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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 782 में से

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पृष्ठ 23

( १७ )
द्वितीय व्यवहाराध्याय है । व्यवहार शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ वीर-
मित्रोदय में उद्धृत कात्यायन के अनुसार निम्न-लिखित है—
विर्नानाऽर्थेऽवसन्देहे हरणं हार उच्यते ।
नाना-सन्देह-हरणाद् व्यवहार इति स्मृतः ॥
बृहस्पति ने व्यवहार शब्द का अर्थ अधोलिखित रूप में बतलाया है—
शास्त्रं केवलमाश्रित्य क्रियते यत्र निर्णयः ।
व्यवहारः स विज्ञेयः·················॥
( बृह० स्मृ० पृ० ४, श्लो० १९ )
विज्ञानेश्वर की व्याख्या सबों से स्पष्टतम है—
'अन्य-विरोधेन स्वात्म-सम्बन्धितया कथनं व्यवहारः । यथा कश्चिदिदं क्षेत्रादि
मदीयमिति कथयति अन्योऽपि तद्विरोधेन मदीयमिति ॥' ( मिताक्षरा० २।१ )
इस अध्याय में २५ प्रकरण हैं, जिनका निर्देश इस प्रकार है—
( १ ) साधारण-व्यवहार-मातृका-प्रकरण ( श्लो० १-८ ),
( २ ) असाधारण-व्यवहार-मातृका-प्रकरण ( श्लो० ९-३६ ),
( ३ ) ऋणादान-प्रकरण ( श्लो० ३७-६४ ),
( ४ ) उपनिधि ( A sealed diposit ) प्रकरण १ ( श्लो० ६५-६७ ),
( ५ ) साक्षि-( Witness ) प्रकरण ( श्लो० ६८-८३ ),
( ६ ) लेख्य-( Written document ) प्रकरण ( श्लो० ८४-९४ ),
( ७ ) दिव्य-( Ordeal ) प्रकरण ( श्लो० ९५-११३ ),
( ८ ) दाय-विभाग ( Partition of Inheritance ) प्रकरण ( श्लो०
११४-१४९ ),
( ९ ) सीमा-विवाद-( Settlement of disputed boundary questions )
प्रकरण ( श्लो० १५०-१५८ ),
( १० ) स्वामि-पाल-( The owner and the keeper of cattle )
विवाद-प्रकरण ( श्लो० १५९-१६७ ),
( ११ ) अ-स्वामि-विक्रय-प्रकरण २ ( श्लो० १६८-१७४ ),
( १२ ) दत्ताऽप्रदानिक-( Non-delivery or resumption of gifts )
प्रकरण ( श्लो० १७५-१७६ ),
( १३ ) क्रीतानुशय-( Returning a thing purchased to the seller )
प्रकरण ( श्लो० १७७-१८१ ),
१. यथाह नारदः— असंख्यातमविज्ञातं समुद्रं ( Sealed ) यन्निधीयते ।
तज्जानीयादुपनिधिं निक्षेपं गणितं विदुः ॥ मिताक्षरा० २।६५॥
२. तस्य च लक्षणं नारदेनोक्तम्—
निक्षिप्तं वा पर-द्रव्यं नष्टं लब्ध्वाऽपहृत्य वा ।
विक्रीयतेऽसमक्षं यत् स ज्ञेयोऽस्वामिविक्रयः । मिता० २।१६८ ॥