ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३
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अन्नकी रचना
सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत। या
वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥ २॥
उसने आपों (जलों) को लक्ष्य करके तप किया। उन अभितप्त
आपोंसे एक मूर्ति उत्पन्न हुई, यह जो मूर्ति उत्पन्न हुई वही अन्न है ॥२॥
स ईश्वरोऽन्नं सिसृक्षुस्ता एव | अन्न रचनेकी इच्छावाले उस
पूर्वोक्ता अप उद्दिश्याभ्यतपत् । | ईश्वरने उन पूर्वोक्त जलोंको ही
ताभ्योऽभितप्ताभ्य उपादान- | उद्देश्य करके तप किया। उन
भूताभ्यो मूर्तिर्घनरूपं धारण- | उपादानभूत अभितप्त जलोंसे ही
समर्थं चराचरलक्षणमजायतोत्प- | धारण करनेमें समर्थ चराचरभूत
न्नम्। अन्नं वै तन्मूर्तिरूपं या वै | घनरूप मूर्ति उत्पन्न हुई। यह जो
सा मूर्तिरजायत ॥ २॥ | मूर्ति उत्पन्न हुई वह मूर्तिरूप
| अन्न ही है ॥ २ ॥
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अन्नका पलायन और उसके ग्रहणका उद्योग
तदेनत्सृष्टं पराङ्त्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्ना-
शक्नोद्वाचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनद्वाचाग्रहैष्यदभिव्याहृत्य
हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ३ ॥
[ लोकपालोंके आहारार्थ ] रचे गये उस इस अन्नने उनकी ओरसे
मुँह फेरकर भागना चाहा। तब उस (आदिपुरुष) ने उसे वागिन्द्रिय-
द्वारा ग्रहण करना चाहा, किन्तु वह उसे वाणीसे ग्रहण न कर सका।
यदि वह इसे वाणीसे ग्रहण कर लेता तो [ उससे परवर्ती पुरुष भी ]
अन्नको बोलकर ही तृप्त हो जाया करते ॥ ३ ॥