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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

भूमिका ७
शब्द का प्रयोग भी किया जाता है। यहाँ प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन,
दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास,
छल, जाति और निग्रहस्थान इन सोलह पदार्थों को मान्यता प्रदान की गई है।
यह दर्शन आत्मा को गुणों का आश्रय मानता है। इसके अनुसार आत्मा के
जीवात्मा और परमात्मा दो भेद होते हैं तथा आत्मा, शरीर, इन्द्रियाँ, अर्थ,
बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रत्यभाव, फल, दुःख तथा अपवर्ग ये सभी प्रमेय
विषय हैं।
यह दर्शन जगत् की सत्ता में परमाणु को समवायी तथा ईश्वर को
निमित्तकारण मानता है तथा आगमप्रमाण के माध्यम से ईश्वर की सत्ता को
सिद्ध करता है। अन्य दर्शनों के समान ही यह जीवन का अन्तिम लक्ष्य
दुःखों की हमेशा के लिए निवृत्ति मानता है। उसी को यहाँ मोक्ष माना गया
है।
आचार्य गौतम के अतिरिक्त गंगेश उपाध्याय, वात्स्यायन, उद्योतकर,
वाचस्पतिमिश्र, जयन्तभट्ट, उदयनाचार्य, रघुनाथ शिरोमणि, मथुरानाथ,
जगदीश, गदाधर भट्ट आदि उल्लेखनीय आचार्यों ने इस दर्शन के साहित्य में
श्रीवृद्धि की है। इनमें भी आचार्य केशवमिश्र की तर्कभाषा को यहाँ विशेष
प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
(६) वैशेषिकदर्शन-'विशेष' नामक एक विलक्षण पदार्थ को मानने
के कारण इसे वैशेषिक कहा गया। सर्वदर्शनसंग्रह में इसे 'औलूक्यं दर्शन'
भी कहा गया है। तदनुसार इसके प्रणेता 'उलूक' नामक आचार्य थे। महर्षि
कणाद को भी इसका प्रणेता माना जाता है। जैन लेखक राजशेखर ने
न्यायकन्दली टीका में जनश्रुति के आधार पर इस सम्बन्ध में अपनी सम्मति
इसप्रकार दी है-
“कणाद मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर परमपिता परमात्मा ने स्वयं
उलूक के रूप में अवतरित होकर उन्हें इस दर्शन के सिद्धान्तों का उपदेश
दिया था। इसीलिए इसे औलूक्य दर्शन कहा जाता है।”
इसके अनुसार-पृथिवी, तेज, जल, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा
और मन ये नौ द्रव्य हैं। इनमें पृथिवी, तेज, वायु और आकाश भौतिक हैं।
आत्मा के अस्तित्व, स्वरूप, सृष्टि तथा मोक्ष के सम्बन्ध में यह दर्शन न्याय
के साथ मतैक्य रखता है। इस दर्शन के सिद्धान्तों का निरूपण प्रशस्तपाद
नामक ग्रन्थ में भलीप्रकार किया गया है। तत्पश्चात् उदयनाचार्य, श्रीधराचार्य,

भूमिका: (ग) वेदान्तदर्शन के मूल स्रोत व उपनिषदें

८ वेदान्तसार
व्योमशिवाचार्य आदि प्रमुख विद्वानों ने महत्त्वपूर्ण टीकाओं का भी प्रणयन
किया।
(घ) वेदान्तदर्शन के मूलस्रोत-वेदान्तदर्शन को भी अत्यन्त प्राचीन
कहा जा सकता है, क्योंकि विश्व के सर्वाधिक प्राचीनग्रन्थ ऋग्वेद में इसके
मूलस्रोत के दर्शन होते हैं। यद्यपि वहाँ यह व्यवस्थितरूप में प्रस्तुत नहीं
हुआ है तथापि वहाँ इसके बीज अवश्य देखे जा सकते हैं। विश्व की
संरचना एवं संचालन के लिए ब्रह्म, ईश्वर और जीव इन तीन तत्त्वों को
वहां स्पष्टरूप से स्वीकार किया गया है। पुरुषसूक्त के आरम्भ में वर्णित
आदिपुरुष, वेदान्त के ब्रह्म के सामर्थ्य से मेल खाता है-
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ (10/90/1)
इसीप्रकार आदिपुरुष से उत्पन्न विराट्पुरुष जो वेदान्त का ईश्वर है तथा
उसका आश्रय लेकर उत्पन्न हुआ, पुरुष ही जीवात्मा अर्थात् वेदान्त का
जीव है-
तस्माद् विराळजायत विराजो अधि पूरुषः।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः॥ (10/90/5)
इसीप्रकार-
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं विश्वं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (1/164/20)
यहाँ वर्णित विश्व, वेदान्त की माया तथा 'पिप्पल' उसके भोगने योग्य
पदार्थ हैं। भोगने वाला पक्षी वेदान्त का 'जीव' तथा न भोगने वाला दूसरा
पक्षी ईश्वर है। अतः ऋग्वेद में वेदान्त के तत्त्वों को सहज ही स्वीकार
किया जा सकता है।
हाँ इतना अवश्य है कि वेदान्तदर्शन के प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार के समान
व्यवस्थित वेदान्तसिद्धान्तों के हमें यहाँ दर्शन नहीं होते हैं, किन्तु वेदान्तदर्शन
का चिन्तन वैदिकसंहिताओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों से आरम्भ हो चुका था, इतना
अवश्य स्वीकार किया जा सकता है। इस तथ्य की पुष्टि हेतु कुछ अन्य
उदाहरण भी द्रष्टव्य हैं। ऋग्वेद के नासदीयसूक्त में वेदान्त की माया के
रजस् एवं तमोगुण का उल्लेख हुआ है-
नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् (ऋ. 10/129/1)
तम आसीत्तमसा गूहळमग्रे (वही-10/129/3)

भूमिका ९
इसी सूक्त के अग्रिम मन्त्र में प्रयुक्त ‘सत्’ को विद्वानों ने ‘सत्त्व’ गुण
के अर्थ में प्रयुक्त माना है–
सतो बन्धुमसति निरविन्दन् (ऋ. 10/129/4)
इसके अतिरिक्त ‘पुरुष एवेदं सर्वम्’ (ऋ. 10/90/2) तथा ‘यो
अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्’ इत्यादि मन्त्रों में सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी,
सत्यस्वरूप, प्रकाशमय, आनन्दस्वरूप ईश्वर अथवा ‘ब्रह्म’ के दर्शन भी
किए जा सकते हैं। इसप्रकार सूक्ष्मरूप से अन्वेषण करने पर ऋग्वेद के
मन्त्रों में अनेकस्थलों पर वेदान्त के सिद्धान्तों एवं तत्त्वों को मूलरूप में
सहज ही देखा जा सकता है। इसी आधार पर यह भी कहा जा सकता है
कि वेदान्त के सिद्धान्तों का पल्लवन संहिता एवं उपनिषद्काल के बीच
ब्राह्मणग्रन्थों के समय में हुआ होगा, तभी उपनिषदों तक आते-आते हमें
इस दर्शन का परिष्कृत एवं व्यवस्थितरूप देखने को मिलता है। जिसका हम
आगे संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं–
(ङ) उपनिषदों में वेदान्तदर्शन–उपनिषद् अध्यात्मविद्या अथवा
ब्रह्मविद्या को कहते हैं। वेद का अन्तिम भाग होने से इसे वेदान्त भी कहा
जाता है। ‘वेदान्तो नाम उपनिषत्प्रमाणम्’ परिभाषा के अनुसार उपनिषदों को
प्रमाणरूप में मानकर चलने वाला शास्त्र वेदान्तदर्शन माना गया है। इस दृष्टि
से उपनिषदों का स्वतः ही महत्त्व सिद्ध हो जाता है। उपनिषद् शब्द से
ज्ञानकाण्ड के विशाल दार्शनिकसाहित्य का बोध होता है। जिसकी सृष्टि
वैदिक कर्मकाण्ड की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुई।
उपनिषद् शब्द ‘उप’ एवं ‘नि’ उपसर्गपूर्वक सद् धातु से क्विप् प्रत्यय
करके निष्पन्न हुआ है। अतः अर्थ की दृष्टि से भी यह शब्द वेदान्तदर्शन
के लक्ष्य को ही इंगित करता है, क्योंकि इनके अनुशीलन से मुमुक्षुओं की
संसारबीजरूपी अविद्या नष्ट हो जाती है तथा मनुष्य के गर्भवास, जन्म,
जरा, मृत्यु आदि विषयक दुःख सर्वथा शिथिल हो जाते हैं और उसे ब्रह्म
की प्राप्ति होती है। इस दृष्टि से उपनिषद् एवं वेदान्तदर्शन को अभिन्न माना
जा सकता है। इसीकारण वेदान्तदर्शन का प्रतिपादन करते हुए विद्वान्
आचार्यों ने पदे-पदे उपनिषद्वाक्यों को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है।
अब प्रश्न उठता है कि प्राप्त उपनिषदों की संख्या तो 220 के लगभग
है तो क्या सभी में वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों का उल्लेख हुआ है? इस
सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि उपलब्ध उपनिषदों में से

१० वेदान्तसार
लगभग 20 उपनिषद् सर्वाधिक प्राचीन माने गए हैं। शेष बहुत बाद की
रचनाएँ हैं। ब्राह्मणग्रन्थों के अन्त में जुड़े हुए उपनिषद् सर्वाधिक प्राचीन कहे
जा सकते हैं। जिनकी संख्या लगभग छः है-
(1) ऐतरेय उपनिषद् (ऐतरेय ब्राह्मण, ऋग्वेद सम्बन्धी)
(2) कौषीतकि उपनिषद् (कौषीतकि ब्राह्मण, ऋग्वेद सम्बन्धी)
(3) तैत्तिरीय उपनिषद् (कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय आरण्यक विषयक)
(4) बृहदारण्यकोपनिषद् (शुक्ल यजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण विषयक)
(5) छान्दोग्योपनिषद् (सामवेद की ताण्ड्यशाखा से सम्बन्धित छान्दोग्य
ब्राह्मण में)
(6) केनोपनिषद् (सामवेद की तलवकार शाखा से जुड़े जैमिनीय
ब्राह्मण में)
यद्यपि ये सभी छः उपनिषद् भारतीयदर्शन के विकास की प्रारम्भिक
अवस्था को प्रदर्शित करते हैं तथापि इन सभी में वेदान्तदर्शन अपने शुद्ध
एवं मूलरूप में सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे उपनिषद् भी हैं जो
वेदान्तदर्शन का विवेचन तो करते हैं, किन्तु उतने परिशुद्ध रूप में नहीं, वहाँ
उनमें सांख्य एवं योगदर्शन के तत्त्वों के भी दर्शन होते हैं। इनकी संख्या
लगभग आठ है-
(1) कठोपनिषद् (काठक संहिता, कृष्णयजुर्वेद विषयक)
(2) श्वेताश्वतरोपनिषद् (तैत्तिरीय संहिता, कृष्णयजुर्वेद विषयक)
(3) महानारायणोपनिषद् (तैत्तिरीय संहिता, कृष्णयजुर्वेद विषयक)
(4) ईशोपनिषद् (वाजसनेयी संहिता, शुक्लयजुर्वेद विषयक)
(5) मुण्डकोपनिषद् (अथर्ववेद सम्बन्धी)
(6) प्रश्नोपनिषद् (अथर्ववेद सम्बन्धी)
(7) मैत्रायणी उपनिषद् (कृष्ण-यजुर्वेद विषयक) अपेक्षाकृत अर्वाचीन।
(8) माण्डूक्योपनिषद् (अथर्ववेद सम्बन्धी) अपेक्षाकृत अर्वाचीन।
इसप्रकार उपर्युक्त 14 उपनिषद् वेदान्तदर्शन की आधारशिला माने गए
हैं। इसीलिए वेदान्तदर्शन के भाष्यकारों एवं टीकाकारों ने इन्हीं के वाक्यों
को पदे-पदे उद्धृत किया है। उपनिषदों का यही साहित्य 'वेदान्त' भी कहा
जाता है, जो सूक्ष्मदृष्टि से उपयुक्त भी प्रतीत होता है क्योंकि वेदान्तदर्शन

भूमिका: (घ) वेदान्तदर्शन के प्रमुख ५७ आचार्य एवं उनके ग्रन्थ

भूमिका ११
का सम्पूर्ण कलेवर ही उपनिषद् है। विद्वानों ने वेदान्त को उपनिषद् के पुत्र
की संज्ञा दी है। वस्तुतः वेदान्तदर्शन के जो सिद्धान्त उपनिषदों में इतस्ततः
असम्बद्ध अवस्था में बिखरे पड़े हैं। तर्क की कसौटी पर कसे नहीं गए हैं।
उन्हीं सिद्धान्तों को वेदान्तदर्शन में सुसम्बद्धरूपं में रखा गया है तथा उन्हें
तर्क की कसौटी पर कसा गया है। इसीप्रकार का मन्तव्य आचार्य शङ्कर ने
भी अभिव्यक्त किया है-
वेदान्तवाक्यकुसुमग्रथनार्थत्वात् सूत्राणाम्।
वेदान्तवाक्यानि हि सूत्रैरुदाहृत्य विचार्यन्ते॥
(ब्रह्मसूत्र-शांकरभाष्य)
अतः वेदान्तदर्शन के गहन अध्ययन हेतु उपर्युक्त उपनिषदों का
अवलोकन अत्यावश्यक है।
(च) वेदान्तदर्शन के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रन्थ-जैसाकि हमने
अभी उल्लेख किया कि उपनिषदों में वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों का
असम्बद्धरूप में प्रयोग हुआ है। उन्हें सर्वप्रथम व्यवस्थितरूप देने का श्रेय
आचार्य बादरायण को जाता है। जिन्होंने ब्रह्मसूत्र नामक ग्रन्थ की संरचना
की। इस दृष्टि से विद्वानों ने इन्हें वेदान्तदर्शन का संस्थापक अथवा प्रणेता
आचार्य भी कहा है। ब्रह्मसूत्र पर अनेक विद्वानों ने वैदुष्यपूर्णभाष्य करके इस
दर्शन के साहित्य की श्रीवृद्धि की। अनेक ग्रन्थ स्वतन्त्ररूप से भी लिखे
गए। वस्तुतः वेदान्तदर्शन पर इतने विपुल साहित्य की रचना की गई यदि
उसका विस्तार से उल्लेख किया जाए तो अपने आप में विशालग्रन्थ का ही
निर्माण हो जाए, किन्तु हम यहाँ इनका अत्यन्त संक्षेप में उल्लेख कर रहे
हैं।
वेदान्तदर्शन के आचार्यों का व्यवस्थितरूप से अध्ययन हम इन्हें तीन
श्रेणियों में विभाजित करके कर सकते हैं। प्रथम वे आचार्य जिनका महर्षि
बादरायण के ब्रह्मसूत्र में नामोल्लेख हुआ है। द्वितीय, आचार्य शङ्कर के
पूर्ववर्ती आचार्य। तृतीय, आचार्य शङ्कर के परवर्ती आचार्य। अब हम इनका
क्रमशः उल्लेख करते हैं।
(१) आचार्य बादरायण-इस दर्शन के प्रणेता आचार्य माने गए हैं।
विद्वानों ने इनका समय 400 ई.पू. के लगभग निर्धारित किया है। महर्षि
बदर का वंशज होने के कारण इन्हें इस नाम से जाना जाता है। (प्राचीन
चरित्र कोश-पृ० 505)। भारतीयपरम्परा इन्हें तथा महर्षि पराशर के पुत्र

१२ वेदान्तसार
कृष्णद्वैपायन वेदव्यास को एक ही स्वीकार करती है। इन्होंने वेदान्तदर्शन के
प्रसिद्धग्रन्थ ब्रह्मसूत्र की संरचना की। इसके चार अध्याय, सोलह पाद, एक
सौ बानवे अधिकरणों में पांच सौ बचपन सूत्र हैं। इसीको उत्तरमीमांसा,
बादरायणसूत्र, ब्रह्ममीमांसा, वेदान्तसूत्र, व्याससूत्र, तथा शारीरकसूत्र के नाम
से भी जाना जाता है।
इस ग्रन्थ में बृहदारण्यक, छान्दोग्य, कौषीतकि, ऐतरेय, मुण्डक, प्रश्न,
श्वेताश्वतर एवं जाबाल आदि उपनिषद्ग्रन्थों में प्राप्त वाक्यों पर विचार
किया गया है। इसके प्रथम अध्याय में स्पष्ट, अस्पष्ट एवं संदिग्ध श्रुतियों
का ब्रह्म में समन्वय किया गया है। द्वितीय अध्याय में अन्य दार्शनिक मतों
का दोषप्रदर्शन करके युक्तिपूर्वक वेदान्तमत की स्थापना की गई है। तृतीय
अध्याय में जीव और ब्रह्म का लक्षण करते हुए उसे मुक्ति का बहिरङ्ग एवं
अन्तरङ्ग साधन बताया गया है। चतुर्थ अध्याय में जीवन्मुक्ति, जीव की
उत्क्रान्ति तथा सगुण-निर्गुण उपासना का दिग्दर्शन कराया गया है।
इन सूत्रों का प्रमुख उद्देश्य उपनिषदों के तत्त्वज्ञान का समन्वय करना है।
इसमें सामान्यरूप से पहले पूर्वपक्ष की स्थापना पुनः सिद्धान्तपक्ष का
प्रस्तुतीकरण, इस रचनापद्धति को अपनाया गया है, किन्तु कुछ स्थलों पर
पहले सिद्धान्तपक्ष देकर बाद में पूर्वपक्ष को भी प्रस्तुत किया गया है। इसे
'प्रतिलोम पद्धति कहते' हैं।
ब्रह्मसूत्र के अनेकभाष्य प्रचलित हैं। जिनमें शङ्कराचार्य का शारीरक-
भाष्य, रामानुजाचार्य का श्रीभाष्य, मध्वाचार्य का पूर्णप्रज्ञभाष्य प्रसिद्ध हैं।
इसके अतिरिक्त भास्कराचार्य ने भास्करभाष्य, निम्बार्काचार्य ने
वेदान्तपारिजात, श्रीकण्ठ ने शैवभाष्य, श्रीपति ने श्रीकरभाष्य, बल्लभाचार्य ने
अणुभाष्य, विज्ञानभिक्षु ने विज्ञानामृत तथा आचार्य बलदेव ने गोविन्दभाष्य
की भी संरचना की।¹
इस ग्रन्थ में अनेकस्थलों पर महर्षि बादरायण का अन्यपुरुष के रूप में
उल्लेख किया गया है। इस आधार पर कुछ विद्वानों ने इन सूत्रों का
रचयिता उन्हें मानने में आपत्ति प्रदर्शित की है, किन्तु डॉ० राधाकृष्णन् आदि
प्रसिद्ध दार्शनिक विद्वानों ने इस आधार पर इस मन्तव्य का खण्डन किया है
कि ग्रन्थकार द्वारा स्वयं का उल्लेख अन्यपुरुष में करने की प्राचीन
भारतीयपरम्परा रही है। अतः यह विचार मान्य नहीं है।

  1. भूमिका- ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य, प्रकाशक : गोविन्दमठ, वाराणसी

भूमिका १३


( i ) बादरायण विरचित ब्रह्मसूत्र में उल्लिखित आचार्य—महर्षि
बादरायण ने ब्रह्मसूत्र में पूर्वकालिक अनेक आचार्यों के मतों की विवेचना
उनके नामोल्लेखपूर्वक की है, किन्तु उन आचार्यों के ग्रन्थ आज उपलब्ध
नहीं हैं। इनमें आत्रेय के नाम का उल्लेख एक बार (3/4/44) आश्मरथ्य
का दो बार (1/2/19, 1/4/20), औडुलोमि का तीन बार (1/4/2, 3/4/45,
4/4/6), कार्ष्णाजिनि का एक बार (3/1/9), काशकृत्स्न का एक बार
(1/4/22), जैमिनि का ग्यारह बार तथा बादरि पराशर का चार बार
(1/2/30, 3/1/11, 4/3/7, 4/4/10) किया है। अब हम इनका संक्षेप में
विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
(2) आचार्य आत्रेय—ब्रह्मसूत्रकार ने एक स्थल पर इनके नाम का
उल्लेख करते हुए “यजमान को ही यज्ञ की अङ्गभूत उपासना का फल
प्राप्त होता है, ऋत्विक् को नहीं। इसलिए सम्पूर्ण उपासनाएँ स्वयं यजमान
को ही करनी चाहिए, पुरोहित के माध्यम से इन्हें सम्पादित नहीं कराना
चाहिए” इत्यादि मत का खण्डन आचार्य औडुलोमि के मत को प्रमाणरूप
में उद्धृत करके किया है।
आचार्य जैमिनि ने भी अपने मीमांसादर्शन में (5/2/18) आचार्य
कार्ष्णाजिनि के मत का खण्डन करने के लिए आचार्य आत्रेय के मत का
सिद्धान्तरूप में उल्लेख किया है। साथ ही उन्होंने बादरि के वैदिककर्म में
सर्वाधिकार के मत का खण्डन करने के लिए भी आत्रेय के मत को
प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। (6/1/26) इस दृष्टि से ये मूलतः पूर्वमीमांसा
के आचार्य प्रतीत होते हैं तथा साथ ही महर्षि बादरायण से पूर्व में इनकी
स्थिति सिद्ध होती है।
बृहदारण्यकोपनिषद् 2/6/3 में इनका मांटी के शिष्यरूप में, ऐतरेय
ब्राह्मण (8/22) में अंगराज के पुरोहितरूप में इस नाम का उल्लेख हुआ
है। किन्तु ये तीनों एक ही व्यक्ति हैं अथवा अलग-अलग, इस सम्बन्ध में
निश्चितरूप से नहीं कहा जा सकता है।
( ३ ) आचार्य आश्मरथ्य—आचार्य जैमिनि ने मीमांसादर्शन में इनके मत
का उल्लेख करके उसका खण्डन किया है। अतः इन्हें निःसंदेह वेदान्त का
आचार्य स्वीकार किया जा सकता है। आश्मरथ का वंशज होने के कारण
इनका यह नाम पड़ा (प्राचीन चरित्रकोश-पृ० 63)। सूत्रग्रन्थों में भी इनके
नाम का उल्लेख मिलता है (आश्वलायन श्रौतसूत्र-6/10)। ब्रह्म के लिए

१४ वेदान्तसार
वैश्वानर शब्द के प्रयोग प्रसङ्ग में ब्रह्मसूत्र में इनके नाम का दो बार उल्लेख
हुआ है (1/2/21, 1/4/20)। अनेक विद्वान् इन्हें द्वैताद्वैत मत का सर्वाधिक
प्राचीन आचार्य मानते हैं। ये परमात्मा और विज्ञानात्मा में भेदाभेद के
समर्थक रहे।
आचार्य शङ्कर एवं भामतीकार वाचस्पतिमिश्र ने इन्हें विशिष्टाद्वैतवादी
सिद्ध किया है। इनके अनुसार परमेश्वर अनन्त होने पर भी उपासक के
ऊपर अनुग्रह करने हेतु प्रदेशमात्र स्थान में प्रकट होते हैं। आगे चलकर
इनके भेदाभेदवाद का यादवप्रकाश आदि द्वारा पल्लवन किया गया।
(४) आचार्य औडुलोमि-ये परमतत्त्वज्ञानी थे। केवल ब्रह्मसूत्र में ही
इनके नाम का उल्लेख हुआ है- (1/4/21, 3/4/45, 4/4/6)।
मीमांसासूत्रकार ने इनके नाम का कथन नहीं किया है। ये भी वेदान्त के
आचार्य तथा भेदाभेदवाद के समर्थक विद्वान् थे। इनके अनुसार-सांसारिक
स्थिति में जीव और ब्रह्म में भेद होता है, किन्तु मुक्ति की स्थिति में इन
दोनों में अभेद होता है।
मीमांसक आचार्य आत्रेय के मत का खण्डन करने के लिए महर्षि
बादरायण ने इनके मत का नामोल्लेखपूर्वक कथन किया है। ब्रह्मसूत्र में एक
स्थल पर (4/4/51) ग्रन्थकार ने आचार्य जैमिनि के इस मत को प्रदर्शित
करके कि-'मुक्त व्यक्ति ब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त होता है, वह निष्पाप,
सर्वज्ञ तथा ऐश्वर्य आदि का अधिकारी हो जाता है' औडुलोमि के इस मत
द्वारा खण्डन किया है कि 'चैतन्य ही आत्मा का स्वरूप है। इसलिए वह
मुक्ति की अवस्था में चैतन्यमात्र को ही प्राप्त होता है। सत्य संकल्पत्व,
सर्वज्ञत्व तथा सर्वेश्वरत्व आदि धर्मों की स्थिति उसमें नहीं रहती है।
(५) आचार्य कार्ष्णाजिनि-ये आचार्य बादरायण एवं महर्षि जैमिनि से
पूर्ववर्ती आचार्य प्रतीत होते हैं, क्योंकि ब्रह्मसूत्र में एक स्थल पर (3/1/9)
तथा जैमिनिसूत्र में दो स्थलों पर (4/3/17, 6/7/35) इनके नाम का
उल्लेख हुआ है। ब्रह्मसूत्रकार ने इनके मत का उल्लेख अपने मत के
समर्थन में-पृथ्वी पर जीव के पुनरागमन के प्रसङ्ग में किया है। तदनुसार
जीव अपने अवशिष्ट कर्मों (अनुशयभूत कर्म) के साथ ही पृथ्वी पर आता
है। ये अवशिष्टकर्म ही उसकी अन्य योनि में कारण होते हैं। जबकि
मीमांसासूत्रकार ने इनके मत का खण्डन करते हुए इनके नाम का उल्लेख
किया है।

भूमिका १५
अतः इन्हें निःसन्देह वेदान्त का आचार्य स्वीकार किया जा सकता है।
इन्होंने कार्ष्णाजिनि नामक स्मृतिग्रन्थ की भी रचना की। इसलिए इनका
उल्लेख धर्मशास्त्र के इतिहास में भी किया गया है। डॉ० पी०वी० काणे ने
मुख्य स्मृतिकार एवं उपस्मृतिकारों के अतिरिक्त 21 अन्य स्मृतिकारों में
इनके नाम की गणना करते हुए वीरमित्रोदय का उद्धरण प्रस्तुत किया है-
वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः।
विष्णुः कार्ष्णाजिनिः सत्यव्रतो गार्ग्यश्च देवलः॥
(परिभाषा प्र०, पृ० 18)
पैठीनसि, हेमाद्रि, माधवाचार्य आदि ग्रन्थकारों ने भी कार्ष्णाजिनि स्मृति
का उल्लेख किया है (प्राचीन चरित्रकोश-पृ० 137)। इसके अतिरिक्त
मिताक्षरा, अपरार्क, स्मृतिचन्द्रिका तथा श्राद्धविषयक अन्य ग्रन्थों में भी इनके
नाम का कथन किया गया है। राशियों के चिह्नों के विषय में इनके द्वारा
विरचित एक श्लोक अपरार्क में भी दिया गया है। (प्राचीन चरित्रकोष, पृ.
137)। ये महर्षि बादरि के मत के समर्थक रहे।
(६) आचार्य काशकृत्स्न- आचार्य जैमिनि ने अपने पूर्वमीमांसादर्शन
में इनके नाम का उल्लेख नहीं किया है, किन्तु आचार्य बादरायण ने इनके
मत का समर्थन करते हुए ब्रह्मसूत्र में एक स्थल पर (1/4/22) इनके नाम
का कथन किया है। अतः ये भी बादरायण से पूर्ववर्ती आचार्य सिद्ध होते
हैं। ये अद्वैतवादी थे। इनके अनुसार-परमब्रह्म ही जगत् का मुख्य कारण है
तथा प्रलयावस्था में यह उसी में समाविष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त
जीव ब्रह्म का विकार नहीं है, अपितु सृष्टि के समय अविकृत् ब्रह्म ही जीव
रूप में विद्यमान रहता है।
आचार्य शङ्कर ने इनके मत को श्रुतिसम्मत माना है-“काशकृत्स्नस्या-
चार्यस्य अविकृतः परमेश्वरो जीवो नान्य इति मतम् तत् काशकृत्स्नीयं मतं
श्रुत्यनुसारीति गम्यते, अतिपादयिषितार्थानुसारात् 'तत्त्वमसि' इत्यादि श्रुतिभ्यः'
(ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य-1/4/22)
(७) आचार्य जैमिनि-ये कृष्णद्वैपायन व्यास के सामवेद के शिष्य थे।
इन्होंने पूर्वमीमांसादर्शन के प्रसिद्धग्रन्थ जैमिनिसूत्र की संरचना की। ये
आचार्य बादरायण के समकालीन प्रतीत होते हैं, क्योंकि मीमांसादर्शन के
सिद्धान्तों का ब्रह्मसूत्र में तथा ब्रह्मसूत्र के सिद्धान्तों का मीमांसादर्शन में
खण्डन देखने को मिलता है। अनेकस्थलों पर मीमांसादर्शन ने ब्रह्मसूत्र के

१६ वेदान्तसार
सिद्धान्तों को ग्रहण भी किया है। इनके पुत्र का नाम सुमन्तु तथा पौत्र का
नाम सत्वान था।
इन्होंने सामवेद की राणायनीय नामक शाखा के जैमिनीय नामक नवम
भेद की संरचना की। इस संहिता को कर्नाटक में विशेष सम्मान प्राप्त है।
(प्राचीन चरित्रकोष, पृ. 236)। इसीप्रकार जैमिनीय ब्राह्मण तथा
जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण नामक सामवेदीय ब्राह्मणग्रन्थों का भी इन्होंने प्रणयन
किया। ये दोनों ही ग्रन्थ आज भी विद्यमान हैं।
इसके अलावा इन्होंने जैमिनिसूत्र, जैमिनिनिघण्टु, जैमिनिपुराण, ज्येष्ठ-
माहात्म्य, जैमिनिभागवत, जैमिनिभारत, जैमिनिगृह्यसूत्र, जैमिनिसूत्रकारिका,
जैमिनिस्तोत्र तथा जैमिनिस्मृति इत्यादि ग्रन्थों की भी संरचना की। ये
सामवेदी श्रुतर्षि थे। साथ ही ब्रह्माण्ड पुराण के प्रवर्तक ऋषियों की परम्परा
में भी इनके नाम का उल्लेख मिलता है।
आचार्य जैमिनि द्वारा विरचित 'जैमिनिसूत्र', 'पूर्वमीमांसा' अथवा
'कर्ममीमांसा' नाम से भी प्रसिद्ध है। यज्ञसम्बन्धी वाक्यों का अर्थविषयक
मतभेद दूर करके अभिप्राय प्रदर्शित करना ही इस ग्रन्थ का मुख्य प्रयोजन
है। इन्हीं सूत्रों से 'वाक्यार्थविचारशास्त्र' की उत्पत्ति मानी गयी है। इस ग्रन्थ
के ग्यारह अध्यायों में कुल 2500 सूत्र हैं। सूत्रग्रन्थों में इन्हें सर्वाधिक
प्राचीन माना गया है।
'जैमिनिसूत्रों' के ऊपर उपवर्ष की वृत्ति, शाबरभाष्य, प्रभाकरभट्ट की
बृहती, कुमारिलभट्ट का वार्तिक, पार्थसारथिमिश्र की शास्त्रदीपिका,
मण्डनमिश्र के विधिविवेक तथा भावनाविवेक, खण्डदेव की भाट्टदीपिका
आदि व्याख्याग्रन्थ प्रसिद्ध हैं। (प्राचीन चरित्रकोष, पृ. 236)। आचार्य
जैमिनि ने यज्ञों में प्रयुक्त होने वाले ब्राह्मणग्रन्थों की वाक्यार्थों की अन्विति
करने के लिए सूत्रों की रचना की, जिन्हें 'जैमिनिसूत्र' कहा गया। इसीकारण
इसे पूर्वमीमांसा नाम से भी जाना गया। जबकि आचार्य बादरायण विरचित
'ब्रह्मसूत्र' में वेद के उत्तरभाग के रूप में प्रसिद्ध उपनिषद्वाक्यों का विचार
किया गया है। अतः इसे उत्तर-मीमांसा के रूप में ख्याति प्राप्त हुई।
(८) आचार्य बादरि-इनके मत का उल्लेख ब्रह्मसूत्र में पुनर्जन्म के
विषय में छान्दोग्योपनिषद् के कथन 'तद् य इह रमणीयचरणाः' के सम्बन्ध
में विविध आचार्यों के मत का उल्लेख करने के प्रसङ्ग में किया गया है।¹

  1. ब्रह्मसूत्र-1/2/30, 3/1/11, 4/3/7, 4/4/10

भूमिका १७
इसके अतिरिक्त मीमांसासूत्रकार ने भी चार स्थलों पर (3/1/3, 6/1/27,
8/3/6, 9/2/30) नाम का उल्लेख करते हुए पूर्वपक्ष के रूप में खण्डन के
लिए इनके मत का उल्लेख किया है। जबकि आचार्य बादरायण ने अपने
मत के समर्थन में इन्हें प्रस्तुत किया है। अतः स्पष्टरूप से कहा जा सकता
है कि ये वेदान्तदर्शन के आचार्य थे तथा तात्कालिक समय में अत्यधिक
प्रसिद्ध थे।
जैमिनिसूत्र में निर्दिष्ट बादरि नामक आचार्य तथा महर्षि बादरायण
वस्तुतः दोनों भिन्न व्यक्ति थे, क्योंकि बादरायण के मतों के विपरीत बादरि
के अनेक मतों का निर्देश 'बादरिसूत्रों' में हुआ है।¹ आचार्य बादरायण ने
देह का भाव और अभाव दोनों को स्वीकार किया है, जबकि आचार्य बादरि
देह की अभावयुक्त अवस्था को ही मान्यता प्रदान करते हैं। यह मत
वैभिन्य दोनों आचार्यों के भिन्न-भिन्न होने की सम्भावना की पुष्टि करता
है।
यत्र तत्र उल्लिखित सिद्धान्तों के आधार पर इनकी मान्यताओं को संक्षेप
में इसप्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं-
(क) अवशिष्टशोभन अथवा अशोभन कर्मों के साथ ही जीवात्मा इस
संसार में पुनरागमन करता है।
(ख) यद्यपि परमेश्वर महान् हैं, फिर भी प्रदेशमात्र हृदय अर्थात् मन
द्वारा उनका स्मरण किया जा सकता है।
(ग) छान्दोग्य उपनिषद् के वाक्य 'स एनान् ब्रह्म गमयति' में प्रयुक्त
ब्रह्म पद से अभिप्राय कार्य ब्रह्म से है, क्योंकि परब्रह्म तो सर्वत्र है। उसे
प्राप्त करने हेतु लोकोत्तर में जाने की आवश्यकता नहीं है।
(घ) गतिश्रुति बल से कार्यब्रह्म अर्थात् सगुणब्रह्म की ही प्राप्ति हो
सकती है। वस्तुतः अमानव पुरुष ही ब्रह्म की प्राप्ति कराने में सक्षम हैं।
(ङ) वेदज्ञानी पुरुष के शरीर आदि नहीं होते हैं तथा मुक्तपुरुष
निरिन्द्रिय तथा शरीरविहीन होते हैं।
(च) वैदिककर्म करने का सभी को अधिकार है।
(ii) आचार्य शङ्कर के पूर्ववर्ती वेदान्तदर्शन के आचार्य-महर्षि
बादरायण के ब्रह्मसूत्र में उल्लेख किए गए उक्त आचार्यों के अतिरिक्त

  1. ब्रह्मसूत्र 4/4/10-12

पश्चाद्वर्ती अन्यान्य ग्रन्थों में भी वेदान्तदर्शन के कुछ आचार्यों के नाम का
कथन किया गया है, जिनमें भर्तृप्रपञ्च, भर्तृहरि, भर्तृमित्र, उपवर्ष, बोधायन,
ब्रह्मनन्दी, टङ्क, ब्रह्मदत्त, भारुचि, सुन्दरपाण्ड्य, आचार्य गौडपाद एवं आचार्य
गोविन्द विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। अब हम इनका संक्षेप में विवरण
प्रस्तुत कर रहे हैं-
(१) आचार्य भर्तृप्रपञ्च-इन्होंने कठोपनिषद् एवं बृहदारण्यकोपनिषद्
पर भाष्य की संरचना की। ये प्रमाणसमुच्चयवादी आचार्य के रूप में
विख्यात थे। इनके मत में लौकिकप्रमाण और वेद दोनों ही सत्य हैं।
इसलिए इन्होंने लौकिकप्रमाणगम्यभेद तथा वेदगम्य अभेद दोनों को सत्य
रूप में स्वीकार किया है। इनकी सम्मति में जिसप्रकार केवल कर्म मोक्ष का
साधन नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार केवल ज्ञान भी मोक्ष प्रदान नहीं करा
सकता है। अतः मोक्षप्राप्ति के लिए ज्ञान-कर्म-समुच्चय ही उत्कृष्ट साधन
है।
उनके अनुसार-मोक्ष दो प्रकार का होता है (१) अपवर्ग (२) ब्रह्मभाव
की प्राप्ति। इसी शरीर से ब्रह्मसाक्षात्कार होने की स्थिति में अपवर्ग होता है।
जबकि देहपात के पश्चात् ही साधक को ब्रह्मभाव की प्राप्ति होती है। ब्रह्म
में जीव का लय होने के कारण ही इसे 'ब्रह्मभावापत्ति' कहा गया है।
इसीको 'परामुक्ति' भी कहते हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि सुरेश्वराचार्य एवं आनन्दगिरि के समय में
आचार्य भर्तृप्रपञ्च का ग्रन्थ उपलब्ध था, क्योंकि इन आचार्यों द्वारा इनके
मत की प्रस्थापना एवं व्याख्या की शैली से इस बात की पुष्टि होती है।
शङ्कराचार्य ने अपने बृहदारण्यकोपनिषद् भाष्य में भर्तृप्रपञ्च के लिए परिहास
रूप में 'औपनिषदमन्य' पद का प्रयोग किया है, किन्तु इससे उनके महत्त्व
में किसीप्रकार की कमी नहीं होती है। वस्तुतः तात्कालिक समय में
दार्शनिकक्षेत्र में इनके पाण्डित्य का पर्याप्त प्रभाव था। इसीकारण शङ्कराचार्य
के साक्षात् शिष्यों ने भी अपने ग्रन्थों में 'सम्प्रदायवित्' एवं 'ब्रह्मवादी'
कहकर इनकी प्रशंसा की है।
उनके मत में-'परमार्थ एक भी है और अनेक भी। ब्रह्मरूप में वह एक
है तथा जगत् के रूप में अनेकरूपों वाला है। इसीकारण उन्होंने ज्ञान एवं
कर्म दोनों की सार्थकता को स्वीकार किया। उनकी दृष्टि में जीव में विद्या,
कर्म तथा पूर्वकर्म के संस्कार विद्यमान रहते हैं। परमात्मा से अभिव्यक्त हुई

भूमिका १९

अविद्या, जीव में विकार उत्पन्न करती हुई अनात्मस्वरूप अन्तःकरण में
धर्मभाव से विद्यमान रहती है।
उनके विचार में परममोक्ष प्राप्त करने से पूर्व जीव हिरण्यगर्भभाव को
प्राप्त होते हैं, जो वस्तुतः मुक्तावस्था न होकर मोक्ष की पूर्वकालीन
अवस्थामात्र है। इस अवस्था में परमात्मा का सान्निध्य हमेशा के लिए
विद्यमान रहता है। काम, वासना आदि जीव के धर्म हैं। ब्रह्म एक होने पर
भी समुद्र की तरङ्ग के समान द्वैताद्वैत है। जिसप्रकार अद्वैतभाव सत्य है,
ठीक उसीप्रकार द्वैत भी सत्य है।
(१०) आचार्य भर्तृमित्र-जयन्तभट्ट कृत न्यायमञ्जरी में पृ० 213 से
226 तक तथा यामुनाचार्य के सिद्धित्रय में पृ० 4-5 में नामोल्लेखपूर्वक
इनके सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया गया है। इसके आधार पर इन्हें
वेदान्तदर्शन का आचार्य माना जा सकता है। इनके नाम से मीमांसादर्शन पर
भी एक ग्रन्थ उपलब्ध होता है। कुमारिलभट्ट ने अपने श्लोकवार्तिक में
अनेकस्थलों पर इनके नाम का उल्लेख किया है (1/1/1/10,
1/1/6/130-131)। साथ ही टीकाकार पार्थसारथि मिश्र ने भी अपनी न्याय
रत्नाकर नामक टीका में इसीप्रकार का अभिप्राय अभिव्यक्त किया है।
कुमारिलभट्ट के अनुसार-भर्तृमित्र इत्यादि आचार्यों के अपसिद्धान्तों के
प्रभाव से मीमांसाशास्त्र लोकायतवत् हो गया। इसलिए विशिष्टाद्वैत दर्शन के
ग्रन्थों में उल्लिखित भर्तृमित्र तथा श्लोकवार्तिक में कहे गए मीमांसक
भर्तृमित्र एक ही व्यक्ति थे अथवा अलग-अलग, यह निश्चयपूर्वक कहना
अत्यन्त कठिन है, किन्तु कुमारिलभट्ट की समालोचना के आधार पर इन्हें
भिन्न व्यक्ति मानना ही उचित प्रतीत होता है। आचार्य मुकुलभट्ट ने भी
अपने 'अभिधावृत्तिमातृका' नामक ग्रन्थ में इनके नाम का उल्लेख किया है
(पृ० 17)।
(११) आचार्य भर्तृहरि-यामुनाचार्य के ग्रन्थ 'सिद्धित्रय' में इनके नाम
का भी उल्लेख किया गया है। ये प्रसिद्ध वैयाकरण थे। इन्हें महर्षि
पतञ्जलि के व्याकरण महाभाष्य का सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक
टीकाकार माना गया है। महाभाष्य पर लिखी गयी इनकी टीका 'महाभाष्य
प्रदीप' ने विद्वानों में विशिष्टस्थान प्राप्त किया। इनके नाम से वाक्यपदीय,
वाक्यपदीय के पहले दो काण्डों पर 'स्वोपज्ञटीका', वेदान्तसूत्रवृत्ति, मीमांसा

२० वेदान्तसार
सूत्रवृत्ति ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं।¹ विद्वानों ने शृङ्गारशतक, नीतिशतक एवं
वैराग्यशतक के रचयिता राजा भर्तृहरि को इनसे भिन्न माना है।²
पुण्यराज के अनुसार-आचार्य भर्तृहरि के गुरु का नाम वसुरात था। चीनी
यात्री इत्सिंग ने इन्हें बौद्धधर्मावलम्बी स्वीकार किया है। उनके अनुसार
इन्होंने सात बार प्रव्रज्या ग्रहण की थी, किन्तु कुछ विद्वान् इन्हें वैदिक
धर्मावलम्बी स्वीकार करते हैं।³ वाक्यपदीय व्याकरणविषयक ग्रन्थ होने पर
भी प्रसिद्ध दार्शनिकग्रन्थ है। निःसंदेहरूप से इसका आधार वेदान्तदर्शन के
अद्वैतसिद्धान्त को ही स्वीकार किया जा सकता है।
कुछ विद्वानों के मत में आचार्य मण्डनमिश्र ने आचार्य भर्तृहरि द्वारा
प्रतिपादित शब्दब्रह्मवाद का आश्रय लेकर ही अपने 'ब्रह्मसिद्धि' नामक ग्रन्थ
की संरचना की। जिसपर वाचस्पतिमिश्र द्वारा विरचित ब्रह्मतत्त्वसमीक्षा नाम
की टीका मिलती है। काश्मीरीय शिवाद्धैत के प्रमुख आचार्य, उत्पलाचार्य के
गुरु आचार्य सोमानन्द ने अपने 'शिवदृष्टि' नामक ग्रन्थ में भर्तृहरि के
शब्दाद्वयवाद की विशेषरूप से समालोचना की है। इसके अतिरिक्त
शान्तरक्षित कृत तत्त्वसंग्रह, अविमुक्तात्मकृत इष्टसिद्धि तथा जयन्तकृत
न्यायमञ्जरी में भी शब्द-अद्वैतवाद का विस्तारपूर्वक उल्लेख मिलता है।
उत्पलाचार्य एवं सोमानन्द के वचनों से ज्ञात होता है कि आचार्य भर्तृहरि
एवं उनके सिद्धान्त का अनुकरण करने वाले शब्दब्रह्मवादी दार्शनिकविद्वान्
'पश्यन्तीवाक्' को ही शब्दब्रह्म का स्वरूप स्वीकार करते थे। इस वाक् को
विश्व के नियामक एवं अन्तर्यामी चित् तत्त्व से अभिन्न माना गया है।
आचार्य भर्तृहरि ने ब्रह्म को यथार्थसत्ता मानते हुए, शब्द एवं ब्रह्म में
अभिन्नता प्रतिपादित करते हुए सम्पूर्ण जगत् को ब्रह्म का विवर्त स्वीकार
किया है-
अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्।
निवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥

  1. प्राचीन चरित्रकोश-चित्राव, पृ. 553
  2. वही।
  3. संस्कृत व्याकरण का इतिहास-युधिष्ठिर मीमांसक- पृ० 257

भूमिका २१
उनके अनुसार-व्याकरण के सिद्धान्तों के अध्ययन एवं मनन द्वारा मोक्ष
की प्राप्ति की जा सकती है। इनके परवर्ती आचार्य, मण्डनमिश्र ने इनके
सिद्धान्तों एवं मान्यताओं से प्रभावित होकर स्फोटसिद्धि नामक ग्रन्थ की
संरचना की। प्रो० मैक्समूलर ने आचार्य भर्तृहरि को ईसा की सप्तम शताब्दी
के पूर्वार्द्ध में स्थित माना है।
(12) आचार्य उपवर्ष-शङ्कराचार्य¹ एवं शबरस्वामी के भाष्य² में इनके
नाम का उल्लेख हुआ है। वहाँ इनके लिए सम्मानजनक 'भगवान्' शब्द का
प्रयोग तात्कालिक समय में इनके गौरव तथा श्रेष्ठता को सिद्ध करता है।
साथ ही इससे यह भी प्रतीत होता है कि इन्होंने पूर्वमीमांसा एवं
उत्तरमीमांसा दोनों पर ही अपनी विद्वत्तापूर्ण व्याख्या की संरचना की थी।
मणिमेखले नामक तमिलभाषा में लिखे गए एक प्राचीनग्रन्थ में आचार्य
जैमिनि तथा व्यास के साथ ही आठ प्रमाणों को मान्यता प्रदान करने वाले
'कृतकोटि' नामक आचार्य के नाम का उल्लेख हुआ है। इनके साथ उपवर्ष
आचार्य का सम्बन्ध स्थापित करने का विद्वानों ने प्रयास किया है। जो
न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि आचार्य उपवर्ष वस्तुतः अन्य मीमांसकों
एवं वेदान्तियों के समान केवल छः प्रमाणों को ही मान्यता प्रदान करते हैं।
आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इन्हें 200 ई० के लगभग स्थित माना है।
(१३) आचार्य बौधायन-वेदार्थसंग्रह में गुरुदेव, कपर्दी, टङ्क तथा
आचार्य भारुचि के साथ इनके नाम का भी उल्लेख मिलता है। डॉ. थीबो
आदि विद्वानों का विचार है कि इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर एक वृत्ति की संरचना
की थी। यद्यपि इस समय यह कृति उपलब्ध नहीं है तथापि रामानुजाचार्य
के श्रीभाष्य में इसके उद्धरण प्राप्त होते हैं। प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् जैकोबी ने
इनका मीमांसासूत्र पर वृत्ति लिखना स्वीकार किया है।³ ये कल्पसूत्रों के
प्रवर्तक आचार्य बौधायन से भिन्न हैं। इसके अतिरिक्त प्रपञ्चहृदय नामक

  1. "इत एव चाकृष्याचार्येण शबरस्वामिना प्रमाणलक्षणे वर्णितम्। अत एव च
    भगवतोपवर्षेण प्रथमे तन्त्रे आत्मास्तित्वाभिधानप्रसक्तौ शारीरके वक्ष्याम
    इत्युद्धास्तुकृतः।" (ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य-3/3/53)
  2. अथ गौरित्यत्र शब्दः गकारौकारविसर्जनीयः इति भगवानुपवर्षः।
    (मीमांसा शबरभाष्य-1/1/5)
  3. जरनल ऑफ दॉ अमेरिकन ओरियण्टल सोसायटी-पृ0 17-191

२२ वेदान्तसार
ग्रन्थ से भी यह बात सिद्ध होती है कि इनके द्वारा निर्मित वेदान्तवृत्ति का
नाम कृतकोटि था (प्रपञ्चहृदय-त्रिवेन्द्रम्-पृ० 39) अनेक विद्वानों ने इन्हें
द्रविड़ देश का निवासी स्वीकार किया है।¹
(१४) आचार्य टङ्क-आचार्य रामानुज ने वेदान्तसंग्रह में इनके नाम का
उल्लेख किया है। ये विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के समर्थक थे। कुछ विद्वान्
ब्रह्मनन्दी आचार्य के साथ इनकी अभिन्नता का प्रतिपादन करते हैं, किन्तु
इस विषय में निश्चितरूप से कुछ भी कहना कठिन है।
(१५) आचार्य ब्रह्मनन्दी-आचार्य मधुसूदन सरस्वती ने संक्षिप्त
शारीरक टीका में (3/117) इनके नाम का उल्लेख किया है। ऐसा प्रतीत
होता है कि ये सम्भवतः अद्वैतवेदान्त के आचार्य थे तथा प्राचीन वेदान्त
साहित्य में छान्दोग्य वाक्यकार अथवा केवल वाक्यकार के नाम से प्रसिद्ध
थे, क्योंकि इन्होंने वाक्य नामक छान्दोग्यव्याख्यान की संरचना की थी।
जिसपर द्रमिडाचार्य ने भाष्य लिखा। जैसा कि हम पूर्व में उल्लेख कर चुके
हैं, कुछ विद्वानों ने आचार्य टङ्क के साथ इनकी अभिन्नता प्रतिपादित की है।
(१६) आचार्य ब्रह्मदत्त-शङ्कराचार्य के पूर्ववर्ती वेदान्ताचार्यों में इनके
नाम का उल्लेख भी प्राप्त होता है। ये अद्वैतवादी आचार्य थे
(नैष्कर्म्यसिद्धि-1/68)। शङ्कराचार्य ने बृहदारण्यकोपनिषद् (1/4/7) के
भाष्य में भी इनके मत का उल्लेख किया है। प्राचीन वेदान्ताचार्य आश्मरथ्य
के भेदाभेद के सिद्धान्त से इनके मत की अनुकूलता प्रतीत होती है, क्योंकि
उन्होंने ब्रह्म से जीव की उत्पत्ति तथा मुक्ति की स्थिति में उसका उसी में
लीन होना स्वीकार किया है। जबकि ब्रह्मदत्त ने भी जीव की उत्पत्ति एवं
विनाश की स्थिति को मान्यता प्रदान की है।
इनके अनुसार-अज्ञान की निवृत्ति भावनाजन्य ज्ञान से ही होती है,
औपनिषदिकज्ञान मुक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इस ज्ञान के प्राप्त
करने के पश्चात् भी जीवनपर्यन्त भावना आवश्यक है। इनके मत में-शरीर
के रहने पर भी उपाय के माध्यम से देवता का साक्षात्कार सम्भव है, किन्तु
उसके साथ मिलन देह के अभाव में ही सम्भव है। इसप्रकार प्रारब्धकर्मों से
प्राप्त की हुई देह उपास्य के साथ उपासक के मिलन में बाधक है।²

  1. प्राचीन चरित्रकोश, पृ. 525
  2. बृहदारण्यकोपनिषद् वार्तिक-पृ0 1357 तथा नैष्कर्म्यसिद्धिटीका-‘चन्द्रिका’-पृ0 1-67

भूमिका २३
जिसप्रकार मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग की प्राप्ति होती है। उसीप्रकार देह छूटने
के पश्चात् ही मोक्ष भी सम्भव है।
(१७) आचार्य भारुचि-आचार्य रामानुज ने अपने वेदान्तसंग्रह में पृ०
154 पर प्राचीन वेदान्ताचार्यों का उल्लेख करते हुए इनके नाम का सर्वप्रथम
उल्लेख किया है। इन आचार्यों के नाम हैं-भारुचि, टङ्क, बोधायन, गुहदेव,
कपर्दिक तथा द्रमिलाचार्य। इसीप्रकार विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका में
(1/18, 2/124) माधवाचार्य की पराशर संहिता टीका में (2/3, पृ० 510)
तथा सरस्वतीविलास आदि ग्रन्थों में आचार्य भारुचि के नाम का कथन
किया गया है।
मिताक्षरा का समय विद्वानों ने 1050 ई० निर्धारित किया है। अतः इनका
काल इससे पूर्व सिद्ध होता है। डा० पी० वी० काणे ने धर्मशास्त्र के इतिहास
में इनका समय नवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना है।¹ श्री निवासदास ने
यतीन्द्रमत दीपिका में अन्य वेदान्ताचार्यों के नामोल्लेख के प्रसङ्ग में इनका
भी कथन किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन्होंने आचार्य विष्णुकृत
धर्मसूत्र के ऊपर टीका की संरचना की थी। कुछ विद्वान् धर्मशास्त्रकार
भारुचि तथा वेदान्ताचार्य भारुचि को भिन्न मानते हैं, किन्तु काणे महोदय ने
दोनों के एक होने की सम्भावना व्यक्त करते हुए इन्हें विश्वरूप का
समकालीन माना है।²
(१८) द्रविडाचार्य-ये भी प्राचीन वेदान्ताचार्य थे। इन्होंने
छान्दोग्योपनिषद् पर अत्यन्त वृहद्भाष्य की संरचना की। साथ ही
बृहदारण्यकोपनिषद् पर भी भाष्य लिखा। अपने माण्डूक्योपनिषद् भाष्य में
(2/32, 2/20) आचार्य शङ्कर ने इन्हें 'आगमवित्' कहकर सम्मानित किया
है तथा बृहदारण्यकोपनिषद् भाष्य में 'सम्प्रदायवित्' कहकर सम्बोधित किया
है। इन सम्बोधनों से तात्कालिक समय के दार्शनिक विद्वानों में इनके गौरव
की अभिव्यक्ति होती है। यही कारण है कि शङ्कराचार्य ने कहीं भी इनके
मत का खण्डन नहीं किया है। इनका दूसरा नाम द्रमिलाचार्य भी मिलता है।
ये अद्वैतमत के समर्थक थे। इसके अतिरिक्त रामानुजाचार्य ने अपने
वेदान्तसंग्रह में भी इनके नाम का उल्लेख किया है। विद्वानों ने यामुनाचार्य

  1. धर्मशास्त्र का इतिहास-पी० वी० काणे- पृ० 68 प्रथम भाग-हिन्दी अनुवाद।
  2. वही

२४ वेदान्तसार
के सिद्धित्रय में आये 'भाष्यकृत' शब्द का सम्बन्ध इन्हीं द्रविडाचार्य से
माना है—
“भगवता बादरायणेन इदमर्थमेव सूत्राणि प्रणीतानि विवृतानि च
परिमितगम्भीरभाष्यकृता” (सिद्धित्रय-यामुनाचार्य)
(१९) गौडपादाचार्य—इन्हें अद्वैतवेदान्त का प्रथम प्रवर्तक एवं प्रधान
आचार्य माना गया है, क्योंकि अद्वैतवेदान्त की गुरुपरम्परा अत्यन्त प्राचीन
होते हुए भी इसके सिद्धान्तों का क्रमबद्धरूप में प्रस्थापन एवं प्रतिपादन
इन्हीं के द्वारा किया गया। कुछ विद्वानों ने इन्हें बौद्धदर्शन से प्रभावित माना
है। इनके जीवन के सम्बन्ध में कुछ विशेषबात नहीं मिलती, किन्तु
शङ्कराचार्य के शिष्य सुरेश्वराचार्य के नैष्कर्म्यसिद्धि नामक ग्रन्थ से केवल
इतना ज्ञात होता है कि ये गौड़प्रदेश के निवासी थे। विद्वानों ने इन्हें ईसा
पूर्व द्वितीय शताब्दी के पूर्वभाग में स्थित माना है, जिसका आधार इनके
ग्रन्थों में बौद्धमत का स्पष्टरूप से उल्लेख न होना रहा है।
इन्होंने माण्डूक्योपनिषद् पर प्रसिद्ध कृति 'माण्डूक्यकारिका' की संरचना
की। जिसपर शङ्कराचार्य ने भाष्य की रचना की तथा इसी कारिका पर
मिताक्षरा नामक टीका भी मिलती है। परवर्ती आचार्यों ने इस कारिका को
प्रमाणरूप में स्वीकार किया है। इस ग्रन्थ को चार प्रकरणों में विभाजित
किया गया है (1) आगम (2) वैतथ्य (3) अद्वैत (4) अतीत शान्ति।
इनका दूसरा ग्रन्थ 'उत्तरगीताभाष्य' मिलता है। उत्तरगीता महाभारत का
ही एक अंश है, किन्तु यह अंश महाभारत की सभी प्रतियों में उपलब्ध
नहीं होता। ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका पर भी आचार्य गौडपाद का भाष्य
उपलब्ध है,¹ किन्तु विद्वानों ने इन्हें पूर्वगौडपाद से भिन्न माना है, क्योंकि
सांख्यकारिका के भाष्यकार आचार्य गौडपाद का समय ईसा की सप्तम
शताब्दी माना गया है।²
आचार्य गौडपाद अद्वैतवाद के प्रमुख आचार्य थे। अपनी कारिकाओं में
उन्होंने जिन सिद्धान्तों को बीजरूप में प्रदर्शित किया, उन्हीं को आचार्य
शङ्कर ने अपने ग्रन्थों में सरलशैली में प्रतिपादित किया। कारिकाओं में
निर्दिष्ट उनके मत को विद्वानों ने 'अजातवाद' की संज्ञा प्रदान की।


  1. लेखककृत सांख्यकारिका 'चन्द्रिका' व्याख्या- संस्कृत ग्रन्थागार, दिल्ली-1998
  2. वही, भूमिका, पृ० 33

भूमिका २५
इनके अनुसार-वस्तुतः जगत् की उत्पत्ति नहीं हुई, एकमात्र अखण्ड--
चिद्घन सत्ता ही मोहवश प्रपञ्चवत् प्रतीत हो रही है-
मनोदृश्यमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः।
मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते॥
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येष परमार्थता॥
अर्थात् उत्पत्ति, प्रलय, बद्धता, साधकत्व, मुमुक्षत्व एवं मुक्तभाव ये सभी
परमार्थ नहीं हैं। जिसप्रकार रज्जु में सर्प, सीपी में चांदी तथा स्वर्ण में
आभूषणों की प्रतीति होती है, ठीक उसीप्रकार माया की महिमा द्वारा
सर्वसङ्गशून्य निर्विशेष चित् तत्त्व में ही समस्त पदार्थों की प्रतीति हो रही है।
अतः एकमात्र वही वस्तु सत् एवं परमार्थ है।
(२०) आचार्य गोविन्दपाद-ये आचार्य गौडपाद के शिष्य तथा
शङ्कराचार्य के गुरु थे। शङ्कराचार्य की जीवनी से केवल इनका नर्मदातट-
निवासी होना सिद्ध होता है। ये अपने समय के उद्भट विद्वान् थे। इनका
कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है।
(२१) शङ्कराचार्य एवं उत्तरवर्ती वेदान्ताचार्य-शङ्कराचार्य को
अद्वैतवाद का प्रवर्तक आचार्य माना जाता है। अद्वैतमत को शाङ्करमत या
शाङ्करदर्शन भी कहते हैं। ब्रह्मसूत्र पर उपलब्ध भाष्यों में सर्वाधिक प्राचीन
शाङ्करभाष्य माना जाता है। आचार्य शङ्कर की प्रामाणिक जीवनी का कहीं
भी उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु परवर्तीकाल में उनके जीवन की घटनाओं
का कहीं-कहीं संकलन किया गया है। जिनमें आनन्दगिरि की
शङ्करदिग्विजय, चिद्विलास की शङ्करविजय तथा माधवाचार्य की संक्षिप्त
शङ्करजय मुख्य हैं। इन्हीं ग्रन्थों के आधार पर हम उनके विषय में यहाँ
विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं-
शङ्कराचार्य का जन्म केरल प्रदेश की पूर्णा नदी के तटवर्ती ग्राम कलादी
में वैशाख शुक्ल 5 को 788 ई० में हुआ। इनके पिता का नाम शिवगुरु
तथा माता का नाम सुभद्रा था। भगवान् शङ्कर की आराधना से पुत्रप्राप्ति
होने के कारण उन्होंने इनका नाम भी शङ्कर रखा। बालक शङ्कर
बाल्यावस्था से ही अद्भुत प्रतिभा एवं स्मरणशक्ति के धनी थे अतः सात
वर्ष की अवस्था तक इन्होंने वेद, वेदान्त और वेदाङ्गों का विधिवत् अध्ययन

२६ वेदान्तसार
कर लिया। इनकी असाधारण प्रतिभा से सभी गुरुजन प्रभावित एवं
आश्चर्यचकित थे।
विद्याध्ययन समाप्त करने के पश्चात् घर लौटकर इन्होंने माता से संन्यास
ग्रहण करने की अनुमति मांगी। मात्राज्ञा प्राप्त कर आठ वर्ष की अवस्था में
ये घर से निकल पड़े क्योंकि शङ्कर माता के बहुत बड़े भक्त थे उनकी
अनुमति के बिना, उन्हें कष्ट देकर संन्यास लेना नहीं चाहते थे। घर से
प्रस्थान करने के बाद उन्होंने नर्मदा के तट पर स्वामी गोविन्दपाद से शिक्षा
ग्रहण की। उन्होंने इनका नाम पूज्यपादाचार्य रखा। गुरु की कृपा से शीघ्र ही
ये बहुत बड़े योगसिद्ध महात्मा हो गए। उनकी सिद्धि से प्रसन्न होकर गुरु
ने इन्हें काशी जाकर वेदान्तसूत्र पर भाष्य लिखने की आज्ञा दी। जहाँ उनके
वैदुष्य की ख्याति बढ़ने लगी और लोग उनके पास आकर उनका शिष्यत्व
ग्रहण करने लगे।
विद्यार्णव नामक ग्रन्थ के अनुसार उनके शिष्यों की संख्या 14 थी।
जिनमें पाँच संन्यासी तथा नौ गृहस्थ थे। इनके प्रथम शिष्य का नाम पद्मपाद
था। शेष चार संन्यासी शिष्यों में शङ्कर, बोध, गीर्वाण तथा आनन्दतीर्थ का
नाम उल्लेखनीय है। सुन्दर, विष्णुशर्मा, लक्ष्मणमल्लिकार्जुन, त्रिविक्रम,
श्रीधर, कपर्दी, केशव और दामोदर इनके गृहस्थ शिष्य थे। काशी में रहते
हुए इन्होंने सभी विरुद्ध मतावलम्बियों को परास्त किया तथा ब्रह्मसूत्र पर
भाष्य की संरचना की।
वहाँ से कुरुक्षेत्र होते हुए ये बदरिकाश्रम गए। जहाँ उन्होंने कुछ अन्य
ग्रन्थों की रचना की। उन्होंने अपनी 12 वर्ष की अवस्था से सोलह वर्ष की
अवस्था तक सभी ग्रन्थों की रचना की। वहाँ से चलकर ये प्रयाग गए,
जहाँ कुमारिलभट्ट से इनकी मुलाकात हुई। वहाँ से मगध की माहिष्मती
नगरी में मण्डनमिश्र के पास शास्त्रार्थ हेतु गए। मण्डनमिश्र की पत्नी भारती
शास्त्रार्थ में निर्णायक के रूप में रहीं। अन्त में मण्डनमिश्र की पराजय होने
के पश्चात् उन्होंने आचार्य शङ्कर का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया। ये ही आगे
चलकर सुरेश्वराचार्य के नाम से प्रख्यात हुए।
मगधविजय करके शङ्कराचार्य दक्षिण के ओर गए। जहाँ उन्होंने शैव और
कापालिकों को परास्त किया। वहाँ से चलकर दक्षिण में तुङ्गभद्रा के तट पर