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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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त्रिपुरविमान ] [ ३३७
: उसके ऊपर मञ्जूषद्रव - मजीठ रस ? का पात्र रखे उसमें आतपोष्णोपसंहार मणि डाले या
लगावे रखे, इसी प्रकार उष्णता को हटाने वाले अभ्रकचक्रों को यथाविधि घूमने वाले दान्तेयुक्त सामने
भूमि पर भ्रामणी - घुमाने वाले दण्डकीलों से संयुक्त को संस्थापित करके पुनः कील भ्रमणार्थ त्रिचक्रकील
को उसमें सरलता से नियुक्त करे उसके चलाने से छत्रभ्रमण वेग से होता है उस से छत्रानुसार आत-
पोष्णभ्रमण होवे पश्चात् उष्णतापहारक अभ्रकचक्र यथाक्रम - ॥ ३१६-३२० ॥
सङ्ग्राहयेदातपोष्णशक्तिं वेगात् स्वशक्तितः ।
आतपोष्णोपसंहारमणिः पश्चात् स्वतेजसा ॥ ३२१ ॥
तच्छक्तिमपहृत्य स्वमुखतः पिबति क्रमात् ।
मञ्जूषद्रावक पश्चात्तच्छक्तिवेगतः पुनः ॥ ३२२ ॥
समाहृत्यातिशीतस्वभावं तस्याः प्रयच्छति ।
शैत्यत्वं प्राप्य तच्छक्तिः पश्चाद् वेगस्वभावतः ।। ३२३ ।।
वायुमण्डलमासाद्य तत्रैव लयमेधते ।
तस्माद् यानस्यातपोष्णानिवृत्तिः प्रभवेत् क्रमात् ॥ ३२४ ॥
तेनात्यन्तसुखं यानयन्तॄणां प्रभवेत् ततः ।
स्थापयेदातपोष्णोपहारयन्त्रं यथाविधि ॥ ३२५ ॥
अपनी शक्ति से आतपोष्णशक्ति को वेग से ले ले-ले लेगा पश्चात् आतपोष्णसंहारमणि
स्वतेज से उस शक्ति को लेकर अपने मुख से पीती है पश्चात् मञ्जूषद्रावक उस शक्ति को वेग से एकत्र
कर उसके लिए अतिशीत स्वभाव को देता है वह शक्ति शीतता को प्राप्त कर वेग से स्वभावतः वायु-
मण्डल को प्राप्त होकर वहां ही लय को प्राप्त हो जाता है अतः यान की आतपोष्णता की निवृत्ति हो
जाती है इस विमान के नायक - यात्रियों को सुख होता है अतः आतपोष्णोपसंहार यन्त्र स्थापित
करे ॥ ३२१-३२५ ॥
अन्यथा यन्तॄणां कष्टं भवत्येव न संशयः ।
एवमुक्तस्वातपोष्णोपहारयन्त्रं यथाविधि ॥ ३२६ ॥
यानतृतीयावरणरचनाविधिरुच्यते ।
प्रथमावरणे पूर्वं द्वितीयावरणस्य हि ॥ ३२७ ॥
स्थापनार्थं यथासन्धानकीलानि यथाविधि ।
स्थापितानि तथैवास्मिन् द्वितीयावरणेपि च ॥ ३२८ ॥
तृतीयावरणस्थापनार्थं चैव यथाक्रमम् ।
सन्धारयेत्कीलकानि सर्वतस्सुदृढान्यथा ॥ ३२६ ॥
तृतीयावरणपीठाधः प्रदेशेप्यथाक्रमम् ।
ऊर्ध्वाधोभागकीलानां यथा संयोजनं भवेत् ॥ ३३० ॥
अन्यथा नायक यात्रियों को कष्ट होता ही है इसमें संशय नहीं । इस प्रकार आतपोष्णोपसंहार
यन्त्र यथाविधि कहकर विमान के तृतीय आवरण की रचनाविधि कही जाती है । प्रथम आवरण के ऊपर