वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ६९
तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ६९
साथ कर सकते हैं ? कभी नहीं, किन्तु जिस विषय में इन्द्रिय और मन
दोनों लगें, उसी विषय का ग्रहण होता है और जिस विषय में इन्द्रिय लगे,
परन्तु मन न लगे, उस का ग्रहण नहीं होता । इस लिये मन का होना
सिद्ध है जो एक साथ अनेक विषयों का ग्रहण नहीं होने देता । ऐसा ही
न्यायदर्शन में लिखा है किः-
युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम् १ । १ । १६ ॥
अर्थात् एक साथ अनेक ज्ञानों का उत्पन्न न होना मन का लिङ्ग है ।
इस प्रकार न्याय और वैशेषिक का मत समान है ॥ १ ॥
यदि कहो कि मन सिद्ध हुवा परन्तु मन का द्रव्य होना और नित्य
होना कैसे सिद्ध होंगे ? तो उत्तर-
१३८-तस्य द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ २ ॥
(तस्य) उस मन के (द्रव्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यपना और नित्यपना (वायुना)
वायु से (व्याख्याते) व्याख्यान किये ॥
जिस प्रकार वायु द्रव्य और नित्य है उसी प्रकार मन भी द्रव्य और
नित्य है । द्रव्य के लक्षण में कह चुके हैं कि जो क्रियावाला और गुणवाला
तथा समवायी कारण हो उस को द्रव्य कहते हैं, जैसे वायु गति क्रिया वाला
है वैसे मन भी गति क्रिया वाला है, जैसे वायु स्पर्श गुण वाला है वैसे मन
भी बोध गुण वाला है और जैसे वायु अपने कार्यों का समवायी कारण है
वैसे मन भी अपने कार्यों का समवायी कारण है और जैसे वायु मोक्ष पर्यन्त
स्थायी है वैसे मन भी मोक्ष पर्यन्त ठहरने वाला है । इस लिये वायु के द्रव्यत्व
और नित्यत्व के समान मन का भी द्रव्यत्व और नित्यत्व कहा गया सम-
झना चाहिये ॥ २ ॥
क्यों जी ? यह मन प्रत्येक शरीर में अनेक हैं वा एक ? उत्तरः-
१३९-प्रयत्नायौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्चैकम् ॥ ३ ॥
(प्रयत्नायौगपद्यात्) प्रयत्न के एक साथ न होने से (च) और (ज्ञाना-
यौगपद्यात्) ज्ञान के एक साथ न होने से (एकम्) एक है ॥
यदि मन अनेक होते तो एक साथ अनेक प्रयत्न हो सकते क्योंकि एक
मन से एक प्रयत्न और दूसरे मन से दूसरा प्रयत्न हो सकता । इसी प्रकार एक
९७ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
मन से एक ज्ञान और दूसरे मन से दूसरा ज्ञान हो सकता, और होता है
नहीं, इस लिये मन एक है ॥ ३ ॥
उद्देश क्रम को छोड़ कर आवश्यकता से मन की परीक्षा कही गई
अब फिर उद्देश क्रमानुसार आत्मा की परीक्षा करते हुये उस के साधक
लिङ्गों का वर्णन करते हैं:-
१४०-प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः
सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि ॥ ४ ॥
( प्राणापा-विकाराः ) प्राण, अपान, निमेष, उन्मेष, जीवन, मनो-
गति और इन्द्रियान्तरविकार, तथा ( सुखदुः-प्रयत्नाः ) सुख, दुःख, इच्छा,
द्वेष और प्रयत्न ( आत्मनः ) आत्मा के ( लिङ्गानि ) लिङ्ग हैं ॥
मुख और नासिका से बाहर निकलने वाला, ऊपर को चलने वाला,
शरीरस्थ वायु प्राण कहाता है; मूत्र और विष्ठा को नीचे निकालने वाला
शरीरस्थ वायु अपान कहाता है; आंख की पलकों को मिलाना निमेष
कहाता है, और आंख की पलकों को पृथक् करना उन्मेष कहाता है; शरीर
की वृद्धि और घाव का भर आना आदिक जीवन कहाता है; अपने चाहे
विषयों के ग्राहक इन्द्रियों से सम्बन्ध जोड़ने को उस २ विषय पर मन का
लेजाना मनोगति कहाता है; एक इन्द्रिय से ग्रहण किये हुये विषय का
दूसरे इन्द्रिय में विकार उत्पन्न होजाना-जैसे आंख से खटाई को देखकर
जीभ में पानी भर आना इन्द्रियान्तरविकार कहाता है; किसी विषय का
अनुकूल प्रतीत होना सुख कहाता है; किसी विषय का प्रतिकूल प्रतीत होना
दुःख कहाता है; अपने लिये वा पराये लिये अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना करना
इच्छा कहाता है और जिस से अपने आत्मा में जलन सी प्रतीत हो उस
अप्रियता के ज्ञान से उत्पन्न हुवा गुण द्वेष कहाता है; और कुछ करना
प्रयत्न कहाता है । यह सब आत्मा के होने में लिङ्ग हैं अर्थात् जहां आत्मा
होता है वहीं प्राणादि प्रयत्न पर्यन्त लिङ्ग पाये जाते हैं और जब आत्मा
देह से निकल जाता है तब यह लिङ्ग नहीं पाये जाते । इस लिये यह आत्मा
के लिङ्ग हैं । शरीर में प्राण और अपान दोनों रहते हैं जिन में से एक नीचे
और दूसरा ऊपर जाने वाला है, इन दोनों परस्परविरोधियों को प्रयत्न से
अपने अधिकार में रखना अर्थात् जब चाहे तब अपान को नीचे निकाले और
तृतीयाऽध्याय २ आन्हिक ९१
जब चाहे तब प्राण को ऊपर फेंके। यह सब चेष्टा बिना शरीराधिष्ठाता आत्मा
के नहीं हो सक्तीं। इस लिये प्राण और अपान आत्मा के लिङ्ग हैं। इसी
प्रकार आंख मीचना और खोलना एक दूसरे के विरोधी दो कर्म बिना किसी
स्वतन्त्र प्रयत्न करने वाले के हो नहीं सक्ते, इसलिये निमेष और उन्मेष भी
आत्मा के लिङ्ग हैं। तथा प्रतिक्षण शरीर का बढ़ना और चोट लगने पर
घाव का फिर से भरना भी, जो जीवन है, बिना किसी अधिष्ठाता आत्मा
के हो नहीं सक्ता, इसलिये जीवन आत्मा का लिङ्ग है। इसी प्रकार भिन्न २
विषयों की ग्रहण करने वाली इन्द्रियों को मन की सहायता से किसी एक
विषय में लगाना और दूसरे विषय से हटाना भी आत्मा के बिना नहीं हो
सक्ता, इसलिये मनोगति आत्मा का लिङ्ग है और नारङ्गी को आंख से देख
कर उस के स्वाद को याद करना और फिर दूसरी इन्द्रिय रसना से विकार
उत्पन्न करना आत्मा के बिना कैसे हो सकता है, इस लिये इन्द्रियान्तर
विकार आत्मा का लिङ्ग हैं। जो गुण है वह किसी द्रव्य के आश्रय रहता है
जैसा कि रूप तेज के आश्रय रहता है। इसी प्रकार सुख दुःख इच्छा द्वेष और
प्रयत्न भी गुण हैं जो किसी द्रव्य के आश्रय रहने चाहियें और वह द्रव्य
आत्मा ही हो सकता है, इस लिये सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न भी
आत्मा के लिङ्ग हैं ॥ ४ ॥
क्यों जी ! प्राणापानादि लिङ्गों से आत्मा तो सिद्ध हुवा, परन्तु आत्मा
का द्रव्यत्व और नित्यत्व कैसे सिद्ध हो ? उत्तर-
१४१-तस्य द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ५ ॥
(तस्य) उस आत्मा के (द्रव्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुना)
वायु से (व्याख्याते) कहे गये ॥
वायु के द्रव्यत्व और नित्यत्व के समान हेतु से आत्मा का भी द्रव्यत्व
और नित्यत्व कहा गया समझना चाहिये अर्थात् जैसे वायु नित्य और द्रव्य
है, वैसे ही आत्मा भी नित्य और द्रव्य है। इतना विशेष समझना चाहिये
कि वायु के समान आत्मा व्यावहारिक नित्य नहीं किन्तु वास्तविक नित्य है
और वायु व्यावहारिक नित्य है क्योंकि वायु सृष्टि के आरम्भ से प्रलय की
अवधिपर्य्यन्त नित्य है, परन्तु आत्मा प्रलय में भी नष्ट नहीं होता, इस लिये
वास्तविक नित्य है, यहां उस को वायु के समान नित्य कहना केवल नित्य
शब्द की समानता को लेकर है ॥ ५ ॥
७२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
प्रश्न- ज्ञानादि गुण तो अदृष्ट हैं ? किसी दृष्ट लिङ्ग से आत्मा सिद्ध कीजिये ?
उत्तर- सुनियेः-
१४२-यज्ञदत्त इति सन्निकर्षे प्रत्यक्षाभावाद् दृष्टं लिङ्गं न विद्यते ॥ ६ ॥
( सन्निकर्षे ) समीप होने पर भी ( यज्ञदत्तः इति ) यज्ञदत्त है, ऐसा ( प्रत्यक्षाभावात् ) प्रत्यक्ष न होने से ( दृष्टम् ) दृष्ट ( लिङ्गम् ) लिङ्ग ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता है ॥
भाव यह है कि संसार में सामने खड़े हुये देवदत्त यज्ञदत्तादि को देख कर भी केवल शरीर का प्रत्यक्ष होता है, न कि इस बात का कि यह देवदत्त है वा यज्ञदत्त है। तब फिर आत्मा के सिद्ध करने में यदि दृष्ट लिङ्ग न हो तो क्या हानि वा आश्चर्य है ? ॥ ३ ॥
तब फिर आत्मा कैसा है ? उस को कैसे जानें ? सुनियेः-
१४३-सामान्यतोदृष्टाच्चाविशेषः ॥ ७ ॥
( सामान्यतोदृष्टात् ) सामान्यतोदृष्ट से ( च ) और [ ज्ञानादि गुणों से ] ( अविशेषः ) विशेष नहीं कह सकते ॥
अर्थात् जो ज्ञानादि गुण चतुर्थ सूत्र में कहे गये हैं उन्हीं से समझलो कि इन गुणों का आश्रय कोई द्रव्य है, विशेष कुछ नहीं कह सकते ॥ ७ ॥
तो फिर उस का नाम आत्मा है, यह कैसे जानें ? उत्तरः-
१४४-तस्मादागमिकः ॥ ८ ॥
( तस्मात् ) इस कारण ( आगमिकः ) शास्त्रसिद्ध है ॥
अर्थात् जब सामान्यतोदृष्ट ज्ञानादि गुणों का आश्रय द्रव्य विशेष कोई न कोई है और वह क्या है अर्थात् उसका नाम क्या है यह बात शास्त्र में देखकर इतनी ही निश्चित होती है कि उस का नाम आत्मा है। जैसा कि “आत्मैवाभूद्विजानतः” यजुः ४०।७। “आत्मानं चेद्विजानीयात्” बृहदारण्यक ४।४।१२ इत्यादि शास्त्र में उस का नाम आत्मा पाया जाता है ॥ ८ ॥
प्रश्न- पृथिव्यादि आठ द्रव्यों में से ही किसी को आत्मा क्यों न मान लिया जाय ? उत्तर-
१४५-अहमिति शब्दस्य व्यतिरेकान्नागमिकम् ॥ ९ ॥
तृतीयाऽध्याय २ आन्हिक ३३
( अह्मिति शब्दस्य ) " अहम्=मैं" इस शब्द के ( व्यतिरेकात् ) भिन्न
होने से ( आगमिकम् ) शास्त्रानुकूल ( न ) नहीं होगा ॥
अर्थात् मैं और मेरा का व्यवहार पृथिवी आदि अन्य द्रव्यों में नहीं
पाया जाता इस कारण पृथिवी आदि अन्य आठ द्रव्यों में से किसी को आत्मा
मानना शास्त्रानुकूल नहीं ॥ ९ ॥
प्रश्न-हम तो प्रत्यक्षात्मवादी हैं, तब-
१४६-यदि दृष्टमन्वक्षमऽहं देवदत्तोऽहं यज्ञदत्त इति ॥ १० ॥
(यदि) यदि (अन्वक्षम्) आंखों सामने (दृष्टं) देखे हुवे को ( अहम्
देवदत्तः ) मैं देवदत्त हूं ( अहम् यज्ञदत्तः ) मैं यज्ञदत्त हूं ( इति ) इस प्रकार
[ आत्मा मानलेवें तो क्या हानि है ? ] ॥ १० ॥ उत्तरः-
१४७-दृष्ट आत्मनि लिङ्गे एकएव दृढत्वात्
प्रत्यक्षवत् प्रत्ययः ॥ ११ ॥
(आत्मनि) [ षष्ठ्यर्थे सप्तमी ] आत्मा के (लिङ्गे) लिङ्ग के (दृष्टे)
दृष्ट होने पर तौ ( दृढत्वात् ) दृढ़ होने से (एकः) एक (एव) ही (प्रत्ययः)
प्रतीति होती (प्रत्यक्षवत्) जैसा कि प्रत्यक्ष में होती है ॥
यदि मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञदत्त हूं, ऐसा कहने वाले देवदत्त वा यज्ञदत्त
को ही आत्मा मानलें तब तौ शरीरसमुदाय में ही दृढ़ प्रतीति होजावेगी
कि यही आत्मा है तब फिर ज्ञानादि गुणों की और उन के आश्रय द्रव्य
आत्मा की जिज्ञासा ही व्यर्थ है परन्तु शरीर को देख कर भी आत्मा को
प्रत्यक्ष नहीं देखा जाता जैसा कि इसी शास्त्र में आगे अध्याय ८ आह्निक १
सूत्र २ में कहेंगे कि " तत्रात्मा मनश्चाप्रत्यक्षे " आत्मा और मन प्रत्यक्ष नहीं।
तब देवदत्त और यज्ञदत्त संज्ञा वाले देहादि संघात को प्रत्यक्ष आत्मा कैसे
मान लिया जावे ? ॥ ११ ॥
यदि कहो कि हम तौ ज्ञानादि लिङ्गों से लिङ्गी आत्मा का प्रत्यक्ष नहीं
कहते किन्तु हम तौ यह कहते हैं कि मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञदत्त हूं, ऐसा जो
मन में निश्चय होता है, इस मानसिक प्रत्ययगोचर होने से आत्मा को
प्रत्यक्ष कहते हैं ? तो उत्तर-
१०
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७४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
१४८-देवदत्तो गच्छति यज्ञदत्तो गच्छती-
त्युपचाराच्छरीरे प्रत्ययः ॥ १२ ॥
(देवदत्तो गच्छति) देवदत्त जाता है (यज्ञदत्तो गच्छति) यज्ञदत्त जाता
है (इति) ऐसी (उपचारात्) बोलचाल होने से (शरीरे) देह में (प्रत्ययः)
निश्चय होता है ॥
देवदत्त और यज्ञदत्त को जाता हुआ देख कर जब कहते हैं कि देवदत्त
वा यज्ञदत्त जाता है, तब तौ शरीर में ही गति क्रिया देखकर यही निश्चय
होगा कि जाने वाला शरीर ही देवदत्त वा यज्ञदत्त है, न कि ज्ञानादि गुणों
वाला कोई पदार्थ आत्मा है। परन्तु बिना ज्ञानादि गुणों के भित्ति के समान
देवदत्त वा यज्ञदत्त के शरीर को कोई आत्मा नहीं मान सकता ॥१२॥ शङ्का-
१४६-संदिग्धस्तूपचारः ॥ १३ ॥
(उपचारः) बोलचाल (तु) तौ (संदिग्धः) संदेहयुक्त है ॥
अर्थात् देवदत्त जाता है, यज्ञदत्त जाता है, इस उपचार=बोलचाल से
यह पूरा निश्चय नहीं होता कि बोलने वाला देवदत्त वा यज्ञदत्त के शरीर को
जाता समझता है अथवा ज्ञानादि गुणों वाले आत्मा को जाता समझता है ॥१३॥
तथा च-यदि हमारा कहा उपचार संदिग्ध है तब मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञ-
दत्त हूं, इत्यादि प्रत्यक्ष प्रतीति शरीर में नहीं तौ किस में है ? उत्तर-
१५०-अहमिति प्रत्यगात्मनि भावात्परत्रा-
ऽभावादर्थान्तरप्रत्यक्षः ॥ १४ ॥
(अहम् इति) मैं हूं, ऐसा व्यवहार (प्रत्यगात्मनि) छिपे हुये आत्मा में
(भावात्) होने से और (परत्र) शरीर में (अभावात्) न होने से (अर्था-
न्तरप्रत्यक्षः) अन्य अर्थ का प्रत्यक्ष है ॥
अर्थात् जब 'मैं हूं' इत्यादि प्रत्यक्ष अदृष्ट आत्मा में होता है और शरीर
में नहीं होता तब मैं देवदत्त हूं, मैं यज्ञदत्त हूं, ऐसा जो प्रत्यक्ष होता है उस
को अर्थान्तर (आत्मा) का ही प्रत्यक्ष कह सकते हैं ॥ १४ ॥
आगे पूर्वपक्षी अपने पक्ष का समाधान करता है किः-
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.