बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
द्वितीय आवरण के स्थापनार्थ जोड के अनुसार कीलें स्थापित की हैं वैसे ही द्वितीय आवरण में भी
तृतीय आवरण की स्थापना के अर्थ यथाक्रम सुदृढ कीलें लगावे । तृतीय आवरण के पीठ के नीचे प्रवेश
में भी यथाक्रम ऊपर नीचे के भागों की कीलों का संयोजन हो जावे ॥ ३२६-३३० ॥
कीलकानि तथा सम्यक् सुदृढ कल्पयेत् क्रमात् ।
द्वितीयावरणात्पञ्चवितस्त्यूनं यथा दृढम् ॥ ३३१ ॥
चतुरस्रं वर्तुंलं वा तृतीयावरणस्य च ।
पीठं कृत्वा तदुपरि द्वितीयावरणे यथा ॥ ३३२ ॥
तथैवात्रापि कर्तव्यं गृहकुड्यादयः क्रमात् ।
तृतीयावरणस्येशान्यदिग्भागे यथाविधि ॥ ३३३ ॥
विद्युद्यन्त्रस्थापनार्थं चतुरस्रं सकीलकम् ।
सोमाङ्कलोहेन क्रमात् कुर्यादावरणं दृढम् ॥ ३३४ ॥
तस्मिन् संस्थापयेद् विद्युद्यन्त्र शास्त्रोक्तवर्त्मना ।
उस प्रकार कीलें सुदृढ सम्यक् क्रम से लगावे, तृतीय आवरण का पीठ चौकोर या गोल करके
उसके ऊपर जैसे द्वितीय आवरण पर करने की भाँति यहां भी करना चाहिये क्रम से कमरे भित्ति आदि
तृतीय आवरण के ईशानी दिशा भाग में यथाविधि विद्युद्यन्त्र स्थापनार्थ चौकोर कीलसहित आवरण
सोमाङ्क लोहे से करे, उसमें शास्त्रोक्त विधि से विद्युद्यन्त्र स्थापित करे ॥ ३३१-३३४ ॥
सोमाङ्कलोहमुक्तं लोहतन्त्रे-सोमाङ्क लोहा कहा है लोहतन्त्र में-
नागं पञ्चास्यकं चैव सप्तमं रविमेव च ।
नवमं चुम्बुकं तद्वन्नलिकात्वक् शराणिकम् ॥ ३३५ ॥
टङ्कणं च समालोड्य समभागान् यथाक्रमम् ।
सर्पास्यमूषामध्येथ पूरयित्वा यथाविधि ॥ ३३६ ॥
नागकुण्डान्तरे स्थाप्य इङ्ग्लान् परिपूर्य च ।
त्रिपञ्चाशदुत्तरत्रिशतकक्ष्योष्णमानत ॥ ३३७ ॥
सम्यग्धमनेच्छशमुखभस्त्राद् वेगेन शास्त्रतः ।
समीकरणयन्त्रेथ तद्रसं परिपूरयेत् ॥ ३३८ ॥
पश्चादत्यन्तमृदुलं विद्युद्गर्भं दृढं लघु ।
सोमाङ्कलोहं भवति अविनाश मनोहरम् ॥ ३२६ ॥ इत्यादि ॥
सीसा, पञ्चास्य-लोह विशेष ? रवि-ताम्बा प्रत्येक ७ भाग, चुम्बुक ६ भाग, नलिकात्वक्-
नली की छाल, शराणिक-शरणा-प्रसारिणी का क्षार या शराटिक-खदिरपर्णी-दुर्गन्ध खैर या कत्था,
सुहागा इनके समान भागों को मिला कर सर्पास्य-सर्पमुख कृत्रिममोतल के अन्दर यथाविधि भरकर नाग-
कुण्ड के अन्दर रख कर अंगारे भर कर ३५३ दर्जे की उष्णता से शशमुख भस्त्रा से वेग से धोंके उस
पिंघले रस को समीकरण यन्त्र में भर दे फिर वह अत्यन्त मृदु विद्युत् को गर्भ में लिए हुए स्थिर रहने
वाला मनोहर सोमाङ्क लोहा हो जाता है ॥ ३३५-३३६ ॥