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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 160 में से

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पृष्ठ 75

तृतीयाऽध्याय २ आन्हिक ९१
जब चाहे तब प्राण को ऊपर फेंके। यह सब चेष्टा बिना शरीराधिष्ठाता आत्मा
के नहीं हो सक्तीं। इस लिये प्राण और अपान आत्मा के लिङ्ग हैं। इसी
प्रकार आंख मीचना और खोलना एक दूसरे के विरोधी दो कर्म बिना किसी
स्वतन्त्र प्रयत्न करने वाले के हो नहीं सक्ते, इसलिये निमेष और उन्मेष भी
आत्मा के लिङ्ग हैं। तथा प्रतिक्षण शरीर का बढ़ना और चोट लगने पर
घाव का फिर से भरना भी, जो जीवन है, बिना किसी अधिष्ठाता आत्मा
के हो नहीं सक्ता, इसलिये जीवन आत्मा का लिङ्ग है। इसी प्रकार भिन्न २
विषयों की ग्रहण करने वाली इन्द्रियों को मन की सहायता से किसी एक
विषय में लगाना और दूसरे विषय से हटाना भी आत्मा के बिना नहीं हो
सक्ता, इसलिये मनोगति आत्मा का लिङ्ग है और नारङ्गी को आंख से देख
कर उस के स्वाद को याद करना और फिर दूसरी इन्द्रिय रसना से विकार
उत्पन्न करना आत्मा के बिना कैसे हो सकता है, इस लिये इन्द्रियान्तर
विकार आत्मा का लिङ्ग हैं। जो गुण है वह किसी द्रव्य के आश्रय रहता है
जैसा कि रूप तेज के आश्रय रहता है। इसी प्रकार सुख दुःख इच्छा द्वेष और
प्रयत्न भी गुण हैं जो किसी द्रव्य के आश्रय रहने चाहियें और वह द्रव्य
आत्मा ही हो सकता है, इस लिये सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न भी
आत्मा के लिङ्ग हैं ॥ ४ ॥
क्यों जी ! प्राणापानादि लिङ्गों से आत्मा तो सिद्ध हुवा, परन्तु आत्मा
का द्रव्यत्व और नित्यत्व कैसे सिद्ध हो ? उत्तर-
१४१-तस्य द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ५ ॥
(तस्य) उस आत्मा के (द्रव्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुना)
वायु से (व्याख्याते) कहे गये ॥
वायु के द्रव्यत्व और नित्यत्व के समान हेतु से आत्मा का भी द्रव्यत्व
और नित्यत्व कहा गया समझना चाहिये अर्थात् जैसे वायु नित्य और द्रव्य
है, वैसे ही आत्मा भी नित्य और द्रव्य है। इतना विशेष समझना चाहिये
कि वायु के समान आत्मा व्यावहारिक नित्य नहीं किन्तु वास्तविक नित्य है
और वायु व्यावहारिक नित्य है क्योंकि वायु सृष्टि के आरम्भ से प्रलय की
अवधिपर्य्यन्त नित्य है, परन्तु आत्मा प्रलय में भी नष्ट नहीं होता, इस लिये
वास्तविक नित्य है, यहां उस को वायु के समान नित्य कहना केवल नित्य
शब्द की समानता को लेकर है ॥ ५ ॥