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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

विषय सूची ६
१३८ सन्तान पर माता पिता के रोगो का प्रभाव २७१
१३९ शुद्ध रज वीर्य से उत्तम सन्तान २७१
१४० सन्तान होने मे बाधक रोग २७१
दसवां अध्याय
१४१ पुरुषार्थ हीनता या नपुंसक्त्व २७५
१४२ नपुंसक पुरुष के लक्षण २७५
१४३ नपुंसकता के विशेष कारण २७६
१४४ वृद्धावस्था की नपुंसकता २७८
१४५ चिंता क्रोध और शोक से नपुंसकता २७९
१४६ अन्य कारणों से नपुंसकता २७९
१४७ नपुंसक होने का कारण २८०
१४८ आरोग्य और वलिष्ट सन्तान २८०
१४९ नपुंसको की उत्पत्ति २८१
१५० आसेव्य नपुंसक २८१
१५१ सौगन्धिक नपुंसक २८२
१५२ कुंभिक नपुंसक २८३
१५३ दूसरा कारण २८३
१५४ ईर्ष्यक नपुंसक २८४
१५५ स्त्री के नपुंसक होने का कारण २८५
१५६ दूसरी प्रकार की स्त्री नपुंसक २८६
१५७ नपुंसको की सम्भोग शक्ति २८७

१० विषय सूची
ग्यारहवां अध्याय
१५८ बालको के रोगो और मृत्यु की अधिकता का
कारण २९१
१५९ दूसरा कारण २९१
१६० तीसरा कारण २९१
१६१ चौथा कारण २९२
१६२ पांचवां कारण २९२
१६३ छठा कारण २९२
१६४ सातवा कारण २९३
१६५ आठवां कारण २९४
१६६ नवां कारण २९५
१६७ दशवां कारण २९५
१६८ ग्यारहवां कारण २९६
१६९ बारहवा कारण २९६
१७० तेरहवां कारण २९७
१७१ चौदहवां कारण २९७
१७२ पन्द्रहवा कारण २९८
१७३ सोलहवा कारण २९९
१७४ सत्रहवां कारण २९९
१७५ अठारहवां कारण ३००
१७६ उन्नीसवां कारण ३००

विषय सूची ११
१७७ बीसवां कारण ३०१
१७८ डकीसवां मुख्य कारण ३०१
बारहवाँ अध्याय
१७९ आरोग्यता ३०७
१८० आरोग्यता के लक्षण ३०८
१८१ मिथ्या आहार विहार ३०९
१८२ शरीर रक्षा ३११
१८३ ब्रह्मचर्य का सामान्य स्वरूप ३११
१८४ ब्रह्मचर्य के आठ प्रकार ३१२
१८५ ब्रह्मचर्य के अमूल्य गुण ३१३
१८६ प्राचीन काल मे ब्रह्मचर्य ३१३
१८७ ब्रह्मचर्य के अभाव से हानि ३१५
१८८ प्राचीन विद्याभ्यास का ढंग ३१७
१८९ आजकल का विद्याभ्यास ३१८
१९० पढ़ानेवाला कैसा चाहिये ३१९
१९१ प्राचीन विवाह क्रम ३२१
१९२ मेरा तजुरबा ३२४
१९३ सन्तानहीन स्त्रियों का इलाज ३२६
तेरहवां अध्याय
१९४ स्त्री की जनेंद्री ३२९

१२ विषय सूची

१९५ स्त्री की जनेन्द्री तथा अन्य अवयव ३३३
१९६ स्त्री की नपुंसकता उत्तेजना शक्ति का नष्ट होजाना ३४३
चौदहवां अध्याय
१९७ रतिक्रिया का प्राकृतिक नियम और उत्तम सन्तान ३५१
१९८ गर्भाधान के समय की स्थिति ३५४
१९९ गर्भधारण के लक्षण ३५५
२०० गर्भ रक्षा ३५६
पन्द्रहवां अध्याय
२०१ गर्भधारण ३५९
२०२ स्त्रियों के जनेन्द्री दोष ३६०
२०३ योनि और गर्भाशय ३६१
२०४ आरोग्यता की दशा मे ३६२
२०५ मासिकधर्म के समय गर्भाशय का खुला हुआ मुख ३६३
२०६ पुत्र और कन्या के गर्भस्थिति का कारण ३६४
२०७ गर्भाशय मे कन्या व पुत्र का स्थान ३६५
२०८ गर्भ मे दो बच्चे होने का कारण ३६६
२०९ विपरीत आसन से गर्भाशय की हानि ३६८
२१० गर्भाशय का आगे का हिस्सा ३६८
२११ गर्भाशय का पीछे का हिस्सा ३६९
२१२ गर्भाशय के बन्धन ३७०

विषय सूची १३
२१३ गर्भाशय के रोग ३७१
२१४ गर्भाशय की गांठ ३७२
२१५ गर्भाशय की भीतरी गांठ ३७२
२१६ गर्भाशय से गांठ ( योनिकन्द ) ३७३
२१७ गर्भाशय के मुंह पर गांठ ३७४
२१८ गर्भाशय का मस्सा ३७५
२१९ भीतरी मस्सा ३७६
२२० गर्भाशय का भीतरी का मस्सा ३७७
२२१ भीतरी मस्सा के सम्बन्ध में ३७८
२२२ स्त्रियो की रोग परीक्षा ३८०
२२३ गर्भाशय का टेढ़ा होजाना ३८०
२२४ गर्भाशय का मुख टेढ़ा होना ३८२
२२५ अनियम रतिक्रिया करनेवालो सावधान ३८४
२२६ गर्भाशय का योनि की दीवार में चिपटा मुख ३८५
२२७ दाम्पत्य जीवन को दुखमय बनाने वाली मनगढ़ंत
पुस्तको से सचेत रहिये ३८६
२२८ गर्भाशय के मुख की सूजन ३८७
२२९ विपरीत रति से सैकड़ा पीछे ९९ स्त्रिया रोगी हैं ३८८
२३० गर्भाशय का खुला मुख ३९०
२३१ ऋतुस्नाता स्त्री के पति दर्शन का कारण ३९१
२३२ विपरीत आसन से गर्भाशय भ्रंस ३९३
२३३ गर्भाशय का बाहर निकल आना ३९४

१४ विषय सूची
२३४ पति के व्यभिचार से पत्नी के गर्भाशय दोष - ३९६
२३५ योनि के छाले फुंसियां ३९७
२३६ गर्भाशय के मुख पर गर्मी रोग ३९८
२३७ योनि की गांठ ३९९
२३८ गर्भाशय के मुख पर सम्सा ४०१
२३९ गर्भाशय के मुख पर खराबी ४०२
२४० मासिकधर्म के समय तथा गर्भ धारण के लिए शुद्ध ४०३
गर्भाशय का मुख
२४१ वद् मुह गर्भाशय ४०४
२४२ गर्भाशय का भीतर को झुका हुआ मुख ४०५
२४३ मेद् रोग ( चर्बी का वढ जाना ) ४०६
२४४ जरूरी बात ४०८
सोलहवाँ अध्याय
२४५ अनियम आहार विहार से स्त्रियो के अन्य रोग ४११
२४६ वातज योनि रोग ४११
२४७ पित्तज योनि रोग ४१२
२४८ कफज योनि रोग ४१३
२४९ सन्निपातक योनि रोग ४१३
२५० रक्त पित्तज योनि रोग ४१४
२५१ अरजस्का योनि ४१४
२५२ अचरणा योनि ४१५

विषय सूची १५
२५३ अति चरणा योनि ४१५
२५४ प्राक चरणा योनि ४१६
२५५ उपप्लुता योनि ४१७
२५६ परिप्लुता योनि ४१७
२५७ उदावृत्ता योनि ४१८
२५८ उदावर्त्तिनी योनि ४१९
२५९ कर्णिनी योनि ४१९
२६० पुत्रघ्नी योनि ४१९
२६१ अन्तर्मुखी योनि ४२०
२६२ सूचीमुखी योनि ४२१
२६३ शुष्का योनि ४२२
२६४ वामिनी योनि ४२४
२६५ वन्ध्या योनि ४२४
२६६ महा योनि ४२५
२६७ योनि सकोचन ४२६
२६८ अनियम सभोग और पुरुष रोगो की उत्पत्ति ४२८
२६९ वीर्य के दूषित होने का कारण ४३०
२७० याद रखने की बात ४३१
२७१ अनुचित मैथुन से हानि ४३२
२७२ आनन्द वर्द्धक प्रसग ४३४
२७३ बाल विवाह ४३६
२७४ बेमेल विवाह ४३७

१६ विषय सूची
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
२७५ बेमेल विवाह का भयंकर परिणाम ४३८
२७६ सन्तान हीन स्त्रियों का शर्तिया इलाज ४३९
२७७ पति की अवस्था कम होने का परिणाम ४४१
२७८ रतिक्रिया के योग्य स्त्री की अवस्था ४४५
२७९ छोटा पति बड़ी पत्नी ४४९
२८० सम्भोग और निर्बलता ४५२

सत्रहवां अध्याय

२८१ बाबा का विवाह ४५७
२८२ वृद्ध विवाह के भेद ४६१
२८३ गर्भपात और मृतगर्भों की उत्पत्ति ४६३

अठारहवां अध्याय

२८४ स्त्री का रति सुख ४६७
२८५ रति सुख का आनन्द ४६८
२८६ गर्भवती से रति करने का गर्भ पर बुरा प्रभाव ४६८
२८७ गर्भाधान क्रिया अर्थात् सम्भोग ठीक न होने से स्त्रियों का
रोगी होना ४७३
२८८ प्रेम सम्भोग और आरोग्यता ४७३
२८९ पति की निर्बलता सम्भोग और रोग ४७४
२९० याद रखने की बात ४७५
२९१ स्त्रियां वन्ध्या क्यों होती हैं ४७६

विषय सूची १७
२९२ स्त्रियों के अडकोष ४७६
२९३ बन्ध्या स्त्रियो का शर्तिया इलाज ४७७
२९४ सन्तानहीन स्त्रियां निराश न हो ४७७
२९५ पुरुष रोगियों को सूचना ४७७
२९६ मूढ़ गर्भोँ की उत्पत्ति ४७८
२९७ गर्भोँ की स्थिति ४७९
उन्नीसवाँ अध्याय
२९८ गर्भिणी और गर्भ को हानि पहुंचने का कारण ४९९
२९९ पति पत्नी की प्रेम वार्त्ता ५००
३०० पति का प्यार ससार के बहुमूल्य आभूषणो
से भी बढ़कर है ५००
३०१ जवानी और बुढ़ापा ५०१
३०२ प्रेम की प्रार्थना ५०२
३०३ अनुभव की बात ५०४
बीसवाँ अध्याय
यमराज की कचेहरी
३०४ अत्याचारी और व्यभिचारी पतियो का न्याय ५०७
३०५ अत्याचारी पति को यमराज का दण्ड ५०८
३०६ पर स्त्री गमन का फल ५०८

१८ विषय सूची
३०७ दुष्ट पुरुषो से ठगीगई परपुरुषरता स्त्री को
यमराज का दण्ड ५०९
३०८ अपने सुख और आराम के लिये सौतेली सन्तान
को कष्ट देने का फल ५०९
३०९ पति का निरादर ५०९
भूल सुधार
पाठक इस तरह सुधार कर पढ़ें
अशुद्ध शुद्ध
पृष्ठ ९१ मे—
एकादशी को कपोल मे एकादशी को गले मे
द्वादशी को गले मे द्वादशी को गालो मे
तेरस को गाल मे तेरस को होठ मे
पृष्ठ २६३ पंक्ति १६ मे
बाद स्खलित होगी पहले स्खलित होगी
चित्र पृष्ठ १९६ मे
वर्षा वहार पृ० १९१ वर्षा वहार पृ० १२२
कहीं कहीं कुछ प्रूफ की और भी भूले रह गई है पाठक
क्षमा करे । अगले संस्करण मे ठीक कर दी जायगी ।

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भूमिका
शम्भु स्वयम्भु हरयो हरिणेक्षणानाम् ।
येनाक्रियन्तसततं गृहकर्मदासाः ॥
वाचामगोचर चरित्र विचित्रताय ।
तस्मै नमो भगवते कुसुमायुधाय ॥ (भर्तृहरि)
जिसने अपने कर्त्तव्य से शिव ब्रह्मा और विष्णु को भी स्त्रियो
के प्रेम के कारण गृहकार्य करने के लिये दास बना रक्खा है
और जो विचित्र चरित्र मे परम चतुर और विलक्षण है। जिसकी
चतुरता का वर्णन नही हो सकता ऐसे भगवान कामदेव को

  • वारम्बार नमस्कार है ।
    कुसुमायुधधारी कामदेव की महिमा अपार है जिस
    समय वह अपना प्रचण्ड वेग धारण करता है उस समय देव-
    ताओं तक की बुद्धि ठिकाने नही रहती वे भी विषयान्ध हो
    जाते हैं ।

३ भूमिका

जब जब कामदेव ने अपना उग्ररूप धारण किया तो
बड़े बड़े योगी और तपस्वी भी उसके वश मे हो गये साधारण
पुरुषो की क्या गिनती है। जो महात्मा विश्व को ब्रह्ममय देखते थे
वे उसे स्त्रीमय देखने लगे। कभी कभी कामदेव ने देवताओ तक
को वह कौतुक दिखलाया कि तमाम ससार काममय हो गया ।
इसमे जाना जासकता है कि—
जब ऐसे ऐसे बलवान् और ज्ञानवान् देवताओ तपस्वियों
महर्षियो और योगिराजो तथा विद्वानो तक को कामदेव ने नाच
नचा दिया और उन्हे स्त्रियो का दास बना दिया तो साधारण
मनुष्यो की क्या गिनती है।
स्त्रिया प्रत्यक्ष रति का स्वरूप और सृष्टि की उन्नति का
मूल कारण है, उन्ही के द्वारा मनुष्य मात्र की उत्पत्ति होती है
इसीलिये विधि ने उनमे सौन्दर्य की विशेषता रक्खी है। उनके
अंग अंग से लावण्यता और मोहकता टपकती है। उनमें वह
आकर्षण होता है जिसकी शक्ति चुम्बक से भी अधिक होती है।
स्त्रीमुद्रां झषकेतनस्य जननीं सर्वार्थसम्पत्करीं ।
येमूढाः प्रविहाययांति कुधियोमिथ्याफलान्वेषिणः ।
अर्थात् स्त्रियां कामदेव की मुद्रा है, वे सब अर्थ और सम्पत्ति
की करने वाली हैं जो मूढ़ कुबुद्धि उन्हे छोड़कर स्वर्गादि की इच्छा
से निकल भागते हैं वे मिथ्याफल के खोजने वाले हैं।
जिस नारी जाति को आज पुरुष उपेक्षा की दृष्टि से देखते
हैं उसकी महिमा शास्त्रकारों ने मुक्त कंठ से गाई है।

नारी महिमा ३
नारी महिमा
द्रष्टव्येषु किमुत्तमं मृगदृशां प्रेमप्रसन्नं मुखं।
घ्रातव्येष्वपि किं तदास्य पवनःश्राव्येषु किं तद्वचः॥
किं स्वाद्येषु तदोष्ठपल्लवरसः स्पृश्येषु किं तत्तनु-
र्ध्येयं किं नवयौवनं सुहृदयैः सर्वत्र तद्विभ्रमः ॥
मनुष्यो के देखने योग्य वस्तुओ मे उत्तम वस्तु क्या है ? मृग-
नयनी स्त्रियों का प्रेम से प्रसन्न वदन (मुख), सूंघने की वस्तु में
उनके मुख की भाफ, सुनने में मधुरवाणी, स्वादिष्ट वस्तु में उनके
अधर पल्लव (ओठो) का रस, स्पर्श की वस्तु मे उनका कोमल
शरीर और ध्यान करने के योग्य उनका यौवन और विलास है ।
स्वपर प्रतार कोऽसौ निन्दति,
योलीक पण्डितो युवतीः ।
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्ग-
स्तस्यापि फलं तथाप्सरसः ॥
जो स्त्रियों की बुराई करता है वह झूठा पण्डित है, आप तो
ठगा ही गया, औरो को भी ठगाता है क्योकि तपस्या का फल
स्वर्ग है और स्वर्ग का फल स्त्री भोग है। अर्थात् स्वर्ग भोग से
भी बढ़कर आनन्द दायक पत्नी का प्रेम है ।

४ भूमिका
सती और शिव का दाम्पत्य प्रेम
यदि स्त्री के प्रेम मे इतना प्रभाव न होता तो शिव और
श्रीकृष्ण आदि तक इसप्रकार स्त्री के प्रेम मे मग्न न होते। देवता
और बड़े वडे महर्षि तक स्त्रियों का आदर करते थे उनके प्रेम
वन्धन मे बंधे हुए थे। पढ़िये शिव जी के पत्नी मोह की कथा।
सती राजा दक्ष प्रजापतिकी कन्या थीं इनकी सुन्दरता
संसार मे विख्यात थी। सती का विवाह शिव जी के साथ हुआ
था, विवाह के पश्चात् सती कैलाशपति शिव जी के यहां आकर
बड़े आनन्द से रहने लगी।
यद्यपि शिवजी के यहां किसी बात की कमी न थी परन्तु
सती के शरीर पर गेरुए कपड़े और आभूषणों की जगह गले
में रुद्राक्ष की माला, हाथों में भी रुद्राक्ष के आभूषण
सौन्दर्य की शोभा बढा रहे थे। शिवजी और सती मे इतना अधिक
प्रेम था कि एक दूसरे से क्षण भर को भी अलग न होते थे।
एक बार सती के पिता ने बड़ा भारी यज्ञ किया जिसमे
भारत वर्ष भर के धनी निर्धन मूर्ख विद्वान सभी को निमंत्रण दिया
परन्तु अपनी प्यारी पुत्री सती और उनके पति शिवजी को
नहीं बुलाया। जब सती को यह बात नारद जी से मालूम हुई और
यज्ञ का दिन निकट आगया तब एक दिन सती ने अपने पति
शिवजी से पिता के यहाँ जाने की आज्ञा मांगी। शिवजी ने कहा
बिना बुलाए पिता के यहाँ किसी ऐसे उत्सव मे जाना उचित
नहीं है क्योकि उन्होंने समस्त देश के मनुष्यो को निमंत्रण भेजा

श्रीकृष्ण जी का दाम्पत्य-प्रेम ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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सती और शिव का दाम्पत्य प्रेम ५
है, परन्तु हमारा तुम्हारा नाम भी नहीं लिया। यो साधारण समय
में तुम जाना चाहती तो मुझे कोई इनकार न था परन्तु ऐसे समय
में न बुलाना हमलोगों का अपमान करना है, इस समय यदि तुम
बिना बुलाये जाओगी तो तुम्हारा बड़ा अपमान होगा।
तुम्हारे पिता ने हम लोगों का अपमान करने के लिये ही यह यज्ञ
किया है ऐसा मेरा ख्याल है। इस कारण बिना बुलाये तुम जाओगी
तो तुम्हारा अपमान होगा, तुम्हे पछताना पड़ेगा, तुम्हारा अपमान
होने से मेरा अपमान होगा।
सती ने प्रार्थना की कि हे स्वामिन ! पुत्री यदि पिता के यहां
बिना बुलाये भी चली जांय तो अपमान नहीं होता क्योंकि पिता
का घर भी तो अपना ही घर है। पुत्री के लिये पिता निमन्त्रण भेजे
या न भेजे पुत्री को जाने में मेरे विचार से तो कुछ अपमान की
बात नहीं होनी चाहिये ।
इस पर शिवजी ने कहा—इस विषय में अधिक कहने सुनने
की कोई बात नहीं है यदि तुम्हारी इच्छा जाने की ही है तो मैं
मना भी नहीं कर सकता चली जाओ। शिवजी की आज्ञा पाकर
सती ने पिता के घर जाने की तैयारी की। जब चलने लगी तब
शिवजी ने फिर समझाया कि देखो वहां जाकर जो कुछ भी कार्य
करना वह बड़े विचार से करना और समय का हर समय ध्यान
रखना सब कार्य समय का विचार करके करना ।
शिवजी ने सती को समझाया तो खूब परन्तु सती को माता
का स्नेह खींच ले गया क्योकि नारद जी सती से कहगये थे कि

६ भूमिका
"तुम्हें यज्ञ में तुम्हारे पिता ने नही बुलाया इस लिये तुम्हारी
माता ने अन्न जल त्याग दिया है और वे बडी दुःखी हैं" ।
नारद जी के कहने के अनुसार सती ने माता का दुःख
सुनकर जाना ही उचित समझा, इस लिये शिवजी की बात पर
कुछ विशेष ध्यान नही दिया ।
सती अपने पिता के यहा पहुंच गईं। घर में सती की माता
अन्न जल त्याग कर सती के लिये दुःखित पडी रो रही थी ।
माता की यह दशा देखकर सती को भी बडा दुःख हुआ । माता
के निकट जाकर सती ने कहा "माता मैं आगई" ।
सती की आवाज माता के कानो मे पहुची और वह सुनते
ही उठी, सती को हृदय से लगा लिया, माता पुत्री के स्नेह का
प्रेम सागर उमड पडा । दोनों परस्पर हृदय से लगकर रोने
लगीं । माता से मिलकर सती ने पिता से मिलने की इच्छा
प्रकट की । माता ने कहा—नही ! बेटी पिता से इस समय
मिलना उचित नही है क्योकि वे इस समय यज्ञशाला मे हैं। ऐसे
समय वहा तुम्हारा जाना मै भला नही समझती ।
सती को इस बात का बड़ा दुःख था कि पिता ने मुझे
निमंत्रण क्यो नही दिया इसलिये वह पिता से इस बात का
उलाहना देने की धुन मे थी इस कारण उसने एक न सुनी । वह
यज्ञशाला मे पिता के पास पहुच गई ।
सती को देखकर यज्ञशाला मे बैठे हुए सभी ऋषि मुनि
आदिको ने सती को पिता के पास जाने के लिये रास्ता दे दिया