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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 160 में से

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पृष्ठ 74

९७ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
मन से एक ज्ञान और दूसरे मन से दूसरा ज्ञान हो सकता, और होता है
नहीं, इस लिये मन एक है ॥ ३ ॥
उद्देश क्रम को छोड़ कर आवश्यकता से मन की परीक्षा कही गई
अब फिर उद्देश क्रमानुसार आत्मा की परीक्षा करते हुये उस के साधक
लिङ्गों का वर्णन करते हैं:-
१४०-प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः
सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि ॥ ४ ॥
( प्राणापा-विकाराः ) प्राण, अपान, निमेष, उन्मेष, जीवन, मनो-
गति और इन्द्रियान्तरविकार, तथा ( सुखदुः-प्रयत्नाः ) सुख, दुःख, इच्छा,
द्वेष और प्रयत्न ( आत्मनः ) आत्मा के ( लिङ्गानि ) लिङ्ग हैं ॥
मुख और नासिका से बाहर निकलने वाला, ऊपर को चलने वाला,
शरीरस्थ वायु प्राण कहाता है; मूत्र और विष्ठा को नीचे निकालने वाला
शरीरस्थ वायु अपान कहाता है; आंख की पलकों को मिलाना निमेष
कहाता है, और आंख की पलकों को पृथक् करना उन्मेष कहाता है; शरीर
की वृद्धि और घाव का भर आना आदिक जीवन कहाता है; अपने चाहे
विषयों के ग्राहक इन्द्रियों से सम्बन्ध जोड़ने को उस २ विषय पर मन का
लेजाना मनोगति कहाता है; एक इन्द्रिय से ग्रहण किये हुये विषय का
दूसरे इन्द्रिय में विकार उत्पन्न होजाना-जैसे आंख से खटाई को देखकर
जीभ में पानी भर आना इन्द्रियान्तरविकार कहाता है; किसी विषय का
अनुकूल प्रतीत होना सुख कहाता है; किसी विषय का प्रतिकूल प्रतीत होना
दुःख कहाता है; अपने लिये वा पराये लिये अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना करना
इच्छा कहाता है और जिस से अपने आत्मा में जलन सी प्रतीत हो उस
अप्रियता के ज्ञान से उत्पन्न हुवा गुण द्वेष कहाता है; और कुछ करना
प्रयत्न कहाता है । यह सब आत्मा के होने में लिङ्ग हैं अर्थात् जहां आत्मा
होता है वहीं प्राणादि प्रयत्न पर्यन्त लिङ्ग पाये जाते हैं और जब आत्मा
देह से निकल जाता है तब यह लिङ्ग नहीं पाये जाते । इस लिये यह आत्मा
के लिङ्ग हैं । शरीर में प्राण और अपान दोनों रहते हैं जिन में से एक नीचे
और दूसरा ऊपर जाने वाला है, इन दोनों परस्परविरोधियों को प्रयत्न से
अपने अधिकार में रखना अर्थात् जब चाहे तब अपान को नीचे निकाले और