वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
१ अध्याय २ आन्हिक २३
१ अध्याय २ आन्हिक २३
सूत्र १० । १२ और ११ के समान व्याख्यान है ॥ १६ ॥
अब सत्ता का एक होना सिद्ध करते हैं :-
४८-सदिति लिङ्गाऽविशेषाद्विशेषलिङ्गाभावाच्चैको भावः॥१७॥
इति प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
(सत् इति) "है" उस में (लिङ्गाऽविशेषात्) लिङ्ग के सामान्य से (च)
और (विशेषलिङ्गाऽभावात्) विशेष का लिङ्ग न होने से (भावः) सत्ता
(एकः) एक है ॥
जिस प्रकार सामान्यविशेषभावरहित सब द्रव्यों में द्रव्यत्व एक है,
सब अनेक गुणों में गुणत्व एक है, सब कर्मों में कर्मत्व एक है, इसी प्रकार
सब द्रव्यों, गुणों और कर्मों में भाव वा सत्ता एक है, क्योंकि "है" इतने
में कोई विशेष का चिन्ह नहीं, । द्रव्य है, गुण है, कर्म है, इन सब उदाहरणों
में "है=अस्ति" एक सा है, उस में विशेष का लिङ्ग कुछ नहीं ॥ १७ ॥
इस २ आन्हिक के विषय को बताने वाला यह नीचे लिखा श्लोक वैदिक
वृत्ति से उद्धृत किया जाता है जो सब पाठकों को उपयोगी होगा कि-
कार्यकारणयोर्ज्ञानं सामान्यार्थस्य लक्षणम् ।
परीक्षणं च संक्षेपाद्द्वितीयेऽस्मिन्प्रकीर्त्तितम् ॥ १ ॥
कार्य और कारण का ज्ञान, सामान्य अर्थ का लक्षण और संक्षेप से
परीक्षा; इस द्वितीय (आन्हिक) में कही गई ॥ १ ॥
इति प्रथमाऽध्याये द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥
इति श्री तुलसीरामस्वामिकृते
वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे
प्रथमोऽध्यायः
॥ १ ॥
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ओ३म्
अथ द्वितीयोऽध्यायः
तत्र
प्रथमाह्निकम्
अब द्रव्यों का लक्षण आरम्भ करते हुये, प्रथम ९ द्रव्यों में से पहिली
पृथिवी का लक्षण करते हैं:—
४६-रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथिवी ॥ १ ॥
( ऊ-ती ) रूप, रस, गन्ध, और स्पर्शवाली ( पृथिवी ) पृथिवी है ॥
पृथिवी में गन्ध गुण अपना और रूपादि तीन गुण अपने से पहिले तेज,
अप्, और वायु के मिलाकर ४ गुण हैं । आकाश का पांचवां गुण शब्द यहां
इस लिये पृथिवी में नहीं गिनाया कि प्रत्येक शास्त्रकार अपने सूत्रों में अपने
अभिमत लाक्षणिक अर्थों के लाक्षणिक शब्दों का प्रयोग करता है । यद्यपि
न्यायशास्त्रादि में ५ वां महाभूत आकाश गिनाया है, सांख्य में उस को
प्रकृति का कार्य कहा गया है, जिस का गुण शब्द है, परन्तु वैशेषिक दर्शन
में आकाश का गुण शब्द नहीं गिनाया, किन्तु शब्द को एक प्रकार से वायु
गुण मानलिया हो, और उस आकाश को भी जिस को सांख्यादि ने प्रकृति
का कार्य माना है, वैशेषिक ने वायु के अन्तर्गत समझा हो, ऐसा जान
पड़ता है। क्योंकि वैशेषिक के आचार्य कणाद मुनि ने आगे चलकर इसी अध्याय
और आह्निक के सूत्र २० में “निष्क्रमणं प्रवे०” केवल निकलना व प्रवेश करना
मात्र आकाश का चिन्ह कहा है, शब्द नहीं । इस से पाया जाता है कि
वैशेषिक शास्त्र में आकाश कोई प्राकृत पदार्थ नहीं, किन्तु दिशा और काल
के समान एक तीसरा द्रव्य आकाश भी है, जो शून्यार्थक व्यावहारिक है ।
परन्तु न्याय सांख्यादि के अभिमत आकाश (महाभूत) का इस से खण्डन
नहीं समझना चाहिये, किन्तु जैसे सांख्य ने अपने मतानुसार एक प्रकृति
को उपादान कारण माना है, और आकाशादि ५ महाभूतों को तदन्तर्गत
कार्य माना है, और न्याय में प्रकृति का नाम न लेकर केवल आकाशादि
५ महाभूतों से ही सब जगत् की रचना मानते हुये, उन्हीं को उपादान
कारण माना है। इसी प्रकार वैशेषिक ने कुछ कार्य कारणपने की विवक्षा
से नहीं, किन्तु व्यावहारिक संज्ञा रखकर अपना व्यवहार चलाने को पृथिवी
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द्वितीयाऽध्याय १ आन्हिक २५
आदि ९ पदार्थों की द्रव्य संज्ञा करली है, शेष गुणादि समवायान्त ५ पदार्थ
अन्य गिन कर व्यवहार चलाया है। इतने से कोई वैशेषिक का सांख्यादि
के साथ विरोध नहीं हुवा। किन्तु संज्ञा भेदमात्र हुवा ॥ १ ॥
अब दूसरे अप् द्रव्य का लक्षण करते हैं:—
५०–रूपरसस्पर्शवत्य आपोद्रवाः स्निग्धाः ॥ २ ॥
(रू-त्यः) रूप, रस, स्पर्श वाले (द्रवाः) बहने वाले (स्निग्धाः)
और चिकने (आपः) जल हैं ॥
वहां भी शब्द को आकाश का गुण न मानते हुए व्यवहार है। ऐसे
ही आगे भी "परिशेषाल्लिङ्गमाकाशस्य" २७ में आकाश की पहचान शब्द
बताया है, न कि गुण ॥ २ ॥
५१–तेजोरूपस्पर्शवत् ॥ ३ ॥
(रूपस्पर्शवत्) रूप और स्पर्श वाला (तेजः) तेज वा अग्नि द्रव्य है ॥३॥
५२–स्पर्शवान्वायुः ॥ ४ ॥
(स्पर्शवान्) स्पर्श वाला (वायुः) वायु है ॥ ४ ॥
५३–त आकाशे न विद्यन्ते ॥ ५ ॥
(ते) वे गन्धादि चारों गुण (आकाशे) आकाश पोल शून्य वा खड़ा
द्रव्य में (न) नहीं (विद्यन्ते) हैं ॥ ५ ॥ और—
५४–सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानामग्निसंयोगाद्
द्रवत्वमद्भिः सामान्यम् ॥ ६ ॥
(सर्पिर्ज-नाम्) घृत, लाख, मधु=शहद=माक्षिकादि का (अग्निसंयो-
गात्) अग्नि के संयोग से (अद्भिः) जलों के साथ (सामान्यम्) सामान्य है ॥
घृत, लाक्षा और शहद को गरमी पहुंचाने से इन में द्रवत्व (बहाव)
उत्पन्न होजाता है, तब ये द्रव होकर जल के समान होजाते हैं ॥ ६ ॥ तथा—
५५–त्रपुसीसलोहरजतसुवर्णानामग्निसंयोगाद्
द्रवत्वमद्भिः सामान्यम् ॥ ७ ॥
(त्रपु-सीस-लोह-रजत-सुवर्णानाम्) रांग, सीसा, लोहा, चान्दी और
सोने का (अग्निसंयोगात्) अग्नि के संयोग से (द्रवत्वम्) पिंघलापन
(अद्भिः) जलों से (सामान्यम्) समानता है ॥
४
२६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
जिसप्रकार घृतादि काष्ठ विकारों में अग्नि से द्रवत्व होजाता है, इसी
प्रकार रांगा, सीसा, लोहा, चान्दी, सोना और अन्य धातुओं का भी पिंघल
कर जल के समान द्रवत्व होजाता है ॥ ७ ॥
यदि कहो कि “ स्पर्शवान्वायुः ” यह वायु का लक्षण इस लिये उचित
नहीं कि प्रथम तो वायु का होना ही साध्य है, तब लक्षण से लक्ष्य जाना
जायगा । इस पर अदृष्ट चिन्ह ( लिङ्ग ) से उसको सिद्ध करने के लिये प्रथम
दृष्ट ( चाक्षुषप्रत्यक्ष ) लिङ्ग का उदाहरण देते हैं:—
५६-विषाणी ककुद्वान् प्रान्तेबालधिः सास्नावान्
इति गोत्वे दृष्टं लिङ्गम् ॥ ८ ॥
( विषाणी ) सींग वाला, ( ककुद्वान् ) ऊंची ककूद [ टाट ] वाला,
( प्रान्तेबालधिः ) पुच्छ के अन्तिम भाग में बालों वाला और ( सास्नावान् )
गले में लटक ने वाले मांस [ कमला ] वाला, यह ( गोत्वे ) बैल = गोजाति
होने में ( दृष्टम् ) दृष्ट ( लिङ्गम् ) लिङ्ग = चिन्ह वा लक्षण है ॥ ८ ॥ इसी प्रकार-
५७-स्पर्शश्च वायोः ॥ ९ ॥
( वायोः ) वायु का ( स्पर्शः ) स्पर्श ( च ) भी [ लिङ्ग ] है, जिस से
लिङ्गी वायु पहचाना जाता और सिद्ध होता है ॥ ९ ॥ तथा च-
५८-न च दृष्टानां स्पर्श इत्यऽदृष्टलिङ्गोवायुः ॥ १० ॥
( च ) और ( दृष्टानां ) दृष्टों = पृथिवी जल अग्नियों का ( स्पर्शः ) स्पर्श
गुण वा लिङ्ग ( न ) नहीं है ( इति ) इस कारण ( वायुः ) वायु ( अदृष्टलिङ्गः )
अदृष्ट लिङ्ग वाला है ॥ १० ॥
यदि कहो कि स्पर्श लिङ्ग से सिद्ध वायु कोई होगा, परन्तु यह कैसे
जानें कि यह वैशेषिकोक्त ९ द्रव्यों में का एक द्रव्य ही है ? उत्तर-
५९-अद्रव्यवत्त्वेन द्रव्यम् ॥ ११ ॥
( अद्रव्यवत्त्वेन ) द्रव्य वाला न होने से ( द्रव्यम् ) द्रव्य ही है ॥
वायु स्पर्श वाला है और स्पर्श द्रव्य नहीं, बस वायु द्रव्य वाला नहीं,
इस से वह स्वयं द्रव्य है ॥ ११ ॥