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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

जीवन्मुक्त-निरूपण २८३
जीवन्मुक्त अज्ञान का विनाश हो जाने के कारण किए, जाने वाले कार्य
के प्रति कर्तापन से अथवा भोग की जा रही वस्तु के प्रति भोक्ताभाव से
पूर्णतया मुक्त होता है। इसलिए पूर्ववासना के कारण वर्तमानशरीर आदि से
किए जाने वाले क्रियमाण एवं प्रारब्धकर्मों का वह साक्षिमात्र होता है,
क्योंकि वह उनमें कर्तापन के अभिमान से रहित होता है। यद्यपि दूसरों की
दृष्टि में वह इन सबका भोक्ता प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में उसकी
स्थिति कमल के पत्ते पर स्थित जल की बूँद के समान होती है, जो पत्ते
पर रखी हुई भी उसमें लिप्त नहीं होती है।
इसीकारण वह रक्त एवं मांसादिपदार्थों द्वारा निर्मित मल-मूत्र आदि से
भरे इस शरीर द्वारा, अन्धभाव, मन्दभाव आदि से युक्त श्रोत्रादि इन्द्रियसमूह
से तथा शोक, मोह, भूख, प्यास आदि से व्याकुल हो जाने वाले
अन्तःकरण द्वारा पूर्ववासना के प्रभाव के कारण किए जाने वाले कर्म तथा
वर्तमानसमय में फलों की ओर उन्मुख प्रारब्धकर्मों के फलों के प्रति
यथार्थस्थिति से पूर्णतया परिचित हो जाने के कारण, उन्हें सत्य नहीं मानता
है। उन सभी कार्यों के प्रति उसकी मनःस्थिति को ग्रन्थकार एक उदाहरण
द्वारा समझाते हैं-
जीवन्मुक्त व्यक्ति क्रियमाण एवं प्रारब्धकर्मों को, उनके फलों को देखते
हुए ठीक उसीप्रकार नहीं देखता है, जैसे- जादू को देखने वाला कोई
व्यक्ति जादूगर की बातों को जादू समझकर 'यह वास्तविक नहीं है',
इसप्रकार देखता हुआ भी नहीं देखता है, अर्थात् वह व्यक्ति उन कार्यों के
प्रति कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व के अभिमान से पूर्णतया रहित रहता है, क्योंकि
ज्ञान द्वारा उससे सम्बन्धित अज्ञान समाप्त हो जाता है।
जबकि शरीर एवं इन्द्रियों के प्रति ममत्व एवं अहंभाव रखने के कारण
बद्धव्यक्ति अपने अज्ञान के कारणशरीर एवं इन्द्रियों द्वारा किए जाने वाले
कर्मों के प्रति कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व के अभिमान से युक्त रहता है।
परिणामस्वरूप वह इनसे प्राप्त होने वाले अच्छे एवं बुरे फलों से भी बँध
जाता है एवं उन्हें भोगने के लिए बार-बार विभिन्नशरीरों को धारण करके
इस संसार में जन्म लेकर, आवागमन के चक्र में पड़ा सुख दुःख का भागी
होता है।
इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि ब्रह्मज्ञान होने पर तत्त्वज्ञानी तुरन्त
शरीर का त्याग करके मोक्ष प्राप्त नहीं करता है, अपितु वस्त्र के जल जाने
पर भी कुछ समय तक उसमें होने वाली वस्त्रविषयकबुद्धि के समान,

२८४ वेदान्तसार
भ्रमवश दिखायी देने वाले, दो चन्द्रमाओं की ज्ञाननिवृत्ति के समान
अज्ञानवश प्रतीत होने वाले देहादि के मिथ्या होने का निश्चय होने पर भी
पूर्वसंस्कारों के कारण प्रारब्धकर्मों के विनाशपर्यन्त उसके शरीर की स्थिति
बनी रहती है। जो इस शरीर द्वारा फलभोग के उपरान्त ही समाप्त होते हैं।
नित्यप्रति के दैनिककर्मों को यद्यपि जीवन्मुक्त व्यक्ति इसी शरीर द्वारा करता
है, किन्तु उन सभी के प्रति कर्तापन एवं अहंभाव के अभाव के कारण, वे
उसके द्वारा किए जाते हुए भी न किए गए के समान ही रहते हैं, क्योंकि
वह उनके कर्मफल से आबद्ध नहीं रहता है। इसी बात को ग्रन्थकार ‘स
चक्षुरचक्षुरिव’ इत्यादि श्रुतिवचन को उद्धृत करते हुए परिपुष्ट करते हैं।
जीवन्मुक्त नेत्र होते हुए भी देखता नहीं है, कान होते हुए भी सुनता
नहीं है, इसका अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार जादूगर की क्रियाओं द्वारा
अनेक वस्तुओं को उत्पन्न होते प्रत्यक्षतः देखते हुए भी हम यह कहते हैं
कि यह सत्य नहीं है, दृष्टि का भ्रममात्र है। जले हुए वस्त्र को देखकर यह
वस्त्र है, इस क्षणिकप्रतीति के साथ उसमें मिथ्यात्व का आभास भी रहता
है। ठीक उसीप्रकार जीवन्मुक्त इस संसार को देखता हुआ भी असत्य
मानकर नहीं देखता है। वार्तालाप करता हुआ वाणी एवं श्रवणेन्द्रिय का
प्रयोग करता हुआ भी नहीं करता है, क्योंकि इन सब क्रियाओं के प्रति
उसमें कर्तापन एवं अहंभाव का पूर्णतया अभाव रहता है।
इसके बाद ग्रन्थकार उपदेशसाहस्री में दिए गए श्लोक को उद्धृत करके
जीवन्मुक्त के क्रियाकलाप को कहते हैं-“जो व्यक्ति ब्रह्म एवं आत्मा के
एकत्व को भलीभांति समझ लेता है। सभीप्रकार के भेदभाव से रहित हुआ
वह सुषुप्ति अवस्था के समान ही जाग्रत अवस्था में भी द्वैतभाव को समाप्त
कर देता है। वस्तुतः इसप्रकार के व्यक्ति को ही आत्मज्ञानी कहा गया है।”
इसे ‘अहं ब्रह्मास्मि’ एवं ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ इत्यादि महावाक्यों की
अनुभूति हो जाती है। इस कारण उसकी दृष्टि में ब्रह्म के अतिरिक्त सम्पूर्ण
दृश्यमान चराचरजगत् एवं उसके कारण अज्ञान का पूर्णतया अभाव ही हो
जाता है। इसलिए लोकव्यवहार में कर्मों को करता हुआ भी वह उन्हें नहीं
करता है, क्योंकि कमल के पत्ते पर विराजमान जल की बूँद के समान, उन
सभी कार्यों से वह सर्वथा अलिप्त रहता है। वस्तुतः वही व्यक्ति ब्रह्मवेत्ता,
आत्मवेत्ता कहलाने का अधिकारी होता है, अन्य नहीं। इसमें लेशमात्र भी
संदेह नहीं है।

जीवन्मुक्त-निरूपण २८५
विशेष-(1) जिसप्रकार धनुर्धारी द्वारा चलाए गए बाण में फेंकने वाले
की शक्तिपर्यन्त वह भूमि पर नहीं गिरता है, ठीक उसीप्रकार प्रारब्धकर्मों के
फलभोगपर्यन्त जीवन्मुक्त का शरीर विनष्ट नहीं होता है।
(2) 'व्युत्थान समये' से अभिप्राय ज्ञानप्राप्ति से होने वाली 'जाग्रति'
रूप अर्थ से ग्रहण करना चाहिए।
(3) शरीरनिर्माण में मांस-शोणित-मूत्रपुरीष आदि का उल्लेख शरीर के
प्रति होने वाले वैराग्यभाव की अभिव्यक्ति हेतु सप्रयोजन किया गया है।
(4) वेदान्त के अनुसार भूख एवं प्यास वस्तुतः प्राणों के कार्य हैं,
किन्तु यहाँ उन्हें अन्तःकरण के कार्य कहा गया है। इसे विद्वानों ने सांख्य
का प्रभाव माना है।
(5) प्रस्तुत अंश में जीवन्मुक्त के क्रियाकलाप एवं सांसारिकव्यवहार के
प्रति उसके चिन्तन का कथन करने के कारण 'बद्धव्यक्ति' के क्रियाकलापों
की व्यञ्जना से प्रतीति हो रही है।
(6) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है-
चित्र-६३
जीवन्मुक्त की दृष्टि (व्यवहार)
शरीर इन्द्रियाँ अन्तःकरण
रुधिर मांस मलमूत्र मन्दत्व, अन्धत्व एवं शोक, मोह एवं भूख
का पात्र कुण्ठत्व कापात्र प्यास का पात्र
वैराग्य भाव
सर्वत्र अद्वैतभाव का दर्शन इसके द्वारा किए जा रहे सर्वत्र अद्वैतभाव का दर्शन
कार्यों के प्रति कर्तापन
एवं अहंभाव का अभाव
अवतरणिका-पुनः अपने द्वारा किए गए कर्मों के प्रति जीवन्मुक्त द्वारा
शुभ-अशुभ भावनाओं के अभाव को कहते हैं-
अस्य ज्ञानात्पूर्वं विद्यमानानामेवाहारविहारादीनामनुवृत्तिवच्छुभ-
वासनानामेवानुवृत्तिर्भवति शुभाशुभयोरौदासीन्यं वा। तदुक्तम्-
“बुद्धाद्वैतसतत्त्वस्य यथेष्टाचरणं यदि।
शुनां तत्त्वदृशां चैव को भेदोऽशुचिभक्षण” इति।
“ब्रह्मवित्त्वं तथा मुक्त्वा स आत्मज्ञो न चेतर” इति॥३६॥

२८६ वेदान्तसार
पदच्छेद-अस्य ज्ञानात् पूर्वम् विद्यमानानाम् एव आहार-विहार-आदीनाम्-
अनुवृत्ति-वत्, शुभवासनानाम् एव अनुवृत्तिः भवति, शुभ-अशुभयोः
औदासीन्यम् वा। तद् उक्तम्-
“बुद्ध-अद्वैत-सतत्त्वस्य यथा-इष्ट-आचरणम् यदि।
शुनाम् तत्त्वदृशाम् च एव कः भेदः अशुचिभक्षणे” इति।
“ब्रह्मवित्त्वम् तथा मुक्त्वा सः आत्मज्ञः न च इतरः” इति।।36।।
अनुवाद-इस (ब्रह्मज्ञानी) के आत्मज्ञान से पूर्व विद्यमान आहार, विहार
आदि की परम्परा के समान, केवल शुभवासनाओं का ही क्रम जारी रहता
है अथवा शुभ एवं अशुभ इन दोनों में उसका उदासीनभाव उत्पन्न हो जाता
है। इसीलिए कहा गया है-
अद्वैत को तत्त्वरूप से जानने वाले (आत्मज्ञानियों) का यदि इच्छानुसार
आचरण होता तो, तत्त्वज्ञों की भी कुत्ते के समान शुद्ध-अशुद्ध के भक्षण में
भिन्नता नहीं होती। 'यह ब्रह्मज्ञान है' उसप्रकार की भावना का परित्याग
करने वाला व्यक्ति ही वह 'आत्मज्ञानी' है, अन्य कोई नहीं।
'चन्द्रिका'-इससे पूर्व ग्रन्थकार ने प्रतिपादित किया कि 'जीवन्मुक्त'
अपने द्वारा किए जा रहे कार्यों के प्रति कर्तापन एवं अहंभाव से पूर्णतया
रहित होकर सर्वत्र अद्वैत का दर्शन करता है, किन्तु इसी प्रसङ्ग में प्रतिपक्षी
द्वारा यह शङ्का करने पर कि यदि जीवन्मुक्त कर्म करते हुए स्वयं को कर्ता
नहीं मानता है, इसीलिए वह कर्मबन्धन से मुक्त रहता है, क्योंकि उसके
द्वारा किए जाने वाले कार्यों के पाप एवं पुण्य का वह भागी नहीं होता।
ऐसी स्थिति में तो वह अपनी इच्छानुसार अच्छे बुरे, सभीप्रकार के कार्य
करने में स्वतन्त्र होगा? क्या यह मानना उचित है?
इसी शङ्का के उत्तर में ग्रन्थकार कहते हैं कि तत्त्ववेत्ता ब्रह्मज्ञान से पूर्व
सांसारिकस्थिति में श्रेष्ठविचारों के साथ-साथ सदाचरण भी करता है। उन्हीं
का अनुसरण वह इस स्थिति को प्राप्त करने के उपरान्त भी करता रहता है,
अर्थात् स्वच्छ आचरण के परित्याग का सङ्कल्प तो वह वस्तुतः आत्मज्ञान
से पूर्व प्रारम्भिककाल में ही कर चुका है। अतः सिद्धि के पश्चात् उसमें
इच्छानुसार अशुभकर्मों के प्रति प्रवृत्ति की सम्भावना लेशमात्र भी नहीं रहती
है। आत्मसिद्धि ही वस्तुतः उसके शुभचिन्तन एवं कर्मों की परिचायक है।
साथ ही दीर्घकालीन अभ्यास के कारण इच्छानुसार स्वच्छन्द आचरण के

जीवन्मुक्त-निरूपण २८७
संस्कार ही वास्तव में विनष्ट हो जाते हैं। इसलिए तत्त्वज्ञान के पश्चात्
जीवन्मुक्तदशा में भी शुभवासनाओं की प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप वह शुभ-
कर्मों में ही प्रवृत्त होता है, अशुभ कर्मों में नहीं।
पुनः जीवन्मुक्त की अग्रिम उत्कृष्ट अवस्था को कहते हैं-कुछ समय
पश्चात् निरन्तर अभ्यास के परिणामस्वरूप शुभ-अशुभ दोनों प्रकार की
भावनाओं के प्रति उसमें उदासीनभाव उत्पन्न हो जाता है, जो वस्तुतः इसकी
उत्कृष्टता का ही द्योतक है। कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन्मुक्त
अवस्था में व्यक्ति यदि किसी भी कार्य में प्रवृत्त होता भी है तो,
संस्कारवश उसकी प्रवृत्ति शुभकार्यों में ही होगी अथवा फिर शुभ-अशुभ के
प्रति उसका उदासीनभाव रहेगा। अतः उसके द्वारा अशुभकर्मविषयक शङ्का
करना पूर्णतया निराधार एवं भ्रामक है, क्योंकि तत्त्वज्ञान होने पर भी यदि
वह अशुभकर्मों में प्रवृत्त होता है तो ऐसी स्थिति में हम मूर्ख एवं
आत्मज्ञानी इन दोनों में भेद ही नहीं कर सकेंगे।
अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में उद्धृत
करते हुए कहते हैं कि जिन तत्त्ववेत्ताओं ने अखण्डब्रह्म को भलीप्रकार
समझ लिया है, वे कभी भी स्वेच्छानुसार आचरण नहीं करते हैं और यदि
ऐसा नहीं होता तो जिसप्रकार कुत्ता भक्ष्य-अभक्ष्य के बारे में नहीं जानता है
तथा अपनी भूख के अनुसार किसी भी प्रकार की वस्तु को खाने में प्रवृत्त
हो जाता है, ठीक उसीप्रकार तत्त्ववेत्ता भी शुद्ध-अशुद्ध का ध्यान न रखते
हुए प्रत्येक कार्य में प्रवृत्त होता, जबकि ऐसा देखा नहीं गया है। अतः हम
निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि ब्रह्मज्ञानी का आचरण स्वच्छन्द नहीं होता
है। या तो उसकी प्रवृत्ति शुभकर्मों में होती है या फिर शुभ-अशुभ के प्रति
उसका उदासीनभाव रहता है।
इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को उद्धृत करते हुए जीवन्मुक्त की
एक अन्य विशेषता का भी कथन करते हैं कि ब्रह्मवेत्ता जहाँ अपने कर्तापन
के भाव को समाप्त कर देता है वहीं 'मैं आत्मज्ञानी हूँ' इसप्रकार के
अहंभाव को भी वह त्याग देता है। इन दोनों भावनाओं के परित्याग की
स्थिति में ही वह सच्चा ब्रह्मज्ञानी अथवा जीवन्मुक्त कहलाने का अधिकारी
बनता है, अन्यथा नहीं।
विशेष-(1) यहाँ प्रयुक्त अन्तिमपंक्ति उपदेशसाहस्री से उद्धृत है, जहाँ
इन भावों को इसप्रकार अभिव्यक्त किया गया है-

२८८ वेदान्तसार
यो वेदालुप्तदृष्टत्वमात्मनोऽकर्तृत्वां तथा।
ब्रह्मवित्त्वं तथा मुक्त्वा स आत्मज्ञो न चेतरः॥
(२) केनोपनिषद् में ब्रह्मज्ञानी को इसप्रकार परिभाषित किया गया है-
‘यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य य वेद सः।
अविज्ञातं विजानता विज्ञातमविजानताम्॥’
(३) ब्रह्मज्ञान के अभिमान से शून्य को ही वस्तुतः ब्रह्मज्ञानी बताया
गया है, जिसे ब्रह्मज्ञान का अभिमान है, जो 'मैं ब्रह्मज्ञानी हूँ' ऐसा कहता है,
वह व्यक्ति ब्रह्मवेत्ता हो ही नहीं सकता है।
(४) ब्रह्मवेत्ता में पवित्र-आचरण एवं पवित्र-वासनाओं की स्थिति की
पुष्टि की गयी है।
(५) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है-
चित्र-६४
[जीवनमुक्त में अभाव]
↙ ↘
(स्वच्छन्द (उच्छृंखल) आचरण विषयक) (अहंभाव विषयक)
↓ ↓
[ब्रह्मज्ञान से पूर्व सदाचरण एवं सद्विचारों के कारण] [मैं ब्रह्मज्ञानी हूं वह ऐसा भी नहीं कहता है।]
↘ ↙
(शुभ वासनाओं का क्रम जारी) ➔ अथवा ➔ (शुभ-अशुभ के प्रति औदासीन्य)
अवतरणिका-तदनन्तर जीवन्मुक्त में स्थित रागद्वेष आदि का अभाव
एवं दया आदि गुणों को उसका अलङ्कार बताते हुए कहते हैं-
तदानीममानित्वादीनि ज्ञानसाधनान्यद्वेष्टृत्वादयः सद्गुणाश्चालङ्कारवदनु-
वर्तन्ते। तदुक्तम्-
“उत्पन्नात्मावबोधस्य ह्यद्वेष्टृत्वादयो गुणाः।
अयत्नतो भवन्त्यस्य न तु साधनरूपिण” इति॥३७॥
पदच्छेद-तदानीम् अमानित्वादीनि ज्ञानसाधनानि अद्वेष्टृत्व-आदयः सद्गुणाः
च अलङ्कारवद् अनुवर्तन्ते। तद् उक्तम्-

जीवन्मुक्त-निरूपण २८९
“उत्पन्न-आत्म-अवबोधस्य हि अद्वेष्टृत्व-आदयः गुणाः।
अयत्नतः भवन्ति अस्य न तु साधनरूपिणः” इति॥37॥
अनुवाद-उससमय अभिमानराहित्य आदि ज्ञान के साधन, द्वेषहीनता
आदि सद्गुण आभूषणों के समान (जीवन्मुक्त का) अनुवर्तन करते हैं।
इसीलिए कहा गया है-
“उत्पन्न हो गया है आत्मज्ञान जिसे, इसके अद्वेष आदि गुण स्वाभाविक
हो जाते हैं। वे वस्तुतः साधनरूप नहीं रहते हैं।
‘चन्द्रिका’-जीवन्मुक्त की अवस्था में व्यक्ति को न तो किसी भी
विषय में अभिमान ही रहता है और न ही वह वस्तुविशेष या व्यक्तिविशेष
के प्रति द्वेष की भावना ही रखता है। इन दोनों गुणों के लिए उसे प्रयास
भी नहीं करना पड़ता, अपितु ये उसके स्वभाव में ही विद्यमान रहते हैं, जो
वस्तुतः आभूषण के समान उसकी शोभा में वृद्धि करने वाले होते हैं।
ये गुण जीवन्मुक्तावस्था में उसके साधन नहीं बनते हैं, अपितु अपने
आप उसमें लक्षण के रूप में दिखायी देने लगते हैं। इसी बात को ग्रन्थकार
नैष्कर्म्यसिद्धि की कारिका को उद्धृत करते हुए कहते हैं-
जिसे आत्मज्ञान की सिद्धि हो गयी है, ऐसे ब्रह्मज्ञानी के लिए द्वेष न
करना, अहंकार न करना, दयालुता दिखाना इत्यादि गुण मानो उसका स्वभाव
ही हो जाते हैं। उनके लिए उसे किसीप्रकार का कोई प्रयत्न नहीं करना
पड़ता है।
ऐसी स्थिति में जीवन्मुक्त के मन में अशुभकर्म करने का विचार भी
नहीं आता है, क्योंकि उसे साध्यरूप ब्रह्म की सिद्धि हो जाती है। इसलिए
इस अवस्था में उसे ये गुण साधनरूप में आवश्यक प्रतीत भी नहीं होते हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन्मुक्त व्यक्ति में अनहंकार, अद्वेष्टृत्व
आदि गुणों की स्थिति, अत्यन्त सहज एवं स्वाभाविक हो जाती है। इनके
लिए उसे किसीप्रकार के प्रयत्न की आवश्यकता नहीं रहती है, फिर भला
वह अशुभादिकर्म किसप्रकार कर सकता है?
विशेष-(1) जीवन्मुक्त व्यक्ति के लिए अहंकारराहित्य एवं द्वेष न
करना आदि गुणों की स्वाभाविकस्थिति का कथन किया गया है।
(2) गुणों को उसकी शोभा में वृद्धि करने वाले आभूषण बताया गया
है, जो अत्यन्त सुन्दर बन पड़ा है।

२९० वेदान्तसार
(३) अभिमान एवं द्वेष का अभाव ज्ञान के लिए आवश्यक बताया गया
है। यद्यपि आरम्भ में यह ज्ञान के साधनरूप में स्वीकार किया जाता है,
किन्तु बाद में ये ब्रह्मज्ञानी के स्वभाव में ही विराजमान हो जाते हैं। इनके
लिए उसे कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता है।
(४) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
चित्र-६५
┌─────────────┐ ┌───────────────────────┐ ┌─────────────────────────┐
│अहंकार न करना│ < │ पूर्व में ज्ञान के साधन │ > │(द्वेष न करना (अद्वेष्टृत्व)│
│(अमानित्व) │ └──────────┬────────────┘ └────────────┬────────────┘
└──────┬──────┘ │ │
└────────────────────> ┌─────────────┐ <────────────┘
│ आदिगुण │
└──────┬──────┘
↓
┌─────────────┐ ┌───────────────────────────┐ ┌─────────────────────────┐
│एतदर्थ उसे कोई│ < │ जीवन्मुक्तावस्था में आभूषण │ > │ अब वे गुण साधन न │
│प्रयत्न नहीं करना │ │ के समान उसके स्वभाव में │ │ होकर लक्षण बन जाते हैं। │
│पड़ता है। │ │ ही विद्यमान रहते हैं। │ └─────────────────────────┘
└─────────────┘ └───────────────────────────┘
अवतरणिका-तत्पश्चात् ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए शरीरपात के
पश्चात् जीवन्मुक्त के ब्रह्मलीन होने की बात का प्रतिपादन करते हैं-
किं बहुनायं देहयात्रामात्रार्थमिच्छानिच्छापरेच्छाप्रापितानि सुखदुःख-
लक्षणान्यारब्धफलान्यनुभवन्नन्तःकरणाभासादीनामवभासकः संस्तदवसाने
प्रत्यगानन्दपरब्रह्मणि प्राणे लीने सत्यज्ञानतत्कार्यसंस्काराणामपि
विनाशात्परमकैवल्यमानन्दैकरसमखिलभेदप्रतिभासरहितमखण्डब्रह्मावतिष्ठ
ते। “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति”, “अत्रैव समवलीयन्ते”, “विमुक्तश्च
विमुच्यत” इत्यादिश्रुतेः॥३८॥
पदच्छेद-किम् बहुना अयम् देह-यात्रामात्रार्थम् इच्छा-अनिच्छा-परेच्छा-
प्रापितानि सुखदुःख-लक्षणानि आरब्धफलानि अनुभवन् अन्तःकरण-
आभास-आदीनाम् अवभासकः सन् तद् अवसाने प्रत्यक्-आनन्द-परब्रह्मणि
प्राणे लीने सति अज्ञान तत् कार्य-संस्काराणाम् अपि विनाशात् परम-कैवल्यम्
आनन्द-एकरसम् अखिल-भेदप्रतिभास-रहितम् अखण्डब्रह्म-अवतिष्ठते।
“न तस्य प्राणाः उत्क्रामन्ति”, “अत्र एव समवलीयन्ते”, “विमुक्तः च
विमुच्यते” इत्यादिश्रुतेः॥३८॥
अनुवाद-अधिक क्या, देहयात्रामात्र के लिए इच्छा, अनिच्छा अथवा
दूसरों की इच्छा से प्राप्त कराए गए, सुखदुःखरूप प्रारब्धकर्मों के
फलों का अनुभव करते हुए, इन्द्रियों के आभास आदि को प्रकाशित करते

जीवन्मुक्त-निरूपण २९१
हुए, उन (प्रारब्धकर्मों) की समाप्ति पर, आन्तरिक आत्मानन्दस्वरूप
परब्रह्म में प्राणों के लीन होने पर, अज्ञान एवं उसके कार्यरूप संस्कारों के
भी विनष्ट होने से, परमकैवल्य, आनन्दैकरस, सभीप्रकार के भेदों के
आभास से रहित, यह (जीवन्मुक्त) अखण्डब्रह्मरूप में ही स्थित हो जाता
है।
“उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते हैं", "वे यहीं पर विलीन हो जाते
हैं", (अतः वह) "मुक्त हुआ भी पुनः मुक्त हो जाता है।" इत्यादि श्रुति
का वचन (भी इसमें प्रमाण है।)
'चन्द्रिका'-तत्पश्चात् जीवन्मुक्त की देहमुक्ति के सम्बन्ध में ग्रन्थकार
आचार्य सदानन्द कहते हैं कि इस विषय में और अधिक कहने की
आवश्यकता नहीं है। शरीर की यात्रा के हेतुरूप स्वेच्छा, अनिच्छा अथवा
परेच्छारूप प्रारब्धकर्मों द्वारा प्राप्त कराए गए, सुख एवं दुःखस्वरूप फलों का
अनुभव करते हुए, अन्तर्वृत्तियों के आभास अर्थात् ज्ञान को उत्तरोत्तर
प्रकाशित करते हुए, प्रारब्धकर्मों की समाप्ति के पश्चात् आनन्दस्वरूप
आन्तरिक आत्मारूप परब्रह्म में प्राणों के लीन होने पर, सृष्टि के कारण
अज्ञान तथा उसके कार्यरूप संस्कारों के पूर्णतया नष्ट होने के बाद उसे
सभीप्रकार के भेदों का आभास होना बन्द हो जाता है। इस अवस्था में
जीवन्मुक्त का शरीरपात हो जाता है तथा परमकैवल्य एकमात्र आनन्दरूप में
स्थित हुआ, वह अखण्डब्रह्मरूप में ही स्थित हो जाता है।
इस संदर्भ में अपने कथन की पुष्टि हेतु ग्रन्थकार श्रुतिवचनप्रमाणरूप में
प्रस्तुत करते हैं। श्रुतियों की मान्यता है कि जीवन्मुक्त के शरीरपात के
पश्चात् प्राण एक शरीर का त्यागकर दूसरे शरीर में नहीं जाते हैं, अपितु
अपने कारणरूप सूक्ष्मतन्मात्राओं में विलीन हो जाते हैं। इसप्रकार एक बार
मुक्ति को प्राप्त हुआ, जीवन्मुक्त शरीरपात के साथ पुनः मुक्त होता है।
प्रथम मुक्ति ज्ञान होने के बाद प्रारब्धकर्मों के क्षय से पूर्व होती है, जब वह
ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार कर लेता है तथा द्वितीय-मुक्ति प्रारब्धकर्मों के
फलभोग के परिणामस्वरूप उनका क्षय होने के बाद शरीरपात के साथ
होती है, जब उसके प्राण इसीसंसार की तन्मात्रास्वरूप आकाशादि में विलीन
हो जाते हैं तथा आत्मा ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है। इस अवस्था में

२९२ वेदान्तसार
जीवन्मुक्त का पुनर्जन्म नहीं होता है। इसीको मोक्ष अथवा कैवल्य कहा
जाता है।
विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में तीन प्रकार के प्रारब्धकर्मों का उल्लेख
हुआ है, जो व्याख्या की अपेक्षा रखते हैं-
(क) स्वेच्छा-प्रारब्ध-न्यायपूर्ण आजीविका अर्जन आदि में
स्वेच्छापूर्वक कष्ट को स्वीकार करना ही स्वेच्छाप्रारब्ध है, क्योंकि ऐसा
करने की अन्तःप्रेरणा का कारण प्रारब्धकर्म ही होते हैं।
(ख) अनिच्छा-प्रारब्ध-मार्ग में जाते समय कांटा लगना, मूल्यवान
वस्तु की अनायास प्राप्ति होना, जिसे प्राप्त करने की पहले से कोई
सम्भावना अथवा इच्छा नहीं थी, ईशकृपा से अनायास प्राप्त हो जाना ही
अनिच्छा- प्रारब्ध है।
(ग) परेच्छा-प्रारब्ध-सर्पदंश, दुष्ट द्वारा सताया जाना अथवा किसी
सज्जन द्वारा कष्ट को दूर करना आदि बिना अभिलाषा के सुख-दुःखादि
भोग, जो दूसरे की इच्छा से प्राप्त होते हैं, परेच्छाप्रारब्ध कहलाते हैं।
जीवन्मुक्त भी इन तीनों प्रकार के प्रारब्धभोगों को भोगकर उनका क्षय
करता है। जैसे-भिक्षाप्राप्ति हेतु घूमना, कष्ट उठाना स्वेच्छाप्रारब्ध, रोगादि से
ग्रस्त होने पर अन्यों द्वारा अन्नादि प्रदान करना परेच्छाप्रारब्ध, पैर में कांटा
आदि लगना अनिच्छाप्रारब्ध है।
(2) जीवन्मुक्त के प्रारब्धफलभोग के पश्चात् वह ब्रह्म में लीन हो
जाता है, किन्तु यहाँ जीवन्मुक्त एवं विदेहमुक्ति की भिन्नता को समझना
आवश्यक है। जीवन्मुक्त की अवस्था में प्रारब्धकर्मों का पूर्ण नाश न होने
के कारण अज्ञान की अंशमात्रसत्ता विद्यमान रहती है, किन्तु विदेहमुक्ति की
स्थिति में अज्ञान का वह अंश भी समाप्त हो जाता है। परिणामस्वरूप
उसके कार्यरूप संस्कार भी विनष्ट हो जाते हैं। इसप्रकार कैवल्य की
अवस्था से एक क्षण पूर्व उसका शरीररूप अज्ञान, लिङ्गशरीररूप प्राण तथा
स्थूलशरीर आदि सभी आत्यन्तिकदृष्टि से सदैव के लिए नष्ट हो जाते हैं।
(3) यहाँ प्रयुक्त परमकैवल्य से अभिप्राय मुक्तपुरुष का ब्रह्मभाव को
प्राप्त होना है।

जीवन्मुक्त-निरूपण २९३
(4) परमकैवल्य विशुद्ध आनन्दमात्र होने से आनन्दैकरस कहलाता है।
(5) यहाँ प्रयुक्त देहयात्रा से अभिप्राय है कि जीवन्मुक्त इन्द्रियों की
तृप्ति के लिए प्रारब्धफलों का भोग नहीं करता है, अपितु वह केवल शरीर
स्थिति के लिए उनको भोगता है।
(6) समुद्र में उठने वाली लहरें जिसप्रकार समुद्र में लीन हो जाती हैं,
उसी प्रकार जीवन्मुक्त के प्राण प्रत्यक् अभिन्नपरमात्मा में विलीन होते हैं।
सामान्यजीवों के समान ऊर्ध्वगमन नहीं करते हैं।
॥इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यसदानन्दविरचिता वेदान्तसारः
समाप्तः॥
॥इसप्रकार श्रीमद् परमहंस परिव्राजकाचार्य सदानन्द द्वारा विरचित
वेदान्तसार समाप्त हुआ॥

परिशिष्ट: डायग्राम्स सूची व सहायक ग्रन्थ-सूची

२९४ वेदान्तसार
परिशिष्ट-क
विषयवार डायग्राम-सूची पृष्ठ

  1. कारण शरीर, सुषुप्ति अवस्था, आनन्दमयकोष 61
  2. सत्रह अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर 62
  3. सात्त्विक अंशों से अपञ्चीकृतसूक्ष्मभूत एवं
    पञ्चज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति 63
  4. रजोप्रधान अंशों से पञ्चकर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति 64
  5. रजोप्रधान अंशों से पञ्चवायुओं की उत्पत्ति 65
  6. कारणशरीर, कोशत्रय-विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय 66
  7. स्थूलशरीर-जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज 67
  8. पञ्चकोषों का विस्तृतज्ञान 69
    9-10. पञ्चीकरणप्रक्रिया 70
  9. स्थूलमहाभूतों का निर्माण 71
  10. त्रिवृत्करण 72
  11. अनुपलब्धि प्रमाण के भेद 79
  12. सृष्टिप्रक्रिया अवस्था आदि। 84
  13. समष्टिव्यष्टि की सोदाहरण विस्तृत व्याख्या 84
  14. सत्ता के त्रिविधरूप 86
  15. वेदान्त की विस्तृत सृष्टिप्रक्रिया 91-92
    18-19 मंगलाचरण की व्याख्या 112-115
  16. अनुबन्धचतुष्टय 121
  17. अधिकारी स्वरूप 126
  18. करणीय अकरणीय कार्य (काम्य, निषिद्ध, नित्य, नैमित्तिक) 132
  19. साधनचतुष्टय विस्तृत व्याख्या 136
  20. शमादि षट्कसम्पत्ति 141
  21. अनुबन्धचतुष्टय 146

परिशिष्ट २९५
26. अधिकारी एवं गुरु का परस्पर व्यवहार 149
27. अध्यारोप 151
28. अज्ञान का स्वरूप 154
29. समष्टि-व्यष्टि व्याख्या 156
30. अज्ञान की समष्टि 159
31. अज्ञान की व्यष्टि 164
32-33. सुषुप्ति अवस्था में आनन्दानुभूति 168
34. समष्टि-व्यष्टि का अभेद 170
35. शुद्धचैतन्य-तुरीय अवस्था 172
36. अज्ञान की शक्तिद्वय (आवरण-विक्षेप) 175
37. आवरण-विक्षेपशक्ति का उदाहरण 175
38. अज्ञान से उपहितचैतन्य का उपादान एवं निमित्तकारण होना 181
39. स्थूलभूतों की उत्पत्ति 184
40. सूक्ष्मशरीर, कोशत्रय-कर्ता, करण, क्रियारूप 195
41. पञ्चीकरण की प्रक्रिया 201
42. त्रिवृत्तकरण 203
43-44. स्थूलशरीर की समष्टि-व्यष्टि 209 212
45. महाप्रपञ्च वाच्यार्थ लक्ष्यार्थ 215
46. आत्माविषयक तर्क एवं अनुभव 220
47. प्रत्यगात्मा विषयक तर्क एवं अनुभव 224
48. सृष्टिविलय की प्रक्रिया 228
49. तत्त्वमसि वाक्य, अभिन्नता की प्रतीति 232
50. तत्त्वमसि में सम्बन्धत्रय 235
51. तत्त्वमसि में नीलमुत्पलम् के समान
विशेषणविशेष्यसम्बन्धाभाव 239
52. तत्त्वमसि में जहल्लक्षणा का अनौचित्य 243
53. तत्त्वमसि में अजहल्लक्षणा की भिन्नता 247
54. तत्त्वमसि में भागलक्षणा 249

२९६ वेदान्तसार
55. अहं ब्रह्मास्मि महावाक्य 254
56. सामान्यव्यक्ति एवं ब्रह्मज्ञानी की प्रत्यक्षप्रक्रिया 259
57. ब्रह्मसाक्षात्पर्यन्त अपेक्षित अनुष्ठान 265
58. सविकल्पक-निर्विकल्पक समाधि 269
59. निर्विकल्पकसमाधि के अंग 271
60. विघ्नचतुष्टय 275
61. निर्विकल्पक समाधि में साधक की चित्तवृत्ति 278
62. जीवन्मुक्त का लक्षण 281
63. जीवन्मुक्त की दृष्टि 285
64. जीवन्मुक्त में अभाव 288
65. पूर्व में ज्ञान के साधन अमानित्व अद्वेष्टृत्व का आभूषण होना। 290

पञ्चीकरण प्रक्रिया २९७
परिशिष्ट-१
सहायक ग्रन्थ-सूची

  1. वेदान्तसार, नृसिंह सरस्वती टीका, निर्णयसागर प्रेस बम्बई
  2. वेदान्तसार, स्वामी रामतीर्थ टीका, निर्णयसागर प्रेस बम्बई
  3. वेदान्तसार, रामशरण त्रिपाठी, भावबोधिनी, चौखम्बा, वाराणसी
  4. वेदान्तसार, डा. नरेन्द्रदेव सिंह, साहित्य भण्डार, मेरठ
  5. वेदान्तसार, श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी, साहित्य भण्डार, मेरठ
  6. वेदान्तपरिभाषा, धर्मराज अध्वरीन्द्र, शिवदत्तकृत दीपिकाटीका,
    चौखम्बा, संस्कृत प्रकाशन, बनारस
  7. वेदान्तसार, एम० हिरियन्ना, पूना
  8. वेदान्तसार, सुरेन्द्रनाथ शास्त्री, भारती प्रकाशन, इन्दौर
  9. वेदान्तसार, महेशचन्द्र भारतीय-विमल प्रकाशन, गाजियाबाद
  10. वेदान्तसार, डा. राममूर्ति शर्मा, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली
  11. वेदान्तसार, बद्रीनाथ शुक्ल, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली
  12. शाङ्करवेदान्त तत्त्वमीमांसा, कालीप्रसाद सिंह-विश्वविद्यालय प्रकाशन,
    वाराणसी
  13. सर्वदर्शन संग्रह, माधवाचार्य, व्याख्या- उमाशङ्करऋषि; चौखम्बा
    प्रकाशन, वाराणसी
  14. वेदान्तदर्शन, पाल डायसन, उ० प्र० हिन्दी ग्रन्थ अकादमी
  15. भारतीयदर्शन का इतिहास, एस० एन० दासगुप्त, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ
    अकादमी, जयपुर
  16. भारतीयदर्शन, नन्दकिशोर, उ० प्र० हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  17. वेदान्त ज्ञानमीमांसा, मलकानी, म० प्र० हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल
  18. भारतीयदर्शन, उमेश मिश्र, हिन्दी समिति सूचना विभाग, उ० प्र०
  19. भारतीयदर्शन, डा. राधाकृष्णन, राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली
  20. वेदान्तदर्शन का इतिहास, उदयवीर शास्त्री, गाजियाबाद

२९८ वेदान्तसार
21. भारतीय दर्शनशास्त्र का इतिहास,-डा० नरेन्द्रदेव सिंह, साहित्य
भण्डार, मेरठ
22. वेदान्त का विकास एवं स्वरूप, -शेखावत, म०प्र० हिन्दी ग्रन्थ
अकादमी, भोपाल
23. वेदान्तविमर्श, डा. अभिमन्यु, परिमल प्रकाशन, दिल्ली
24. भारतीयदर्शन की रूपरेखा, हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा, मोतीलाल बनारसी
दास, दिल्ली
25. भारतीयदर्शन की रूपरेखा, एम० हिरियन्ना, राजकमल प्रकाशन,
दिल्ली
26. ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य, गोविन्दानन्द, निर्णयसागर प्रेस, बम्बई
27. पञ्चदशी, विद्यारण्यस्वामी, निर्णयसागर प्रेस, बम्बई
28. मनुस्मृति-हरगोविन्दशास्त्री, चौखम्बा संस्कृत प्रकाशन, वाराणसी
29. भारतीयदर्शन, बलदेव उपाध्याय, शारदा मन्दिर, वाराणसी
30. भारतीयदर्शन, वाचस्पति गैरोला, लोकभारती, इलाहाबाद
31. वेदान्तसार-कर्नल जेकब, चौखम्बा भवन, वाराणसी
32. वेदान्तसार चिन्तामणि-सीतारामशास्त्री, वेंकटेश्वर वि० वि०, तिरुपति

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वेदान्तसार वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ है। इसके 38 खण्डों में
ग्रन्थकार ने वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों का सरलरूप में प्रतिपादन मशरअमे का
प्रयास किया है। इससे पूर्व ब्रह्मसूत्रादि में प्रतिपादित वेदान्त के सिद्धान्तों को
समझना सामान्य व्यक्ति के लिए दुष्करकार्य हो गया था। इसीकारण आचार्य
सदानन्द ने वेदान्तसार की रचना की आवश्यकता अनुभव की जो अत्यन्त
लोकप्रिय हुई।
यहाँ 108 पृष्ठों की विस्तृत भूमिका में जहाँ वेदान्त-विषयक अनेक
जिज्ञासाओं का समाधान किया गया है। वहीं मूलग्रन्थ के रूप को सुरक्षित रखते
हुए विषय को स्पष्ट किया गया है। सरलता की दृष्टि से मुख्य खण्डों को
उपखण्डों में विभाजित किया गया है। प्रखण्डों के विभाजन में विषय-विशेष के
सर्वांगीण विवेचन की दृष्टि ही प्रमुख रही है।
पूर्व प्रतिपादित विषय को अग्रिम विषय के साथ जोड़ने के लिए
अवतरणिका, पुन: पदच्छेद एवं हिन्दी अनुवाद के बाद 'चन्द्रिका' हिन्दी
व्याख्या में विषय का सर्वांगीण एवं विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है। साथ
ही विशेष शीर्षक में तत्सम्बन्धित अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का उल्लेख
किया है। तत्पश्चात् उस खण्ड के अभिप्राय को डायग्राम बनाकर अध्येता
जिज्ञासु के लिए विषय को सहज हृदयंगम कराना ही मुख्य उद्देश्य है।
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