बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतिवेगतः ।
Line 7: सहस्रलिङ्गुप्रमाणविद्युत् सजायते क्रमात् ॥३६५॥
Line 8: उन सूर्यकिरणों के अन्दर स्थित शक्ति को स्वभावतः अपने अन्दर ८४ लिङ्गु (डिग्री) प्रमाण
Line 9: का वेग चुटकी बजाने मात्र समय में खींच कर उन्हें पी ले, पश्चात् आवरण आदर्श में स्थित शक्ति
Line 10: को अपने तेज से पूर्व कही छत्री शिखरों में स्थित वे मणियां उस शक्ति को खींच कर वेग से पीती हैं-
Line 11: लेती हैं पश्चात् शक्ति वेग से मणियां घूमती हैं एक चुटकी बजाने समय में सहस्र लिङ्गु (डिग्री) की
Line 12: बिजुली उत्पन्न हो जाती है ॥३६१-३६५॥
Line 13: शङ्खस्थद्रावकं पश्चात् तच्छक्तिमपकर्षति ।
Line 14: द्रावकस्थमणिः पश्चात् स्वपूर्वमुखतः क्रमात् ॥३६६॥
Line 15: समाकृष्याथ तच्छक्तिं वेगात् पिबति तत्क्षणात् ।
Line 16: ततस्तत्पश्चिममुखाच्छक्ति प्रवहति स्वतः ॥३६७॥
Line 17: कार्यनिर्वाहणायाथ तच्छक्तिं तन्त्रीभिः क्रमात् ।
Line 18: समाहृत्यातिवेगेन यत्र कुत्रापि