बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
त्रिपुरविमान ] [ ३३७
: उसके ऊपर मञ्जूषद्रव - मजीठ रस ? का पात्र रखे उसमें आतपोष्णोपसंहार मणि डाले या
लगावे रखे, इसी प्रकार उष्णता को हटाने वाले अभ्रकचक्रों को यथाविधि घूमने वाले दान्तेयुक्त सामने
भूमि पर भ्रामणी - घुमाने वाले दण्डकीलों से संयुक्त को संस्थापित करके पुनः कील भ्रमणार्थ त्रिचक्रकील
को उसमें सरलता से नियुक्त करे उसके चलाने से छत्रभ्रमण वेग से होता है उस से छत्रानुसार आत-
पोष्णभ्रमण होवे पश्चात् उष्णतापहारक अभ्रकचक्र यथाक्रम - ॥ ३१६-३२० ॥
सङ्ग्राहयेदातपोष्णशक्तिं वेगात् स्वशक्तितः ।
आतपोष्णोपसंहारमणिः पश्चात् स्वतेजसा ॥ ३२१ ॥
तच्छक्तिमपहृत्य स्वमुखतः पिबति क्रमात् ।
मञ्जूषद्रावक पश्चात्तच्छक्तिवेगतः पुनः ॥ ३२२ ॥
समाहृत्यातिशीतस्वभावं तस्याः प्रयच्छति ।
शैत्यत्वं प्राप्य तच्छक्तिः पश्चाद् वेगस्वभावतः ।। ३२३ ।।
वायुमण्डलमासाद्य तत्रैव लयमेधते ।
तस्माद् यानस्यातपोष्णानिवृत्तिः प्रभवेत् क्रमात् ॥ ३२४ ॥
तेनात्यन्तसुखं यानयन्तॄणां प्रभवेत् ततः ।
स्थापयेदातपोष्णोपहारयन्त्रं यथाविधि ॥ ३२५ ॥
अपनी शक्ति से आतपोष्णशक्ति को वेग से ले ले-ले लेगा पश्चात् आतपोष्णसंहारमणि
स्वतेज से उस शक्ति को लेकर अपने मुख से पीती है पश्चात् मञ्जूषद्रावक उस शक्ति को वेग से एकत्र
कर उसके लिए अतिशीत स्वभाव को देता है वह शक्ति शीतता को प्राप्त कर वेग से स्वभावतः वायु-
मण्डल को प्राप्त होकर वहां ही लय को प्राप्त हो जाता है अतः यान की आतपोष्णता की निवृत्ति हो
जाती है इस विमान के नायक - यात्रियों को सुख होता है अतः आतपोष्णोपसंहार यन्त्र स्थापित
करे ॥ ३२१-३२५ ॥
अन्यथा यन्तॄणां कष्टं भवत्येव न संशयः ।
एवमुक्तस्वातपोष्णोपहारयन्त्रं यथाविधि ॥ ३२६ ॥
यानतृतीयावरणरचनाविधिरुच्यते ।
प्रथमावरणे पूर्वं द्वितीयावरणस्य हि ॥ ३२७ ॥
स्थापनार्थं यथासन्धानकीलानि यथाविधि ।
स्थापितानि तथैवास्मिन् द्वितीयावरणेपि च ॥ ३२८ ॥
तृतीयावरणस्थापनार्थं चैव यथाक्रमम् ।
सन्धारयेत्कीलकानि सर्वतस्सुदृढान्यथा ॥ ३२६ ॥
तृतीयावरणपीठाधः प्रदेशेप्यथाक्रमम् ।
ऊर्ध्वाधोभागकीलानां यथा संयोजनं भवेत् ॥ ३३० ॥
अन्यथा नायक यात्रियों को कष्ट होता ही है इसमें संशय नहीं । इस प्रकार आतपोष्णोपसंहार
यन्त्र यथाविधि कहकर विमान के तृतीय आवरण की रचनाविधि कही जाती है । प्रथम आवरण के ऊपर
३३८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
द्वितीय आवरण के स्थापनार्थ जोड के अनुसार कीलें स्थापित की हैं वैसे ही द्वितीय आवरण में भी
तृतीय आवरण की स्थापना के अर्थ यथाक्रम सुदृढ कीलें लगावे । तृतीय आवरण के पीठ के नीचे प्रवेश
में भी यथाक्रम ऊपर नीचे के भागों की कीलों का संयोजन हो जावे ॥ ३२६-३३० ॥
कीलकानि तथा सम्यक् सुदृढ कल्पयेत् क्रमात् ।
द्वितीयावरणात्पञ्चवितस्त्यूनं यथा दृढम् ॥ ३३१ ॥
चतुरस्रं वर्तुंलं वा तृतीयावरणस्य च ।
पीठं कृत्वा तदुपरि द्वितीयावरणे यथा ॥ ३३२ ॥
तथैवात्रापि कर्तव्यं गृहकुड्यादयः क्रमात् ।
तृतीयावरणस्येशान्यदिग्भागे यथाविधि ॥ ३३३ ॥
विद्युद्यन्त्रस्थापनार्थं चतुरस्रं सकीलकम् ।
सोमाङ्कलोहेन क्रमात् कुर्यादावरणं दृढम् ॥ ३३४ ॥
तस्मिन् संस्थापयेद् विद्युद्यन्त्र शास्त्रोक्तवर्त्मना ।
उस प्रकार कीलें सुदृढ सम्यक् क्रम से लगावे, तृतीय आवरण का पीठ चौकोर या गोल करके
उसके ऊपर जैसे द्वितीय आवरण पर करने की भाँति यहां भी करना चाहिये क्रम से कमरे भित्ति आदि
तृतीय आवरण के ईशानी दिशा भाग में यथाविधि विद्युद्यन्त्र स्थापनार्थ चौकोर कीलसहित आवरण
सोमाङ्क लोहे से करे, उसमें शास्त्रोक्त विधि से विद्युद्यन्त्र स्थापित करे ॥ ३३१-३३४ ॥
सोमाङ्कलोहमुक्तं लोहतन्त्रे-सोमाङ्क लोहा कहा है लोहतन्त्र में-
नागं पञ्चास्यकं चैव सप्तमं रविमेव च ।
नवमं चुम्बुकं तद्वन्नलिकात्वक् शराणिकम् ॥ ३३५ ॥
टङ्कणं च समालोड्य समभागान् यथाक्रमम् ।
सर्पास्यमूषामध्येथ पूरयित्वा यथाविधि ॥ ३३६ ॥
नागकुण्डान्तरे स्थाप्य इङ्ग्लान् परिपूर्य च ।
त्रिपञ्चाशदुत्तरत्रिशतकक्ष्योष्णमानत ॥ ३३७ ॥
सम्यग्धमनेच्छशमुखभस्त्राद् वेगेन शास्त्रतः ।
समीकरणयन्त्रेथ तद्रसं परिपूरयेत् ॥ ३३८ ॥
पश्चादत्यन्तमृदुलं विद्युद्गर्भं दृढं लघु ।
सोमाङ्कलोहं भवति अविनाश मनोहरम् ॥ ३२६ ॥ इत्यादि ॥
सीसा, पञ्चास्य-लोह विशेष ? रवि-ताम्बा प्रत्येक ७ भाग, चुम्बुक ६ भाग, नलिकात्वक्-
नली की छाल, शराणिक-शरणा-प्रसारिणी का क्षार या शराटिक-खदिरपर्णी-दुर्गन्ध खैर या कत्था,
सुहागा इनके समान भागों को मिला कर सर्पास्य-सर्पमुख कृत्रिममोतल के अन्दर यथाविधि भरकर नाग-
कुण्ड के अन्दर रख कर अंगारे भर कर ३५३ दर्जे की उष्णता से शशमुख भस्त्रा से वेग से धोंके उस
पिंघले रस को समीकरण यन्त्र में भर दे फिर वह अत्यन्त मृदु विद्युत् को गर्भ में लिए हुए स्थिर रहने
वाला मनोहर सोमाङ्क लोहा हो जाता है ॥ ३३५-३३६ ॥
त्रिपुरविमान ] [ ३३६
तल्लोहं कुट्टिणीमन्त्रात् पट्टिकां कारयेत् ततः ।
वितस्तित्रयमायामं वितस्त्यष्टकमुन्नतम् ॥ ३४० ॥
दोलाकारेणैकपात्रं कृत्वा तस्य मुखोपरि ।
आच्छाद्य पट्टिकामेका बध्नीयात् कीलकैर्दृढम् ॥ ३४१ ॥
सार्धवितस्तिप्रमाणायामं छिद्रद्वयं क्रमात् ।
पूर्वोत्तरविभागाभ्यां कृत्वा तस्मिन् यथाविधि ॥ ३४२ ॥
स्थापयेद् विद्युदागारे कीलकैस्सुदृढ यथा ।
तद्रन्ध्राधः प्रदेशेऽथ दोलामध्ये यथाक्रमम् ॥ ३४३ ॥
पीठद्वयं कीलयुक्तं स्थापयेत् तावदेव हि ।
वितस्तिद्वयमायामं चतुर्वितस्तिरुन्नतम् ॥ ३४४ ॥
पिञ्जुलीपात्रं कुर्यात् पात्रद्वयमत परम् ।
षडङ्गुलायामयुक्तान् वितस्त्येकोन्नतान् तथा ॥ ३४५ ॥
कृत्वाष्टचषकान्
३४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
कृत्वा तन्मन्थुमध्यक्ष्ये स्थापयेन्मध्यरन्ध्रतः ।
यथान्योन्यस्पर्शनं स्यात्तथा सन्धारयेद् दृढम् ॥ ३५३ ॥
एक एक पात्र पर चार चषक ( गिलास पात्र ) हों ऐसा कहा है । इन चषकों के मध्य में
अन्योऽन्य स्पर्श हो । दो पात्रों पर एक एक बड़ा चषक रखे पश्चात् दो पात्रों के मुख पर पांच छिद्रों से
युक्त एक एक पट्टिका सम्यक् कीलों से जोड दे । दोनों पात्र दोलामुख के दोनों छिद्रों में प्रविष्ट कर-घुसा
कर वहां के पीठ के मध्य देश में दृढ रख दे । पांच अंगुल लम्बाई से युक्त तथा आठ अंगुल से ऊंचे
इक्षु यन्त्र ( ईख पीडने के कोल्हू ) आदि के समान दान्तोंसहित आठ मन्थु—मथन साधनों को करावे,
एक एक पात्र अन्दर से चषकों में यथाक्रम चारों दिशाओं में शास्त्रानुसार ४ मन्थु लगावे वैसे दो मध्य
मन्थान लगावे उन दोनों से घन-मथित वस्तु करके उसे मन्थु के मध्य में मध्य छिद्र से स्थापित कर दे
जिससे अन्योऽन्य स्पर्श इनका हो जावे ॥ ३४७-३५३ ॥
पात्रद्वयमुखच्छिद्रद्वारेणैव प्रवेशयेत् ।
मध्यस्थमन्थुदण्डस्योपरिभागे यथाविधि ॥ ३५४ ॥
सर्वमन्थुसमाशो यथा स्यात् तद्वदेव हि ।
सन्धारयेच्चक्रावर्तकीलकं सुदृढं यथा ॥ ३५५ ॥
मध्यमन्थुभ्रामणेन सर्वमन्थुभ्रमो यथा ।
भवेत् तथा प्रकर्तव्यं तेषा कीलकतः क्रमात् ॥ ३५६ ॥
अथ यन्त्रमुखाद् विद्युच्छक्ति सूर्यांशुभि क्रमात् ॥ ३५७ ॥
समाहर्तुं विशेषेण उपाय परिकीर्त्यते ।
पूर्वोक्तदोलामध्यस्थपात्रयोरुपरि क्रमात् ॥ ३५८ ॥
द्विनवत्युत्तरशतसंख्याकेनैव हि क्रमात् ।
किरणाकर्षणार्दशादष्टनालान् प्रकल्पयेत् ॥ ३५६ ॥
पश्चादेकैकपात्रोपर्यथ नालैः प्रकल्पितान् ।
स्तम्भान् संस्थापयेत् सम्यक् चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ॥ ३६० ॥
दोनों पात्रों के मुख वाले छिद्रों से प्रविष्ट करे, मध्यस्थ मन्थुदण्ड के ऊपर भाग में यथाविधि
सर्वमन्थु समावेश जैसे हो वैसे ही चक्र को घुमाने वाली कील को दृढ लगावे, मध्य के मन्थु के घुमाने
से सारे मन्थुओं का घूमना जिससे हो जावे उनकी कीलों से वैसे करना चाहिए । यन्त्रमुख से विद्युत्
शक्ति को सूर्यकिरणों से ले लेने को विशेष रूप से उपाय कहा जाता है । पूर्वोक्त दोलामध्यस्थ पात्रों के
ऊपर १६२ संख्याक्रम से ही किरणाकर्षण आदर्श से ८ नालों को बनावे, पश्चात् एक एक पात्र के ऊपर
नालों से सम्बद्ध किये स्तम्भों को चारों दिशाओं में स्थापित करे ॥ ३५४-३६० ॥
तेषामुपरि पञ्चास्यकर्णिकान् स्थापयेत् क्रमात् ।
रुक्मपुच्छाशरां तेषु पूरयित्वा ततः परम् ॥ ३६१ ॥
विद्युदाकर्षकंमणीन् तेषु सन्धारयेद् दृढम् ।
पूर्वोक्तांशुपदर्पणावरण चोपरिक्रमात् ॥ ३६२ ॥
त्रिपुराविमान ] [ १४१
कृत्वा तदूर्ध्वे पञ्चशिखराकारगोपुरम् ।
कुर्यादेकं ऋशिखरमुखे चञ्चुपुटाकृतिम् ॥ ३६३ ॥
कल्पयित्वा ततस्तस्मिन् सिञ्जीरकमणीनथ ।
स्थापयेदंशुवाहकमणीनपि यथाविधि ॥ ३६४ ॥
अंशुमित्रमणिं मध्यशिखाग्रे दृढं यथा ।
चतुर्मणीनामुपरि गोभिलोक्तविधानतः ॥ ३६५ ॥
उन स्तम्भों के ऊपर पञ्चमुखी कर्णफूल—? उनमें कनकपुङ्खबाण—सुनहरे शर का बाण भरकर
विद्युदाकर्षण मणियों को उनमें लगा दे, पूर्व कहे अंशुपादर्पण आवरण को ऊपर करके उसके ऊपर
पांच शिखर आकार वाला गोपुर—गवाक्ष झरोखा करे, एक एक शिखरमुख पर चञ्चुपुट—चूंच की
आकृति जैसा बनाकर उसमें सिञ्जीरक ? मणियों को स्थापित करे अंशुवाहक मणियों को भी लगावे, बीच
के शिखराग्र में चारों मणियों के ऊपर अंशुमित्रमणि—सूर्यकान्त मणि ? को गोभिल के विधान से
लगावे ॥ ३६१–३६५ ॥
षडङ्गुलायामयुक्तं वितस्तित्रयमुन्नतम् ।
किरणाकर्षणदर्शात् कृतं नालचतुष्टयम् ॥ ३६६ ॥
स्थापयित्वा तदुपरि द्रावकैःशोधितान्यथ ।
चतुर्वितस्त्यायामयुतमुखपात्राण्यथाविधि ॥ ३६७ ॥
सन्धारयेच्छङ्कुकीलैरच्छिद्राणि दृढान् यथा ।
तेषु सम्पूरयेद् रुद्रजटावालं प्रमाणतः ।: ३६८ ॥
भ्रामणीघुटिकान्तेषु विन्यसेन्मध्यकेन्द्रके ।
किरणाकर्षण वेगाद् भ्रामणीघुटिकास्ततः ॥ ३६९ ॥
कृत्वा तन्नालमार्गेण अन्त. प्रेषयति क्रमात् ।
शिखराग्रस्थमणय तच्छक्तिं पिबन्ति* क्रमात् ॥३७०॥
६ अङ्गुल लम्बाई से युक्त ३ बालिश्त ऊंचा किरणाकर्षण दर्पण से किए हुए ४ नालें स्थापित
करके उनके ऊपर द्रावकों से शुद्ध किए हुए छिद्ररहित ४ बालिश्त लम्बाई से युक्त मुखपात्रों को यथा-
विधि शंकुकीलों से स्थिर करदे । उन पात्रों में रुद्रजटावाल-शंकरजटा-बालछड़ के बाल प्रमाण से भरदे,
अन्त स्थानों में भ्रामणी घुटिका मध्यकेन्द्र में लगावे । किरणाकर्षण वेग से भ्रामणी घुटिका करके उनके
नालभाग से अन्दर प्रेरित करता है शिखराग्रस्थित मणियां उस शक्ति को पीती हैं ॥३६६–३७०॥
तदन्त स्थितसिञ्जीरमणिसंज्ञापि तथैव हि ।
अंशुमित्रमणिश्चैव तच्छक्तिमपकर्षति ॥३७१॥
तच्छक्तिमंशुपादर्शविवरणं परिगृह्य च ।
विद्युदाकर्षक मणिसन्धौ नियोजयेत् ॥३७२॥
पश्चादन्तस्थितकर्णिकास्तां सम्यक् समाहरेत् ।
तदधस्स्थितदण्डेषु मध्यदण्डाग्रतः क्रमात् ॥३७३॥
- वचनव्यत्ययेन पिबन्ति स्थाने पिबति ।
शक्तिं सम्प्रेषयेत् सम्यग्वेगेन स्वीयतेजसा ।
मध्यदण्डाभ्रमणेन मन्थूनां भ्रमणं भवेत् ॥३७४॥
भ्रमणाद् द्रावके शक्तिः प्रविश्याथ यथाक्रमम् ।
तत्रत्यमणिभिस्सम्यगाकृष्टा व्रजति क्षणात् ॥३७५॥
उनके अन्दर स्थित सिब्जीरमणि ? भी वैसे ही अंशुमित्रमणि भी इस शक्ति को खींचती
है, उस शक्ति को अंशुरादर्श के आवरण को लेकर विद्युदाकर्षणमणि सन्धि में नियुक्त करवे,
पश्चात् अन्दर स्थित कर्णिकाओं-छल्लों या फूलदार पेचों को ? उस शक्ति को सम्यक् लेले उनके नीचे
वाले दण्डों में मध्य दण्डाग्र से शक्ति को वेग से स्वीयतेज से प्रेरित करवे, मध्य दण्ड के घुमाने
से मन्थुओं—मन्थन साधनों का भ्रमण होता है भ्रमण से द्रावक शक्ति प्रविष्ट होकर यथाक्रम यहां की
मणियों से तुरन्त खींची हुई गति करती है ॥३७१-३७५॥
तद्वेगान्माणयस्सम्यग्भ्रामयन्त्यतिवेगतः ।
तद्वेगाच्छक्तेो†रुत्पत्तिरत्यन्तं प्रभवेत् क्रमात् ॥३७६॥
एकछोटिकावच्छिन्नकाले शक्तिः स्वभावतः ।
अशीत्युत्तरसहस्रलिङ्गुमात्र भवेत्स्वतः ॥३७७॥
दोलामुखस्थगणपयन्त्रेणाथ यथाविधि ।
समाकृष्याथ तच्छक्तिं स्थापयेन्मध्यकेन्द्रके ॥३७८॥
उसके वेग से मणियां अतिवेग से घूमती हैं उनके वेग से शक्ति की अत्यन्त उत्पत्ति हो
जाती है, एक चुटकी बजाने मात्र काल में स्वभावतः शक्ति १०८० लिङ्गु (डिग्री) मात्रा में स्वतः हो जावे
दोलामुखस्थित गणपयन्त्र से यथाविधि उस शक्ति को खींचकर मध्य केन्द्र में स्थापित करे ॥३७६-३७८॥
अथ गणपयन्त्रस्वरूपमाह स एष—अब गणप यन्त्र के स्वरूप को उसने ही कहा है—
वितस्त्यैकायामयुक्तं वितस्तित्रयमुन्नतं ।
कुर्याद् विघ्नेश्वराकारयन्त्रमेकं यथाविधि ॥३७६॥
तदुत्तमाङ्गाच्छुण्डीराकारवद् वक्रतं क्रमात् ।
काचावरणसंयुक्तमन्तस्तन्त्रिसमायुतम् ॥३८०॥
नालमेकं प्रकल्प्याथ दोलामुखस्थकीलके ।
सन्धार्यागणपकण्ठनाभ्यन्तं पार्श्वयोर्द्वयो ॥३८१॥
१ बालिस्त लम्बाई युक्त ३ बालिस्त ऊंचा विघ्नेश्वराकार वाला—गणपति आकार वाला
एक यन्त्र यथाविधि, उसका ऊपर का आकार शुण्डीराकार वाला—हाथी शूण्डाकार वाला क्रमशः वक्र
बनावे, काच के आवरण से युक्त अन्दर—तारोसहित एक नाल बनाकर दोलामुख में स्थित कील में
लगाकर गणपयन्त्र के कण्ठ नाभि तक दोनों पाश्वों में लगावे ॥२७६-३८१॥
अङ्गुलत्रयविस्तारं दन्तचक्राणि योजयेत् ।
तथैव तत्कण्ठदेशे बृहच्चक्रं च स्थापयेत् ॥३८२॥
† शक्तित्पत्तिः ? (हस्तलेखपाठः) ।
त्रिपुरविमान ] [ ३४३
करमध्यादागताया. शक्तेश्चलनवेगत ।
बृहच्चक्रं स्वभावेन भ्राम्यते वेगतः क्रमात् ॥३८३॥
तद्वेगतोन्तरचक्राणां भ्रमणं स्याद् यथाक्रमम् ।
तथा कीलकसन्धानं कारयेद् विधिवत् ततः ॥३८४॥
आवृत्ततन्त्रिं तन्मध्ये कुण्डलीवत् प्रकल्पयेत् ।
तन्मध्ये सप्तषष्टिशङ्क (शङ्कु ?)†सिंहिकाभिधम् ॥३८५॥
३ अङ्गुल चौड़े बड़े दान्तों वाले चक्र लगावे, उसी भांति उसके कण्ठ देश में बड़ा चक्र
स्थापित करे, कर-शुण्ड से आई हुई शक्ति के चलनवेग - गतिवेग से बड़ा चक्र स्वभाव से वेग से
घूमता है उसके वेग से अन्दर के चक्रों का भ्रमण यथाक्रम हो जावे इस प्रकार कील जोड़ना चाहिए।
घूमने वाला तार उसके मध्य में कुण्डली की भांति रखे उसके मध्य में शङ्क सिंहिक नाम का ऊपर से
पीठ वाला हो ॥३८२-३८५॥
क्रव्यादलोहावरणसंयुक्तं स्थापयेद् दृढम् ।
जीवावकद्रावकं च पञ्चचञ्चू प्रमाणत ॥३८६॥
सम्पूर्य तस्मिन् सप्तदशोत्तरद्विशतात्मकम् ।
भामुखप्रामुखं नाम मणिं संयोजयेत् तत ॥३८७॥
अङ्गुलद्वयमायामच्छत्रीन् पञ्च प्रकल्प्य च ।
बृहद्गुञ्जीप्रमाणांशु पञ्चांशुमित्रमणीन् क्रमात् ॥३८८॥
सन्धारयेत् पञ्च छत्रीशिखरेषु यथाक्रमम् ।
एकीभूयाथ तत्पञ्चछत्रिणो भ्रामयन्त्यथा ॥३८६॥
तथा कीलकसन्धानं कृत्वा शङ्कोपरि न्यसेत् ।
अंशुपादर्शावरणं तेषामुपरि कल्पयेत् ॥३९०॥
क्रव्याद् लोहे-तीक्ष्ण जाति लोहे-ताम्बा मिल लोहे के आवरण से युक्त स्थापित करे,
जीवावक-शङ्क ? के द्रावक ५ चञ्चू-चून्च-चमच ? या एरण्ड प्रमाण ? प्रमाण से भरकर उससे
२१७ भामुख ? प्रामुख ? मणि को लगावे । २ अङ्गुल लम्बी ५ छत्रियों को युक्त करे बडी गुञ्जा-रत्ति
के माप की ५ अंशुमित्र - सूर्यकान्त मणियों को पांच छत्रियों के शिखर पर लगावे जड़े फिर वे छत्रियों
को मिलकर घुमाती हैं उस कील को लगाकर शङ्क के ऊपर इसे अंशु दर्पण का आवरण उनके
ऊपर रखे ॥३८६-३९०॥
तत्सूर्यकिरणांन्तस्स्थशक्तिं स्वस्मिन् स्वभावत' ।
: चतुरशीतिलिङ्गप्रमाणवेगं स्वशक्तितः ॥३९१॥
एकछोटिकावच्छिन्नकालेनाकृष्य तान् पिबेत् ।
पश्चादावरणादर्शस्थितशक्तिं स्वतेजसा ॥३६२॥
पूर्वोक्तछत्रीशिखरस्थिता ये मणयः क्रमात् ।
† शङ्कु या शङ्ख पाठ होना चाहिए । श्लोक ३९० में शङ्क है, अतः शङ्क यहां भी रखा है।
तिवेगतः ।
Line 7: सहस्रलिङ्गुप्रमाणविद्युत् सजायते क्रमात् ॥३६५॥
Line 8: उन सूर्यकिरणों के अन्दर स्थित शक्ति को स्वभावतः अपने अन्दर ८४ लिङ्गु (डिग्री) प्रमाण
Line 9: का वेग चुटकी बजाने मात्र समय में खींच कर उन्हें पी ले, पश्चात् आवरण आदर्श में स्थित शक्ति
Line 10: को अपने तेज से पूर्व कही छत्री शिखरों में स्थित वे मणियां उस शक्ति को खींच कर वेग से पीती हैं-
Line 11: लेती हैं पश्चात् शक्ति वेग से मणियां घूमती हैं एक चुटकी बजाने समय में सहस्र लिङ्गु (डिग्री) की
Line 12: बिजुली उत्पन्न हो जाती है ॥३६१-३६५॥
Line 13: शङ्खस्थद्रावकं पश्चात् तच्छक्तिमपकर्षति ।
Line 14: द्रावकस्थमणिः पश्चात् स्वपूर्वमुखतः क्रमात् ॥३६६॥
Line 15: समाकृष्याथ तच्छक्तिं वेगात् पिबति तत्क्षणात् ।
Line 16: ततस्तत्पश्चिममुखाच्छक्ति प्रवहति स्वतः ॥३६७॥
Line 17: कार्यनिर्वाहणायाथ तच्छक्तिं तन्त्रीभिः क्रमात् ।
Line 18: समाहृत्यातिवेगेन यत्र कुत्रापि
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