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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 314 में से

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पृष्ठ 31

भूमिका १७
इसके अतिरिक्त मीमांसासूत्रकार ने भी चार स्थलों पर (3/1/3, 6/1/27,
8/3/6, 9/2/30) नाम का उल्लेख करते हुए पूर्वपक्ष के रूप में खण्डन के
लिए इनके मत का उल्लेख किया है। जबकि आचार्य बादरायण ने अपने
मत के समर्थन में इन्हें प्रस्तुत किया है। अतः स्पष्टरूप से कहा जा सकता
है कि ये वेदान्तदर्शन के आचार्य थे तथा तात्कालिक समय में अत्यधिक
प्रसिद्ध थे।
जैमिनिसूत्र में निर्दिष्ट बादरि नामक आचार्य तथा महर्षि बादरायण
वस्तुतः दोनों भिन्न व्यक्ति थे, क्योंकि बादरायण के मतों के विपरीत बादरि
के अनेक मतों का निर्देश 'बादरिसूत्रों' में हुआ है।¹ आचार्य बादरायण ने
देह का भाव और अभाव दोनों को स्वीकार किया है, जबकि आचार्य बादरि
देह की अभावयुक्त अवस्था को ही मान्यता प्रदान करते हैं। यह मत
वैभिन्य दोनों आचार्यों के भिन्न-भिन्न होने की सम्भावना की पुष्टि करता
है।
यत्र तत्र उल्लिखित सिद्धान्तों के आधार पर इनकी मान्यताओं को संक्षेप
में इसप्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं-
(क) अवशिष्टशोभन अथवा अशोभन कर्मों के साथ ही जीवात्मा इस
संसार में पुनरागमन करता है।
(ख) यद्यपि परमेश्वर महान् हैं, फिर भी प्रदेशमात्र हृदय अर्थात् मन
द्वारा उनका स्मरण किया जा सकता है।
(ग) छान्दोग्य उपनिषद् के वाक्य 'स एनान् ब्रह्म गमयति' में प्रयुक्त
ब्रह्म पद से अभिप्राय कार्य ब्रह्म से है, क्योंकि परब्रह्म तो सर्वत्र है। उसे
प्राप्त करने हेतु लोकोत्तर में जाने की आवश्यकता नहीं है।
(घ) गतिश्रुति बल से कार्यब्रह्म अर्थात् सगुणब्रह्म की ही प्राप्ति हो
सकती है। वस्तुतः अमानव पुरुष ही ब्रह्म की प्राप्ति कराने में सक्षम हैं।
(ङ) वेदज्ञानी पुरुष के शरीर आदि नहीं होते हैं तथा मुक्तपुरुष
निरिन्द्रिय तथा शरीरविहीन होते हैं।
(च) वैदिककर्म करने का सभी को अधिकार है।
(ii) आचार्य शङ्कर के पूर्ववर्ती वेदान्तदर्शन के आचार्य-महर्षि
बादरायण के ब्रह्मसूत्र में उल्लेख किए गए उक्त आचार्यों के अतिरिक्त

  1. ब्रह्मसूत्र 4/4/10-12