कबीर के दोहे
मूरख संग न कीजिए, लोहा जल न तिराइ कदली सीप भुजंग मुख, एक बूँद तिहुँ भाइ
अर्थ
मूर्ख का साथ मत करो, जैसे लोहा पानी में नहीं तैरता। स्वाति की एक ही बूँद केले में कपूर, सीप में मोती और साँप के मुँह में विष बन जाती है; संगति से ही फल बदलता है।
रोमन अक्षरों में
murakh sang na kijie, loha jal na tiraai kadli sip bhujang mukh, ek bund tihun bhaai
— Sant Kabirसर्वकोश संग्रह से।अपना सूक्ति चित्र बनाएँ →
