याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
( ग ) याज्ञवल्क्य स्मृति की श्लोक-संख्या
( १५ )
समस्या का उपसंहार सन्देह में ही करना उचित है। योगि-याज्ञवल्क्य आदि,
प्राचीन की दृष्टि में, इस याज्ञवल्क्य से अभिन्न परन्तु नवीनों की दृष्टि में भिन्न,
माने जाते हैं।
( ग ) याज्ञवल्क्य स्मृति की श्लोक-संख्या
याज्ञवल्क्य-स्मृति की श्लोक-संख्या के विषय में विश्वरूपाचार्य, विज्ञानेश्वर
तथा अपरादित्य का मत एक नहीं है। विश्वरूप के अनुसार याज्ञवल्क्य-
स्मृति में १००३, विज्ञानेश्वर के मत में १००९ और अपरादित्य की व्याख्या में
१००६ श्लोक पाये जाते हैं। व्याख्याओं में अनुपलब्ध परन्तु कुछ मूल पुस्तकों
में उपलब्ध—"श्लोकानामपि विज्ञेयं सहस्रं चतुरुत्तरम्” के आधार
पर तो मूल-श्लोकों की संख्या १००४ प्रतीत होती है । मित्र-मिश्र
ने विज्ञानेश्वर का ही अनुसरण किया है । शूलपाणि ने अपनी व्याख्या में
१०१० श्लोक माने हैं ।
व्याख्यात श्लोकों में विषमता के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी श्लोक हैं जिनका
सङ्केत केवल मूल पुस्तक में है, किसी भी व्याख्या में नहीं। उदाहरणार्थ,
आचाराध्याय में और भी कुछ श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं—२३३ एवं
२३४ श्लोकों के मध्य में अर्ध-श्लोक है—"अपहता इति तिलान् विकीर्य च
समन्ततः ।” इसी प्रकार ३०८ तथा ३०९ श्लोकों के मध्य में एक श्लोक है—
ग्रहाणामिदमातिथ्यं कुर्यात् संवत्सरादपि ।
आरोग्य-बल-सम्पन्नो जीवेस्स शरदः शतम् ॥
व्यवहाराध्याय के अन्त में भी मूल पुस्तक में निम्न-लिखित तीन श्लोक
अधिक हैं—
( १ ) राजभिर्दत्त-दण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥
( २ ) एवमुद्धृतदण्डानां विशुद्धिः पापकर्मिणाम् ।
स्व-धर्म-स्थापनाद्राजा प्रजाभ्यो धर्ममश्नुते ॥
( ३ ) यत्र दण्ड-विधिर्नोक्तः सर्वैरेव महात्मभिः ।
देश-कालादि सञ्चिन्त्य तत्र दण्डो विधीयते ॥
इसी प्रकार प्रायश्चित्ताध्याय के अन्त में भी कुछ श्लोक पाये जाते हैं—
( १ ) विप्रेष्वपि विशेषेण धार्या वाजसनेयिकैः ।
इच्छद्भिः श्रेयसि फलमिह लोकै परत्र च ॥
( २ ) यदवाप्तं मया देवाद्रादित्याद्वै सनातनम् ।
तद्वै सर्वमिदम्परोक्तं श्रुति-स्मृत्यभिसम्मतम् ॥
( ३ ) निःश्रेयस-करं नृणां शास्त्रं देवर्षि-सेवितम् ।
ज्ञात्वा ये ह्यध्यवस्यन्ति तेऽन संयान्ति वै पुनः ॥
(ये तीन श्लोक मिताक्षरा के ३२७ तथा ३२८ श्लोकों के मध्य में पाये
जाते हैं।)
( १६ )
( ४ ) धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ॥
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात् प्रजाम् ॥
( यह श्लोक मिताक्षरा के ३३० तथा ३३१ के बीच में पाया जाता है । )
( ५ ) निर्जित्य वादे देवान् वै ऋषीन् सर्वानुपस्थितान् ।
गा बोधेनाहतास्तस्मै नमो ब्राह्मण-हेतवे ॥
( ६ ) अध्याय-त्रय-संक्षिप्तं सर्वेषां बुद्धि-वर्धनम् ।
अनुष्टुप्छन्दसा ह्येतत् याज्ञवल्क्येन भाषितम् ॥
( ७ ) सर्व-पाप-हरं पुण्यं सुप्रसन्नं समञ्जसम् ।
श्लोकानामपि विज्ञेयं सहस्रं चतुरुत्तरम् ॥
( ८ ) आदित्यस्य प्रसादेन प्राप्तवान् यो यजुर्गणम् ।
प्रणमेद्याज्ञवल्क्यं तं पिप्पलादगुरोरलम् ॥
( ये श्लोक सर्वान्त में पाये जाते हैं । )
यद्यपि कुछ श्लोक तो स्पष्टतः अनावश्यक प्रतीत होते हैं तथापि मूल पुस्तक
में उपलब्ध होने के कारण यहाँ उल्लिखित हुए हैं ।
श्लोक-संख्या में वैषम्य के अतिरिक्त पाठान्तर तो बहुत ही हैं ( विशेषतः
बालकीडा मिताक्षरा तथा अपरार्क में ) । यद्यपि प्राचीन ( निर्णयसागर के )
मिताक्षरा-संस्करण में पाठान्तरों का कुछ निर्देश था तथापि प्रस्तुत संस्करण में
उसका लोप ही कर दिया गया । इसका कारण प्रकाशक तथा हिन्दी-व्याख्याता
ही जानते हैं । म० म० पी० वी० काणे ने कुछ पाठान्तरों का विवेचन भी प्रस्तुत
किया है । जिज्ञासुओं को इसके लिए उनका ‘History of Dharma-Shastra’
देखना चाहिए ।
याज्ञवल्क्य स्मृति का विषय-विवरण
सम्पूर्ण याज्ञवल्क्य स्मृति तीन अध्यायों से विभक्त है—आचाराध्याय,
व्यवहाराध्याय तथा प्रायश्चित्ताध्याय ।
प्रथम आचाराध्याय में १३ प्रकरण हैं—( १ ) उपोद्घात-प्रकरण ( श्लो०
१-९ ), ( २ ) ब्रह्मचारि-प्रकरण (श्लो० १०-५०), ( ३ ) विवाह-प्रकरण (श्लो०
५१-८९ ), ( ४ ) जाति-वर्ण-विवेक-प्रकरण ( श्लो० ९०-९६ ), ( ५ ) गृहस्थ-
धर्म-प्रकरण ( श्लो० ९७-१२८ ), ( ६ ) स्नातक-व्रत-प्रकरण (श्लो० १२९-१६६),
( ७ ) भक्ष्याऽभक्ष्य-प्रकरण ( श्लो० १६७-१८१ ), ( ८ ) द्रव्य-शुद्धि-प्रकरण
( श्लो० १८२-१९७), ( ९ ) दान-धर्म-प्रकरण (श्लो० १९८-२१६), ( १० ) श्राद्ध-
प्रकरण ( श्लो० २१७-२७० ), ( ११ ) गण-पति-कल्प-प्रकरण (श्लो० २७१-२९४),
( १२ ) ग्रह-शान्ति-प्रकरण ( श्लो० २९५-३०८ ), ( १३ ) राज-धर्म-प्रकरण
( श्लो० ३०९-३६८ ) ।
( १७ )
द्वितीय व्यवहाराध्याय है । व्यवहार शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ वीर-
मित्रोदय में उद्धृत कात्यायन के अनुसार निम्न-लिखित है—
विर्नानाऽर्थेऽवसन्देहे हरणं हार उच्यते ।
नाना-सन्देह-हरणाद् व्यवहार इति स्मृतः ॥
बृहस्पति ने व्यवहार शब्द का अर्थ अधोलिखित रूप में बतलाया है—
शास्त्रं केवलमाश्रित्य क्रियते यत्र निर्णयः ।
व्यवहारः स विज्ञेयः·················॥
( बृह० स्मृ० पृ० ४, श्लो० १९ )
विज्ञानेश्वर की व्याख्या सबों से स्पष्टतम है—
'अन्य-विरोधेन स्वात्म-सम्बन्धितया कथनं व्यवहारः । यथा कश्चिदिदं क्षेत्रादि
मदीयमिति कथयति अन्योऽपि तद्विरोधेन मदीयमिति ॥' ( मिताक्षरा० २।१ )
इस अध्याय में २५ प्रकरण हैं, जिनका निर्देश इस प्रकार है—
( १ ) साधारण-व्यवहार-मातृका-प्रकरण ( श्लो० १-८ ),
( २ ) असाधारण-व्यवहार-मातृका-प्रकरण ( श्लो० ९-३६ ),
( ३ ) ऋणादान-प्रकरण ( श्लो० ३७-६४ ),
( ४ ) उपनिधि ( A sealed diposit ) प्रकरण १ ( श्लो० ६५-६७ ),
( ५ ) साक्षि-( Witness ) प्रकरण ( श्लो० ६८-८३ ),
( ६ ) लेख्य-( Written document ) प्रकरण ( श्लो० ८४-९४ ),
( ७ ) दिव्य-( Ordeal ) प्रकरण ( श्लो० ९५-११३ ),
( ८ ) दाय-विभाग ( Partition of Inheritance ) प्रकरण ( श्लो०
११४-१४९ ),
( ९ ) सीमा-विवाद-( Settlement of disputed boundary questions )
प्रकरण ( श्लो० १५०-१५८ ),
( १० ) स्वामि-पाल-( The owner and the keeper of cattle )
विवाद-प्रकरण ( श्लो० १५९-१६७ ),
( ११ ) अ-स्वामि-विक्रय-प्रकरण २ ( श्लो० १६८-१७४ ),
( १२ ) दत्ताऽप्रदानिक-( Non-delivery or resumption of gifts )
प्रकरण ( श्लो० १७५-१७६ ),
( १३ ) क्रीतानुशय-( Returning a thing purchased to the seller )
प्रकरण ( श्लो० १७७-१८१ ),
१. यथाह नारदः— असंख्यातमविज्ञातं समुद्रं ( Sealed ) यन्निधीयते ।
तज्जानीयादुपनिधिं निक्षेपं गणितं विदुः ॥ मिताक्षरा० २।६५॥
२. तस्य च लक्षणं नारदेनोक्तम्—
निक्षिप्तं वा पर-द्रव्यं नष्टं लब्ध्वाऽपहृत्य वा ।
विक्रीयतेऽसमक्षं यत् स ज्ञेयोऽस्वामिविक्रयः । मिता० २।१६८ ॥