लघुता से प्रभुता मिलै, प्रभुता से प्रभु दूर चींटी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूर
विनम्रता से बड़प्पन मिलता है और घमंड से प्रभु दूर हो जाते हैं। छोटी चींटी शक्कर ले जाती है, जबकि हाथी अपने सिर पर धूल डालता है।
पंद्रहवीं सदी के संत कवि। उनकी साखियाँ, सबद और रमैनी गुरु-भक्ति, सच्चे प्रेम और पाखंड के विरोध की सीख देती हैं।
लघुता से प्रभुता मिलै, प्रभुता से प्रभु दूर चींटी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूर
विनम्रता से बड़प्पन मिलता है और घमंड से प्रभु दूर हो जाते हैं। छोटी चींटी शक्कर ले जाती है, जबकि हाथी अपने सिर पर धूल डालता है।
दीन गरीबी बंदगी, सब सों आदर भाव कहै कबीर सोई बड़ा, जामें बड़ा सुभाव
विनम्रता, सादगी, भक्ति और सबके प्रति आदर का भाव जिसमें हो, वही सचमुच बड़ा है, क्योंकि उसका स्वभाव बड़ा है।
इक दिन ऐसा होइगा, सब सूँ पड़ै बिछोह राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होइ
एक दिन ऐसा आएगा जब सबसे बिछुड़ना होगा। हे राजा, राणा और छत्रपति, तुम अभी से सावधान क्यों नहीं होते?
कबीर थोड़ा जीवना, माड़ै बहुत मंडाण सबही ऊभा मेल्हि गया, राव रंक सुलतान
जीवन थोड़ा है, फिर भी मनुष्य बहुत बड़े आडंबर रचता है। राजा, गरीब और सुलतान सब यहीं सब कुछ छोड़कर चले गए।
यह तन काचा कुंभ है, लिया फिरै था साथ ढबका लागा फूटिगा, कछू न आया हाथ
यह शरीर कच्चा घड़ा है, जिसे हम साथ लिए फिरते हैं। एक ठोकर लगी और यह फूट गया, हाथ कुछ नहीं आया।
पाँच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय
दिन के पाँच पहर काम-धंधे में और तीन पहर सोने में चले गए। एक पहर भी हरि नाम न लिया, तो मुक्ति कैसे होगी?
आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक
आती हुई गाली एक होती है, पर पलटकर जवाब दें तो अनेक हो जाती हैं। जवाब न दो, तो वह एक की एक ही रह जाती है।
जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन शीतल होय यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय
मन शांत हो तो संसार में कोई शत्रु नहीं। अहंकार छोड़ दो, तो सब तुम पर दया और प्रेम करेंगे।
कबीर सब जग निरधना, धनवंता नहिं कोय धनवंता सोई जानिये, राम नाम धन होय
सारा संसार निर्धन है, कोई सच्चा धनी नहीं। धनी वही है जिसके पास राम नाम का धन है।
कबीर तेरी झोंपड़ी, गल कटियन के पास जो करेगा सो भरेगा, तुम क्यों भये उदास
तुम्हारी झोंपड़ी कसाइयों के पास है तो क्या हुआ। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा; तुम उदास क्यों होते हो।
चाह मिटी चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह जाको कछू न चाहिए, सोई साहंसाह
इच्छा मिटी तो चिंता भी मिट गई और मन निश्चिंत हो गया। जिसे कुछ नहीं चाहिए, वही सच्चा बादशाह है।
चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाय वैद बिचारा क्या करे, कहाँ तक दवा लगाय
चिंता ऐसी डायन है जो भीतर ही भीतर कलेजा खा जाती है। इसका इलाज कोई वैद्य नहीं कर सकता।
हीरा तहाँ न खोलिए, जहाँ कुंजड़ों की हाट बाँधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट
जहाँ सब्ज़ी बेचने वालों का बाज़ार हो, वहाँ हीरा मत खोलो। जहाँ ज्ञान की कदर न हो, वहाँ चुप रहकर अपनी राह चलो।
कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि करै सब छार साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार
कुटिल वचन सबसे बुरे हैं, जो सब कुछ जलाकर राख कर देते हैं। सज्जन के वचन जल जैसे हैं, जिनसे अमृत की धारा बरसती है।
मधुर वचन है औषधी, कटुक वचन है तीर स्रवण द्वार ह्वै संचरै, सालै सकल सरीर
मीठे वचन दवा हैं और कड़वे वचन तीर। कड़वे बोल कानों के रास्ते भीतर जाकर पूरे शरीर को पीड़ा देते हैं।
शब्द सम्हारे बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव
शब्द सोच-समझकर बोलो। शब्द के हाथ-पाँव नहीं होते, फिर भी एक शब्द दवा बन जाता है और एक शब्द घाव कर देता है।
मूरख संग न कीजिए, लोहा जल न तिराइ कदली सीप भुजंग मुख, एक बूँद तिहुँ भाइ
मूर्ख का साथ मत करो, जैसे लोहा पानी में नहीं तैरता। स्वाति की एक ही बूँद केले में कपूर, सीप में मोती और साँप के मुँह में विष बन जाती है; संगति से ही फल बदलता है।
कबीर खाई कोट की, पानी पिवै न कोइ जाइ मिलै जब गंग में, तब सब गंगोदक होइ
किले की खाई का पानी कोई नहीं पीता, पर वही पानी जब गंगा में मिल जाता है तो गंगाजल बन जाता है। अच्छी संगति साधारण को भी पवित्र बना देती है।
कबीर संगति साध की, कदे न निरफल होइ चंदन होसी बावना, नीम न कहसी कोइ
सज्जन की संगति कभी व्यर्थ नहीं जाती। चंदन के पास उगा नीम भी चंदन जैसा सुगंधित हो जाता है, फिर उसे कोई नीम नहीं कहता।
जिस मरनै थैं जग डरै, सो मेरे आनंद कब मरिहूँ कब देखिहूँ, पूरन परमानंद
जिस मृत्यु से दुनिया डरती है, वह मेरे लिए आनंद है। मैं प्रतीक्षा में हूँ कि कब यह शरीर छूटे और पूर्ण परमानंद के दर्शन हों।
सूरा सो पहिचानिए, जु लरै दीन के हेत पुरजा पुरजा कटि मरै, कबहू न छाडै खेतु
सच्चा वीर वही है जो दीन-दुखियों और धर्म के लिए लड़े। वह टुकड़े-टुकड़े होकर मर जाए, पर रणभूमि कभी नहीं छोड़ता।
कामी क्रोधी लालची, इनते भक्ति न होय भक्ति करै कोई सूरमा, जाति बरन कुल खोय
कामी, क्रोधी और लालची व्यक्ति से भक्ति नहीं होती। भक्ति कोई वीर ही करता है, जो जाति, वर्ण और कुल का अभिमान छोड़ देता है।
जब लग नाता जगत का, तब लग भगति न होय नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावै सोय
जब तक संसार से मोह का नाता है, तब तक भक्ति नहीं होती। जो मोह तोड़कर हरि को भजे, वही सच्चा भक्त कहलाता है।
कबीर पढ़िबा दूरि करि, पुस्तक देइ बहाइ बावन आखर सोधि करि, ररै ममै चित लाइ
केवल पढ़ना छोड़ो और किताबों को बहा दो। बावन अक्षरों में से 'र' और 'म' चुनकर राम में मन लगाओ।