अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextकराए तथा तुझे सुख पहुंचाता हुआ दौड़े. तू खाली स्थान में फैले गांव, जनपद आदि को
धारण करने के लिए सीधा चलता हुआ इस प्रकार अपने स्थान को जा, जिस प्रकार सूर्य का
प्रकाश अपने स्थान पर पहुंचता है. (३)
सूक्त-९३ देवता—यम
यमो मृत्युरघमारो निर्ऋथो बभ्रुः शर्वो ऽ स्ता नीलशिखण्डः.
देवजनाः सेनयोत्तस्थिवांसस्ते अस्माकं परि वृञ्जन्तु वीरान्.. (१)
पापियों की हिंसा के लिए यम, मृत्यु, अघमार, निर्ऋति, बभ्रु, शर्व एवं नीलशिखंड आदि
देवगण, अपने परिवार जनों के साथ अपनेअपने स्थान से चल दिए हैं. वे हमारे पुत्र, पौत्र
आदि को छोड़ दें. (१)
मनसा होमैर्हरसा घृतेन शर्वायास्त्र उत राज्ञे भवाय.
नमस्येभ्यो नम एभ्यः कृणोम्यन्यत्रास्मदघविषा नयन्तु.. (२)
शर्व के लिए, क्षेत्र के लिए एवं उन सब के स्वामी महादेव के लिए मैं मन से, तेज से, घृत
और आज्यों से नमस्कार करता हूं. ये सभी नमस्कार के योग्य हैं. प्रसन्न हो कर ये पाप रूपी
विष से पूर्ण कृत्याओं को हम से दूर ले जाएं. (२)
त्रायध्वं नो अघविषाभ्यो वधाद् विश्वे देवा मरुतो विश्ववेदसः.
अग्नीषोमा वरुणः पूतदक्षा वातापर्जन्ययोः सुमतौ स्याम.. (३)
हे सब कुछ जानने वाले मरुदगण एवं विश्वे देव! तुम कृत्याओं की मारक शक्ति से
हमारी रक्षा करो. हम अग्नि, सोम, वरुण, शुद्ध बलशाली मित्र, वायु एवं पर्जन्य के कृपा पात्र
रहें. (३)
सूक्त-९४ देवता—सरस्वती
सं वो मनांसि सं व्रता समाकूतीर्नमामसि.
अमी ये विव्रता स्थन तान् वः सं नमयामसि.. (१)
हे उदास मन वाले लोगो! मैं तुम्हारे परस्पर विरुद्ध हृदयों को एक विषय पर सहमत
करता हूं. मैं तुम्हारे कर्मों एवं संकल्पों को भी एक रूप बनाता हूं. पहले तुम सब परस्पर
विरुद्ध कर्म करने वाले थे. मैं तुम सब को समान मन वाला बनाता हूं. (१)
अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि मम चित्तमनु चित्तेभिरेत.
मम वशेषु हृदयानि वः कृणोमि मम यातमनुवर्त्मान एत.. (२)
हे परस्पर विरोधी मन वाले लोगो! मैं तुम्हारे हृदयों को अपने हृदय के अधीन बनाता हूं.
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