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सर्वकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 782 में से

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पृष्ठ 22

( १६ )
( ४ ) धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ॥
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात् प्रजाम् ॥
( यह श्लोक मिताक्षरा के ३३० तथा ३३१ के बीच में पाया जाता है । )
( ५ ) निर्जित्य वादे देवान् वै ऋषीन् सर्वानुपस्थितान् ।
गा बोधेनाहतास्तस्मै नमो ब्राह्मण-हेतवे ॥
( ६ ) अध्याय-त्रय-संक्षिप्तं सर्वेषां बुद्धि-वर्धनम् ।
अनुष्टुप्छन्दसा ह्येतत् याज्ञवल्क्येन भाषितम् ॥
( ७ ) सर्व-पाप-हरं पुण्यं सुप्रसन्नं समञ्जसम् ।
श्लोकानामपि विज्ञेयं सहस्रं चतुरुत्तरम् ॥
( ८ ) आदित्यस्य प्रसादेन प्राप्तवान् यो यजुर्गणम् ।
प्रणमेद्याज्ञवल्क्यं तं पिप्पलादगुरोरलम् ॥
( ये श्लोक सर्वान्त में पाये जाते हैं । )
यद्यपि कुछ श्लोक तो स्पष्टतः अनावश्यक प्रतीत होते हैं तथापि मूल पुस्तक
में उपलब्ध होने के कारण यहाँ उल्लिखित हुए हैं ।
श्लोक-संख्या में वैषम्य के अतिरिक्त पाठान्तर तो बहुत ही हैं ( विशेषतः
बालकीडा मिताक्षरा तथा अपरार्क में ) । यद्यपि प्राचीन ( निर्णयसागर के )
मिताक्षरा-संस्करण में पाठान्तरों का कुछ निर्देश था तथापि प्रस्तुत संस्करण में
उसका लोप ही कर दिया गया । इसका कारण प्रकाशक तथा हिन्दी-व्याख्याता
ही जानते हैं । म० म० पी० वी० काणे ने कुछ पाठान्तरों का विवेचन भी प्रस्तुत
किया है । जिज्ञासुओं को इसके लिए उनका ‘History of Dharma-Shastra’
देखना चाहिए ।
याज्ञवल्क्य स्मृति का विषय-विवरण
सम्पूर्ण याज्ञवल्क्य स्मृति तीन अध्यायों से विभक्त है—आचाराध्याय,
व्यवहाराध्याय तथा प्रायश्चित्ताध्याय ।
प्रथम आचाराध्याय में १३ प्रकरण हैं—( १ ) उपोद्घात-प्रकरण ( श्लो०
१-९ ), ( २ ) ब्रह्मचारि-प्रकरण (श्लो० १०-५०), ( ३ ) विवाह-प्रकरण (श्लो०
५१-८९ ), ( ४ ) जाति-वर्ण-विवेक-प्रकरण ( श्लो० ९०-९६ ), ( ५ ) गृहस्थ-
धर्म-प्रकरण ( श्लो० ९७-१२८ ), ( ६ ) स्नातक-व्रत-प्रकरण (श्लो० १२९-१६६),
( ७ ) भक्ष्याऽभक्ष्य-प्रकरण ( श्लो० १६७-१८१ ), ( ८ ) द्रव्य-शुद्धि-प्रकरण
( श्लो० १८२-१९७), ( ९ ) दान-धर्म-प्रकरण (श्लो० १९८-२१६), ( १० ) श्राद्ध-
प्रकरण ( श्लो० २१७-२७० ), ( ११ ) गण-पति-कल्प-प्रकरण (श्लो० २७१-२९४),
( १२ ) ग्रह-शान्ति-प्रकरण ( श्लो० २९५-३०८ ), ( १३ ) राज-धर्म-प्रकरण
( श्लो० ३०९-३६८ ) ।