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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 364

त्रिपुराविमान ] [ १४१
कृत्वा तदूर्ध्वे पञ्चशिखराकारगोपुरम् ।
कुर्यादेकं ऋशिखरमुखे चञ्चुपुटाकृतिम् ॥ ३६३ ॥
कल्पयित्वा ततस्तस्मिन् सिञ्जीरकमणीनथ ।
स्थापयेदंशुवाहकमणीनपि यथाविधि ॥ ३६४ ॥
अंशुमित्रमणिं मध्यशिखाग्रे दृढं यथा ।
चतुर्मणीनामुपरि गोभिलोक्तविधानतः ॥ ३६५ ॥
उन स्तम्भों के ऊपर पञ्चमुखी कर्णफूल—? उनमें कनकपुङ्खबाण—सुनहरे शर का बाण भरकर
विद्युदाकर्षण मणियों को उनमें लगा दे, पूर्व कहे अंशुपादर्पण आवरण को ऊपर करके उसके ऊपर
पांच शिखर आकार वाला गोपुर—गवाक्ष झरोखा करे, एक एक शिखरमुख पर चञ्चुपुट—चूंच की
आकृति जैसा बनाकर उसमें सिञ्जीरक ? मणियों को स्थापित करे अंशुवाहक मणियों को भी लगावे, बीच
के शिखराग्र में चारों मणियों के ऊपर अंशुमित्रमणि—सूर्यकान्त मणि ? को गोभिल के विधान से
लगावे ॥ ३६१–३६५ ॥
षडङ्गुलायामयुक्तं वितस्तित्रयमुन्नतम् ।
किरणाकर्षणदर्शात् कृतं नालचतुष्टयम् ॥ ३६६ ॥
स्थापयित्वा तदुपरि द्रावकैःशोधितान्यथ ।
चतुर्वितस्त्यायामयुतमुखपात्राण्यथाविधि ॥ ३६७ ॥
सन्धारयेच्छङ्कुकीलैरच्छिद्राणि दृढान् यथा ।
तेषु सम्पूरयेद् रुद्रजटावालं प्रमाणतः ।: ३६८ ॥
भ्रामणीघुटिकान्तेषु विन्यसेन्मध्यकेन्द्रके ।
किरणाकर्षण वेगाद् भ्रामणीघुटिकास्ततः ॥ ३६९ ॥
कृत्वा तन्नालमार्गेण अन्त. प्रेषयति क्रमात् ।
शिखराग्रस्थमणय तच्छक्तिं पिबन्ति* क्रमात् ॥३७०॥
६ अङ्गुल लम्बाई से युक्त ३ बालिश्त ऊंचा किरणाकर्षण दर्पण से किए हुए ४ नालें स्थापित
करके उनके ऊपर द्रावकों से शुद्ध किए हुए छिद्ररहित ४ बालिश्त लम्बाई से युक्त मुखपात्रों को यथा-
विधि शंकुकीलों से स्थिर करदे । उन पात्रों में रुद्रजटावाल-शंकरजटा-बालछड़ के बाल प्रमाण से भरदे,
अन्त स्थानों में भ्रामणी घुटिका मध्यकेन्द्र में लगावे । किरणाकर्षण वेग से भ्रामणी घुटिका करके उनके
नालभाग से अन्दर प्रेरित करता है शिखराग्रस्थित मणियां उस शक्ति को पीती हैं ॥३६६–३७०॥
तदन्त स्थितसिञ्जीरमणिसंज्ञापि तथैव हि ।
अंशुमित्रमणिश्चैव तच्छक्तिमपकर्षति ॥३७१॥
तच्छक्तिमंशुपादर्शविवरणं परिगृह्य च ।
विद्युदाकर्षक मणिसन्धौ नियोजयेत् ॥३७२॥
पश्चादन्तस्थितकर्णिकास्तां सम्यक् समाहरेत् ।
तदधस्स्थितदण्डेषु मध्यदण्डाग्रतः क्रमात् ॥३७३॥

  • वचनव्यत्ययेन पिबन्ति स्थाने पिबति ।