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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 320 of 1063

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Page 320

सूक्त-७९ देवता—संस्फान
अयं नो नभसस्पतिः संस्फानो अभि रक्षतु. असमातिं गृहेषु नः.. (१)
हवि प्रदान करने के कारण आकाश के पालन कर्ता अग्नि धान्य की वृद्धि करते हुए
हमारी रक्षा करें एवं हमारे घरों की कुठिया को कभी धान्य से रहित न बनाएं. (१)
त्वं नो नभसस्पत ऊर्जं गृहेषु धारय. आ पुष्टमेत्वा वसु.. (२)
हे अंतरिक्ष के पालन कर्ता अग्नि! तुम हमारे घरों में रस वाले अन्न को स्थापित करो.
प्रजा, पशु एवं धन हमारे पास आएं. (२)
देव संस्फान सहस्रापोषस्येशिषे.
तस्य नो रास्व तस्य नो धेहि तस्य ते भक्तिवांसः स्याम.. (३)
हे दानादिगुण युक्त एवं प्रजापालन में प्रवृत्त आदित्य, तुम हजार संख्या वाली प्रजाओं
का पोषण करने वाले धनों के स्वामी हो. तुम उसी प्रकार का धन हमें प्रदान करो तथा उस
धन का भाग हमें भोग करने के लिए दो. तुम्हारी कृपा से हम उस धन के स्वामी बनें. (३)
सूक्त-८० देवता—चंद्रमा
अन्तरिक्षेण पतति विश्वा भूतावचाकशत्.
शुनो दिव्यस्य यन्महस्तेना ते हविषा विधेम.. (१)
कौआ, कबूतर आदि घात करने की इच्छा से बारबार देखते हुए इस पुरुष के शरीर पर
गिरते हैं. हे अग्नि! इस दोष को शांत करने के लिए हम स्वर्ग में रहने वाले श्वान के तेज की
हवि से तुम्हारी सेवा करते हैं. (१)
ये त्रयः कालकाञ्जा दिवि देवा इव श्रिताः.
तान्तसर्वान्ह्व ऊतये ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (२)
कालकांज नाम के जो तीन असुर उत्तम कर्मों के कारण देवों के समान स्वर्ग में वर्तमान
हैं, मैं इस पुरुष की रक्षा के लिए तथा कौए, कबूतर आदि पक्षियों के आघात संबंधी दोष की
भीति के निमित्त सभी कालकांज असुरों का आह्वान करता हूं. (२)
अप्सु ते जन्म दिवि ते सधस्थं समुद्रे अन्तर्महिमा ते पृथिव्याम्.
शुनो दिव्यस्य यन्महस्तेना ते हविषा विधेम.. (३)
हे अग्नि, वाडवाग्नि के रूप में तुम्हारा जन्म सागर में हुआ था तथा सूर्य के रूप में
तुम्हारी स्थिति आकाश में रही है. सागर और धरती के मध्य तुम्हारी महिमा देखी जाती है. हे
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