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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages
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दूसरा प्रकरण । ५१

भावार्थ ।

**प्रश्न—**आत्मा के स्वरूप का जबतक अज्ञान बना है, तबतक आत्मा के प्रकाश का भी प्रभाव ही रहता है, तब फिर आत्मा के स्वरूप के प्रकाश का अभाव होने से जगत् का भान कैसे हो सकता है ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि मेरा जो प्रकाश अर्थात् नित्य-ज्ञान है, वह मेरा स्वाभाविक स्वरूप है, मैं उस प्रकाश से भिन्न नहीं हूँ, इसी वास्ते जिस काल में मुझको विश्व प्रतीत होता है, तब आत्मा के प्रकाश से ही प्रतीत होता है ।

**प्रश्न—**यदि स्वरूप भूतचेतन ही प्रकाशक है, तब फिर अज्ञान कैसे रह सकता है ? क्योंकि ज्ञान और अज्ञान दोनों तम और प्रकाश की तरह परस्पर विरोधी हैं ।

**उत्तर—**दो प्रकार का चेतन है । एक सामान्य चेतन, दूसरा विशेष चेतन । विशेष चेतन अज्ञान का विरोधी है अर्थात् बाधक है । सामान्य चेतन अज्ञान का विरोधी नहीं है, किन्तु साधक है अर्थात् अज्ञान को सिद्ध करता है । जैसे अग्नि दो प्रकार की है । एक सामान्य अग्नि, दूसरी विशेष अग्नि है । सामान्य अग्नि तो सब काष्ठों में व्यापक है, परन्तु काष्ठों के स्वरूप को जलाती नहीं है, किन्तु बनाती है, क्योंकि जितने जगत् के पदार्थ हैं, वे सब भूतों के पञ्चीकरण से बने हैं । जैसे जो लकड़ी पंचतत्त्वों से बनी है, उसको सामान्य तेज अर्थात् अग्नि जो उसके भीतर है, जलाती नहीं है, पर जब दो लकड़ियों के परस्पर रगड़ से जो विशेष अग्नि-रूप तेज उसमें से उत्पन्न होता है, वह तुरंत उस लकड़ी को जला देता है, क्योंकि वह उसका विरोधी

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५२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

है, वैसे सामान्य चेतन जो सर्वत्र व्यापक है, वह उस अज्ञान
का विरोधी अर्थात् बाधक नहीं है, किन्तु अपनी सत्ता करके
उसका साधक है, और आत्माकारवृत्त्यवच्छिन्न विशेष चेतन
है, वही उस अज्ञान का बाधक अर्थात् नाशक है । यदि स्वरूप
चेतन अज्ञान का विरोधी होवे, तब जड़ की सिद्धि भी न
होवेगी । यदि आत्मा के प्रकाश का भी अभाव माना जावे,
तब जगदान्ध्य प्रसंग हो जावेगा । इस वास्ते आत्मा के स्वरूप
प्रकाश करके ही जगत् भी प्रकाशमान हो रहा है, स्वतः
जगत् मिथ्या है ॥ ८ ॥

मूलम् ।
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते ।
रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा ॥ ९ ॥

पदच्छेदः ।
अहो, विकल्पितम्, अज्ञानात्, विश्वम्, मयि, भासते,
रूप्यम्, शुक्तौ, फणी, रज्जौ, वारि, सूर्यकरे, यथा ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अहो=आश्चर्य है किशुक्तौ=शुक्ति में
विकल्पितम्=कल्पितरूप्यम्=चाँदी
विश्वम्=संसाररज्जौ=रस्सी में
अज्ञानात्=अज्ञान सेफणी=सर्प
मयि=मेरे मेंसूर्यकरे=सूर्य की किरणों में
ईदृशम्=ऐसावारि=जल
भासते=भासता हैभासते=भासता है ॥
यथा=जैसे

भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि जैसे शुक्ति के अज्ञान जैसे शुक्ति

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दूसरा प्रकरण । ५३

में रजत असत् प्रतीत होता है—वैसे ही अज्ञान करके मेरे
स्वप्रकाश आत्मा में असत् जगत् प्रतीत हो रहा है, यही
बड़ा भारी आश्चर्य है ॥ ९ ॥

मूलम् ।

मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति ।
मृदि कुम्भोज़ले वीचिः कनके कटकं यथा ॥ १० ॥

पदच्छेदः ।

मत्तः, विनिर्गतम्, विश्वम्, मयि, एव, लयम्, एष्यति,
मृदि, कुम्भः, जले, वीचिः, कनके, कटकम्, यथा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मत्तः=मुझ सेमृदि=मिट्टी में
विनिर्गतम्=उत्पन्न हुआकुम्भ=घड़ा
इदम्=यहजले=जल में
विश्वम्=संसारवाचिः=लहर
मयि=मुझमेंकनके=स्वर्ण में
लयम्=लय कोकटकम्=भूषण
एष्यति=प्राप्त होगा$\left. लय यान्ति \right}$=लय होते हैं ॥
यथा=जैसे

भावार्थ ।

जैसे घट मृत्तिका का कार्य है अर्थात् मृत्तिका से ही
उत्पन्न होता है, और फिर फूटकर मृत्तिका में ही लय हो
जाता है—वैसे ही जगत् भी प्रकृति का कार्य है अर्थात्
प्रकृति से ही उत्पन्न होता है और प्रकृति में ही लय हो
जाता है । चेतन आत्मा से न जगत् उत्पन्न होता है, और
न उसमें लय होता है, क्योंकि जगत् जड़ और आत्मा चेतन

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५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

है । चेतन से जड़ की उत्पत्ति बनती नहीं है—ऐसी सांख्य-शास्त्रवाले की शङ्का है—उसके उत्तर को कहते हैं—
सांख्य-शास्त्रवाले परिणामवादी हैं और पूर्ववाली अवस्था से अवस्थान्तरता को प्राप्त होने का नाम ही परिणाम है । जैसे दूध का परिणाम दधि; मृत्तिका का घट और सुवर्ण का कुण्डल है—वैसे प्रकृति का परिणाम जगत् है—ऐसे सांख्य-शास्त्रवाले मानते हैं ।
नैयायिक आरम्भवादी हैं । अन्य वस्तु से अन्य वस्तु की उत्पत्ति का नाम आरम्भवाद है । जैसे अन्य तन्तु से अन्य पट की उत्पत्ति होती है । वैसे अन्य परमाणुओं से अन्य रूप जगत् की भी उत्पत्ति होती है ।
वेदान्ती का तो विवर्त्तवाद है । जो एक ही वस्तु अपनी पूर्ववाली अवस्था से अन्य अवस्था करके प्रतीत होवे, उसी का नाम विवर्त्त है । जैसे रज्जु का विवर्त्त सर्प है, वह रज्जु ही सर्प-रूप करके प्रतीत होती है । यदि जगत् ब्रह्म का परिणाम माना जावे, तब तो दोष आवे कि चेतन से जड़ कैसे उत्पन्न होता है ? और कैसे जगत् चेतन में लय हो जाता है ? ये सब दोष वेदान्ती के मत में नहीं आते हैं । क्योंकि जैसे रज्जु के अज्ञान से रज्जु सर्प-रूप प्रतीत होती है, और रज्जु के ज्ञान करने उस सर्प की निवृत्ति हो जाती है—वैसे ब्रह्म, आत्मा के स्वरूप के ज्ञान करके जगत् की निवृत्ति हो जाती है ।
सांख्यवाले और नैयायिक के मत में अनेक दोष पड़ते हैं । एक तो वेद में परिणामवाद और आरम्भवाद कहीं भी नहीं लिखा है, अतएव उनका मत वेद-विरुद्ध है । दूसरे

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दूसरा प्रकरण । ५५

युक्तियों से भी परिणामवाद और आरम्भवाद सिद्ध नहीं
होता है । क्योंकि घट मृत्तिका का परिणाम नहीं है और न
स्वर्ण का परिणाम कुण्डल हो सकते हैं । उत्पत्ति-काल में
भी घट मृत्तिका-रूप ही है, गोलाकार उसका रूप और घट
ये दोनों नाम कल्पित हैं । यदि घट से मृत्तिका निकाल दी
जावे, तब घट का कहीं पता नहीं लग सकता है, अतएव घट
मिथ्या है । इसी तरह स्वर्ण के कुण्डल भी मिथ्या हैं । घट
और कुण्डल भी मृत्तिका का विवर्त्त है, क्योंकि मृत्तिका और
स्वर्ण ही अन्य रूप से घट और कुण्डल प्रतीत हो रहे हैं ।
अतएव व्यवर्त्तवाद ही ठीक है । इसी तात्पर्य को लेकर
जनकजी कहते हैं कि यह सारा जगत् मुझसे ही उत्पन्न होता
है और फिर मुझसे ही लय हो जाता है । जैसे मृत्तिका से
घट उत्पन्न होता है और फिर मृत्तिका में ही लय हो
जाता है ।
**प्रश्न—**इसमें कोई वेदवाक्य भी प्रमाण है ?
उत्तर—यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि
जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, इति श्रुतेः ।

**अर्थ—**जिस आत्मब्रह्म से ये सब भूत प्राणी उत्पन्न होते
हैं, जिस ब्रह्म की सत्ता करके उत्पन्न होकर जीते हैं और
फिर सब मर करके जिसमें लय हो जाते हैं, उसी को तुम
अपना आत्मा जानो । यह वेद-वाक्य भी प्रमाण है ॥१०॥

मूलम् ।

अहो अहं नमो मह्यं विनाशी यस्य नास्ति मे ।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशेऽपि तिष्ठतः ॥ ११ ॥

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५६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

अहो, अहम्, नमः, मह्यम्, विनाशः, यस्य, न, अस्ति,
मे, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तम्, जगन्नाशे, अपि, तिष्ठतः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
ब्रह्मादिस्तम्ब पर्यन्तम् = ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त$जगन्नाशे = जगत के नाश होने पर
अपि = भी+ अतःएव = इसलिये
यस्य मे = जिस मेरेअहम् = मैं
तिष्ठतः = होते हुए काअहो = आश्चर्य्यरूप हूँ
विनाशः = नाशमह्यम् = मेरे लिये
न अस्ति = नहीं हैनमः = नमस्कार है ॥

भावार्थ ।

प्रश्न— यदि ब्रह्म को जगत् का उपादान कारण मानोगे, तब वह विकारी हो जावेगा और विकारी होने से नाशी भी हो जावेगा ?

उत्तर— ब्रह्म विकारी और नाशी तब होवे, जब हम जगत् को ब्रह्म का परिणामि उपादान कारण मानें, सो तो नहीं है, किन्तु जगत् को हम ब्रह्म का विवर्त्त मानते हैं, इस वास्ते विकारी और नाशी ब्रह्म कदापि नहीं हो सकता है ।

जनकजी कहते हैं कि मैं आश्चर्य्य-रूप हूँ, क्योंकि सारे जगत् का उपादान कारण होने पर भी मेरा नाश कदापि नहीं होता है एवं स्वर्णादिकों के सदृश विकारता भी मेरे में नहीं है । अतएव मैं अविकारी हूँ और जगत् मेरा विवर्त्त है, इसी कारण वह विवर्त्त का अधिष्ठान-रूप है । उपादान की सत्ता से कार्य्य की सत्ता के विषम होने का नाम विवर्त्त है ।

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दूसरा प्रकरण । ५७

ब्रह्म की पारमार्थिक सत्ता है और जगत् की प्रातिभासिक सत्ता है । ब्रह्म तीनों कालों में नित्य है और जगत् तीनों कालों में अनित्य है, किन्तु केवल प्रतीति-मात्र ही है, इस वास्ते जगत् ब्रह्म का विवर्त्त है । जगत् की उत्पत्ति आदिकों के होने से ब्रह्म का एक रोवाँ भी नहीं बिगड़ता है अर्थात् ब्रह्म की किञ्चिन्मात्र भी हानि नहीं होती है ब्रह्मा से लेकर चींटीपर्यन्त जगत् के नाश होने पर भी ब्रह्म ज्यों का त्यों एकरस रहता है, वही ऐसा पारमार्थिक स्वरूप है ॥ ११ ॥

मूलम् ।
अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानपि ।
क्वचिन्नगन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः ॥ १२ ॥

पदच्छेदः ।
अहो, अहम्, नमः, मह्यम्, एक, अहम्, देहवान्, अपि, क्वचित्, न, गन्ता, न, आगन्ता, व्याप्य, विश्वम्, अवस्थितः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अहम् = मैंन क्वचित् = न कहीं
अहो = आश्चर्य-रूप हूँगन्ता = जानेवाला हूँ
मह्यम् = मेरे लियेन क्वचित् = न कहीं
नमः = नमस्कार हैआगन्ता = आनेवाला हूँ
अहम् = मैंविश्वम् = संसार को
देहवान् = देहधारी होता हुआव्याप्य = आच्छादित करके
अपि = भीअवस्थितः = स्थित हूँ
एकः = अद्वैत हूँ

भावार्थ ।
प्रश्न—आत्मा अनेक प्रतीति होते हैं, क्योंकि प्रत्येक देह

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५८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

में आत्मा सुख दुःखादिवाला पृथक् ही प्रतीत होता है। यदि
आत्मा एक होवे, तब एक के सुखी होने से सबको सुखी
होना चाहिए तथा एक के दुःखी होने से सबको दुःखी होना
चाहिए। एक के चलने से सबको चलना और एक के
बैठने से सबका बैठना होना चाहिए ?

उत्तर—जनकजी कहते हैं कि बड़ा आश्चर्य है कि मेरा
आत्मा एक ही है, तथापि अनेक देहरूपी उपाधियों के भेद
करके अनेक आत्मा प्रतीत हो रहे हैं। जैसे एक ही जल
नाना घट-रूपी उपाधियों में नाना रूपवाला प्रतीत होता
है। जैसे एक ही सूर्य का प्रतिबिम्ब नाना जलोपाधियों में
हिलता-चलता प्रतीत होता है। और जैसे एकही आकाश
नाना घटमठादिक उपाधियों में क्रिया आदिकवाला प्रतीत
होता है, परन्तु वास्तव में वे क्रिया आदि सब उपाधियों के
धर्म हैं, आकाश के नहीं हैं। वैसे सुख दुःख गमनागमनादिक
भी सब देहादि उपाधियों के धर्म हैं, आत्मा के नहीं हैं, इसी
से एक ही आत्मा गमनादिकों से रहित व्यापक होकर स्थित
है ॥ १२ ॥

मूलम् ।

अहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः ।
असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम् ॥ १३ ॥

पदच्छेदः ।

अहो, अहम्, नमः, मह्यम् दक्षः, न, अस्ति, इह, मत्समः,
असंस्पृश्य, शरीरेण, येन, विश्वम्, चिरम्, धृतम् ॥

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दूसरा प्रकरण । ५९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्= मैंयेन= क्यों कि
अहो= आश्चर्य-रूप हूँशरीरेण= शरीर से
नमः= नमस्कार हैअसंस्पृश्य= पृथक्
मह्यम्= मुझकोमया= मुझ करके
इह= इस संसार में+ इदम्= यह
मत्समः= मेरे तुल्यचिरम्= चिरकाल पर्यन्त
दक्षः= चतुरविश्वम्= विश्व
न अस्ति= कोई नहीं हैधृतम्= धारण किया गया है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**असंग आत्मा का शरीरादिकों के साथ संसर्ग कैसे हो सकता है ? और जगत् को कैसे धारण कर सकता है ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि यही तो बड़ा आश्चर्य है कि जो मैं असंग हो करके भी शरीरादिकों को चेष्टा कराता हूँ । जैसे चुम्बक पत्थर आप क्रिया से रहित भी है तथापि लोहे को चेष्टा कराता है । जैसे उसमें एक विलक्षण शक्ति है, वैसे आत्मा में भी एक विलक्षण शक्ति है । वह शरीरादिकों के अन्तर असंग स्थित है, पर क्रिया-रहित है, परन्तु शरीर इन्द्रियादिक सब अपने-अपने काम को करते हैं । जैसे अग्नि घृत के पिण्ड से अलग रह करके भी उसको पिघला देती है, वैसे ही आत्मा भी सबसे असंग रह करके भी और क्रिया से रहित हो करके भी सारे जगत् को क्रियावान् कर देता है । इसी से जनकजी कहते हैं कि मेरे तुल्य कोई चतुर नहीं है, इसी कारण मैं अपने आपको ही नमस्कार करता

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६० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

हूँ । एवं मुझसे अन्य दूसरा कोई नहीं है कि उसको नमस्कार
करूँ ॥ १३ ॥

मूलम् ।
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन ।
अथवा यस्य मे सर्वं यद्वाङ्मनसगोचरम् ॥ १४ ॥

पदच्छेदः ।
अहो, अहम्, नमः, मह्यम्, यस्य, मे, न, अस्ति, किञ्चन,
अथवा, यस्य, मे, सर्वम्, यत्, वाङ्मनसगोचरम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्= मैंअस्ति= है
अहो= आश्चर्य-रूप हूँअथवा= या
मह्यम्= मुझकोयस्य= जिस
नमः= नमस्कार हैमे= मेरे का
यस्य= जिस+ तत्= वह
मे= मेरे कासर्वम्= सब है
किञ्चन= कुछयत्= जो कुछ
न= नहींवाङ्मनसगोचरम्= वाणी और मन का विषय है ॥

भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि मेरे में सम्बन्धवाला कोई पदार्थ नहीं है, क्योंकि वास्तव में कोई पदार्थ सत्य नहीं है, केवल एक ब्रह्मात्मा ही परमार्थ से सत्य है ।
नेह नाना नास्ति किञ्चन ।
इस चेतन आत्मा में नानारूप करके जो जगत् प्रतीत होता है, सो वास्तव में नहीं है—ऐसे श्रुति कहती है ।

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दूसरा प्रकरण । ६१

मृत्योर्वै मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।

वह मृत्यु से भी मृत्यु को प्राप्त होता है, जो ब्रह्म में नानात्व को देखता है अर्थात् नाना आत्मा को देखता है इत्यादि अनेक श्रुतिवाक्य है जो द्वैत का निषेध करते हैं । फिर जनकजी कहते हैं कि जितना मन और वाणी का विषय है, वह सब मिथ्या है, उसका मुझ चैतन्य-स्वरूप आत्मा के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है । इसी वास्ते मैं अपने ही आश्चर्य-रूप आत्मा को नमस्कार करता हूँ ॥१४॥

मूलम् ।

ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम् ।
अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः ॥ १५ ॥

पदच्छेदः ।

ज्ञानम्, ज्ञेयम्, तथा, ज्ञाता, त्रितयम्, न, अस्ति, वास्तवम्, अज्ञानात्, भाति, यत्र, इदम्, सः, अहम्, अस्मि, निरञ्जनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ज्ञानम् =ज्ञानअज्ञानात् =अज्ञान से
ज्ञेयम् =ज्ञेय+ यत्र =जिस विषे
तथा =और
ज्ञाता =ज्ञाताइदम् =यह तीनों
त्रितयम् =तीनोंभाति =भासता है
यत्र =जिसेसः =सोई
वास्तवम् =यथार्थ सेअहम् =मैं
न अस्ति =नहीं हैनिरञ्जनः =निरञ्जन-रूप
+ च =औरअस्मि =हूँ ॥
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६२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

जनकजी कहते हैं कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय; यह जो त्रिपुटी-रूप है, सो भी वास्तव में नहीं है, किन्तु अज्ञान करके चेतन में ये तीनों प्रतीत होते हैं। वास्तव में चेतन का इनके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं है। जो माया और माया के कार्य से रहित चेतन आत्मा है, सो मैं ही हूँ ॥१५॥

मूलम् ।

द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम् ।
दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः ॥ १६ ॥

पदच्छेदः ।

द्वैतमूलम्, अहो, दुःखम्, न, अन्यत्, तस्य, अस्ति, भेषजम्, दृश्यम्, एतत्, मृषः, सर्वम्, एकः, अहम्, चिद्रसः, अमलः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो =आश्चर्य्य है किएतत् =यह
द्वैतमूलम् =द्वैत है मूलकारण जिसका, ऐसासर्वम् =सब
यत् =जोदृश्यम् =दृश्य
दुःखम् =दुःख हैमृषा =झूठ है
तस्य =उसकीअहम् =मैं
भेषजम् =ओषधिएकः =एक अद्वैत
अन्यतः =कोईअमलः =शुद्ध
अस्ति =नहीं हैचिद्रसः =चैतन्य-रस हूँ

भावार्थ ।

प्रश्न—जब आत्मा निरञ्जन है, तब उसका दुःख के

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दूसरा प्रकरण । ६३

साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है, पर देखने में आता है
और लोक भी कहते हैं कि हम बड़े दुःखी हैं ?

उत्तर—निरञ्जन आत्मा को भी द्वैत भ्रम से दुःख
प्रतीत होता है, वास्तव में वह दुःखी नहीं ।

प्रश्न—इस भ्रम-रूपी महान् व्याधि की ओषधि क्या है ?

उत्तर—जो द्वैत प्रतीत हो रहा है, यह सब मिथ्या है ।
वास्तव में सत्य नहीं है । वास्तव में सत्यबोध-रूप आत्मा
ही है, ऐसा जो ज्ञान है, वही त्रिविध दुःख की निवृत्ति की
ओषधि है, और कोई उसकी ओषधि नहीं है ॥ १६ ॥

मूलम् ।

बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया ।
एवं विमृश्यतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम ॥ १७ ॥

पदच्छेदः ।

बोधमात्रः, अहम्, अज्ञानात्, उपाधिः, कल्पितः, मया,
एवम्, विमृश्यतः, नित्यम्, निर्विकल्पे, स्थितिः, मम ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अहम्=मैंएवम्=इस प्रकार
बोधमात्रः=बोध-रूप हूँनित्यम्=नित्य
मया=मुझ करकेविमृश्यतः=विचार करते हुए
अज्ञानात्=अज्ञान सेमम=मेरा
उपाधिः=उपाधिस्थितिः=स्थिति
कल्पितः=कल्पना किया गया हैनिर्विकल्पे=निर्विकल्प में है ॥
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६४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यह जो द्वैत-प्रपंच का अध्यास है, इसका उपादान कारण कौन है ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि नित्य ज्ञान-स्वरूप जो मैं हूँ, सो मैं ही अज्ञान द्वारा सारे प्रपंच का उपादान कारण हूँ अथवा अज्ञान के सहित जो कल्पित सारा प्रपंच है, उसका अधिष्ठान-रूप होने से मैं ही उपादान कारण हूँ । विचार के विना जो सब मिथ्या प्रपंच सत्य की तरह प्रतीत होता था, सो नित्य विचार करने से असत्य भान होने लगा । अब अपने स्वरूप चैतन्य में प्राप्त होकर जीवन्मुक्ति को प्राप्त हुआ हूँ ॥ १७ ॥

मूलम् ।

अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम् ।
न मे बन्धोऽस्तिमोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तानिराश्रया ॥ १८ ॥

पदच्छेदः ।

अहो, मयि, स्थितम्, विश्वम्, वस्तुतः, न, मयि, स्थितम्,
न, मे, बन्धः, अस्ति, मोक्षः, वा, भ्रान्तिः, शान्ता, निराश्रया ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मे=मेरान=नहीं
बन्धः=बन्धअस्ति=है
वा=याअहो=आश्चर्य है कि
मोक्षः=मोक्षमयि=मेरे में स्थित हुआ
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दूसरा प्रकरण । ६५

विश्वम्=जगत्
वस्तुतः=वास्तव में
मयि=मेरे विषे
न=नहीं
स्थितम्=स्थित है

| + इतिविचारतः=ऐसे विचार से
निराश्रया=आश्रयरहित
भ्रान्ति=भ्रान्ति
शान्ता=शान्त हुई है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**मुक्ति क्या पदार्थ है ?
**उत्तर—**आनन्दात्मकब्रह्मावाप्तिश्च मोक्षः ।
आनंद-स्वरूप आत्मा की प्राप्ति का नाम ही मुक्ति है ।
**प्रश्न—**यदि पूर्वोक्त मुक्ति को विचार से जन्य मानोगे, तब मुक्ति भी अनित्य हो जावेगी, क्योंकि जो-जो उत्पत्ति-वाला पदार्थ होता है, सो-सो अनित्य होता है—ऐसा नियम है । यदि मुक्ति को विचार से अजन्य मानोगे, तब फिर विचार से रहित पुरुषों की भी मुक्ति होनी चाहिए ?
**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि वास्तव में तो मेरे में न बंध है, न मोक्ष है, क्योंकि मैं नित्य चैतन्य-स्वरूप हूँ ।
**प्रश्न—**जब कि वास्तविक तुम्हारे में बन्ध और मोक्ष कोई नहीं है, तब फिर शास्त्र के विचार का और गुरु के उपदेश का क्या फल हुआ ?
**उत्तर—**जो देहादिकों में चित्रकार की आत्म-भ्रान्ति हो रही है, 'मैं देह हूँ' 'मैं इन्द्रिय हूँ' 'मैं ब्राह्मण हूँ' 'मैं कर्त्ता और भोक्ता-हूँ-' इस भ्रान्ति की जो निवृत्ति है—'न मैं देह हूँ'; और 'न इन्द्रिय हूँ'; 'न मैं ब्राह्मणत्वादि जाति-वाला हूँ'; 'न मैं कर्त्ता और भोक्ता हूँ' किंतु देहादिक से परे इन सबका मैं साक्षी, शुद्ध ज्ञान-स्वरूप हूँ—ऐसा अपने

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६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

स्वरूप का जो यथार्थ बोध है, यही शास्त्र विचार का और गुरु के उपदेश का फल है।
जनकजी कहते हैं कि अहो ! बड़ा आश्चर्य है कि मेरे में स्थित भी संपूर्ण विश्व वास्तव में, तीनों कालों में मेरे में नहीं है—ऐसा विचार करने से मेरी भ्रान्ति दूर हो गई है ॥ १८ ॥

मूलम् ।

सशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम् ।
शुद्धचिन्मात्रआत्मा च तत्कस्मिन्कल्पनाऽऽधुना ॥ १९ ॥

पदच्छेदः ।

सशरीरम्, इदम्, विश्वम्, न, किञ्चित्, इति, निश्चितम्, शुद्धचिन्मात्रः, आत्मा, च, तत्, कस्मिन्, कल्पना, अधुना ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सशरीरम् = शरीर सहितइति = ऐसा
इदम् = यहयदा = जब
विश्वम् = जगत्निश्चितम् = निश्चय हुआ
किञ्चित् न = कुछ नहीं है अर्थात् न सत् है, और न असत् हैतदा = तब
कस्मिन् = किस विषे
च = औरअधुना = अब
शुद्धचिन्मात्र = शुद्ध चैतन्य-मात्रकल्पना = विश्व की कल्पना होवे ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**रज्जु-रूप अधिष्ठान के विद्यमान रहते हुए, कभी न कभी मंद अंधकार में फिर भी सर्प का भ्रम हो

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दूसरा प्रकरण । ६७

सकता है, वैसे अधिष्ठान चेतन के होते हुए भो मुक्ति में कभी
न कभी प्रपंच भी हो जावेगा ?

उत्तर—शरीर के सहित यह विश्व किंचित् भी सत्य नहीं
है, और असत्य है, किन्तु अनिर्वचनीय अज्ञान का कार्य होने से
अनिर्वचनीय है । उस अनिर्वचनीय की अज्ञान की निवृत्ति
होने से उसके कार्य विश्व की भी निवृत्ति हो जाती है ।
अज्ञान ही कल्पित विश्व का कारण था, उसके नाश हो
जाने से फिर मुक्त पुरुष में विश्व उत्पन्न नहीं होता है ।
जैसे मंद अंधकार के दूर होने से फिर सर्प की भ्रान्ति भी
नहीं होती है, वैसे प्रकाश-स्वरूप आत्मा के ज्ञान से फिर
कदापि विश्व की उत्पत्ति नहीं होती है ॥ १९ ॥

मूलम् ।

शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा ।
कल्पनामात्रमेवैतत्किंमे कार्यं चिदात्मनः ॥ २० ॥

पदच्छेदः ।

शरीरम्, स्वर्गनरकौ, बन्धमोक्षौ, भयम्, तथा कल्पना-
मात्रम्, एव, एतत्, किम्, कार्यम्, चिदात्मनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
एतत् =यहएव =निःसंदेह
शरीरम् =शरीरकल्पनामात्रम् =कल्पना-मात्र है
स्वर्गनरकौ =स्वर्ग और नरकमे चिदात्मनः =मुझ चैतन्य आत्मा को
बन्धमोक्षौ =बन्ध और मोक्ष
तथा =औरकिम् =क्या
भयम् =भयकार्यम् =कर्त्तव्य है ।
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६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यदि संपूर्ण प्रपंच अवास्तविक माना जावे, तब वर्ण और जाति आदिकों का आश्रय जो स्थूलशरीर है, वह भी अवास्तविक ही होगा ? और शरीर को आश्रयण करके प्रवृत्त जो विधि-निषेध शास्त्र है, वह भी अवास्तविक ही होगा ? फिर उस शास्त्र द्वारा बोधन किये हुए जो स्वर्ग नरक हैं, वे भी सब अवास्तविक अर्थात् मिथ्या ही होवेंगे ? फिर स्वर्गादिकों में राग, और नरकादिकों से भय भी मिथ्या होंगे । और शास्त्र ने जो बन्ध मोक्ष कहे हैं, वे भी सब मिथ्या ही होंगे ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि शरीरादिक सब कल्पना-मात्र ही हैं । सच्चिदानन्द-स्वरूप मुझ आत्मा का इन शरीरादिकों के साथ कौन सम्बन्ध है, किन्तु कोई भी सम्बन्ध नहीं है । क्योंकि सत्य मिथ्या का वास्तविक सम्बन्ध नहीं बन सकता है और मेरा शरीरादिकों के साथ कोई भी प्रयोजन नहीं है । और जितने विधि-निषेध वाक्य हैं, वे सब अज्ञानी के लिये हैं, ज्ञानवान् का उनमें अधिकार नहीं है, इस वास्ते ज्ञानवान् की दृष्टि में शरीरादिक और विधि-निषेध सब अवास्तविक ही हैं ॥ २० ॥

मूलम् ।
अहोजनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम ।
अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम् ॥ २१ ॥

पदच्छेदः ।
अहो, जनसमूहे, अपि, न, द्वैतम्, पश्यतः, मम, अरण्यम्, इव, संवृत्तम्, क्व, रतिम्, करवाणि, अहम् ॥

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दूसरा प्रकरण । ६९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो=आश्चर्य है किन संवृत्तम्=नहीं वर्तता है
जनसमूहे=जीवों के बीच मेंतस्मात्=तब
अपि=भीक्व=कैसे
मम=मुझअहम्=मैं
पश्यतः=देखते हुए कारतिम्=मोह को
अरण्यम् इव=अरण्यवत्करवाणि=करूँ ॥
द्वैतम्=द्वैत

भावार्थ

पूर्ववाले वाक्य द्वारा जनकजी ने कहा कि स्वर्गादिकों के साथ मेरा कुछ भी प्रयोजन नहीं है । अब इस वाक्य करके कहते हैं कि इस लोक के साथ भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है ।

जनकजी कहते हैं कि हे प्रभो ! बड़ा आश्चर्य है कि मैं द्वैत को देखता भी हूँ, तब भी जनों का जो समूह-रूपी द्वैत वन की तरह उत्पन्न हुआ है, उसके बीच में होता हुआ भी उसके साथ मुझको कोई प्रीति नहीं है, क्योंकि मैंने उसको मिथ्या जान लिया है । मिथ्या वस्तु के साथ ज्ञानवान् प्रीति को नहीं करते हैं । अज्ञानी मिथ्या पदार्थों के साथ प्रीति करते हैं । इतना ही ज्ञानी और अज्ञानी का भेद है ॥ २१ ॥

मूलम् ।

नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित् ।
अयमेव हि मे बंध आसीद्या जीविते स्पृहा ॥ २२ ॥

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७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

न, अहम्, देहः, न, मे, देहः, जीवः, न, अहम्, अहम्,
हि, चित्, अयम्, एव, हि, मे, बन्धः, आसीत्, या, जीविते,
स्पृहा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम् =मैंहि =निश्चय करके
देहः =शरीरचित् =चैतन्य-रूप हूँ
न =नहीं हूँमे =मेरा
मे =मेराअयम् एव =यही
देहः =शरीरबन्धा =बँधा था
न =नहीं हैया =जो
अहम् =मैंजीविते =जीने में
जीवः =जीवस्पृहा =इच्छा
न =नहीं हूँआसीत् =थी
अहम् =मैं

भावार्थ ।

**प्रश्न—**शरीर में अहंता और ममता अवश्य करनी होगी ? क्योंकि बिना अहंता और ममता के व्यवहार की सिद्धि नहीं होती है ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि मैं देह नहीं हूँ, क्योंकि देह जड़ है, मैं चेतन हूँ, और मेरा देह भी नहीं है, क्योंकि मैं असंग हूँ, मैं जीव अहंकारी भी नहीं हूँ, क्योंकि अहंकार का कर्त्तृत्व धर्म है और नेरा अकर्त्तृत्व धर्म है ।

**प्रश्न—**फिर तुम कौन हो ?