी
एकरूप हो तथा हमारा अंतःकरण भी इसी प्रकार का हो. उक्त फल पाने के लिए हे देवो!
हम एकता उत्पन्न करने वाले आज्य आदि से आप के निमित्त हवन करें. इस से आप सब
एकचित्तता को प्राप्त करो. (२)
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः.
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति.. (३)
हे सौमनस्य चाहने वालो! तुम्हारा संकल्प समान हो. तुम्हारे संकल्पों को उत्पन्न करने
वाले हृदय समान हों. तुम्हारा मन एकरूप हो, जिस से तुम सब सभी कार्य ठीक से कर
सको. (३)
सूक्त-६५ देवता—इंद्र
अव मन्युरवायताव बाहू मनोयुजा.
पराशर त्वं तेषां पराज्चं शुष्ममर्दयाधा नो रयिमा कृधि.. (१)
हमारे शत्रु का क्रोध शांत हो तथा उस का तिरस्कार नष्ट हो. उस के द्वारा ताने गए
आयुध विफल हों. हमारे शत्रुओं की भुजाएं आयुध उठाने में असमर्थ हों. हे शत्रुनाशक इंद्र!
तुम उन शत्रुओं के बल को विमुख करो. इस के पश्चात उन शत्रुओं का धन हमारे समीप
लाओ. (१)
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निर्हस्तेभ्यो नैर्हस्तं यं देवाः शरुमस्यथ.
वृश्चामि शत्रूणां बाहूननेन हविषाऽहम्.. (२)
हे देवो! असुरों का बाहुबल समाप्त करने के लिए तुम जो हिंसक बाण चलाते हो, मैं
उस बाण रूप देवता को दिए जाने वाले हवि से अपने शत्रु की भुजाओं को काटता हूं. (२)
इन्द्रश्चकार प्रथमं नैर्हस्तमसुरेभ्यः.
जयन्तु सत्वानो मम स्थिरेणेन्द्रेण मेदिना.. (३)
इंद्र ने सब से पहले अपने शत्रु असुरों को भुजबल विहीन किया था. युद्ध में दृढ़ एवं
हमारे सहायक इंद्र की सहायता से मेरे योद्धा शत्रुओं को पराजित करें. (३)
सूक्त-६६ देवता—इंद्र
निर्हस्तः शत्रुरभिदासन्नस्तु ये सेनाभिर्युधमायन्त्यस्मान्.
समर्पयेन्द्र महता वधेन द्रात्वेषामघहारो विविद्धः.. (१)
हमें पीड़ित करने वाला शत्रु हाथों की शक्ति से हीन हो जाए. हे इंद्र! जो शत्रु अपनी
सेनाओं की सहायता से हमें युद्ध के लिए ललकारते हैं, उन्हें अपने हनन साधन विशाल वज्र
से संयुक्त करो. इन शूरों में जो मुझे मृत्यु रूपी दुःख पहुंचाने वाला है, वह अधिक घायल हो
कर बुरी दशा को प्राप्त हो. (१)
आतन्वाना आयच्छन्तो ऽ स्यन्तो ये च धावथ.
निर्हस्ताः शत्रवः स्थनेन्द्रो वो ऽ द्य पराशरीत्.. (२)
हे शत्रुओ! तुम धनुष पर डोरी चढ़ाते हुए, धनुष को खींचते हुए और बाण फेंकते हुए
हमारे सामने आ रहे हो. तुम सब अशक्त हाथों वाले बन जाओ. आज इंद्र तुम्हें आहत करें.
(२)
निर्हस्ताः सन्तु शत्रवो ऽ ङ्गैषा म्लापयामसि.
अथैषामिन्द्र वेदांसि शतशो वि भजामहै.. (३)
हमारे शत्रु हाथों की शक्ति से हीन हों. हम उन के अंगों को हर्ष रहित करेंगे. हे इंद्र! इस
के पश्चात हम तुम्हारी कृपा से उन शत्रुओं के धनों को विभाजित कर के प्राप्त करें. (३)
सूक्त-६७ देवता—इंद्र
परि वर्त्मानि सर्वत इन्द्रः पूषा च सस्रतुः.
मुह्यन्त्वद्य ऽ मूः सेना अमित्राणां परस्तराम्.. (१)

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इंद्र और उषा — ये दोनों देव सभी दिशाओं के संचरण मार्गों को रोक दें. इस समय दूर
दिखाई देने वाली शत्रु सेनाएं अत्यधिक मोह में पड़ जाएं और उन में कार्याकार्य का निर्णय
करने की क्षमता न रहे. (१)
मूढा अमित्राश्चरताशीर्षाण इवाहयः.
तेषां वो अग्निमूढानामिन्द्रो हन्तु वरंवरम्.. (२)
हे शत्रुओ! कटे हुए शीश वाले सांप जिस प्रकार हिलतेडुलते हैं, कुछ कर नहीं पाते,
उसी प्रकार तुम जय के उपाय से शून्य हो कर युद्धभूमि में घूमो. हमारी आहुतियों के कारण
मोह को प्राप्त उन शत्रुओं का वध श्रेष्ठ नायक इंद्र करें. (२)
ऐषु नह्य वृषाजिनं हरिणस्य भियं कृधि.
पराङमित्र एषत्वर्वाची गौरुपेषतु.. (३)
हे इच्छा पूर्ण करने वाले इंद्र! तुम सोम मणि को ढकने वाले कृष्ण मृग-चर्म को हमारे
योद्धाओं में बांधो. हमारे शत्रु हमारे सामने से भाग जाएं तथा उन शत्रुओं का पशु धन हमें
प्राप्त हो. (३)
सूक्त-६८ देवता—सविता आदि
आयमगन्त्सविता क्षुरेणोष्णेन वाय उदकेनेहि.
आदित्या रुद्रा वसव उन्दन्तु सचेतसः सोमस्य राज्ञो वपत प्रचेतसः.. (१)
आकाश में दिखाई देते हुए सब के प्रेरक सविता देव मुंडन करने वाले उस्तरे के साथ
आए हैं. हे वायु! गरम जल के साथ तुम भी आओ. बारह आदित्य, एकादश रुद्र तथा आठ
वसु—ये सब समान ज्ञान वाले हो कर उस जल से बालक का सिर गीला करें. हे सेवको! तुम
वरुण और राजा सोम से संबंधित उस्तरे के द्वारा गीले बालों को काटो. (१)
अदितिः श्मश्रु वप्त्वाप उन्दन्तु वर्चसा.
चिकित्सतु प्रजापतिर्दीर्घायुत्वाय चक्षसे.. (२)
देव माता अदिति इस पुरुष के दाढ़ीमूंछ के बाल अलग करें. जल के देवता अपने तेज
से उन्हें भिगोएं. प्रजापति चिरकाल तक जीवन के लिए एवं देखने के लिए इस की चिकित्सा
करें. (२)
येनावपत् सविता क्षुरेण सोमस्य राज्ञो वरुणस्य विद्वान्.
तेन ब्रह्माणो वपतेदमस्य गोमानश्ववानयमस्तु प्रजावान्.. (३)
सविता देव ने जानते हुए जिस उस्तरे से सोम के और राजा वरुण के बालों को काटा, हे
ब्राह्मणो! तुम उसी उस्तरे से इस पुरुष की दाढ़ी और मूंछों के बाल काटो. इस विशेष संस्कार

सूक्त-६९ देवता—बृहस्पति

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से यह पुरुष अनेक गायों, घोड़ों और प्रजाओं से युक्त हो. (३)
सूक्त-६९ देवता—बृहस्पति
गिरावरागरार्टेषु हिरण्ये गोषु यद् यशः.
सुरायां सिच्यमानायां कीलाले मधु तन्मयि.. (१)
हिमालय पर्वत में जो यश है, रथ में बैठ कर चलने वाले राजाओं में, स्वर्ण में और गायों
में जो यश है, वह मुझे प्राप्त हो. पात्रों में ढाली जाती हुई मदिरा में और अन्न में जो मधुर रस
रूपी यश है, वह मुझे प्राप्त हो. (१)
अश्विना सारघेण मा मधुनाङ्क्तं शुभस्पती.
यथा भर्गस्वतीं वाचमावदानि जनाँ अनु.. (२)
हे सुंदर सूर्या के पति अश्विनीकुमारो! मुझे मधुमक्खियों द्वारा एकत्र किए गए मधु से
सींचो, जिस से मैं मनुष्यों को लक्ष्य कर के, मधुर वाणी बोलूं. (२)
मयि वर्चो अथो यशो ऽ थो यज्ञस्य यत् पयः.
तन्मयि प्रजापतिर्दिवि द्यामिव दृंहतु.. (३)
प्रजापति जिस प्रकार अंतरिक्ष में ज्योतिमंडल को दृढ़ करते हैं, उसी प्रकार मुझ
यजमान में तेज, यश और यज्ञ का फल धारण करें. (३)
सूक्त-७० देवता—संध्या
यथा मांसं यथा सुरा यथाक्षा अधिदेवने.
यथा पुंसो वृषण्यत स्त्रियां निहन्यते मनः.
एवा ते अघ्न्ये मनो ऽ धि वत्से नि हन्यताम्.. (१)
मांसभक्षी को मांस, शराबी को शराब और जुआरी को पासे जिस प्रकार प्रिय होते हैं
तथा जिस प्रकार सुरत चाहने वाले पुरुष का मन स्त्री में लगा रहता है, हे गौ! उसी प्रकार तेरा
मन तेरे बछड़े में लगा रहे. (१)
यथा हस्ती हस्तिन्याः पदेन पदमुद्युजे.
यथा पुंसो वृषण्यत स्त्रियां निहन्यते मनः.
एवा ते अघ्न्ये मनो ऽ धि वत्से नि हन्यताम्.. (२)
हाथी जिस प्रकार अपने पैर से प्रेम के साथ हथिनी का पैर मोड़ता है तथा जिस प्रकार
सुरत के इच्छुक पुरुष का मन स्त्री में लगा रहता है, हे गौ! उसी प्रकार तेरा मन तेरे बछड़े में
लगा रहे. (२)
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यथा प्रधिर्यथोपधिर्यथा नभ्यं प्रधावधि.
यथा पुंसो वृषण्यत स्त्रियां निहन्यते मनः.
एवा ते अघ्न्ये मनो ऽ धि वत्से नि हन्यताम्.. (३)
हे गौ! जिस प्रकार रथ के पहिए की नेमि अरों से संबंधित रहती है और सुरत के इच्छुक
पुरुष का मन जिस प्रकार नारी में लगा रहता है, उसी प्रकार तेरा मन अपने बछड़े में लगा
रहे. (३)
सूक्त-७१ देवता—विश्वे देव, अग्नि
यदन्नमद्मि बहुधा विरूपं हिरण्यमश्वमुत गामजामविम्.
यदेव किं च प्रतिजग्रहाहमग्निष्टद्धोता सुहुतं कृणोतु.. (१)
भूख की पीड़ा के वशीभूत हो कर मैं विविध प्रकार का जो अन्न अनेक प्रकार से खाता
हूं, अन्न के अतिरिक्त मैं दरिद्रता के कारण जो सोना, घोड़े और गाएं ग्रहण करता हूं, मुझ
यजमान को वह सब अन्न, सोना आदि अग्नि देव भली प्रकार हवन किया हुआ बनाएं. (१)
यन्मा हुतमहुतमाजगाम दत्तं पितृभिरनुमतं मनुष्यैः.
यस्मान्मे मन उदिव रारजीत्यग्निष्टद्धोता सुहुतं कृणोतु.. (२)
होम के द्वारा संस्कार वाला और इस से विपरीत जो धन मुझे प्राप्त हुआ है, वह पितृ
देवों द्वारा मुझे उपभोग के लिए दिया गया है. मनुष्यों ने उस के उपभोग की अनुमति दी है.
जिस धन के कारण मेरा मन हर्ष की अधिकता से उद्दीप्त रहता है, अग्नि देव की कृपा से वह
धन मुझ यजमान के लिए दोषरहित हो. (२)
यदन्नमद्म्यनृतेन देवा दास्यन्नदास्यन्नुत संगृणामि.
वैश्वानरस्य महतो महिम्ना शिवं मह्यं मधुमदस्त्वन्नम्.. (३)
हे देवो! असत्य भाषण के द्वारा दूसरों का जो अन्न अपहरण कर के मैं खाता हूं, उसे मैं
अन्न के मालिक को चाहे देता रहा हूं अथवा नहीं देता रहा हूं, पर मैं उसे देने की प्रतिज्ञा
करता हूं. वैश्वानर देव की अत्यधिक महिमा से वह अन्न मेरे लिए सुखकर और मधुर हो. (३)
सूक्त-७२ देवता—शेप, अर्क
यथासितः प्रथयते वशाँ अनु वपूंषि कृण्वन्नसुरस्य मायया.
एवा ते शेपः सहसायमर्को ऽ ज्ञेनाङ्गं संसमकं कृणोतु.. (१)
जैसे बंधा हुआ पुरुष अपने वशवर्ती पुरुषों को लक्षित कर के आसुरी माया के द्वारा
अपने शरीरों को प्रसारित करता है, उसी प्रकार अकौआ के वृक्ष से बनी यह ओषधि अर्थात्
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अर्कमणि तेरे प्रजनन अंग अर्थात् लिंग को स्त्री के उपभोग के योग्य बनाए. (१)
यथा पसस्तायादरं वातेन स्थूलभं कृतम्.
यावत् परस्वतः पसस्तावत् ते वर्धतां पसः.. (२)
हे साधक! जिस प्रकार तायादर नाम के प्राणी का प्रजनन अंग अर्थात् लिंग वायु लगने
से मोटा हो जाता है और जैसा परस्वर नाम के प्राणी का लिंग होता है, तेरा लिंग भी बढ़ कर
उसी परिमाण का हो जाए. (२)
यावदङ्गीनं पारस्वतं हास्तिनं गार्दभं च यत्.
यावदश्वस्य वाजिनस्तावत् ते वर्धतां पसः.. (३)
हे साधक पुरुष! पारस्वत नामक हरिण की, हाथी की, गधे की जननेंद्रिय जिस प्रकार
की होती है तथा यौवन में स्थित घोड़े की जननेंद्रिय जैसी होती है, तेरी पुरुषेंद्रिय भी उसी
परिमाण में बढ़ जाए. (३)
सूक्त-७३ देवता—वरुण
एह यातु वरुणः सोमो अग्निबृहस्पतिर्वसुभिरेह यातु.
अस्य श्रियमुपसंयात सर्व उग्रस्य चेत्तुः संमनसः सजाताः.. (१)
वरुण, सोम एवं अग्नि देव कर्म के निमित्त यहां आएं. बृहस्पति देव आठ वसुओं के
साथ यहां आएं. हे समान जन्म वाले बांधवो! तुम सब समान मन वाले हो कर इस
शक्तिशाली एवं कार्याकार्य जानने वाले यजमान के अधीन हो जाओ. (१)
यो वः शुष्मो हृदयेष्वन्तराकूतिर्या वो मनसि प्रविष्टा.
तान्तसीवयामि हविषा घृतेन मयि सजाता रमतिर्वो अस्तु.. (२)
हे बांधवो! तुम्हारे हृदयों में जो शीर्षक बल है और तुम्हारे मन में जो सब कुछ प्राप्त
करने की अभिलाषा है, मैं हवन किए जाते हुए इस हवि के द्वारा बल और उस अभिलाषा को
परस्पर संबंधित करता हूं. तुम्हारी अनुकूल प्रवृत्ति मुझ सौमनस्य के इच्छुक पुरुष को प्राप्त
हो. (२)
इहैव स्त माप याताध्यस्मत् पूषा परस्तादपथं वः कृणोतु.
वास्तोष्पतिरनु वो जोहवीतु मयि सजाता रमतिर्वो अस्तु.. (३)
हे बांधवो! आप मेरे घर में प्रेम से निवास करें तथा यहां से कहीं न जाएं. यदि तुम मेरे
प्रतिकूल आचरण करो तो सविता देव तुम्हारा मार्ग रोकें. घरों के पालक देव वाष्तोस्पति तुम्हें
मेरे लिए बुलाएं. सौमनस्य के इच्छुक मुझ यजमान के प्रति तुम्हारी अनुकूल प्रवृत्ति हो. (३)
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सूक्त-७४ देवता—ब्रह्मणस्पति
सं वः पृच्यन्तां तन्व १ः सं मनांसि समु व्रता.
सं वो ऽ यं ब्रह्मणस्पतिर्भगः सं वो अजीगमत्.. (१)
हे सौमनस्य के इच्छुक पुरुषो! तुम्हारे शरीर परस्पर के अनुराग से बंधें तथा हृदय भी
एकदूसरे के समीप आएं. तुम्हारे कृषि, वाणिज्य आदि कर्म भी सामंजस्य पूर्ण रहें.
ब्रह्मणस्पति देव तुम्हें संगत हृदय वाला बनाएं तथा भग नामक देव तुम्हें परस्पर तालमेल
वाला करें. (१)
संज्ञपनं वो मनसो ऽ थो संज्ञपनं हृदः.
अथो भगस्य यच्छ्रान्तं तेन संज्ञपयामि वः.. (२)
हे सौमनस्य चाहने वाले पुरुषो! मैं ऐसा यज्ञ कर्म करता हूं, जिस से तुम्हारा मन उचित
ज्ञान से पूर्ण हो. भग नाम के देव का जो श्रम से उत्पन्न तप है, उस के द्वारा मैं तुम्हें समान
ज्ञान वाला बनाता हूं. (२)
यथादित्या वसुभिः संबभूवुर्मरुद्भिरुग्रा अहृणीयमानाः.
एवा त्रिणामन्नहृणीयमान इमान्जनान्संमनसस्कृधीह.. (३)
जिस प्रकार अदिति के पुत्र मित्र, वरुण आदि आठ वसुओं के साथ समान ज्ञान वाले
हुए, जिस प्रकार उनचास मरुतों के साथ उग्र एवं बलशाली रुद्र क्रोध करते हुए समान ज्ञान
वाले हुए, हे तीन नामों अर्थात् पार्थिव, विद्युत और सूर्य अग्नि! तुम क्रोध न करते हुए इन
जनों को समान ज्ञान वाला बनाओ. (३)
सूक्त-७५ देवता—इंद्र
निरमुं नुद ओकसः सपत्नो यः पृतन्यति.
नैरबाध्येन हविषेन्द्र एनं पराशरीत्.. (१)
जो शत्रु सेना ले कर हम से युद्ध करने आता है, हम उसे अपने निवास स्थान से
निकालते हैं. हमारे शत्रुओं को मारने में समर्थ हवि के द्वारा इंद्र इस शत्रु की हिंसा करें, जिस
से यह लौट कर न आए. (१)
परमां तं परावतमिन्द्रो नुदतु वृत्रहा.
यतो न पुनरायति शश्वतीभ्यः समाभ्यः.. (२)
वृत्रासुर का वध करने वाले इंद्र उस शत्रु को अत्यधिक दूर देश में जाने की प्रेरणा दें. वह
बहुत वर्षों तक वापस न आए. (२)
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एतु तिस्रः परावत एतु पञ्च जनाँ अति.
एतु तिस्रो ऽ ति रोचना यतो न
पुनरायति शश्वतीभ्यः समाभ्यो यावत् सूर्यो असद् दिवि.. (३)
इंद्र के द्वारा प्रेरित हमारा शत्रु तीनों भूमियों और निषाद आदि पांच जनों को पार कर के
दूर वहां चला जाए, जहां से वापस न आए. जब तक सूर्य आकाश में रहे, तब तक वह अनेक
वर्षों तक न लौटे. (३)
सूक्त-७६ देवता—सायंतन अग्नि
य एनं परिषीदन्ति समादधति चक्षसे. संप्रेद्धो अग्निर्जिह्वाभिरुदेतु
हृदयादधि.. (१)
जो राक्षस आदि इस के चारों ओर बैठते हैं तथा हिंसा करने के लिए तत्पर हो जाते हैं,
उन के हृदय से उत्पन्न प्रज्वलित अग्नि उन्हें जला दे. (१)
अग्नेः सांतपनस्याहमायुषे पदमा रभे.
अद्धातिर्यस्य पश्यति धूममुद्यन्तमास्यतः.. (२)
अधिक तपन वाले उन अग्नि देव के जीवन के लिए मैं उपक्रम करता हूं, जिन के मुख
से निकलते हुए धूम को अद्धाति नाम के ऋषि देखते हैं. (२)
यो अस्य समिधं वेद क्षत्रियेण समाहिताम्.
नाभिह्वारे पदं नि दधाति स मृत्यवे.. (३)
विजय के इच्छुक क्षत्रिय जाति के पुरुष के द्वारा स्थापित अग्नि और दीप्त करने वाली
आहुतियों को जो पुरुष जानता है, वह मृत्यु का कारण बनने वाले ऐसे स्थान में पैर नहीं
रखता है, जहां हाथी, बाघ आदि घूमते हैं. (३)
नैनं घ्नन्ति पर्यायिणो न सन्नां अव गच्छति.
अग्नेर्यः क्षत्रियो विद्वाङ्नाम गृह्णात्यायुषे.. (४)
कल्याण की कामना करने वाले को शत्रु नहीं मार पाते. वह अपने समीपवर्ती शत्रुओं
को भी नहीं जानता. जो क्षत्रिय इस प्रकार से महात्मा अग्नि को जानता हुआ, अग्नि का नाम
चिरकाल तक जीवित रहने के लिए उच्चारण करता है, शत्रु उस का वध नहीं कर पाते. (४)
सूक्त-७७ देवता—जातवेद
अस्थाद् द्यौरस्थात् पृथिव्यस्थाद् विश्वमिदं जगत्.
आस्थाने पर्वता अस्थ्यु स्थाम्न्यश्वां अतिष्ठिपम्.. (१)
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नियंता ईश्वर की आज्ञा से जिस प्रकार आकाश और पृथ्वी अपने स्थान पर स्थित हैं,
उन के मध्य में स्थित जगत् भी अपने स्थान पर वर्तमान है.
मेरु, मंदार आदि पर्वत भी ईश्वर के द्वारा बनाए गए स्थान पर स्थित हैं. हे नारी! उसी
प्रकार मैं तुझे घर की थूनी से बांधता हूं. बांधने का प्रकार वही है, जिस प्रकार घुड़सवार दुष्ट
घोड़ों को रस्सी से बांधता है. (१)
य उदानट् परायणं य उदान्ण्यायनम्.
आवर्तनं निवर्तनं यो गोपा अपि तं हुवे.. (२)
मैं उस देवता का आह्वान करता हूं, जो पीछे गमन करने वालों में व्याप्त है. जो नीचे
गमन करने वालों में व्याप्त है और जो भागने वालों के लौटने की गति को रोकता है. (२)
जातवेदो नि वर्तय शतं ते सन्त्वावृतः.
सहस्रं त उपावृत्तस्ताभिर्नः पुनरा कृधि.. (३)
हे जातवेद अग्नि! इस भागने वाली स्त्री को घर में स्थापित करो. तुम्हारे पास इसे
लौटाने के सैकड़ों उपाय हैं. तुम इसे मेरे पास लौटाने के लिए हजारों उपाय जानते हो. उन के
द्वारा तुम इस स्त्री को पुनः मेरी ओर आकर्षित करो. (३)
सूक्त-७८ देवता—चंद्रमा
तेन भूतेन हविषा ऽ यमा प्यायतां पुनः.
जायां यामस्मा आवाक्षुस्तां रसेनाभि वर्धताम्.. (१)
प्रसिद्ध एवं समृद्धि करने वाले हवि से यह पति पुनः प्रजा और पशु आदि से समृद्ध हो.
विवाह करने वाले पिता आदि जिस पत्नी को इस के समीप लाए थे, उस पत्नी की दधि, मधु,
घृत आदि से हवन किए जाते हुए अग्नि देव वृद्धि करें. (१)
अभि वर्धतां पयसा ऽ भि राष्ट्रेण वर्धताम्.
रय्या सहस्रवर्चसेमौ स्तामनुपक्षितौ.. (२)
यह वर एवं वधू गायों के दूध से समृद्ध हों. इन्हें गायों आदि की समृद्धि प्राप्त हो. ये
पतिपत्नी असीमित तेज और धन के द्वारा पूर्ण काम बनें. (२)
त्वष्टा जायामजनयत् त्वष्टा ऽ स्यै त्वां पतिम्.
त्वष्टा सहस्रमायूंषि दीर्घमायुः कृणोतु वाम्.. (३)
हे वर! त्वष्टा देव ने स्त्री को जन्म दिया एवं त्वष्टा ने ही तुम्हें इस स्त्री का पति बनाया है.
त्वष्टा देव तुम दोनों अर्थात् पतिपत्नी की हजार वर्षों की दीर्घ आयु प्रदान करें. (३)
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सूक्त-७९ देवता—संस्फान

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सूक्त-७९ देवता—संस्फान
अयं नो नभसस्पतिः संस्फानो अभि रक्षतु. असमातिं गृहेषु नः.. (१)
हवि प्रदान करने के कारण आकाश के पालन कर्ता अग्नि धान्य की वृद्धि करते हुए
हमारी रक्षा करें एवं हमारे घरों की कुठिया को कभी धान्य से रहित न बनाएं. (१)
त्वं नो नभसस्पत ऊर्जं गृहेषु धारय. आ पुष्टमेत्वा वसु.. (२)
हे अंतरिक्ष के पालन कर्ता अग्नि! तुम हमारे घरों में रस वाले अन्न को स्थापित करो.
प्रजा, पशु एवं धन हमारे पास आएं. (२)
देव संस्फान सहस्रापोषस्येशिषे.
तस्य नो रास्व तस्य नो धेहि तस्य ते भक्तिवांसः स्याम.. (३)
हे दानादिगुण युक्त एवं प्रजापालन में प्रवृत्त आदित्य, तुम हजार संख्या वाली प्रजाओं
का पोषण करने वाले धनों के स्वामी हो. तुम उसी प्रकार का धन हमें प्रदान करो तथा उस
धन का भाग हमें भोग करने के लिए दो. तुम्हारी कृपा से हम उस धन के स्वामी बनें. (३)
सूक्त-८० देवता—चंद्रमा
अन्तरिक्षेण पतति विश्वा भूतावचाकशत्.
शुनो दिव्यस्य यन्महस्तेना ते हविषा विधेम.. (१)
कौआ, कबूतर आदि घात करने की इच्छा से बारबार देखते हुए इस पुरुष के शरीर पर
गिरते हैं. हे अग्नि! इस दोष को शांत करने के लिए हम स्वर्ग में रहने वाले श्वान के तेज की
हवि से तुम्हारी सेवा करते हैं. (१)
ये त्रयः कालकाञ्जा दिवि देवा इव श्रिताः.
तान्तसर्वान्ह्व ऊतये ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (२)
कालकांज नाम के जो तीन असुर उत्तम कर्मों के कारण देवों के समान स्वर्ग में वर्तमान
हैं, मैं इस पुरुष की रक्षा के लिए तथा कौए, कबूतर आदि पक्षियों के आघात संबंधी दोष की
भीति के निमित्त सभी कालकांज असुरों का आह्वान करता हूं. (२)
अप्सु ते जन्म दिवि ते सधस्थं समुद्रे अन्तर्महिमा ते पृथिव्याम्.
शुनो दिव्यस्य यन्महस्तेना ते हविषा विधेम.. (३)
हे अग्नि, वाडवाग्नि के रूप में तुम्हारा जन्म सागर में हुआ था तथा सूर्य के रूप में
तुम्हारी स्थिति आकाश में रही है. सागर और धरती के मध्य तुम्हारी महिमा देखी जाती है. हे
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सूक्त-८१ देवता—आदित्य

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अग्नि! हम हवि के द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. (३)
सूक्त-८१ देवता—आदित्य
यन्ता ऽ सि यच्छसे हस्तावेप रक्षांसि सेधसि.
प्रजां धनं च गृह्णानः परिहस्तो अभूदयम्.. (१)
हे अग्नि! तुम गर्भ को नष्ट करने वाले राक्षस आदि को वश में करने में समर्थ हो,
इसीलिए अपने दोनों हाथ फैलाओ तथा उन के द्वारा गर्भ का नाश करने वाले राक्षसों का
विनाश करो. पुत्र आदि रूप प्रजा और उन के भोग के लिए धन प्रदान करते हुए अग्नि अपने
हाथ फैला कर रक्षा करें. (१)
परिहस्त वि धारय योनिं गर्भाय धातवे.
मय्यिदि पुत्रमा धेहि तं त्वमा गमयागमे.. (२)
हे कंकण! तुम गर्भ धारण करने के लिए गर्भाशय को विस्तृत करो. हे पत्नी! तुम अपने
गर्भाशय में पुत्र को धारण करो तथा पति के आगमन पर मेरे मनचाहे पुत्र को जन्म दो. (२)
यं परिहस्तमबिभरदितिः पुत्रकाम्या.
त्वष्टा तमस्या आ बध्नाद् यथा पुत्रं जनादिति.. (३)
पुत्र की इच्छा से देवता अदिति ने जिस कंकण को धारण किया, वही कंकण त्वष्टा देव
मेरी इस पत्नी के हाथ में बांधें, जिस से यह पुत्र को जन्म दे सके. (३)
सूक्त-८२ देवता—इंद्र
आगच्छत आगतस्य नाम गृह्णाम्यायत:.
इन्द्रस्य वृत्रघ्नो वन्वे वासवस्य शतक्रतो:.. (१)
मैं अपने समीप आए हुए इंद्र को प्रसन्न करने वाले नाम वृत्र हंता का उच्चारण करता हूं.
विवाह की इच्छा वाला मैं वृत्र का वध करने वाले, वसुओं द्वारा उपासना किए गए और शक्ति
की प्रसिद्धि करने वाले सौ कर्मों के स्वामी इंद्र की उपासना अभिमत फल को पाने के लिए
करता हूं. (१)
येन सूर्या सावित्रीमश्विनोहतुः पथा.
तेन मामब्रवीद् भगो जायामा वहतादिति.. (२)
जिस प्रकार अश्विनीकुमारो ने सविता की पुत्री सूर्या से विवाह किया, उसी प्रकार से भग
ने मुझ से कहा कि पत्नी ले आओ. (२)
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सूक्त-८३ देवता—सूर्योदय

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यस्ते ऽ ङ्कुशो वसुदानो बृहन्निन्द्र हिरण्ययः.
तेना जनीयते जायां मह्यं धेहि शचीपते.. (३)
हे इंद्र! तुम्हारा जो हाथ आकर्षक धन धारण करने वाला एवं स्वर्ण से युक्त हैं. हे शची
के पति! उसी हाथ से पत्नी के इच्छुक मुझ को पत्नी प्रदान करो. (३)
सूक्त-८३ देवता—सूर्योदय
अपचितः प्र पतत सुपर्णो वसतेरिव.
सूर्यः कृणोतु भेषजं चन्द्रमा वो ऽ पोच्छतु.. (१)
हे गंडमालाओ! जिस प्रकार बाज पक्षी अपने निवास स्थान से उड़ता है, उसी प्रकार
तुम मेरे शरीर से निकल जाओ. सूर्य मेरी चिकित्सा करें और चंद्रमा मेरे शरीर से तुम्हें दूर करें.
(१)
अन्यैका श्येन्येका कृष्णैका रोहिणी द्वे.
सर्वासामग्रभं नामावीरघ्नीरपेतन.. (२)
एक गंडमाला लाल रंग की, दूसरी श्वेत वर्ण की तथा तीसरी काले रंग की है. इन के
अतिरिक्त दो गंडमालाएं लाल रंग की हैं. मैं इन सब को प्रसन्न करने वाले नाम का उच्चारण
करता हूं. इस से प्रसन्न हो कर तुम इस पुरुष को त्याग कर अन्यत्र चली जाओ. (२)
असूतिकारामण्यपचित् प्र पतिष्यति.
ग्लौरितः प्र पतिष्यति स गलुन्तो नशिष्यति.. (३)
पीब बहाने वाली तथा घाव के रूप वाली गंडमाला इस पुरुष के शरीर से दूर जाएगी.
इस के घाव के कारण होने वाला दुःख नष्ट हो जाएगा तथा चंद्रमा गंडमालाओं की पीड़ा को
शेष नहीं रखेगा. (३)
वीहि स्वामाहुतिं जुषाणो मनसा स्वाहा मनसा यदिदं जुहोमि.. (४)
हे घाव रोग के अभिमानी देव! तुम अपनी आहुति का भक्षण करो. सेवा किए जाते हुए
तुम आहुति का भक्षण करो. मैं भी मन से यह हवि देता हूं. (४)
सूक्त-८४ देवता—निर्ऋति
यस्यास्त आसनि घोरे जुहोम्येषां बद्धानामवसर्जनाय कम्.
भूमिरिति त्वाभिप्रमन्वते जना निर्ऋतिरिति त्वाहं परि वेद सर्वतः.. (१)
हे रोगाभिमानिनी पाप की देवी! घाव के रोगों से उत्पन्न बंधनों से छूटने के लिए मैं
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तुम्हारे भयानक मुख में हवि डालता हूं तथा घाव को धोने के लिए यह हवि ओषधि युक्त जल
प्रयोग करता हूं. तुम्हें ज्ञानहीन जन पृथ्वी समझते हैं. तुम्हारा स्वरूप जानता हुआ मैं सभी
प्रकार निर्ऋति अर्थात् सभी रोगों का कारण जानता हूं. (१)
भूते हविष्मती भवैष ते भागो यो अस्मासु. मुञ्चेमानमूनेनसः स्वाहा.. (२)
हे सर्वत्र विद्यमान निर्ऋति! तुम हमारे द्वारा दिया हुआ आज्य स्वीकार करो. यह तुम्हारा
भाग्य है जो इस समय हम ने निश्चित् किया है. तुम हमें रोग के कारण पाप से बचाओ. हमारा
यह हवि उत्तम आहुति वाला हो. (२)
एवो ष्व १ स्मन्निर्ऋते ऽ नेहा त्वमयस्मयान् वि चृता बन्धपाशान्.
यमो मह्यं पुनरित् त्वां ददाति तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे.. (३)
हे पाप देवता निर्ऋति! तुम हमें बाधा न पहुंचाती हुई अत्यंत दृढ़ बंधन वाले रस्सी के
फंदों को हम से दूर करो. ये फंदे रोगात्मक हैं. हे रोगी! यमराज तुम्हें मेरे लिए देते हैं. मृत्यु के
देवता उस यम को नमस्कार है. (३)
अयस्मये द्रुपदे बेधिष इहाभिहितो मृत्युभिर्ये सहस्रम्.
यमेन त्वं पितृभिः संविदान उत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (४)
हे निर्ऋति! लोहे की श्रृंखलाओं से अथवा लकड़ी के बने चरण बंधन से जब तुम किसी
पुरुष को बांधती हो, तब वह इस लोक में मृत्यु के द्वारा बद्ध हो जाता है. प्रसिद्ध ज्वर आदि
रोग और राक्षस, पिशाच आदि मृत्यु के हजारों कारण हैं. हे निर्ऋति! तुम मृत्यु के देव यम से
और देवता, पितर आदि से तालमेल कर के इस पुरुष को उत्तम सुख प्रदान करो. (४)
सूक्त-८५ देवता—वनस्पति
वरणो वारयाता अयं देवो वनस्पतिः.
यक्ष्मो यो अस्मिन्नाविष्टस्तमु देवा अवीवरन्.. (१)
यह दिव्य गुण युक्त वरण नाम की वनस्पति से बनी हुई मणि राजयक्ष्मा रोग का
निवारण करे. इस पुरुष में जिस यक्ष्मा रोग का निवास है, उस रोग का निवारण इंद्र आदि देव
करें. (१)
इन्द्रस्य वचसा वयं मित्रस्य वरुणस्य च.
देवानां सर्वेषां वाचा यक्ष्मं ते वारयामहे.. (२)
हे रोगी पुरुष! तेरे हाथ में वरण वृक्ष से बनी हुई मणि बांधने वाले हम सब इंद्र, मित्र
और वरुण की आज्ञा से यक्ष्मा रोग का निवारण करते हैं. हम सभी देवों की आज्ञा से तेरे
यक्ष्मा रोग को तेरे शरीर से निकालते हैं. (२)
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सूक्त-८६ देवता—एक वृष

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यथा वृत्र इमा आपस्तस्तम्भ विश्वधा यतीः.
एवा ते अग्निना यक्ष्मं वैश्वानरेण वारये.. (३)
त्वष्टा का पुत्र वृत्रासुर जिस प्रकार स्थावर और जंगम विश्व का पोषण करने वाले इन
मेघों के जलों की गति रोकता है, हे रोगी! मैं वैश्वानर अग्नि की सहायता से तेरे यक्ष्मा रोग का
उसी प्रकार निवारण करता हूं. (३)
सूक्त-८६ देवता—एक वृष
वृषेन्द्रस्य वृषा दिवो वृषा पृथिव्या अयम्.
वृषा विश्वस्य भूतस्य त्वमेकवृषो भव.. (१)
यह पुरुष इंद्र की कृपा से सेचन समर्थ हो. यह द्युलोक एवं पृथ्वीलोक में श्रेष्ठ बने. हे
श्रेष्ठता के इच्छुक पुरुष! तू संसार के सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बन. (१)
समुद्र ईशे स्रवतामग्निः पृथिव्या वशी.
चन्द्रमा नक्षत्राणामीशे त्वमेकवृषो भव.. (२)
सागर बहने वाले जलों का स्वामी है. अग्नि देव पृथ्वी के स्वामी हैं. चंद्रमा नक्षत्रों का
स्वामी है. तुम सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बनो. (२)
सम्राडस्यसुराणां ककुन्मनुष्याणाम्.
देवानामधर्धभागसि त्वमेकवृषो भव.. (३)
हे इंद्र! तुम असुरों के स्वामी हो. तुम बैल की ठाट के समान सभी मनुष्यों में उन्नत बनो.
हे इंद्र! सभी देव मिल कर तुम्हारे बराबर होते हैं. हे श्रेष्ठता के इच्छुक मनुष्य! तू इंद्र की कृपा
से सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बन. (३)
सूक्त-८७ देवता—ध्रुव
आ त्वाहार्षमन्तर भूर्ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलत्.
विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत्.. (१)
हे राजन्! हम तुम्हें अपने राष्ट्र में लाए हैं! तुम हमारे मध्य हमारे स्वामी बनो. तुम
चंचलता रहित हो कर राज्य के अधिकार पर दृढ़ बनो. सभी प्रजाएं तुम्हें चाहें. यह राष्ट्र
तुम्हारे अधिकार से भ्रष्ट न हो. (१)
इहैवैधि मा स प च्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलत्.
इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय.. (२)
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हे राजन्! तुम इसी राज्य सिंहासन पर सदा वर्तमान रहो. इस से कभी वंचित न बनो.
तुम पर्वत के समान निश्चल हो कर इंद्र के समान इसी राष्ट्र में स्थिर रहो. तुम अपने इस राष्ट्र
को धारण करो. (२)
इन्द्र एतमदीधरद् ध्रुवं ध्रुवेण हविषा.
तस्मै सोमो अधि ब्रवदयं च ब्रह्मणस्पतिः.. (३)
स्थिरता प्रदान करने वाले हमारे द्वारा दिए हुए हवि से संतुष्ट इंद्र ने इस राष्ट्र में इस राजा
को स्थिर रूप से स्थापित किया है. सोम ने इस राजा को अपना कहा है. वेद राशि का पालन
करने वाले ब्रह्म देव यही कहें. (३)
सूक्त-८८ देवता—ध्रुव
ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत्.
ध्रुवासः पर्वता इमे ध्रुवो राजा विशामयम्.. (१)
आकाश जिस प्रकार स्थित है, यह पृथ्वी जिस प्रकार ध्रुव दिखाई देती है. यह दिखाई
देता हुआ विश्व जिस प्रकार ध्रुव है तथा ये सभी पर्वत जिस प्रकार स्थिर हैं, प्रजाओं का
स्वामी यह राजा भी उसी प्रकार स्थिर हो. (१)
ध्रुवं ते राजा वरुणो ध्रुवं देवो बृहस्पतिः.
ध्रुवं त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्रं धारयतां ध्रुवम्.. (२)
हे राजन्! राजा वरुण तुम्हारे राज्य को स्थिर करें. प्रकाश करते हुए बृहस्पति तुम्हारे
राष्ट्र को ध्रुव बनाएं. इंद्र और अग्नि तुम्हारे राष्ट्र को स्थिर बनाएं. (२)
ध्रुवो ऽ च्युतः प्र मृणीहि शत्रूनूछत्रूयतो ऽ धरान् पादयस्व.
सर्वा दिशः संमनसः सध्रीचीर्ध्रुवाय ते समितिः कल्पतामिह.. (३)
हे राजन्! तुम इस राष्ट्र में स्थिर और अच्युत रह कर शत्रुओं का विनाश करो तथा
शत्रुओं के समान आचरण करने वाले अन्य जनों को भी अधोमुख गिराओ. सभी दिशाएं
सौमनस्य वाली बन कर तुम्हारी सेवा में लगें. तुम्हारा यह आयोजन सभी दिशाओं में तुम्हें
स्थिरता प्रदान करने में समर्थ हो. (३)
सूक्त-८९ देवता—मंत्रों में बताए गए
इदं यत् प्रेण्यः शिरो दत्तं सोमेन वृष्ण्यम्.
ततः परि प्रजातेन हार्दिं ते शोचयामसि.. (१)
मुझ प्रेम प्राप्त करने वाले का जो यह शक्ति प्रदान करने वाला शीश है, वह मुझे सोम ने

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दिया है. उन के द्वारा उत्पन्न विशेष स्नेह से मैं तुम्हारे मन को संताप युक्त करता हूं. (१)
शोचयामसि ते हार्दि शोचयामसि ते मनः.
वातं धूम इव सध्य १ ङ् मामेवान्वेतु ते मनः.. (२)
हे पति और पत्नी! मैं तुम दोनों के हृदयों को परस्पर प्रेम उत्पन्न कर के संतप्त करता
हूं. मैं तुम्हारे मन को उसी प्रकार संतप्त करता हूं, जिस प्रकार धुआं वायु का अनुगमन करता
है. तुम्हारा मन इसी प्रकार मेरा अनुगामी हो. (२)
मह्यं त्वा मित्रावरुणो मह्यं देवी सरस्वती.
मह्यं त्वा मध्यं भूम्या उभावन्तौ समस्यताम्.. (३)
हे पत्नी! मित्र और वरुण देव तुम्हें मुझ से मिलाएं. सरस्वती देवी तुम्हें मुझ से मिलाएं.
धरती पर स्थित सभी प्राणी तुम्हें मुझ से मिलाएं तथा इस भूमि के ऊपर और नीचे के प्रदेश
तुम्हें मुझ से मिलाएं. (३)
सूक्त-९० देवता—रुद्र
यां ते रुद्र इषुमास्यदङ्गेभ्यो हृदयाय च.
इदं तामद्य त्वद् वयं विषूचीं वि वृहामसि.. (१)
हे रोगी! तेरे हाथ, पैर और हृदय आदि अंगों को बेधने के लिए रुद्र देव ने जो बाण
अपने धनुष पर चढ़ा कर फेंका है, आज मैं उस का प्रतिकार करने के लिए उस बाण को तुझ
से विमुख करने के लिए शरीर से दूर फेंकता हूं. (१)
यास्ते शतं धमनयो ऽ ङ्गान्यनु विष्ठिताः.
तासां ते सर्वासां वयं निर्विषाणि ह्वयामसि.. (२)
हे शूल रोगी! तेरे हाथ, पैर आदि अंगों में जो सैकड़ों धमनी नाड़ियां स्थित हैं, उन के
लिए मैं विषरहित एवं शूलहीन ओषधियां बनाता हूं. (२)
नमस्ते रुद्रास्यते नमः प्रतिहितायै. नमो विसृज्यमानायै नमो निपतितायै..
(३)
हे व्याधि रूप अस्त्र चलाने वाले रुद्र! तुम को नमस्कार है. धनुष पर चढ़े हुए तुम्हारे
बाण को नमस्कार है. धनुष से छोड़े जाते हुए तुम्हारे बाण को नमस्कार है. लक्ष्य पर गिरने
वाले तुम्हारे बाण को नमस्कार है. (३)
सूक्त-९१ देवता—यक्ष्मा का विनाश
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इमं यवमष्टायोगैः षड्योगेभिरचर्कृषुः. तेना ते तन्वो ३ रपो ऽ पाचीनमप
व्यये.. (१)
ओषधि के रूप में प्रयोग में लाए जाते हुए जौ को आठ बैलों वाले तथा छः बैलों वाले
हल से जोत कर उत्पन्न किया गया है. हे रोगी! उस जौ से मैं तेरे शरीर के रोग के कारण पाप
को दूर करता हूं. (१)
न्यग्् वातो वाति न्यक् तपति सूर्यः. नीचीनमघ्न्या दुहे न्यग् भवतु ते
रपः.. (२)
वायु जिस प्रकार नीचे चलती है, सूर्य जिस प्रकार नीचे तपते हैं, जिस प्रकार गायों से
नीचे की ओर दूध काढ़ा जाता है, हे रोगी! उसी प्रकार तेरे रोग का कारण पाप शांत हो जाए.
(२)
आप इद् वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः.
आपो विश्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्.. (३)
सभी ओषधियां जल का विकार हैं. इस प्रकार जल ही रोग निवारण के लिए उत्तम
ओषधि है. जल सारे संसार के लिए ओषधि रूप है, वे ही जल तेरे लिए रोग निवारक ओषधि
बनें. (३)
सूक्त-९२ देवता—बाजि अर्थात् घोड़ा
वातरंहा भव वाजिन् युज्यमान इन्द्रस्य याहि प्रसवे मनोजवाः.
युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस आ ते त्वष्टा पत्सु जवं दधातु.. (१)
हे रथ के जुए में जुते हुए अश्व! तू वायु के समान तेज चलने वाला बन. इंद्र की प्रेरणा
होने पर तू मन के समान वेग से गंतव्य पर पहुंच. सारे संसार को जानने वाले उनचास
मरुद्गण तुझ से मिल जाएं एवं त्वष्टा देव तेरे चरणों को वेग प्रदान करें. (१)
जवस्ते अर्वन् निहितो गुहा यः श्येने वात उत यो ऽ चरत् परीत्तः.
तेन त्वं वाजिन् बलवान् बलेनाजिं जय समने पारयिष्णुः.. (२)
हे अश्व! तेरा वेग असाधारण स्थान गुफा में छिपा है. तेरा जो वेग बाज पक्षी और वायु
में सुरक्षित है, तू उसी वेगशाली बल से बलवान हो कर हमें संग्राम में सफलता दिला. (२)
तनूष्टे वाजिन् तन्वं१ नयन्ती वाममस्मभ्यं धातवु शर्म तुभ्यम्.
अहुतो महो धरुणाय देवो दिवीव ज्योतिः स्वमा मिमीयात्.. (३)
हे वेगवान अश्व! सवार के शरीर को युद्धभूमि में पहुंचाता हुआ तेरा शरीर हमें धन प्राप्त
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सूक्त-९३ देवता—यम

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कराए तथा तुझे सुख पहुंचाता हुआ दौड़े. तू खाली स्थान में फैले गांव, जनपद आदि को
धारण करने के लिए सीधा चलता हुआ इस प्रकार अपने स्थान को जा, जिस प्रकार सूर्य का
प्रकाश अपने स्थान पर पहुंचता है. (३)
सूक्त-९३ देवता—यम
यमो मृत्युरघमारो निर्ऋथो बभ्रुः शर्वो ऽ स्ता नीलशिखण्डः.
देवजनाः सेनयोत्तस्थिवांसस्ते अस्माकं परि वृञ्जन्तु वीरान्.. (१)
पापियों की हिंसा के लिए यम, मृत्यु, अघमार, निर्ऋति, बभ्रु, शर्व एवं नीलशिखंड आदि
देवगण, अपने परिवार जनों के साथ अपनेअपने स्थान से चल दिए हैं. वे हमारे पुत्र, पौत्र
आदि को छोड़ दें. (१)
मनसा होमैर्हरसा घृतेन शर्वायास्त्र उत राज्ञे भवाय.
नमस्येभ्यो नम एभ्यः कृणोम्यन्यत्रास्मदघविषा नयन्तु.. (२)
शर्व के लिए, क्षेत्र के लिए एवं उन सब के स्वामी महादेव के लिए मैं मन से, तेज से, घृत
और आज्यों से नमस्कार करता हूं. ये सभी नमस्कार के योग्य हैं. प्रसन्न हो कर ये पाप रूपी
विष से पूर्ण कृत्याओं को हम से दूर ले जाएं. (२)
त्रायध्वं नो अघविषाभ्यो वधाद् विश्वे देवा मरुतो विश्ववेदसः.
अग्नीषोमा वरुणः पूतदक्षा वातापर्जन्ययोः सुमतौ स्याम.. (३)
हे सब कुछ जानने वाले मरुदगण एवं विश्वे देव! तुम कृत्याओं की मारक शक्ति से
हमारी रक्षा करो. हम अग्नि, सोम, वरुण, शुद्ध बलशाली मित्र, वायु एवं पर्जन्य के कृपा पात्र
रहें. (३)
सूक्त-९४ देवता—सरस्वती
सं वो मनांसि सं व्रता समाकूतीर्नमामसि.
अमी ये विव्रता स्थन तान् वः सं नमयामसि.. (१)
हे उदास मन वाले लोगो! मैं तुम्हारे परस्पर विरुद्ध हृदयों को एक विषय पर सहमत
करता हूं. मैं तुम्हारे कर्मों एवं संकल्पों को भी एक रूप बनाता हूं. पहले तुम सब परस्पर
विरुद्ध कर्म करने वाले थे. मैं तुम सब को समान मन वाला बनाता हूं. (१)
अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि मम चित्तमनु चित्तेभिरेत.
मम वशेषु हृदयानि वः कृणोमि मम यातमनुवर्त्मान एत.. (२)
हे परस्पर विरोधी मन वाले लोगो! मैं तुम्हारे हृदयों को अपने हृदय के अधीन बनाता हूं.
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तुम सब भी अपने हृदयों को मेरे हृदय का अनुगमन करने वाला बनाओ. तुम्हारे हृदय मेरे वश
में हों एवं तुम सब मेरा अनुगमन करो. (२)
ओते मे द्यावापृथिवी ओता देवी सरस्वती.
ओतौ म इन्द्रश्चाग्निश्चर्ध्यास्मेदं सरस्वति.. (३)
धरती और आकाश सदा मेरे सम्मुख और परस्पर संबद्ध रहें. देवी सरस्वती भी मेरे
अभिमुख और अनुकूल रहे. इंद्र और अग्नि मेरे अनुकूल रहें. हे सरस्वती देवी! इस समय हम
समृद्ध हों. (३)
सूक्त-९५ देवता—वनस्पति
अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयस्यामितो दिवि.
तत्रामृतस्य चक्षणं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (१)
तीसरे आकाश में देवों का स्थान पीपल है. वहां देवों ने अमृत के गुण वाले वनस्पति
कूठ को जाना. (१)
हिरण्ययी नौरचरद्धिरण्यरबन्धना दिवि.
तत्रामृतस्य पुष्पं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (२)
देवों ने सोने के बंधनों वाली स्वर्ग की नाभि के द्वारा कूठ वनस्पति को प्राप्त किया, जो
अमृत का पुरुष है. (२)
गर्भो अस्योषधीनां गर्भो हिमवतामृत. गर्भो विश्वस्य भूतस्येमं मे अगदं
कृधि.. (३)
हे अग्नि! तुम वर्षा से उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों के भीतर स्थित हो तथा शीतल
स्पर्श वाली वनस्पतियों में भी स्थित हो. तुम संसार के सभी प्राणियों में स्थित हो. तुम मेरे इस
मनुष्य को रोग रहित बनाओ. (३)
सूक्त-९६ देवता—वनस्पति, सोम
या ओषधयः सोमराज्ञीर्बह्वीः शतविचक्षणाः.
बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१)
जिन वृक्षों और वनस्पतियों के राजा सोम हैं तथा जो रस, वीर्य आदि के विपाक के
कारण सैकड़ों प्रकार की दिखाई देती हैं, बृहस्पति देव के द्वारा उन रोगों की ओषधि के रूप
में नियत वे वनस्पतियां हमें पाप से बचाएं. (१)
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