याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४ )
मनु ने शूद्र के धर्म का विवरण इस प्रकार किया है—
एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् ।
एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ (मनु० १।९१ )
वर्णसङ्कर के धर्म का संक्षिप्त रूप में सङ्कलन श्रीमद्भागवत के निम्नलिखित
श्लोक में किया गया है—
वृत्तिः सङ्करजातीनां तत्तत्कुल-कृता भवेत् ।
अ-चौराणामपापानामन्त्यजान्त्यावसायिनाम् ॥
(श्रीमद्भागवत ७।११।१७)
याज्ञवल्क्य-स्मृति में वर्ण-धर्म का निरूपण इस प्रकार किया गया है—
इज्याऽध्ययनदानानि वैश्यस्य क्षत्रियस्य च ।
प्रतिग्रहोऽधिको विप्रे याजनाध्यापने तथा ॥
प्रधानं क्षत्रिये कर्म प्रजानाम्परिपालनम् ।
कुसीद-कृषि-वाणिज्य-पाशुपाल्यं विशः स्मृतम् ॥
शूद्रस्य द्विज-शुश्रूषा तयाऽजीवन् वणिग्भवेत् ।
शिल्पैर्वा विविधैर्जीवेद्द्विजाति-हितमाचरन् ॥
(याज्ञ० स्मृ० १।११८-२०)
(२) आश्रम-धर्म का सम्बन्ध सभी आश्रमों से है। द्विजाति की जीवनावधि
को चार भागों में विभक्त किया जाता है। इन आश्रमों के यथाक्रम नाम हैं—ब्रह्म-
चर्य, गार्हस्थ्य, वान-प्रस्थ, संन्यास ।
ब्रह्मचर्याश्रम में वेदाध्ययनादि धर्म माने गये हैं। ब्रह्मचर्याश्रम की अवधि का
निरूपण मनु ने निम्न-लिखित पद्य में किया है—
षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् ।
तदार्धिकम्पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ (मनु० ३।१)
तीन वेद के अध्ययन के लिए ३६ वर्ष अर्थात् प्रतिवेद के अध्ययन के लिए
बारह-बारह वर्षों की अवधि अपेक्षित होती है। अथवा १८ वर्षों तक (प्रतिवेद
के अध्ययन के लिए छः-छः वर्षों की अवधि ), किं वा नौ वर्षों ( १ वेद के लिए तीन
वर्ष) तक अथवा वेदाध्ययनसमाप्ति-पर्यन्त ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना चाहिए ।
याज्ञवल्क्य ने कुछ विशेष बतलाया है—
प्रतिवेदम्रह्मचर्यं द्वादशाब्दानि पञ्च वा ।
ग्रहणान्तिकमित्येके ................॥ (या० स्मृ० १।३६ )
ब्रह्म-चर्याश्रम के समापन के अनन्तर द्विजाति के कृत्य का वर्णन याज्ञवल्क्य
में निम्नलिखित रूप में पाया जाता है—
गुरवे तु वरन्दत्त्वा स्नायाद्वा तदनुज्ञया ।
वेदं व्रतानि वा पारं नीत्वा ह्युभयमेव वा ॥
अविप्लुत-ब्रह्म-चर्यो लक्षण्यां स्त्रियमुद्वहेत् ॥
(या० स्मृ० १।५१-५२ क ख )