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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

७८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

७८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
इत्यर्थः, वयोगतो गतवया | होकर—अवस्था समाप्त हो जानेपर
जीर्णः सन्नैति म्रियते। स इतो- | अर्थात् वृद्ध होनेपर प्रेत—मृत्युको प्राप्त
ऽस्मात्प्रयन्नेव शरीरं परित्यजन्नेव | हो जाता है। वह यहाँसे जाते समय
तृणजलूकावद् देहान्तरमुपाद- | अर्थात् शरीरको त्यागता हुआ ही
दानः कर्मचितं पुनर्जायते। | तिनकेकी जोंक आदिके समान
तदस्य मृत्वा प्रतिपत्तव्यं यत्तत्तृ- | कर्मोपलब्ध अन्य देहको प्राप्त करके
तीयं जन्म। | पुनः उत्पन्न होता है। वह, जो इसे
ननु संसरतः पितुः सकाशा- | मरनेपर प्राप्त हुआ करता है, इसका
द्रतोरूपेण प्रथमं जन्म। तस्यैव | तीसरा जन्म है।
कुमाररूपेण मातुर्द्वितीयं जन्मो- | शंका—संसारी जीवका पितासे
क्तम्। तस्यैव तृतीये जन्मनि | वीर्यरूपसे पहला जन्म बतलाया;
वक्तव्ये प्रेतस्य पितुर्यज्जन्म तत्तृ- | उसीका कुमाररूपसे मातासे दूसरा
तीयमिति कथमुच्यते ? | जन्म कहा। अब उसीका तीसरा
नैष दोषः; पितापुत्रयोरै- | जन्म बतलाते समय उसके मृत
कात्म्यस्य विवक्षितत्वात्। | पिताका जो जन्म होता है वही
सोऽपि पुत्रः स्वपुत्रे भारं निधा- | इसका तीसरा जन्म है—ऐसा क्यों
येतः प्रयन्नेव पुनर्जायते यथा | कहा गया?
पिता। तदन्यत्रोक्तमितरत्राप्यु- | समाधान—पिता और पुत्रकी
क्तमेव भवतीति मन्यते श्रुतिः; | एकात्मता बतलानी इष्ट होनेके
पितापुत्रयोरेकात्मत्वात् ॥ ४ ॥ | कारण ऐसा कहनेमें कोई दोष नहीं
| है। वह पुत्र भी अपने पिताके
| समान अपने पुत्रपर भार छोड़कर
| यहाँसे कूच करनेपर फिर उत्पन्न
| होता ही है। यह बात एकके
| प्रति कही जानेपर दूसरेके लिये
| भी कह ही दी गयी है—ऐसा श्रुति
| मानती है, क्योंकि पिता और पुत्र
| एकरूप ही हैं ॥ ४ ॥