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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 363

३४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
कृत्वा तन्मन्थुमध्यक्ष्ये स्थापयेन्मध्यरन्ध्रतः ।
यथान्योन्यस्पर्शनं स्यात्तथा सन्धारयेद् दृढम् ॥ ३५३ ॥
एक एक पात्र पर चार चषक ( गिलास पात्र ) हों ऐसा कहा है । इन चषकों के मध्य में
अन्योऽन्य स्पर्श हो । दो पात्रों पर एक एक बड़ा चषक रखे पश्चात् दो पात्रों के मुख पर पांच छिद्रों से
युक्त एक एक पट्टिका सम्यक् कीलों से जोड दे । दोनों पात्र दोलामुख के दोनों छिद्रों में प्रविष्ट कर-घुसा
कर वहां के पीठ के मध्य देश में दृढ रख दे । पांच अंगुल लम्बाई से युक्त तथा आठ अंगुल से ऊंचे
इक्षु यन्त्र ( ईख पीडने के कोल्हू ) आदि के समान दान्तोंसहित आठ मन्थु—मथन साधनों को करावे,
एक एक पात्र अन्दर से चषकों में यथाक्रम चारों दिशाओं में शास्त्रानुसार ४ मन्थु लगावे वैसे दो मध्य
मन्थान लगावे उन दोनों से घन-मथित वस्तु करके उसे मन्थु के मध्य में मध्य छिद्र से स्थापित कर दे
जिससे अन्योऽन्य स्पर्श इनका हो जावे ॥ ३४७-३५३ ॥
पात्रद्वयमुखच्छिद्रद्वारेणैव प्रवेशयेत् ।
मध्यस्थमन्थुदण्डस्योपरिभागे यथाविधि ॥ ३५४ ॥
सर्वमन्थुसमाशो यथा स्यात् तद्वदेव हि ।
सन्धारयेच्चक्रावर्तकीलकं सुदृढं यथा ॥ ३५५ ॥
मध्यमन्थुभ्रामणेन सर्वमन्थुभ्रमो यथा ।
भवेत् तथा प्रकर्तव्यं तेषा कीलकतः क्रमात् ॥ ३५६ ॥
अथ यन्त्रमुखाद् विद्युच्छक्ति सूर्यांशुभि क्रमात् ॥ ३५७ ॥
समाहर्तुं विशेषेण उपाय परिकीर्त्यते ।
पूर्वोक्तदोलामध्यस्थपात्रयोरुपरि क्रमात् ॥ ३५८ ॥
द्विनवत्युत्तरशतसंख्याकेनैव हि क्रमात् ।
किरणाकर्षणार्दशादष्टनालान् प्रकल्पयेत् ॥ ३५६ ॥
पश्चादेकैकपात्रोपर्यथ नालैः प्रकल्पितान् ।
स्तम्भान् संस्थापयेत् सम्यक् चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ॥ ३६० ॥
दोनों पात्रों के मुख वाले छिद्रों से प्रविष्ट करे, मध्यस्थ मन्थुदण्ड के ऊपर भाग में यथाविधि
सर्वमन्थु समावेश जैसे हो वैसे ही चक्र को घुमाने वाली कील को दृढ लगावे, मध्य के मन्थु के घुमाने
से सारे मन्थुओं का घूमना जिससे हो जावे उनकी कीलों से वैसे करना चाहिए । यन्त्रमुख से विद्युत्
शक्ति को सूर्यकिरणों से ले लेने को विशेष रूप से उपाय कहा जाता है । पूर्वोक्त दोलामध्यस्थ पात्रों के
ऊपर १६२ संख्याक्रम से ही किरणाकर्षण आदर्श से ८ नालों को बनावे, पश्चात् एक एक पात्र के ऊपर
नालों से सम्बद्ध किये स्तम्भों को चारों दिशाओं में स्थापित करे ॥ ३५४-३६० ॥
तेषामुपरि पञ्चास्यकर्णिकान् स्थापयेत् क्रमात् ।
रुक्मपुच्छाशरां तेषु पूरयित्वा ततः परम् ॥ ३६१ ॥
विद्युदाकर्षकंमणीन् तेषु सन्धारयेद् दृढम् ।
पूर्वोक्तांशुपदर्पणावरण चोपरिक्रमात् ॥ ३६२ ॥