अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-७४ देवता—ब्रह्मणस्पति
सं वः पृच्यन्तां तन्व १ः सं मनांसि समु व्रता.
सं वो ऽ यं ब्रह्मणस्पतिर्भगः सं वो अजीगमत्.. (१)
हे सौमनस्य के इच्छुक पुरुषो! तुम्हारे शरीर परस्पर के अनुराग से बंधें तथा हृदय भी
एकदूसरे के समीप आएं. तुम्हारे कृषि, वाणिज्य आदि कर्म भी सामंजस्य पूर्ण रहें.
ब्रह्मणस्पति देव तुम्हें संगत हृदय वाला बनाएं तथा भग नामक देव तुम्हें परस्पर तालमेल
वाला करें. (१)
संज्ञपनं वो मनसो ऽ थो संज्ञपनं हृदः.
अथो भगस्य यच्छ्रान्तं तेन संज्ञपयामि वः.. (२)
हे सौमनस्य चाहने वाले पुरुषो! मैं ऐसा यज्ञ कर्म करता हूं, जिस से तुम्हारा मन उचित
ज्ञान से पूर्ण हो. भग नाम के देव का जो श्रम से उत्पन्न तप है, उस के द्वारा मैं तुम्हें समान
ज्ञान वाला बनाता हूं. (२)
यथादित्या वसुभिः संबभूवुर्मरुद्भिरुग्रा अहृणीयमानाः.
एवा त्रिणामन्नहृणीयमान इमान्जनान्संमनसस्कृधीह.. (३)
जिस प्रकार अदिति के पुत्र मित्र, वरुण आदि आठ वसुओं के साथ समान ज्ञान वाले
हुए, जिस प्रकार उनचास मरुतों के साथ उग्र एवं बलशाली रुद्र क्रोध करते हुए समान ज्ञान
वाले हुए, हे तीन नामों अर्थात् पार्थिव, विद्युत और सूर्य अग्नि! तुम क्रोध न करते हुए इन
जनों को समान ज्ञान वाला बनाओ. (३)
सूक्त-७५ देवता—इंद्र
निरमुं नुद ओकसः सपत्नो यः पृतन्यति.
नैरबाध्येन हविषेन्द्र एनं पराशरीत्.. (१)
जो शत्रु सेना ले कर हम से युद्ध करने आता है, हम उसे अपने निवास स्थान से
निकालते हैं. हमारे शत्रुओं को मारने में समर्थ हवि के द्वारा इंद्र इस शत्रु की हिंसा करें, जिस
से यह लौट कर न आए. (१)
परमां तं परावतमिन्द्रो नुदतु वृत्रहा.
यतो न पुनरायति शश्वतीभ्यः समाभ्यः.. (२)
वृत्रासुर का वध करने वाले इंद्र उस शत्रु को अत्यधिक दूर देश में जाने की प्रेरणा दें. वह
बहुत वर्षों तक वापस न आए. (२)
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