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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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त्रिपुरविमान ] [ ३४३
करमध्यादागताया. शक्तेश्चलनवेगत ।
बृहच्चक्रं स्वभावेन भ्राम्यते वेगतः क्रमात् ॥३८३॥
तद्वेगतोन्तरचक्राणां भ्रमणं स्याद् यथाक्रमम् ।
तथा कीलकसन्धानं कारयेद् विधिवत् ततः ॥३८४॥
आवृत्ततन्त्रिं तन्मध्ये कुण्डलीवत् प्रकल्पयेत् ।
तन्मध्ये सप्तषष्टिशङ्क (शङ्कु ?)†सिंहिकाभिधम् ॥३८५॥
३ अङ्गुल चौड़े बड़े दान्तों वाले चक्र लगावे, उसी भांति उसके कण्ठ देश में बड़ा चक्र
स्थापित करे, कर-शुण्ड से आई हुई शक्ति के चलनवेग - गतिवेग से बड़ा चक्र स्वभाव से वेग से
घूमता है उसके वेग से अन्दर के चक्रों का भ्रमण यथाक्रम हो जावे इस प्रकार कील जोड़ना चाहिए।
घूमने वाला तार उसके मध्य में कुण्डली की भांति रखे उसके मध्य में शङ्क सिंहिक नाम का ऊपर से
पीठ वाला हो ॥३८२-३८५॥
क्रव्यादलोहावरणसंयुक्तं स्थापयेद् दृढम् ।
जीवावकद्रावकं च पञ्चचञ्चू प्रमाणत ॥३८६॥
सम्पूर्य तस्मिन् सप्तदशोत्तरद्विशतात्मकम् ।
भामुखप्रामुखं नाम मणिं संयोजयेत् तत ॥३८७॥
अङ्गुलद्वयमायामच्छत्रीन् पञ्च प्रकल्प्य च ।
बृहद्गुञ्जीप्रमाणांशु पञ्चांशुमित्रमणीन् क्रमात् ॥३८८॥
सन्धारयेत् पञ्च छत्रीशिखरेषु यथाक्रमम् ।
एकीभूयाथ तत्पञ्चछत्रिणो भ्रामयन्त्यथा ॥३८६॥
तथा कीलकसन्धानं कृत्वा शङ्कोपरि न्यसेत् ।
अंशुपादर्शावरणं तेषामुपरि कल्पयेत् ॥३९०॥
क्रव्याद् लोहे-तीक्ष्ण जाति लोहे-ताम्बा मिल लोहे के आवरण से युक्त स्थापित करे,
जीवावक-शङ्क ? के द्रावक ५ चञ्चू-चून्च-चमच ? या एरण्ड प्रमाण ? प्रमाण से भरकर उससे
२१७ भामुख ? प्रामुख ? मणि को लगावे । २ अङ्गुल लम्बी ५ छत्रियों को युक्त करे बडी गुञ्जा-रत्ति
के माप की ५ अंशुमित्र - सूर्यकान्त मणियों को पांच छत्रियों के शिखर पर लगावे जड़े फिर वे छत्रियों
को मिलकर घुमाती हैं उस कील को लगाकर शङ्क के ऊपर इसे अंशु दर्पण का आवरण उनके
ऊपर रखे ॥३८६-३९०॥
तत्सूर्यकिरणांन्तस्स्थशक्तिं स्वस्मिन् स्वभावत' ।
: चतुरशीतिलिङ्गप्रमाणवेगं स्वशक्तितः ॥३९१॥
एकछोटिकावच्छिन्नकालेनाकृष्य तान् पिबेत् ।
पश्चादावरणादर्शस्थितशक्तिं स्वतेजसा ॥३६२॥
पूर्वोक्तछत्रीशिखरस्थिता ये मणयः क्रमात् ।
† शङ्कु या शङ्ख पाठ होना चाहिए । श्लोक ३९० में शङ्क है, अतः शङ्क यहां भी रखा है।