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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

तत्प्राणेन तच्चक्षुषा तच्छ्रोत्रेण | [ इसी प्रकार उसने ] उस अन्न-
तत्त्वचा तन्मनसा तच्छिश्नेन | को प्राणसे, नेत्रसे, श्रोत्रसे, त्वचासे,
तेन तेन करणव्यापारेणान्नं | मनसे, शिश्नसे एवं भिन्न-भिन्न
ग्रहीतुमशक्नुवन्पश्चादपानेन | इन्द्रियोंके व्यापारसे ग्रहण करनेमें
वायुना मुखच्छिद्रेण तदन्नमजि- | असमर्थ होकर अन्तमें उसे मुखके
घृक्षत् । तदावयत्तदन्नमेवं जग्राह | छिद्रद्वारा अपानवायुसे ग्रहण करने-
आशितवान् । तेन स एषोऽपान- | की इच्छा की । तब उसे ग्रहण कर
वायुरन्नस्य ग्रहोऽन्नग्राहक इत्ये- | लिया; अर्थात् इस प्रकार इस अन्नको
तत् । यद्वायुर्र्यो वायुरन्नायुः | भक्षण कर लिया। उसी कारणसे
अन्नबन्धनोऽन्नजीवनो वै प्रसिद्धः | वह यह अपानवायु अन्नका ग्रह
स एष यो वायुः ॥ ४-१० ॥ | अर्थात् अन्न ग्रहण करनेवाला है।
| जो वायु अन्नायु-अन्नरूप बन्धन-
| वाला अर्थात् अन्नरूप जीवनवाला
| प्रसिद्ध है वह यह [ अपान ] वायु
| ही है ॥ ४-१० ॥
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परमात्माका शरीरप्रवेशसम्बन्धी विचार
स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत
कतरेण प्रपद्या इति । स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि
प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं
यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं
यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥
उस परमेश्वरने विचार किया 'यह (पिण्ड) मेरे बिना कैसे रहेगा ?'
वह सोचने लगा 'मैं किस मार्गसे [ इसमें ] प्रवेश करूँ ?' उसने
विचारा, 'यदि [ मेरे बिना ] वाणीसे बोल लिया जाय, यदि प्राणसे प्राणन
क्रिया कर ली जाय, यदि नेत्रेन्द्रियसे देख लिया जाय, यदि कानसे सुना