वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें२२८ वेदान्तसार
अग्नि वायु में, वायु अपने कारण आकाश में तथा आकाश अपने कारण
अज्ञान से उपहितचैतन्य में विलीन होकर तन्मात्ररूप में विद्यमान हो जाते हैं।
इसके पश्चात् यह अज्ञान एवं इससे उपहितसर्वज्ञ आदि गुणों से युक्त
चैतन्य ईश्वर आदि भी अपने आधारभूत अनुपहितशुद्धचैतन्यरूप तुरीय ब्रह्म
में विलीन हो जाता है। इसप्रकार तुरीयमात्र एक तत्त्व ही शेष बचता है और
यही वेदान्त का अद्वैतभाव भी है एवं यही अपवाद का स्वरूप भी, क्योंकि
यही परमशुद्धचैतन्य ही वस्तु है, जिसका प्रमाता को तात्त्विकज्ञान हो जाता
है।
विशेष-(1) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर
सकते हैं-
चित्र-४८
सृष्टि के विलय की अपवादरूप प्रक्रिया
┌──────────────┬──────────────┬──────────────┐
चतुर्विध शरीर भोग्य अन्नपानादि भूःभुवःस्वः आदि इन सबका
└───────┬──────┘ └──────┬──────┘ आधारभूत ब्रह्माण्ड
│ │ │
└────────────►┌──────────────┴───────────────┴─┐◄──────────────┘
│ का अपने कारण पञ्चीकृत │
│ आकाश आदि में विलय │
└──────────────┬────────────────┘
│
पञ्चीकृत
┌──────────────┬─────────────┴┬──────────────┬──────────────┐
आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी
└──────────────┼─────────────►│◄─────────────┼──────────────┘
│ ┌──────────┴──────────┐ │
└──►│ अपने कारण अपञ्चीकृत │◄──┘
│ आकाश आदि में विलय │
└──────────┬──────────┘
│
अपञ्चीकृत
│
आकाश ◄────────── वायु ◄───────── अग्नि ──────────► जल ◄───────── पृथिवी
│
│ अज्ञानोपहित शुद्धचैतन्य ───────────────► ┌───────────────┐
▼ │ शुद्धचैतन्य तुरीय │
┌───────┐ └───────┬───────┘
│ ईश्वर │ ▼
└───────┘ ( अवशिष्ट )
अवतरणिका-तत्पश्चात् 'अध्यारोप', 'अपवाद' की इन दोनों प्रक्रियाओं
से 'तत्त्वमसि' महावाक्य के तत् एवं त्वम् पदार्थों के अर्थों को समझने में
इनके सहयोग का कथन करते हैं-