अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइडस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर.. (४)
हे अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले अग्नि देव! तुम समस्त प्रकार के धन प्राप्त कराते हो.
तुम यज्ञवेदी में प्रज्वलित होते हो. तुम हमें धन दो. (४)
सूक्त-६४ देवता—सौमनस्य
सं जानीध्वं सं पृच्यध्वं सं वो मनांसि जानताम्.
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते.. (१)
हे सौमनस्य के इच्छुक जनो! तुम समान ज्ञान वाले बनो और समान कार्य में संलग्न हो
जाओ. ज्ञान की उत्पत्ति के निमित्त तुम्हारे अंतःकरण समान हों. इंद्र आदि देव जिस प्रकार
एक ही कार्य को जानते हुए यजमानों द्वारा दिए गए हवि को ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार तुम
भी विरोध त्याग कर इच्छित फल पाओ. (१)
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं व्रतं सह चित्तमेषाम्.
समानेन वो हविषा जुहोमि समानं चेतो अभिसंविशध्वम्.. (२)
हमारा गुप्त भाषण एकरूप हो. हमारे कार्यों में प्रवृत्ति समान हो. हमारा कर्म भी
एकरूप हो तथा हमारा अंतःकरण भी इसी प्रकार का हो. उक्त फल पाने के लिए हे देवो!
हम एकता उत्पन्न करने वाले आज्य आदि से आप के निमित्त हवन करें. इस से आप सब
एकचित्तता को प्राप्त करो. (२)
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः.
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति.. (३)
हे सौमनस्य चाहने वालो! तुम्हारा संकल्प समान हो. तुम्हारे संकल्पों को उत्पन्न करने
वाले हृदय समान हों. तुम्हारा मन एकरूप हो, जिस से तुम सब सभी कार्य ठीक से कर
सको. (३)
सूक्त-६५ देवता—इंद्र
अव मन्युरवायताव बाहू मनोयुजा.
पराशर त्वं तेषां पराज्चं शुष्ममर्दयाधा नो रयिमा कृधि.. (१)
हमारे शत्रु का क्रोध शांत हो तथा उस का तिरस्कार नष्ट हो. उस के द्वारा ताने गए
आयुध विफल हों. हमारे शत्रुओं की भुजाएं आयुध उठाने में असमर्थ हों. हे शत्रुनाशक इंद्र!
तुम उन शत्रुओं के बल को विमुख करो. इस के पश्चात उन शत्रुओं का धन हमारे समीप
लाओ. (१)
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