Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 318 of 1063

Read in context
Page 318

एतु तिस्रः परावत एतु पञ्च जनाँ अति.
एतु तिस्रो ऽ ति रोचना यतो न
पुनरायति शश्वतीभ्यः समाभ्यो यावत् सूर्यो असद् दिवि.. (३)
इंद्र के द्वारा प्रेरित हमारा शत्रु तीनों भूमियों और निषाद आदि पांच जनों को पार कर के
दूर वहां चला जाए, जहां से वापस न आए. जब तक सूर्य आकाश में रहे, तब तक वह अनेक
वर्षों तक न लौटे. (३)
सूक्त-७६ देवता—सायंतन अग्नि
य एनं परिषीदन्ति समादधति चक्षसे. संप्रेद्धो अग्निर्जिह्वाभिरुदेतु
हृदयादधि.. (१)
जो राक्षस आदि इस के चारों ओर बैठते हैं तथा हिंसा करने के लिए तत्पर हो जाते हैं,
उन के हृदय से उत्पन्न प्रज्वलित अग्नि उन्हें जला दे. (१)
अग्नेः सांतपनस्याहमायुषे पदमा रभे.
अद्धातिर्यस्य पश्यति धूममुद्यन्तमास्यतः.. (२)
अधिक तपन वाले उन अग्नि देव के जीवन के लिए मैं उपक्रम करता हूं, जिन के मुख
से निकलते हुए धूम को अद्धाति नाम के ऋषि देखते हैं. (२)
यो अस्य समिधं वेद क्षत्रियेण समाहिताम्.
नाभिह्वारे पदं नि दधाति स मृत्यवे.. (३)
विजय के इच्छुक क्षत्रिय जाति के पुरुष के द्वारा स्थापित अग्नि और दीप्त करने वाली
आहुतियों को जो पुरुष जानता है, वह मृत्यु का कारण बनने वाले ऐसे स्थान में पैर नहीं
रखता है, जहां हाथी, बाघ आदि घूमते हैं. (३)
नैनं घ्नन्ति पर्यायिणो न सन्नां अव गच्छति.
अग्नेर्यः क्षत्रियो विद्वाङ्नाम गृह्णात्यायुषे.. (४)
कल्याण की कामना करने वाले को शत्रु नहीं मार पाते. वह अपने समीपवर्ती शत्रुओं
को भी नहीं जानता. जो क्षत्रिय इस प्रकार से महात्मा अग्नि को जानता हुआ, अग्नि का नाम
चिरकाल तक जीवित रहने के लिए उच्चारण करता है, शत्रु उस का वध नहीं कर पाते. (४)
सूक्त-७७ देवता—जातवेद
अस्थाद् द्यौरस्थात् पृथिव्यस्थाद् विश्वमिदं जगत्.
आस्थाने पर्वता अस्थ्यु स्थाम्न्यश्वां अतिष्ठिपम्.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*