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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

तत्त्वमसिप्रकरणम् २३३
अनुभविता भी अनुभवात्मक ज्ञानरूप ही है अर्थात् अनुभूतिरूप ही है । उसके पृथक् होने में कोई प्रमाण
नहीं है ।। १४१ ।।
अभिन्नोऽपि हि बुद्ध्यात्मा विपर्यासितदर्शनैः ।
ग्राह्यग्राहकसंवित्तिभेदवानिव लक्ष्यते ॥१४२॥
अभिन्न इति- यद्यपि विज्ञानात्मा अभिन्न ही है, तथापि भ्रान्त हुए पुरुषों को वह ग्राह्य-ग्राहक और ग्रहण
के रूप में भेदवान्-सा दिखाई पड़ता है ।। १४२ ।।
हृदयस्पर्शिनी
इसपर यदि कहें कि अनुभूति, अनुभविता और अनुभव्य ये भेददर्शन क्यों होता है ? ऐसी शंका करते
पर वह कहता है कि विज्ञानरूप आत्मा विज्ञान से अभिन्न ही है, उससे भिन्न नहीं है अर्थात् विज्ञान और आत्मा एक
ही है । किन्तु जिनकी दृष्टि विपरीत है अर्थात् जिनकी बुद्धि में भ्रम हो गया है, वे लोग¹ उसे ग्राह्य, ग्राहक, ग्रहण
(संवित्ति-ज्ञान) इन भेदों से युक्त हुआ-सा समझते हैं ।। १४२ ।।
भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैव चोच्यते ।
सत्त्वं नाशित्वमस्याश्चेत् सकर्तृत्वं तथेष्यताम् ॥१४३॥
भूतिरिति-जो लोग 'अनुभूति' को ही क्रिया और कारण भी मानते हैं, उनके अनुसार यदि उसकी सत्ता
और विनाश हैं, तो उसका सकर्तृत्व भी उन्हें स्वीकार करना चाहिये ।। १४३ ।।
हृदयस्पर्शिनी
सिद्धान्ती के द्वारा उक्त मत का खण्डन किया जा रहा है- बुद्धि में कारकत्व का स्वीकार न करने के
कारण उसे कर्ता आदि की अपेक्षा नहीं है। जिनके मत में अनुभूति ही क्रिया है और वही कारक भी है,² उनके
सिद्धान्त के अनुसार यदि उसकी सत्ता (स्वरूपसत्ता) और विनाश है, तो उसी प्रकार उसका सकर्तृत्व भी उन्हें स्वीकार
करना चाहिए। क्योंकि वहां अनुभव का भी सद्भाव है ही। क्षणभंगुर (विनाशी) होने के कारण विरम्य (रुक-रुककर)
व्यापार तो होगा नहीं³, अतः उनके मत में उसे अपने से अतिरिक्त किसकी अपेक्षा होगी⁴ ? ।। १४३ ।।
१. श्लोक सं० १४२ का द्वितीयपाद "विपर्यासितदर्शनैः" दिया गया है। उसीको बृहदारण्यवार्तिक ४।३।४७६ में "विपर्या-
सितबुद्धिभिः" कर दिया है। उसकी टीका में आनन्दज्ञान ने उसे 'कीर्ति' का वाक्य बताया है। श्लोकवार्तिक के शून्यवाद की
१६ वीं कारिका के न्यायरत्नाकर में तथा सर्वदर्शनसंग्रह के बौद्धदर्शन में भी यह कारिका कुछ पाठान्तर के रूप में उपलब्ध
होती है। दोनों में प्रथम पाद "अविभागोऽपि बुद्ध्यात्मा" दिया गया है। वाचस्पति मिश्र ने भी इस कारिका को योग सूत्र
४।२३ की तत्त्ववैशारदी में उद्धृत किया है। वहीं पर वार्तिककार ने भी "विपर्यासिति दर्शने" इस पाठान्तर के रूप में उसे
उद्धृत किया है।
२. "क्षणिकाः सर्वं संस्काराः अस्थिराणां कुतः क्रियाः ।
भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैव चोच्यते ।।"
बृहदारण्यकोपनिषद्वातिक ४।३।४९४ की टीका में आनन्दज्ञान ने कर्तृ नाम का निर्देश किये बिना ही इस संपूर्ण कारिका को
दिया है। वार्तिककार ने भी ४।३।५८६ श्लोक में प्रथम पाद के द्वारा उसे वैसे ही उद्धृत किया है। इस कारिका के द्वितीयार्ध
को वाचस्पति मिश्र ने ब्रह्मसूत्र २।२।२० की भामती में तथा योगसूत्र ४।२० की तत्त्ववैशारदी में वैसा ही रखा है।
सुरेश्वराचार्य ने धर्मकीर्ति का साक्षात् नामनिर्देश भी बृहदारण्यकवार्तिक ४।३।७५३ श्लोक में किया है। उक्त कारिका के
प्रथमार्ध को तन्त्रवार्तिक १।३।१० में एकवचनान्त के रूप में पाठभेद कर के उद्धृत किया है। प्रज्ञाकरमति-विरचित बोधि-
चर्यावतार पञ्जिका ९।६ में सम्पूर्ण कारिका दी गई है।
३. 'शब्दबुद्धिकर्मणां विरम्य व्यापाराभावात्'- यह न्याय है। इस न्याय का अर्थ यह है कि एक ज्ञान कराकर शब्द, विरतव्यापार
हो जाता है, वह पुनः दूसरा शाब्दबोध नहीं कराता। उसी तरह बुद्धि भी एक पदार्थ में ज्ञातता अथवा संस्कार पैदा कर पुनः
३०

२३४ उपदेशसाहस्री
न कश्चिच्चेष्यते धर्म इति चेत्पक्षहानता।
नन्वस्तित्वादयो धर्मा नास्तित्वादिनिवृत्तयः।
न भूतेस्तर्हि नाशित्वं स्वालक्षण्यं मतं हि ते ॥१४४॥
नेति—यदि उसका कोई धर्म तुम्हें अभिमत नहीं है तो तुम्हारे पक्ष की हानि होती है।
उस पर बौद्ध कहता है—'अस्तित्वादि धर्म' तो 'नास्तित्वादि धर्म' की निवृत्ति ही हैं।
उस पर सिद्धान्ती कहता है—तब तो तुम्हारे कथनानुसार 'क्षणिकत्वादि' को अनुभूति का लक्षण नहीं कह
सकते ॥ १४४ ॥
हृदयस्पार्शिनी
यदि उसका सत्त्वादि कोई भी धर्म अभीष्ट नहीं है जो क्षणिकत्व पक्ष का ही भंग हो जाता है। इसपर
यदि बौद्ध कहे कि हम लोग विज्ञान का क्षणिकत्वादि कोई धर्म नहीं मानते, किन्तु अक्षणिकत्वाद्यपोहरूप ही हमारा
क्षणिकत्व है अर्थात् अस्तित्वादि धर्म तो नास्तित्व की निवृत्तिमात्र ही है। उस पर सिद्धान्ती कहता है कि तब तो अनु-
भूति का विनाशित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा। क्योंकि तुम्हारे मत में अनुभूति की स्वलक्षणता (स्वालक्षण्य) मानी गई
है। स्वेनैव लक्ष्यते ज्ञायते इति स्वलक्षणं, तस्य भावः स्वालक्षण्यम् अर्थात् निर्विकल्पमात्रम्। उसका फल यह होगा कि
सविकल्पता होने से, अक्षणिकत्व के न रहने से, नाशित्व-अज्ञत्व आदि की व्यावृत्ति होने से और अनुभूति, सविकल्पज्ञान
की गोचर (विषय) न होने से सत्त्व-नाशवत्त्वादि धर्म की सिद्धि नहीं हो पायेगी। अर्थात् तुम्हारे सिद्धान्त के अनुसार
क्षणिकत्वादि को अनुभूति का लक्षण नहीं कहा जा सकेगा ॥ १४४ ॥
स्वलक्षणावधिर्नाशोनाशोऽनाशनिवृत्तिता ।
अगोरसत्त्वं गोत्वं ते न तु तद्गोत्वलक्षणम् ॥१४५॥
स्वलक्षणेति—स्वलक्षण हो (स्व-स्वरूप हो) जिसकी अवधि है, उसे 'नाश' कहते हैं। किन्तु तुम्हारे मत
में तो 'अनाश' की निवृत्ति को 'नाश' कहते हैं। और 'गोत्व' से भिन्न (अश्वत्व आदि) का अभाव ही 'गोत्व' है। गौ
के लक्षणों से युक्त 'गौ' नहीं है ॥ १४५ ॥
हृदयस्पार्शिनी
स्वरूपमात्र को ही स्वलक्षण कहते हैं। वह स्वलक्षण ही जिसकी अवधि है, उसे नाश कहते हैं। नष्ट
होनेवाला कार्य निरवधि अर्थात् बिना अपनी अवधि के नष्ट नहीं होता, क्योंकि इदमत्र नास्ति—यह वस्तु यहाँ नहीं
है, अमुक वस्तु अब नहीं है, नष्ट हो चुकी है, इस प्रकार नाश के विषय में लोकव्यवहार हुआ करता है। अतः विनाश
का अवधिभूत कोई अविनाशी, अनुत्पन्न एवं स्वतःसिद्ध पदार्थ स्वीकार करना ही होगा। अतएव कहा गया है कि
स्वलक्षण ही जिसकी अवधि है, उसे नाश कहते हैं। स्वरूपमेव लक्षणं प्रमाणं धर्मो वा यस्य सः—स्वलक्षणः, सः अवधिः
सीमा यस्य विनाशस्य सः इति विग्रहः। एवं च तुम्हारे मत में आविर्भाव, तिरोभाव का अवधिभूत कोई स्थिर पदार्थ
न होने से सत्त्व और विनाश दोनों की सिद्धि नहीं होगी। दूसरी बात यह है कि अपोह पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष
प्रसक्त होगा। जैसे—नाश के सिद्ध होनेपर उसके विरोधी अनाश की सिद्धि और अनाश के सिद्ध होने पर उसके
वही बुद्धि अन्य ज्ञातता या अन्य संस्कार को पैदा नहीं करती। उसी प्रकार कर्म भी एकत्र विभाग को पैदा कर विभागान्तर
को पुनः पैदा नहीं करता।
४. योगसूत्र ४।२० के भाष्य में कहा है कि "क्षणिकवादिनः यद्भवन्, सैव क्रिया, तदेव च कारकं—इत्यभ्युपगमः। ""क्षणिक-
वादी के मत में वस्तु की जो उत्पत्ति है, वही क्रिया (कार्य) है और वही उसका कर्त्रादिकारक वर्ग है। इसके मत में समस्त
वस्तु का उत्पत्तिमात्र फल है, और वह निर्हेतुक अर्थात् स्वयमेव होता है, यह क्षणिकवादी का सिद्धान्त है" ऐसा वार्तिक में
लिखा है।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २३५
अपोहरूप नाश की सिद्धि होना यही अन्योऽन्याश्रय दोष का स्वरूप है। ‘सामान्य’ (जाति) का स्वीकार न करते हुए
बौद्ध ने ‘अगोव्यावृत्तिः’ गोलक्षणम् स्वीकार किया है, अर्थात् ‘तद्भिन्न-भिन्नत्वरूप अपोह’ को माना है। वह भी ठीक
नहीं है, क्योंकि उसमें भी वैसा ही अन्योन्याश्रय दोष स्थित है। ‘गो’ से अन्य अश्वत्वादि ही अगोपद के अभिधेय होंगे,
उनका असत्त्व (निवृत्ति अर्थात् अभाव) ही ‘गोत्व’ है, यह तुम्हारा मत है, तदनुसार ‘गोभिन्न-भिन्नत्व’ ही गोत्व है अर्थात्
‘गो’ का लक्षण है, यह सिद्ध होता है। उसी तरह ‘अश्व’ का लक्षण भी गोत्वव्यावृत्तिरूप रहने से परस्परसापेक्षता रूप
अन्योन्याश्रयदोष रहता है। किन्तु हमारे मत में ‘गो’ के लक्षणों से युक्त होना ही ‘गो’ का लक्षण है, अतः हमारे मत में
कोई दोष नहीं है ॥ १४५ ॥
क्षणवाच्योऽपि योऽर्थः स्यात्सोऽप्यन्याभाव एव ते ॥१४६॥
क्षणवाच्योऽपीति—जो पदार्थ ‘क्षण’ शब्द का वाच्य है, वह भी तुम्हारे मत के अनुसार क्षणिकाभाव
(अन्याभाव अर्थात् अक्षण का अभाव) रूप ही होगा। अतः क्षणिकताविरोधी ‘स्थिर पदार्थ’ (अक्षणिकता) को भी
तुमने स्वीकार कर लिया, यह कहा जायगा ॥ १४६ ॥
भेदाभावेऽप्यभावस्य भेदो नामभिरिष्यते ।
नामभेदैरनेकत्वमेकस्य स्यात्कथं तव ॥१४७॥
भेदेति—बौद्ध का कहना है कि ‘अभाव’ में भेद का अभाव रहने पर भी नामों के कारण उसका भेद माना
जाता है, किन्तु तुम्हारे मत के अनुसार नामभेद के कारण एक ही वस्तु का अनेकत्व कैसे हो सकेगा ? ॥ १४७॥
हृदयस्पर्शिनी
इस पर बौद्ध पुनः शंका करता है कि हमने अभाव को सत् की निवृत्तिरूप नहीं माना है। यदि वैसा
मानते तो आपका अतिप्रसंग देना उचित होता। हम तो ‘निरुपाख्य’ को ही अन्यव्यावृत्ति के रूप में कहते हैं। अभाव में
भेद का अभाव होने पर भी (स्वरूपतः भेदाभाव के रहने पर भी) अगोत्व ही अश्वत्व है, अनश्वत्व ही गोत्व है इत्यादि
नामों (संज्ञाओं) के कारण ही स्वरूपभेद माना जाता है। इसपर सिद्धान्ती दोष दे रहा है कि तुम्हारे मत से नामभेद
के कारण एक ही वस्तु का अनेकत्व कैसे हो सकता है ? अर्थात् निःस्वभाव वाले एक ही अभाव का निरर्थक
भिन्न-भिन्न संज्ञाओं (नामभेदों) से समान रूप से अनेक पदार्थों की व्यावृत्ति के रूप में अनेकत्व कैसे संगत हो सकता
है ? ॥ १४७ ॥
अपोहो यदि भिन्नानां वृत्तिस्तस्य कथं गवि ।
नाऽभावा भेदकाः सर्वे विशेषा वा कथंचन ॥१४८॥
अपोह इति—दूसरी बात यह है कि ‘अपोह’ शब्द का अर्थ क्या है ? ‘भिन्न पदार्थों का व्यावर्तन’ है, या ‘अभिन्न
पदार्थों का व्यावर्तन, ? यदि प्रथम पक्ष का नाम ‘अपोह’ है, तो उस अगोत्वाभाव की ‘गोव्यक्ति’ में किस प्रकार वृत्ति हो
सकती है ? और द्वितीय पक्ष का नाम ‘अपोह’ है, तो सभी अभाव किसी प्रकार भी भेदक (व्यावृत्तिबोधक) अथवा
विशेष (भावरूप) नहीं हो सकते ॥ १४८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
सिद्धान्ती पूछता है कि ‘अपोह’ का अर्थ भिन्न पदार्थों की व्यावृत्ति है या अभिन्न पदार्थों की व्यावृत्ति है ?
यदि भिन्न पदार्थों की व्यावृत्ति को ‘अपोह’ मानते हो तो किसी शब्द का अर्थ उसके प्रतियोगी का अभाव ही है तो ‘गो’
शब्द से अगोत्व का अभाव ही समझना चाहिए। ‘गो’ शब्द से भिन्न-भिन्न वस्तुओं की व्यावृत्ति होती है तो अनन्त
(अगणित) प्रतियोगी होने के कारण अगोत्वाभाव की वृत्ति ‘गो’ व्यक्ति में नहीं हो सकती। क्योंकि भेद के अनन्त
प्रतियोगियों का ज्ञान हुए बिना उनके अपोह का ज्ञान होना संभव नहीं। उस स्थिति में वह अपोह ‘गो’ में कैसे रहेगा ?
अपोह के न रह सकने पर किसी का भी अभाव कहीं भी सुलभ रहने से व्यवहार अनियमित हो जायगा। निष्कर्ष यह
हुआ कि अगोत्वाभाव की गोव्यक्ति में वृत्ति न हो सकने से भिन्न वस्तुओं की व्यावृत्ति को अपोह नहीं कह सकते। अब

२३६ उपदेशसाहस्री
यदि द्वितीय पक्ष अर्थात् अभिन्न वस्तु की व्यावृत्ति को अपोह कहें तो सभी अभाव किसी प्रकार भी भेदक (व्यावृत्ति-
बुद्धिजनक) अथवा विशेष (भावरूप) नहीं हो सकते। अभिप्राय यह है कि यदि अजत्व, अश्वत्वादिरूप किसी अभिन्न
वस्तु की व्यावृत्ति ही अगोत्वाभाव है तो भेद्य और भेदक का भेद निश्चित न होने के कारण उससे न तो गो के साथ
अन्योन्याभावरूप बुद्धि की ही उत्पत्ति हो सकती है और न वे किसी भावरूप खण्ड-मुण्डादि पदार्थ के ही बोधक
हो सकते हैं ।। १४८ ।।
नामजात्यादयो यद्वत्संविदस्तेऽविशेषतः ।।१४९।।
नामेति - तुम्हारे सिद्धान्त के अनुसार जैसे निर्विशेष होने के कारण 'नाम' एवं 'जाति' आदि, 'विज्ञान' के
विशेषण नहीं हो सकते, उसी तरह 'अगोत्वाभाव' अथवा 'खण्ड, मुण्डादि' भी 'गो' के विशेषण नहीं हो सकेंगे ।। १४९ ।।
हृदयस्पर्शिनी
अपोहवाद में 'खण्डा गौः' 'नीलमुत्पलम्' आदि विशिष्ट व्यवहार नहीं बन सकेगा। उसी तरह 'इयं गौः',
इत्यादि असाधारण स्वरूपव्यवहार भी नहीं बन सकेगा। अतः अपोह को न मानना ही समुचित है। बौद्ध के मत में
जिस प्रकार संविद् (विज्ञान) के निर्विशेष होने के कारण नाम, जाति आदि उस विज्ञान के विशेषण नहीं हुआ करते,
उसी प्रकार अगोत्वाभाव अथवा खण्ड-मुण्डादि भी 'गो' के विशेषण नहीं होंगे, तब विशिष्ट व्यवहार का लोप ही हो
जायगा, जिससे बौद्ध को जीना भी कठिन होगा ।। १४९ ।।
प्रत्यक्षमनुमानं *च व्यवहारे यदिच्छसि ।
क्रियाकारकभेदैस्तदभ्युपेयं ध्रुवं भवेत् ।।१५०।।
प्रत्यक्षमिति-सिद्धान्ती का कहना है कि तुमने प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणों का जैसे स्वीकार किया है, वैसे
ही क्रिया-कारक रूपभेद के सहित ही उन दोनों को अवश्य स्वीकार करना होगा ।। १५० ।।
हृदयस्पर्शिनी
प्रत्यक्ष और अनुमान इन दो प्रमाणों को तो बौद्ध स्वीकार करते हैं, किन्तु क्रिया-कारकरूप भेद को नहीं १
मानते। वस्तुतः इन दो प्रमाणों के द्वारा क्रिया-कारकरूप भेद का ही ज्ञान होता है। अतः विज्ञान में क्रिया-कारकरूप
भेद नहीं है-यह बौद्ध कथन नितान्त अनुचित है। बौद्ध यदि लोकव्यवहार में प्रत्यक्ष, और अनुमान प्रमाण का स्वीकार
करता है, तो उन्हें निश्चित रूप से क्रिया-कारकभेद के साथ ही विज्ञान का स्वीकार करना होगा ।। १५० ।।
तस्मान्नीलं तथा पीतं घटादिर्वा विशेषणम् ।
संविदस्तदुपैयं स्याद्येन चाप्यनुभूयते ।।१५१।।
तस्मादिति-इसलिये नील, पीत, घट आदि को अपने अभिमत 'विज्ञान' के विशेषण रूप में मानना ही
होगा। उसी तरह उसके अनुभव करने वाले 'ज्ञाता' का भी स्वीकार करना होगा ।। १५१ ।।
हृदयस्पर्शिनी
संवेदन (विज्ञान) के अतिरिक्त वेद्य, वेत्ता के स्वरूप को स्वीकार करने की इच्छा न रहने पर भी उसे
तुम्हें (बौद्ध को) हठात् (जबरदस्ती) स्वीकार करना होगा। अर्थात् नील, पीत, घट आदि को विज्ञान का विशेषण
स्वीकार करना ही होगा। और जिसके द्वारा उनका अनुभव किया जाता है, उस अनुभवकर्ता ज्ञाता का भी स्वीकार
करना होगा। अतः बौद्ध अपना हठ छोड़ दे, और हमारे कथन का स्वीकार कर ले ।। १५१ ।।
रूपादीनां यथाऽन्यः स्याद्ग्राह्यत्वादग्राहकस्तथा ।
†प्रत्ययस्य तथाऽन्यः स्याद्व्यञ्जकत्वात्प्रदीपवत् ।।१५२।।
१. ( "भूतिर्येषां क्रिया सैव"-उ. सा. १८।१४३ )

  • वा०-पाठान्तरम् + पाठान्तरम् । † प्रत्ययस्तथान्यः-पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २३७
रूपेति—'रूप' आदि ग्राह्य पदार्थ हैं, अतः उनका कोई अन्य ग्राहक भी माना जाता है, तथा 'प्रत्यय' भी
ग्राह्य होता है, अतः उसका भी कोई अन्य ग्राहक होता है। उसी प्रकार दीपक के तुल्य प्रकाशक होने के कारण ग्राहक की
सत्ता को 'ग्राह्य' पदार्थ से भिन्न मानना ही होगा ॥ १५२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अब संवित्साक्षी में अनुमान प्रमाण बताते हैं। बौद्धों के समक्ष तो अनुमान प्रयोग इस प्रकार करना होगा—
'यद्ग्राह्यं, तत्स्वान्यग्राह्यं, यथा रूपादि, ग्राह्या च संवित्' उसी तरह 'अवभासकः अवभास्यादन्यः, व्यञ्जकत्वात्,
घटादेः प्रदीपवत्'– यह अनुमान प्रयोग आस्तिकों के समक्ष करना होगा । जैसे रूप आदि पदार्थों की ग्राह्यता होने से
उनका ग्राहक कोई अन्य होता है, उसी तरह दीपक के समान प्रकाशक होने के कारण ग्राहक की सत्ता, ग्राह्य से पृथक्
ही माननी चाहिए । प्रत्यय, ग्राह्य होने से उसका ग्राहक कोई अन्य होगा, उसी तरह ग्राहक भी ग्राह्य से कोई अन्य
होगा ॥ १५२ ॥
अध्यक्षस्य दृशेः कीदृक्संबन्धः संभविष्यति ।
अध्यक्ष्येण तु दृश्येन मुक्त्वाऽन्यो द्रष्टृदृश्यताम् ॥१५३॥
अध्यक्षस्येति—साक्षी से सम्बन्धित प्रत्ययवर्ग के साथ 'द्रष्टा आत्मा' का 'द्रष्टृ-दृश्यत्व' सम्बन्ध के अतिरिक्त
अन्य कौन सम्बन्ध हो सकता है ? ॥ १५३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अब प्रत्ययवर्ग और अध्यक्ष (साक्षी) का सम्बन्ध बताते हैं। द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध मान लेने पर
आभास को तो मानना ही होगा। प्रत्यय (अध्यक्ष्य) के साथ आत्मा (दृशि) का सम्बन्ध पारमार्थिक है, या अपार-
मार्थिक ? प्रथम विकल्प मानने पर दृशि में परिणामादि विकार का प्रसंग प्राप्त होगा । अतः यह प्रथम पक्ष सावद्य
(निन्दित) है। तात्पर्य यह कि साक्षी से सम्बन्धित प्रत्ययवर्ग के साथ द्रष्टा आत्मा का द्रष्टृ-दृश्यत्वरूप सम्बन्ध को
छोड़कर अन्य कौन-सा सम्बन्ध हो सकता है ? ॥ १५३ ॥
अध्यक्षेण कृता दृष्टिर्दृश्यं व्याप्नोत्यथाऽपि वा ।
नित्याध्यक्षकृतः कश्चिदुपकारो भवेद्धियाम् ॥१५४॥
अध्यक्षेणेति—द्रष्टा की दृष्टि, 'दृश्य' को व्याप्त करतो है या नहीं ? नित्य साक्षी के द्वारा 'बुद्धि' का कोई
उपकार तो होना ही चाहिये । 'साक्ष्य' के साथ 'साक्षी' का सम्बन्ध पारमार्थिक है या अपारमार्थिक है ? इस विकल्प में
आचार्य, द्वितीय पक्ष का स्वीकार करते हैं ॥ १५४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
द्रष्टा (अध्यक्ष) की दृष्टि, दृश्य को व्याप्त करती है या नहीं ? जो नित्य साक्षी है, उसके द्वारा बुद्धि पर
कोई उपकार तो होना ही चाहिए ॥ १५४ ॥
स चोक्तस्तन्निभत्वं प्राक्संव्याप्तिश्च घटादिषु ।
यथाऽऽलोकादिसंव्याप्तिर्व्यञ्जकत्वाद्धियस्तथा ॥१५५॥
स चेति—साक्षीकृत बुद्धि के उपकार का वर्णन मुखाभास का दृष्टान्त देकर किया जा चुका है। जिस प्रकार
घट आदि में प्रकाश आदि की व्याप्ति होती है, उसी प्रकार अभिव्यञ्जक होने के कारण उसमें बुद्धि की भी व्याप्ति होती
है ॥ १५५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उस नित्य अध्यक्ष साक्षी के द्वारा बुद्धि पर किये गये उपकार (चिन्निभत्व = चित् की समानता) का वर्णन,
पहले मुख-प्रतिबिम्ब के दृष्टान्त से किया जा चुका है। उसी प्रतिबिम्ब (आभास) के द्वारा आत्मा का दृश्य (बाह्य

२३८ उपदेशसाहस्री
विषय) के साथ सम्बन्ध बताने के लिये बुद्धि की विषयव्याप्ति को दृष्टान्त देकर बताते हैं—जिस प्रकार घट-पटादि में
प्रकाशादि की व्याप्ति होती है, उसी प्रकार अभिव्यञ्जक होने के कारण उन दृश्य बाह्य पदार्थों में (घटादि में) बुद्धि की
भी व्याप्ति होती है ॥ १५५ ॥
आलोकस्थो घटो यद्वद्बुद्धयारूढो भवेत्तथा ।
धीव्याप्तिः स्याद्घटारोहो धियो व्याप्तौ क्रमो भवेत् ॥१५६॥
आलोकस्थ इति—प्रकाश स्थित घट जैसे 'बुद्धि' में आरूढ़ होता है, वैसे ही बुद्धिनिष्ठ घट भी बुद्धि में
आरूढ़ होता है। बुद्धि के द्वारा घट की व्याप्ति ही 'घटारोह' है। किन्तु बुद्धि की व्याप्ति में क्रम रहता है, और आत्मव्याप्ति
में कोई क्रम नहीं रहता ॥ १५६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उपर्युक्त बात को ही अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। जैसे आलोकनिविष्ट (प्रकाशस्थित) घट आलोकारूढ़
होता है, वैसे ही बुद्धिनिविष्ट (बुद्धिनिष्ठ—स्थित) घट भी बुद्ध्यारूढ़ होता है। यहाँ पर 'आरूढ़' का अर्थ अश्व और
अश्वारोही के समान आधाराधेयभाव नहीं है। यहाँ तो बुद्धि के द्वारा घट की व्याप्ति ही घटारोह है। यदि विषय-
व्याप्तिमात्र ही बुद्धि की विषयव्यञ्जकता है, तो आत्मा और बुद्धि दोनों में अन्तर क्या है ? उत्तर यही होगा कि बुद्धि
की व्याप्ति में क्रम रहता है और आत्मव्याप्ति में कोई क्रम नहीं रहता ॥ १५६ ॥
*पूर्वा स्यात्प्रत्ययव्याप्तिस्ततोऽनुग्रह आत्मनः ।
कृत्स्नाध्यक्षस्य नो युक्तः कालाकाशादिवत्क्रमः ॥१५७॥
पूर्वमिति—'विषय' में 'बुद्धि' की व्याप्ति प्रथम होती है, और उसके पश्चात् 'आत्मा' का अनुग्रह होता है ।
किन्तु काल और आकाश आदि के समान व्यापक आत्मा की व्याप्ति में कोई क्रम नहीं होता ॥ १५७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रथमतः विषय में बुद्धि की व्याप्ति होती है। तदनन्तर आत्मा का अनुग्रह होता है। अर्थात् बुद्धि
जब विषयाकार हो जाती है, तब उस आकार में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है। उसके बल पर बुद्धि, विषय को
अभिव्यक्त कर पाती है। इस रीति से बुद्धि में क्रमशः द्रष्टृत्व और अन्यशेषत्व सिद्ध होता है । एवंच बुद्धि की
विषय में व्याप्ति क्रमशः होती है । किन्तु काल और आकाशादि के समान व्यापक आत्मा की व्याप्ति में कोई क्रम
नहीं है। निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक विषय (अर्थ) के प्रति बुद्धि के भिन्न-भिन्न परिणाम होकर वह विषय की
अभिव्यंजक हुआ करती है, अतः क्रम तो बुद्धि का ही मानना उचित होगा। सर्वत्र अनुगतप्रकाशरूप अपरिच्छिन्न
आत्मा का क्रम मानना उचित नहीं है ॥ १५७ ॥
विषयग्रहणं यस्य †कारणापेक्षया भवेत् ।
सत्येव ग्राह्यशेषे च परिणामी स चित्तवत् ॥१५८॥
विषयेति—किन्तु 'बुद्धि' के समान 'आत्मा' परिणामी नहीं है। क्योंकि ग्राह्य विषय के अवशिष्ट रहते हुए
जिसे 'कारक' की अपेक्षा से 'विषय' का ग्रहण होता है, वह पदार्थ 'चित्त' के समान परिणामी होता है ॥ १५८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कोई कहे कि भोग्य विषय का अवभासक होने से बुद्धि की तरह अध्यक्ष (साक्षी आत्मा) का भी
परिणाम होगा, तो उसका उत्तर यह है कि बुद्धि की तरह आत्मा परिणामी नहीं है। क्योंकि अपने से असंसृष्ट
ग्राह्य विषय के अवशिष्ट रहते हुए जो कर्तादि कारकों की अपेक्षा करके विषय का ग्रहण कर पाता है, वह पदार्थ
चित्त के समान परिणामी कहा जाता है। आत्मा को जो विषयावभास होता है, वह इस रीति से नहीं होता,

  • पूर्वं०—पाठान्तरम् । † करणा०—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २३९
किन्तु वह आत्मा नित्यसिद्धप्रकाशस्वरूप होने से उसे अपने में अध्यस्त (आरोपित) समस्त विषयों का युगपत्
अवभासन होता है, इसलिये उसके परिणामी होने की शंका ही नहीं की जा सकती ॥ १५८ ॥
अध्यक्षोऽहमिति ज्ञानं बुद्धेरेव विनिश्चयः ।
*नाध्यक्षस्याविशेषत्वान्न तस्यास्ति परो यतः ॥१५९॥
अध्यक्षेति—'मैं साक्षी हूँ' यह ज्ञान, चिदाभासविशिष्ट बुद्धि का ही निश्चय है, 'साक्षी' का नहीं। क्योंकि
वह 'निर्विशेष' है, और उससे भिन्न उसका कोई 'द्रष्टा' भी नहीं है ॥ १५९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यद्यपि उक्त रीति से आत्मा का भोग्यविषय के आकार में कोई परिणाम न हो, तथापि ब्रह्मज्ञान के
आकार में तो परिणाम होता ही है। क्योंकि ब्रह्म यद्यपि स्वात्मा के रूप में ही है, तथापि उसके आकार का अवभास
होने में आगन्तुक ज्ञान की अपेक्षा होती है। अतः ब्रह्म को परिणामी कह सकते हैं। इस आशंका का समाधान इस
प्रकार किया जाता है कि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों से अनुभव में आने वाला 'मैं ब्रह्म (परमात्मा) ही हूँ', इत्याकारक
जो ज्ञान है, वह अध्यक्ष (साक्षी) का परिणाम नहीं है। क्योंकि आत्मा तो विशेषरहित है, क्योंकि निरवयव, असंग
आत्मा में स्वतः अथवा परतः किसी भी प्रकार का कोई विशेष होने की संभावना ही नहीं है। अपितु साभास बुद्धि
की ही निश्चयात्मिका विशेष अवस्था हुआ करती है। 'मैं साक्षी हूँ' यह ज्ञान चिदाभासविशिष्ट बुद्धि का ही निश्चय
है, साक्षी का नहीं। क्योंकि वह निर्विशेष है। उससे भिन्न उसका कोई द्रष्टा भी नहीं है। निष्कर्ष यह है कि अनेक
जन्मानुष्ठित यज्ञ-यागादि से उत्पन्न अदृष्टादि दोषों की निवृत्ति के संस्कार से युक्त हुई, सगुणब्रह्मोपासना के द्वारा
जिसकी चञ्चलता का निराभरण हो चुका है, सम्प्रति विवेक-वैराग्य-शमादि गुणों से सुसंस्कृत हुई और 'तत्' और
'त्वम्' इन दो पदार्थों के परिशोधन से उत्पन्न हुए ज्ञान के कारण जिसमें ब्रह्मात्मैक्य के संस्कार सुदृढ़ हो गये हैं,
ऐसी जो ब्रह्मात्मनिश्चयात्मिका बुद्धि है, उसी की कोई अखण्डाकारा अवस्था हुआ करती है, जो 'तत्त्वमसि'
वाक्योपदेशश्रवण के समानान्तर शोधित तत्-त्वम् पदार्थ में परिकल्पित भेद का तिरोधान कर देती है। तब अखण्डा-
कार अवस्था हो जाती है, उस अवस्था में प्रतिबिम्बित चिदात्मा, उस अखण्डाकार वृत्ति से अपने को अविविक्त
समझता हुआ 'अहं'=मैं, इस प्रकार से परामर्श करने लगता है। तब उपाध्यंश का अपोह होने से अपने विविक्ताकार
स्वरूप को ही अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। उसमें कोई किसी प्रकार की नवीन विशेषता पैदा नहीं होती।
उस चिदात्मा में किसी प्रकार की कोई विशेषता (परिणाम) मानने पर, परिणामी चित्त के समान 'स्वान्यवेद्यत्व'
नियम के अनुसार चिदात्मा का भी कोई अन्य साक्षी मानना होगा। किन्तु अनवस्था और प्रमाणरहित कल्पना करना
उचित नहीं है। अतः यही स्वीकार करना होगा कि उसका कोई साक्षी नहीं है ॥ १५९ ॥
कर्त्ता चेदहमित्येवमनुभूयेत मुक्तता ।
सुखदुःखविनिर्मोको नाहंकर्तरि युज्यते ॥१६०॥
कर्तेति—यदि 'कर्ता'—मैं मुक्त हूँ— ऐसा मानकर 'मुक्तता' का अनुभव कर सकता है तो अहंकारातीत
आत्मा में 'सुख-दुःख' की निवृत्ति नहीं रहनी चाहिये थी, किन्तु सुख-दुःख रूप फल की प्राप्ति तो आत्मा को ही हुआ करती
है। वह क्यों होती है ? क्योंकि मुक्त होने पर तो 'क्रिया' के सहित 'कर्ता' भी नहीं रहता, इसलिये उसे उसके फल की
प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ ॥ १६० ॥
हृदयस्पर्शिनी
यद्यपि अन्तःकरणका ही ज्ञानाकार (वृत्त्याकार) परिणाम होता है, तथापि उसे उसके सुख-दुःख-
निवृत्तिरूप फल की प्राप्ति नहीं होती, वह फलप्राप्ति तो आत्मा को ही हुआ करती है। किन्तु अहंकर्ता के साथ
फल का संबंध मानने पर दोष बताते हैं। कर्ता अर्थात् विकारी, 'अहं मुक्तः' मैं मुक्त हूँ—इस प्रकार मुक्तता का
अनुभव यदि करे तो निरहंकार आत्मा में सुख-दुःख की निवृत्ति नहीं रहनी चाहिये थी। क्योंकि मुक्त होने पर तो

  • नाध्यक्षस्या०—पाठान्तरम्।

२४० उपदेशसाहस्री
क्रिया के सहित कर्ता भी नहीं रहता । इस कारण उसे फल की प्राप्ति कैसे हो सकेगी ? अतः आत्मा के साथ फल
का कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ १६० ॥
देहादावभिमानोत्थो दुःखीति प्रत्ययो ध्रुवम् ।
कुण्डलीप्रत्ययो यद्वत्प्रत्यगात्माभिमानिना ॥१६१॥
देहादाविति–'प्रत्यगात्मा' में अभिमान करने वाले व्यक्ति का जैसे 'मैं कुण्डल वाला हूँ'—यह प्रत्यय निवृत्त
( बाधित ) हो जाता है, क्योंकि कुण्डल का सम्बन्ध तो स्थूल शरीर से है। उससे अपना पार्थक्य ज्ञान ( भिन्नता का ज्ञान )
हो जाता है, तब वह अपने से उसका सम्बन्ध नहीं मानता। उसी प्रकार 'विवेक ज्ञान' के द्वारा उसका 'मैं दुःखी हूँ'—यह
देहाभिमान से उत्पन्न हुआ अविवेकमय प्रत्यय भी निश्चित रूप से बाधित हो जाता है ॥ १६१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रत्यगात्मा में अभिमान रखने वाले पुरुष का 'मैं कुण्डलवाला हूँ'—यह प्रत्यय बाधित हो जाता है,
क्योंकि कुण्डल का सम्बन्ध तो स्थूल शरीर से ही रहता है। जब स्थूल शरीर से अपने को भिन्न समझने लगता है,
तब वह उसे अपने से सम्बन्धित नहीं मानता। उसी प्रकार जब विवेकज्ञान हो जाता है तब 'मैं दुःखी हूँ'—यह
देहाभिमान से उत्पन्न हुआ अविवेकमय प्रत्यय भी निश्चितरूप से बाधित हो जाता है ॥ १६१ ॥
बाध्यते प्रत्ययेनेह विवेकेनाऽविवेकवान् ।
विपर्यासेऽसदन्तं स्यात्प्रमाणस्याप्रमाणतः ॥१६२॥
बाध्यते इति—अविवेक से विवेक का बाध क्यों नहीं होता ? इस शंका का समाधान यह है कि विपर्यास
मानने पर प्रमाण का अप्रामाण्य हो जाने के कारण सभी कुछ 'शून्यमय' हो जायगा। अतः 'अविवेक' से 'विवेक' की
निवृत्ति नहीं हुआ करती ॥ १६२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि विवेकज्ञान से अविवेक की निवृत्ति हो जाती है, तो अविवेक के द्वारा विवेक की भी निवृत्ति हो
सकती है। इस प्रकार शंका करने पर समाधान देते हैं कि इस प्रकार विपरीत मानने पर प्रमाण का अप्रामाण्य हो
जायगा, तब सभी शून्यमय हो जायगा। अतः अविवेक से विवेक की निवृत्ति मानना उचित नहीं है ॥ १६२ ॥
दाहच्छेदविनाशेषु दुःखित्वं नान्यथाऽऽत्मनः ।
नैव ह्यन्यस्य दाहादावन्यो दुःखी भवेत्क्वचित् ॥१६३॥
दाहेति–देहाभिमान के रहने से अनुभूयमान दाह, छेदन और मरण होने के लिये अविवेक के अतिरिक्त अन्य
कोई कारण नहीं। अतः 'आत्मा' का दुःखी होना सम्भव नहीं है। क्योंकि अन्य के दाहादि में कोई अन्य कभी दुःखी नहीं
होता है ॥ १६३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
विवेक से अविवेक की निवृत्ति (बाध) होती है, यह पहले बता चुके हैं, उसे और अधिक स्पष्ट कर
रहे हैं। दुःख का जो अनुभव होता है, वह दाहादि देहोपघात के कारण ही होता है, अन्यथा नहीं। वह अनुभव
देहाभिमाननिबन्धन ही है, अन्यथा सुषुप्ति में भी होना चाहिये। अतः देहाभिमान के कारण अनुभूयमान दाह,
छेदन, मरण आदि से होनेवाले दुःखानुभव में अविवेक के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है। इसीलिये आत्मा का
दुःखी होना असंभव ही है। क्योंकि किसी दूसरे के दाहादि होने पर कोई अन्य कभी दुःखी नहीं होता अर्थात् 'अहं दुःखी
अस्मि' मैं दुःखी हूँ—ऐसा ज्ञान नहीं हुआ करता। आत्मा भी देह से भिन्न है, यह प्रमाणसिद्ध है। 'अहं दुःखी अस्मि'
यह जो अनुभव होता है, वह अध्यासनिबन्धन है ॥ १६३ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४१
अस्पर्शत्वाददेहत्वान्नाहं दाह्यो यतः सदा ।
तस्मान्मिथ्याभिमानोत्थं मृते पुत्रे मृतिर्यथा ॥१६४॥
अस्पर्शत्वादिति—'आत्मा' को स्पर्श न कर सकने के कारण वह 'अस्पृश्य' है, और वह अदेह (देह से भिन्न)
भी है। इसलिये वह दाह्य भी नहीं है। फिर भी पुत्र के मरने पर उसे अपने ही मरण के समान जो दाहजनित दुःख
होता है, वह मिथ्या अभिमान के कारण ही होता है ॥ १६४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा को कोई छू नहीं सकता इसलिये वह अस्पृश्य है, और वह देह से भिन्न भी है, इस कारण आत्मा
दाह्य (दाह के योग्य) भी नहीं है। तथापि पुत्र के मरने पर अपने ही मरण के तुल्य यह दाहजनित दुःख तो मिथ्या-
भिमान से ही होता है, वास्तविक नहीं है ॥ १६४॥
कुण्डल्यहमिति ह्येतद्बाध्येतैव विवेकिना ।
दुःखीति प्रत्ययस्तद्वत् केवलाहंधिया *सह ॥१६५॥
कुण्डल्यहमिति—जैसे विवेकी पुरुष 'मैं कुण्डली हूँ'—इस ज्ञान का बाध कर देता है, वैसे ही शुद्ध ब्रह्म में अहं-
बुद्धि के सहित 'मैं दुःखी हूँ'—इस ज्ञान का भी बाध हो जाता है ॥ १६५ ॥
सिद्धे दुःखित्व इष्टं स्यात् तच्छक्तिश्छन्दसाऽऽत्मनः ।
मिथ्याभिमानतो दुःखी तेनाऽर्थापादन†क्षयः ॥१६६॥
सिद्धे इति—'आत्मा' का दुःखी होना (दुःखित्व ) सिद्ध होने पर, इच्छानुसार उसकी दुःखित्वशक्ति भी इष्ट हो
सकती है। वह तो मिथ्या अभिमान के कारण ही दुःखी होता है और उसी से वह दुःखित्वशक्ति का सम्पादन करने में
समर्थ रहता है ॥ १६६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
दुःखरहित के लिये मोक्षोपदेश अनुपपन्न होने से आत्मा में दुःखित्व की प्रतीति हो सकती है, उस
कारण उस प्रकार की प्रतीति के लिये उसमें शक्तिमत्त्व की प्रतीति माननी होगी। अतः अन्यगत निमित्त से ही वह
दुःखी नहीं है, किन्तु सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में भी स्वतः ही उसमें शक्तिमत्त्व मानना होगा, उसका निवारण कैसे
हो सकता है ? इस प्रश्न के समाधान में कह रहे हैं कि किसी भी अवस्था में उस केवल शुद्ध आत्मा में दुःखित्व यदि
प्रमाण से सिद्ध हो तो अपनी इच्छा के अनुसार उसमें दुःखित्वशक्ति की कल्पना भी की जाय। किन्तु वैसी कल्पना
नहीं कर सकते। क्योंकि उसमें जो दुःखदर्शन होता है, उसकी अन्यथा उपपत्ति भी लगायी जा सकती है। वह तो
मिथ्या अभिमान के कारण ही दुःखी है और उसी से वह दुःखित्वशक्ति सम्पादन करने में समर्थ हो जाता है। अर्थात्
मिथ्याभिमान के कारण ही उसे दुःखित्व का अनुभव होता है ॥ १६६ ॥
अस्पर्शोऽपि यथा स्पर्शमचलश्चलनादि च ।
अविवेकात्तथा दुःखं मानसं चात्मनीक्षते ॥१६७॥
अस्पर्शोऽपीति—जैसे अविवेक से परवश होकर आत्मा, स्पर्शरहित रहने पर भी अपने को स्पर्शयुक्त एवं
अचल रहने पर भी चलनादि धर्म से युक्त समझता है, वैसे ही मन में होनेवाले दुःख को अपने में देखता है ॥ १६७ ॥
विवेकात्मधिया दुःखं नुद्यते चलनादिवत् ।
अविवेकस्वभावेन मनो गच्छत्यनिच्छतः ॥१६८॥
विवेकात्मेति—जिस प्रकार स्थूल देह से आत्मा की भिन्नता का ज्ञान होने पर उसमें चलनादि क्रिया की
निवृत्ति होती है, उसी प्रकार विवेकरूप आत्मज्ञान के द्वारा दुःखादि सूक्ष्मदेहधर्म की भी निवृत्ति हो जाती है। मनुष्य

  • सदा—पाठान्तरम् । † क्षमः—पाठान्तरम् ।
    ३१

२४२ उपदेशसाहस्री
की इच्छा न रहने पर भी उसका मन अविवेक के अधीन होकर ही इधर-उधर भटकता रहता है। अर्थात् सूक्ष्म देह से
अविवेक रहने के कारण होने वाले दुःख का ब्रह्मात्मज्ञान से समूल बाध हो जाता है ॥ १६८ ॥
तदा तु दृश्यते दुःखं नैश्चल्ये नैव तस्य तत् ।
प्रत्यगात्मनि तस्मात्तद्दुःखं नैवोपपद्यते ॥१६९॥
तदेति—किन्तु विवेक के द्वारा मन के निश्चल हो जाने पर वह दुःख आत्मा में नहीं दिखाई पड़ता। अतः
प्रत्यगात्मा में दुःख का होना संभव ही नहीं है ॥ १६९ ॥
त्वंसतोस्तुल्यनोडत्वान्नीलोत्पलइवविदं भवेत् ॥१७०॥
त्वमिति—'त्वम्' और 'सत्' ये दोनों पद, एक ही अर्थ में अन्वित होते हैं। अतः यह वाक्य 'नील-अश्व' के
समान है ॥ १७० ॥
हृदयस्पर्शिनी
उपर्युक्त युक्तियों से निर्दुःख स्वभाववाला आत्मा है, यह सिद्ध होने पर वेदान्तवाक्य से ही 'मैं ब्रह्म हूँ' यह
अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है। 'त्वं और सत्' ये पद, एक ही अर्थ (वस्तु) में अन्वित होते हैं। अतः 'तत्त्वमसि' यह
वाक्य, 'नील अश्व' के तुल्य है। यद्यपि इस दृष्टान्त में यह प्रश्न उपस्थित किया जा सकता है कि 'नील अश्व' में
'नील' गुण है और 'अश्व' गुणी (द्रव्य) है, और दोनों का 'संसर्ग' उसका अर्थ है। किन्तु 'तत्त्वमसि' में 'तत्' और
'त्वम्' पद की 'अखण्डार्थता' ही वाक्यार्थ है। अतः यह दृष्टान्त देना उचित नहीं है। किन्तु इसका समाधान यह है
कि यद्यपि उक्त दृष्टि से इनकी समानता नहीं है, तथापि एकद्रव्यपर्यवसायित्वरूप सामानाधिकरण्य तो है ही।
इस प्रकार सामानाधिकरण्य बताने में ही दृष्टान्त देने का तात्पर्य है ॥ १७० ॥
निर्दुःखावाचिना योगात् त्वंशब्दस्य तदर्थता ।
प्रत्यगात्माभिधानेन तच्छब्दस्य युतेस्तथा ॥१७१॥
निर्दुःखेति—निर्दुःखवाचक 'सत्' शब्द के साथ 'त्वम्' शब्द का सामानाधिकरण्य है। इसलिये उसका अर्थ
'सत्' है। उसी तरह प्रत्यगात्मा के वाचक 'त्वम्' पद के साथ 'सत्' पद का सामानाधिकरण्य है। अतः उसका 'अपरोक्षत्व'
सिद्ध होता है ॥ १७१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'तत्' और 'त्वम्' दोनों पदों का एकार्थनिष्ठत्व किस प्रकार है, उसे बता रहे हैं। निर्दुःखवाची 'सत्'
शब्द के साथ सामानाधिकरण्य होने से 'त्वं' शब्द में 'सत्' शब्द की अर्थता है अर्थात् 'त्वम्' शब्द, 'सत्' शब्द का अर्थ
है, और प्रत्यगात्मा के वाचक 'त्वं' शब्द के साथ 'तत्' शब्द (सत् शब्द) का सामानाधिकरण्य होने से 'तत्' (सत्)
शब्द, 'त्वम्' शब्द का अर्थ है। अतः 'तत्' (सत्) का अपरोक्षत्व सिद्ध हो जाता है ॥ १७१ ॥
दशमस्त्वमसीत्येवं वाक्यं स्यात्प्रत्यगात्मनि ॥१७२॥
दशमस्त्वमिति—अतः 'दसवां (दशम) तू है' इस वाक्य के समान 'तत्त्वमसि' वाक्य का तात्पर्य 'प्रत्यगात्मा'
में ही समझना चाहिये ॥ १७२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
वाक्य भी अपरोक्ष वस्तु का प्रतिपादक होता है, उसे दृष्टान्त देकर बता रहे हैं। जैसे दस मनुष्य किसी
समय देशान्तर जा रहे थे। रास्ते में एक नदी थी। तैरते हुए जब उस नदी के पार पहुँच गये, तब यह जानने के लिये
कि कोई डूब तो नहीं गया या बह तो नहीं गया ? यह जानने के लिये आपस में वे गिनने लगे। प्रत्येक ने सबको गिना,

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४३
लेकिन वह स्वयं को गिनना भूल जाता था, अर्थात् केवल नौ लोगों को ही गिनता था। तब वे यह समझने लगे कि हम
दस में से एक बह गया या डूब गया, और शोकग्रस्त होकर रोने लगे। उसी समय एक बुद्धिमान् आदमी वहाँ आ
पहुँचा। और उसने दस में से एक के डूबने का समाचार उनसे सुना, तब उसने कहा 'दशम' दसवाँ भी है, वह न डूबा
है और न बह गया है। और दसों को गिनकर यह भी दिखा दिया कि वह 'दशम' दसवा आदमी, स्वयं गणना करने-
वाला ही है। अतः जिस प्रकार 'दशमस्त्वमसि' दसवा तू ही है—इस वाक्य का तात्पर्य स्वयं गणना करनेवाले में ही है,
उसी प्रकार 'तू ब्रह्म है' इस वाक्य का तात्पर्य भी प्रत्यगात्मा में ही है। 'तत्त्वमसि' वाक्य का तात्पर्य 'दशमस्त्वमसि'
वाक्य के समान प्रत्यगात्मा में ही है ॥ १७२ ॥
स्वार्थस्य ह्यप्रहाणेन विशिष्टार्थसमर्पकौ ।
प्रत्यगात्मावगत्यन्तौ नान्योऽर्थोऽर्थाद्विरोध्यतः ॥१७३॥
स्वार्थस्येति—अपने वाच्यार्थ का त्याग न करने से तो ये विशिष्ट अर्थ के द्योतक होते हैं। किन्तु अन्ततोगत्वा
इनका पर्यवसान ( तात्पर्य) प्रत्यगात्मा में ही होता है। इस अखण्डार्थ का विरोधी अन्य अर्थ, वेदान्त शास्त्र में नहीं बताया
गया है। 'त्वम्' पद से वाच्य जो 'जीव' है, वह प्रत्यक्ष और अल्पज्ञ है। तथा 'तत्' पद से वाच्य जो 'ईश्वर' है, वह परोक्ष
और सर्वज्ञ है। उनके इन विशेष गुणों का बाध कर देने पर 'शुद्ध' चेतन अवशिष्ट रह जाता है। वही 'तत्त्वमसि' महा-
वाक्य का अखण्ड अर्थ है ॥ १७३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'तत्' और 'त्वम्' पदों का यदि एक ही अर्थ में पर्यवसान होता है तो घट-कलश आदि के समान उन्हें
पर्याय कहना होगा, तब उनका सहप्रयोग (एकसाथ प्रयोग) नहीं किया जा सकता। ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये,
क्योंकि उन दोनों की प्रवृत्ति के भिन्न-भिन्न निमित्त (प्रवृत्तिनिमित्त भेद) होने से उन्हें पर्याय नहीं कह सकते।
ये 'तत् और त्वम्' दोनों पद, अपने वाच्यार्थ (परोक्षत्व और प्रत्यक्षत्व) का त्याग न करने के कारण ही विशिष्ट
अर्थ के प्रकाशक होते हैं। अतः वाच्यार्थ के भिन्न होने से दोनों को पर्याय नहीं कह सकते। अन्ततोगत्वा उन दोनों
का तात्पर्य प्रत्यगात्मा में ही है। अर्थात् शुद्ध साक्षी का ज्ञान कराने में ही उन पदों का तात्पर्य है। निष्कर्ष यह है कि
तत्-त्वम् पदों के सुनाई देनेवाले सामानाधिकरण्य का तात्पर्य परस्परविरुद्ध वाच्यार्थों के संसर्ग (संबन्ध) में अथवा
अन्यतरविशिष्ट हुए अन्यतर में हैं। किन्तु—'सोऽयं देवदत्तः' के समान भेदपरामर्श के कल्पित होने से लक्षण के
द्वारा परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि अंश के समाप्त होने पर अखण्डस्वरूपमात्र में उनका पर्यवसान होता है। एवंच
प्रत्यगात्मा का ज्ञान कराने के लिये ही तत्-त्वं शब्द कहे गये हैं। तथापि पुनः जिज्ञासा होती है कि तत्-त्वम् पदों के
सामानाधिकरण्य की उपपत्ति अंशांशिभाव को मानकर भी हो सकती है, तब अखण्डार्थ में ही इतना पक्षपात क्यों
है ? उत्तर यह है कि अखण्डार्थ का विरोधी कोई अन्य अर्थ वेदान्त में नहीं बताया गया है। कहने का अभिप्राय यह
है कि सुवर्ण-कुण्डल के समान तत्-त्वम् के अर्थों में कार्य-कारणभाव से संसर्ग का होना संभव नहीं है। क्योंकि
“अन्यत्रास्मात्कृताकृतात्”१ श्रुति से विरोध होगा। और भूमि-ऊषरादि के सामान अंशांशिभाव से भी उनका संसर्ग
होना संभव नहीं है, क्योंकि “निष्कलं निष्क्रियम्”२ इत्यादि कूटस्थ एकरस की प्रतिपादक श्रुति से विरोध होगा।
उसी तरह 'नीलम्-उत्पलम्' में जैसे गुण-गुणिभाव से संसर्ग होता है, वैसा संपर्क भी यहाँ नहीं हो सकता, क्योंकि
निर्गुणत्वश्रुति से विरोध होगा। और जाति-व्यक्ति-विशिष्ट स्वरूपादि प्रकार से भी यहां संसर्ग नहीं बन सकता,
क्योंकि “एकमेवाद्वितीयम्”३, “असङ्गोहायं पुरुषः४” इत्यादि श्रुतियों से विरोध होगा। तस्मात् विशिष्टसंसर्गविरोधी
वस्तुमात्र में स्थित रहना, यही वाक्य की अखण्डार्थता का तात्पर्य है। तथाच अनुमान का आकार यह होगा—
१. ( कठ उ. २।१४ )
२. ( श्वे. उ. ६।१९ )
३. ( छां. उ. ६।२।१८ )
४. ( बृ. उ. ४।३।१५-१६ )

२४४ उपदेशसाहस्री
'विमतं अखण्डार्थनिष्ठम्, उपाधिपरामर्शमन्तरेणाविभाव्यमानभेदवस्तुनिष्ठत्वात् 'सोऽयं देवदत्तः', खं छिद्रम्' इत्यादि
वाक्यवत् ॥ १७३ ॥
नवबुद्ध्यपहाराद्धि स्वात्मानं दशपूरणम् ।
अपश्यञ्ज्ञातुमेवेच्छेत् स्वमात्मानं जनस्तथा ॥१७४॥
नवेति—'हम नौ मनुष्य हैं'—इस भ्रान्त बुद्धि से (यथार्थ ज्ञान के न रहने से) दशम संख्या की पूर्ति करने
वाले स्वयं अपने को वह जानना चाहता है। क्योंकि वह अपने-आप को ही भूल बैठा था ॥ १७४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
वाक्य की अखण्डार्थनिष्ठता रहने पर भी केवल उसमें ही उसका तात्पर्य (पर्यवसान) मानना उचित
नहीं है। क्योंकि केवल ज्ञानमात्र से फलप्राप्ति नहीं होती। अतः यत्नान्तर का अन्वेषण करना चाहिये, इसलिये क्रिया-
पर्यवसायिता क्यों नहीं मानी जाती ? उत्तर देते हैं कि जो अर्थ जिज्ञासित रहता है, उसी अर्थ की कल्पना की जाती है।
जिज्ञासित अर्थ को छोड़कर अर्थान्तर में तात्पर्य की कल्पना यदि की जायेगी तो अबुभुत्सित अर्थ होने से वाक्य ही
अप्रमाण हो जायेगा। 'हम नौ मनुष्य हैं' इस बुद्धि के भ्रम से यथार्थ ज्ञान तिरोहित हो जाने से दशम संख्या की पूर्ति
करनेवाला व्यक्ति स्वयं अपने को न जानने के कारण उसे केवल जानना ही चाहता है। उसके अतिरिक्त और कुछ करना
नहीं चाहता। इस दृष्टान्त के अनुसार मुमुक्षु व्यक्ति भी स्वयं अपने को किसी कारण से भूल गया था, अतः उसे केवल
जानना ही चाहता है, जिससे भ्रम दूर हो जाय। एवंच भ्रमनिवृत्तिरूप फल के लिये ही वह केवल अपने आप को
जानना ही चाह रहा है। अतः क्रियापरत्व की कल्पना करने का अवसर ही कहाँ है ? ॥ १७४ ॥
अविद्याबद्धचक्षुष्ट्वात्कामापहृतधीः सदा ।
विविक्तं दृशिमात्मानं नैक्षते दशमं यथा ॥१७५॥
अविद्याबद्धेति—अपना ही विस्मरण होने से जैसे दसवें व्यक्ति का ज्ञान नहीं हुआ था, वैसे ही अनादि अविद्या
के द्वारा विवेकदृष्टि के आच्छादित होने के कारण नानाविध कामना (तृष्णा) ओं से कुण्ठित बुद्धि वाला पुरुष, दृश्य वर्ग
से पृथक्भूत ज्ञानस्वरूप आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाता ॥ १७५ ॥
दशमस्त्वमसीत्येवं तत्त्वमस्यादिवाक्यतः ।
स्वमात्मानं विजानाति कृत्स्नान्तःकरणेक्षणम् ॥१७६॥
दशमस्त्वमिति—'दशमस्त्वमसि' के समान 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य से मुमुक्षु पुरुष सम्पूर्ण अन्तःकरण के
साक्षी आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेता है ॥ १७६ ॥
इदं पूर्वमिदं पश्चात् पदं वाक्यं भवेदिति ।
नियमो नैव वेदेऽस्ति पदसाङ्गत्यमर्थतः ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां ततो वाक्यार्थबोधनम् ॥१७७॥
इदमिति—'तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि' इन वाक्यों में 'त्वम्', 'अहम्' आदि पदों को पहले और 'तत्' 'ब्रह्म'
आदि पदों को पीछे रखकर वाक्य बनाया जाता है। तब अन्वय-व्यतिरेक से वाक्यार्थ का बोध होता है। किन्तु व्यावहारिक
नियम के अनुसार 'उद्देश्य' को पहले और 'विधेय' को बाद में रखा जाता है। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य में विधेय जो 'तत्'
पद है, उसे पहले रखा गया है, और उद्देश्य जो 'त्वम्' पद है, उसे बाद में रखा गया है। उस पर सिद्धान्ती कहता है कि
'पाठक्रम' की अपेक्षा 'अर्थक्रम' को प्रबल मानने का सिद्धान्त मीमांसा शास्त्र ने बताया है। अतः अन्वय-व्यतिरेक रूप
प्रमाण के सहारे उनका अर्थ के अनुसार अन्वय समझना चाहिये ॥ १७७ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४५
हृदयस्पर्शिनी
पुनरपि एक जिज्ञासा जागरित होती है कि लोकव्यवहार में सर्वत्र यह नियम देखा जाता है कि वाक्य
में प्रथमतः उद्देश्य रखा जाता है, पीछे विधेय रखा जाता है ।
“यच्छब्दः योगः प्राथम्यमित्याद्युद्देश्यलक्षणम् ।
तच्छब्द एवकारश्च स्यादुपादेयलक्षणम्¹ ।।
इस न्याय में प्रथमनिर्दिष्ट उद्देश्य और चरमानिर्दिष्ट उपादेय (विधेय) होता है। प्रकृत में उसका पालन नहीं हुआ है।
‘तत्त्वमसि’ वाक्य में ‘तत्’ पद जो विधेय है, उसका प्रथम निर्देश हुआ है। और ‘त्वम्’ पद जो उद्देश्य है, उसका
पश्चात् निर्देश हुआ है। अर्थात् ‘तत्त्वम्’ में तदर्थ का प्राथम्य सुनाई देता है और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ में त्वमर्थ का प्राथम्य
ज्ञात हो रहा है। अतः उद्देश्य-विधेय के नियम की यहाँ रक्षा नहीं हो पायी। तब सिद्धान्ती उत्तर देते हैं कि वेद में
पाठक्रम के अनुसार अर्थ करने का ही कोई नियम नहीं है। पाठक्रम की अपेक्षा अर्थक्रम की प्रबलता मानी गई है।
अतः अनेक स्थलों में अर्थक्रम के अनुसार ही अनुष्ठान किया जाता है। 'आहर पात्रम्', 'पात्रमाहर' के समान अर्थ-
नियम की विवक्षा की गई है। अन्वय-व्यतिरेक प्रमाण के द्वारा अर्थ के अनुसार अन्वय किया जाता है। 'तत्त्वमसि', 'अहं
ब्रह्मास्मि' इत्यादि वाक्यों में यह 'त्वम्' 'अहम्' आदि पद पहले और 'तत्' 'ब्रह्म' आदि पद पीछे रहने से वाक्य बनाता
है। अतः पश्चात् अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा वाक्यार्थ का ज्ञान होता है। क्योंकि पाठ का नियम न रहने पर भी 'प्रसिद्ध-
मुद्दिश्य अनूद्य अप्रसिद्धो बोध्यते'—इस न्याय से प्रसिद्धार्थक त्वम्, अहम् आदि पदों को पहले और ‘इदम्’ अप्रसिद्धार्थक
ब्रह्म, सत् आदि पदों को पश्चात्—इस रीति से विन्यस्त किये गये को वाक्य कहा जा सकता है—इस प्रकार अन्वय-
व्यतिरेक के द्वारा जानकर पश्चात् वाक्यार्थ का बोधन (ज्ञान) अर्थात् त्वमर्थ की तदर्थात्मता का ज्ञान हो सकता
है ।। १७७ ।।
वाक्ये हि श्रूयमाणानां पदानामर्थसंस्मृतिः ।। १७८।।
वाक्ये इति—वेदवाक्य में जो श्रूयमाण पद हैं, उनमें अर्थस्मृतिरूप नियम नहीं है। वहाँ अर्थ के अनुसार
पदों की संगति लगानी होती है ।। १७८ ।।
हृदयस्पर्शिनी
क्योंकि वाक्य के अन्तर्गत श्रुत हुए पदों का अर्थस्मृतिरूप नियम नहीं है। वहाँ अर्थ के अनुसार पदों की
संगति लगाई जाती है ।। १७८ ।।
यदा नित्येषु वाक्येषु पदार्थस्तु विविच्यते ।
वाक्यार्थज्ञानसंक्रान्त्यै तदा प्रश्नो न युज्यते ।। १७९।।
यदेति—जब वाक्यार्थ के ज्ञान का संचार करने के लिये नित्यवाक्य में प्रयुक्त पद के अर्थ का विवेचन कर
दिया जाता है, तब शिष्य का कोई प्रश्न करना उचित नहीं है ।। १७९ ।।
हृदयस्पर्शिनी
कोई प्रश्नकर्ता पुनः कहता है कि ‘तू ब्रह्म है’—इस प्रकार गुरु के उपदेश करने पर भी शिष्य कह सकता है
कि 'मैं तो परिच्छिन्न हूँ', तब मैं अपरिच्छिन्न तथा नित्य ब्रह्म कैसे हो सकता हूँ ?—इस स्थिति में केवल वाक्यार्थ मात्र
से पदार्थज्ञान की उत्पत्ति कैसे मानी जा सकती है ? अतः तदन्यथानुपपत्त्या कहा जा सकता है कि वाक्य, साक्षात् बोध-
जननसमर्थ नहीं है। इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है कि जिस समय गुरु, वाक्य के पदों का वास्तविक अर्थ बताकर
शिष्य के अन्तःकरण में वाक्यार्थ का संचार कर देता है, उस समय शिष्य को पुनः कोई शंका नहीं हो सकती। शंका
१. वरदराज ने अवयव निरूपण के प्रसंग पर ‘तार्किकरक्षा’ नामक ग्रन्थ में इस कारिका को उद्धृत किया है। विद्यारण्य ने भी
‘विवरण प्रमेय संग्रह’ में सू. १ के द्वितीय वर्णक में इसे उद्धृत किया है।

२४६ उपदेशसाहस्री
तो तभी तक होती है, जब तक उसे पदार्थ का बोध नहीं होता है। पदार्थ का बोध हो जाने पर शिष्य को कोई
शंका नहीं रहती ॥ १७९॥
अन्वयव्यतिरेकोक्तिः पदार्थस्मरणाय तु ।
स्मृत्यभावे न वाक्यार्थो ज्ञातुं शक्यो हि केनचित् ॥१८०॥
अन्वयेति—श्लोक १७७ 'इदं पूर्वमिदं' में अन्वय-व्यतिरेक के विषय में जो बताया गया है, वह पदों के अर्थ
का स्मरण रखने के लिये कहा गया है। क्योंकि उनके स्मरण के बिना कोई भी व्यक्ति वाक्यार्थ को जानने में समर्थ नहीं
हो सकता क्योंकि वाक्यार्थ का बोध तो पदों के अर्थज्ञान की स्मृति पर ही निर्भर रहता है ॥ १८० ॥
हृदयस्पर्शिनी
पदार्थतत्व से अनभिज्ञ पुरुष ही प्रश्न करता है। जो अभिज्ञ है, उसके सभी प्रश्न शान्त हो जाते हैं।
पूर्वगत १७७ वे श्लोक में अन्वय-व्यतिरेक के सम्बन्ध में जो कहा गया है, वह पदों के अर्थों को स्मरण रखने के लिये
कहा गया है, क्योंकि उनकी स्मृति के बिना वाक्य का अर्थ किसी के समझ में नहीं आ सकता। अवान्तर वाक्य और
तदनुकूल तर्क के द्वारा आत्मानात्म-विवेचन ही पूर्वोक्त अन्वय-व्यतिरेक शब्द से कहा गया है। लोकानुभव से यह
स्पष्ट है कि पदार्थस्मृति ही पदोपस्थापित वाक्यार्थ का ज्ञान कराने में कारण हुआ करती है ॥ १८० ॥
तत्त्वमस्यादिवाक्येषु त्वंपदार्थाविवेकतः ।
व्यज्यते नैव वाक्यार्थो नित्यमुक्तोऽहमित्यतः ॥१८१॥
तत्त्वमिति—'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यों में 'त्वम्' पदार्थ का विवेक न होने से 'मैं नित्य मुक्तस्वरूप हूँ'—यह
वाक्यार्थ अभिव्यक्त नहीं हो पाता ॥ १८१ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यों में 'त्वं' पद के अर्थ का विवेक न होने के कारण 'मैं नित्य मुक्त स्वरूप हूँ'
यह वाक्यार्थ अभिव्यक्त नहीं हो पाता। इसलिये 'त्वं' पदार्थ के विवेक करने में अत्यन्त प्रयत्न करना चाहिये ॥१८१॥
अन्वयव्यतिरेकोक्तिस्तद्विवेकाय नान्यथा ।
त्वंपदार्थविवेके हि पाणावर्पितबिल्ववत् ॥१८२॥
अन्वयेति—अन्वय-व्यतिरेक का जो उल्लेख किया गया था, वह उसी का विवेक कराने के लिये ही है, उसका
कोई अन्य प्रयोजन नहीं है। 'त्वम्' पदार्थ का विवेक हो जाने पर हथेली पर रखे हुए बिल्व फल के समान...॥ १८२॥
वाक्यार्थो व्यज्यते चैवं केवलोऽहंपदार्थतः ।
दुःखीत्येतदपोहेन प्रत्यगात्मविनिश्चयात् ॥१८३॥
वाक्यार्थ इति—वाक्यार्थ की अभिव्यक्ति हो जाती है। 'मैं दुःखी हूँ'—इस प्रकार के प्रत्यय का 'अहम्'
पद के अर्थ से बाध हो जाने पर प्राप्त हुए प्रत्यगात्मा का निश्चय हो जाता है ॥ १८३॥
हृदयस्पर्शिनी
उपर्युक्त अन्वय-व्यतिरेक का उल्लेख उसी का विवेक कराने के लिये है, किसी अन्य प्रयोजन के लिये
नहीं है। 'त्वं' पद के अर्थ का विवेक हो जानेपर 'अहं' के अर्थ से 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार के प्रत्यय का बाध कर देने
पर प्राप्त हुए प्रत्यगात्मा के निश्चय से हथेली पर रखे हुए बेलफल के तुल्य वाक्यार्थ की अभिव्यक्ति हो जाती है।
'तत्त्वमसि' महावाक्य का श्रुत अर्थ तो अखण्डार्थ है, अर्थात् माया और अज्ञान के संसर्ग से रहित ब्रह्म और आत्मा की
एकता है, तथा अश्रुत अर्थ 'संसर्गादि' है, जिसमें जीव और ईश्वर की स्वरूपगत एकता न होकर केवल चैतन्यरूप से
उनकी समानता स्वीकार की जाती है ॥ १८२-१८३ ॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४७
तत्रैवं संभवत्यर्थे श्रुतहानाश्रुतार्थधीः ।
नैव कल्पयितुं युक्ता पदवाक्यार्थकोविदैः ॥१८४॥
तत्रेति—इस रीति से ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य का पूर्वोक्त अर्थ संभव होने पर पद और वाक्य का रहस्य
जानने वालों को श्रुत अर्थ का त्याग और अश्रुत अर्थ की कल्पना करनी उचित नहीं है ॥ १८४ ॥
प्रत्यक्षादीनि बाधेरन् कृष्णलादिषु पाकवत् ।
अक्षजादिनिभैरेतैः कथं स्याद्वाक्यबाधनम् ॥१८५॥
प्रत्यक्षादीनीति—पूर्वपक्षी का कहना है कि जैसे कृष्णल ( सुवर्ण खण्ड ) आदि का पाक नहीं हो सकता,
वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उक्त अखण्डार्थ का बाध हो जायगा । उस पर सिद्धान्ती कहता है कि इन प्रत्यक्षाभासादि
प्रमाणों से उक्त महावाक्य के अखण्डार्थ का बाध कैसे हो पायगा ? ॥ १८५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
प्रत्यक्षादिविरुद्ध अर्थ में वाक्य का बाधदर्शन होने से पूर्ववादी दृष्टान्त देकर शंका कर रहा है । जैसे
'कृष्णलान् श्रपयेत्'१ वाक्य से कृष्णल (सुवर्णमय कण) का पाक श्रुत रहनेपर भी प्रत्यक्ष प्रमाण से उसका बाध किया
जाता है, क्योंकि सुवर्ण कणों में विक्लित्ति होना संभव ही नहीं है । अतः पाकक्रियासाध्य संस्कारमात्र ही अदृष्टफल
के लिये किया जाता है । उसी तरह यहाँ भी भेदग्राहक प्रत्यक्षादि प्रमाण, वाक्य की अखण्डार्थता का बाध कर देंगे ।
आत्मा का ब्रह्मत्व श्रुत रहने पर भी उसमें पूर्णता नहीं दिखाई देती । इसलिये प्रसंख्यान होने से वाक्य को आत्म-
संस्कारार्थ ही मान लिया जाय । तब सिद्धान्ती उत्तर देता है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से कर्तृत्ववादि का प्रतिभास यदि
होता हो तो आपके कथनानुसार हो भी सकता है, किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों से कर्तृत्ववादि का ज्ञान (प्रतिभास) नहीं
होता । क्योंकि आत्मा में दुःखित्वादि धर्मों की प्रतीति, अध्यस्त अहंकार आदि के सम्बन्ध से ही होती है । दुःखित्वादि
धर्म, स्वतः आत्मा के नहीं हैं । अतः प्रत्यक्षाभासादि प्रमाणाभासों से प्रमाणभूत वाक्य का बाध कैसे किया जा सकता
है ? अर्थात् उसका बाध कभी नहीं किया जा सकेगा । तथा 'प्रयाजे कृष्णलं जुहोति'२ के समान ब्रह्मज्ञान में संस्कृत हुए
आत्मा का अन्यत्र विनियोग भी नहीं है, इसलिये वाक्य को संस्कारार्थ भी नहीं कहा जा सकता । और आत्मा की पूर्णता
अर्थात् तत्काल ब्रह्मत्व, जो उसमें नहीं प्रतीत होता है, वह पदार्थ की दृढ़ बुद्धि न होने से है । तात्पर्य यह है कि
प्रमाणाभास से महावाक्य का बाध नहीं होगा ॥ १८५ ॥
दुःख्यस्मीति सति ज्ञाने निर्दुःखोति न जायते ।
प्रत्यक्षादिनिभत्वेऽपि वाक्यान्न व्यभिचारतः ॥१८६॥
दुःखीति—पूर्वपक्षी कहता है कि आपके कथनानुसार दुःखित्वाभिमान का प्रत्यक्षाभासत्व सिद्ध रहने पर भी
'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान होने पर उक्त वाक्य से 'मैं दुःखरहित हूँ' यह ज्ञान नहीं होता । उस पर सिद्धान्ती कहता है कि
तुम ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि 'दुःखित्वज्ञान' का व्यभिचार दिखाई देता है ॥ १८६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्वपक्षी पुनः शंका करता है कि दुःखित्वाभिमान का प्रत्यक्षाभासत्व सिद्ध होने पर भी 'मैं दुःखी हूँ'
यह ज्ञान तो होता है, किन्तु वाक्य से 'मैं दुःखहीन हूँ' यह ज्ञान नहीं होता । तब सिद्धान्ती कहता है कि ऐसी बात
नहीं है, क्योंकि इस दुःखित्वज्ञान का व्यभिचार दिखाई देता है । पूर्वपक्षी के कहने का अभिप्राय यह है कि विरोधिता-
लक्षण अप्रामाण्य के न रहने पर भी अनुपपत्तिलक्षण अप्रामाण्य तो वाक्य में है ही । प्रत्यक्ष तो पूर्व से ही सिद्ध रहने
से असंजातविरोधी है, इसलिये वही प्रबल है, वाक्य प्रबल नहीं है । तब सिद्धान्ती व्यभिचारप्रदर्शन कर
रहा है ॥ १८६ ॥
१. ( जै. सू. १०।१।१-३, २।१-२ )
२. ( तै. सं. २।३।२।३ )

२४८ उपदेशसाहस्री
स्वप्ने दुःख्यहमध्यासं दाहच्छेदादिहेतुतः ।
तत्कालभाविभिर्वाक्यैर्न बाधः क्रियते यदि ॥१८७॥
स्वप्न इति—व्यभिचार इस प्रकार है कि स्वप्नावस्था में मैं दाह-छेदन आदि कारणों से दुःखी था, उसके
बाद आप्त जनों के उपदेश से दुःखरहित हो गया—यह अनुभव रहने से समझ में आता है कि दुःखित्व धर्म 'आत्मा' का
नहीं है। यदि स्वप्न के वाक्यों से उसका बाध न भी हुआ हो तो......॥ १८७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उसी व्यभिचार को दिखा रहे हैं—स्वप्नावस्था में दाह-छेदनादि कारणों से मैं दुःखी था । पश्चात्
आप्त के उपदेश से दुःखहीन हो गया—यह अनुभव होता है, उस कारण यह दुःखित्व, आत्मा का धर्म नहीं है ॥१८७॥
समाप्तेस्तर्हि दुःखस्य प्राक्च तद्बाध इष्यताम् ।
न हि दुःखस्य सन्तानो भ्रान्तेर्वा दृश्यते क्वचित् ॥१८८॥
समाप्तेरिति—उस दुःख की समाप्ति में और उससे पूर्व उसके बाध का स्वीकार करो। क्योंकि शुक्ति-रजतादि
के भ्रम के समान आत्मा में दुःखपरम्परा का रहना भी किसी ने देखा नहीं है ॥ १८८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
तथापि पूर्वपक्षी के अभिनिवेश के अनुसार कहें कि स्वप्नावस्था के वाक्यों से उसका बाध न भी किया
गया हो तो उस दुःख की समाप्ति में और उससे पूर्व उसका बाध स्वीकार करना ही चाहिये, क्योंकि दुःख के पूर्व
और उसकी समाप्ति में तो दुःख का अभाव ही है। शुक्तिरजतादि भ्रम के तुल्य आत्मा में दुःखपरम्परा के भी कभी
दर्शन नहीं होते । वह भी आरोपित ही है। अतः उसे आत्मा का स्वरूप नहीं कह सकते, क्योंकि वह आगन्तुक है
किन्तु आत्मा नित्यसिद्ध है। इसलिये वाक्य के असामर्थ्य की शंका भी नहीं की जा सकती है ॥ १८८ ॥
प्रत्यगात्मन आत्मत्वं दुःख्यस्मीत्यस्य बाधया ।
दशमं नवमस्येव वेद चेदविरुद्धता ॥१८९॥
प्रत्यगात्मनेति—जिस प्रकार लोक में नवम का बाध करके दशम व्यक्ति का ज्ञान होता है, उसी प्रकार यदि
महावाक्य से 'मैं दुःखी हूँ' इस ज्ञान का बाध करके प्रत्यगात्मा के आत्मत्व का अनुभव हो जाता है, तब भी वाक्यार्थ के
प्रबल रहने में कोई विरोध नहीं हो सकता ॥ १८९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिस प्रकार लोकव्यवहार में नवम का बाध करके दशम पुरुष का ज्ञान होता है, उसी प्रकार यदि
महावाक्य द्वारा 'मैं दुःखी हूँ' इस ज्ञान का बाध करके प्रत्यगात्मा के आत्मत्व का अनुभव हो जाता है, तथापि वाक्यार्थ
की प्रबलता में कोई विरोध नहीं हो सकता । अतः वाक्य को प्रत्यक्ष से दुर्बल नहीं कह सकते ॥ १८९ ॥
नित्यमुक्तत्वविज्ञानं वाक्याद्भवति नान्यतः ।
वाक्यार्थस्यापि विज्ञानं पदार्थस्मृतिपूर्वकम् ॥१९०॥
नित्येति—विस्तार से कहे गये न्यायार्थ को चार श्लोकों के द्वारा संक्षेप में कह रहे हैं। आत्मा के नित्य-
मुक्तत्व का ज्ञान भी वाक्य से ही होता है, किसी अन्य प्रमाण से नहीं। तथा वाक्यार्थ का ज्ञान भी पदों के अर्थ की स्मृति
के द्वारा ही हो सकता है ॥ १९० ॥
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां पदार्थः स्मर्यते ध्रुवम् ।
एवं निर्दुःखमात्मानमक्रियं प्रतिपद्यते ॥१९१॥

अन्वयेति—और पदों के अर्थ का स्मरण अन्वय-व्यतिरेक से ही होता है। इस रीति से दुःखहीन तथा निष्क्रिय
आत्मा की प्राप्ति होती है ॥ १९१ ॥
सदेवेत्यादिवाक्येभ्यः प्रमा स्फुटतरा भवेत् ।
दशमस्त्वमसीत्यस्माद्यथैवं प्रत्यगात्मनि ॥१९२॥
सदेवेति—जिस प्रकार 'दशमस्त्वमसि' वाक्य से अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ज्ञान होता है, उसी प्रकार 'सदेव सोम्येद्-
मग्र आसीत्' इत्यादि वाक्यों द्वारा प्रत्यगात्मा का अपरोक्ष ज्ञान होता है ॥ १९२ ॥
प्रबोधेन यथा स्वाप्नं सर्वदुःखं निवर्तते ।
प्रत्यगात्मधिया तद्वद्दुःखित्वं सर्वदाऽऽत्मनः ॥१९३॥
प्रबोधेनेति—जिस प्रकार प्रबोध होने पर (जागने पर ) स्वप्न में प्राप्त हुआ समस्त दुःख दूर हो जाता है,
उसी प्रकार प्रत्यगात्मबुद्धि से सर्वदा ही आत्मा के दुःखित्व की निवृत्ति हो जाती है ॥ १९३ ॥
कृष्णलादौ प्रमाऽजन्म तदन्यार्थाऽमृदुत्वतः ।
तत्त्वमस्यादिवाक्येषु न त्वेवमविरोधतः ॥१९४॥
कृष्णलादाविति—पूर्वं दिये गये कृष्णलपाक दृष्टान्त के वैषम्य को स्फुट करते हैं। 'कृष्णलान् श्रपयेत्' इत्यादि
वाक्य से जो प्रमा की अनुत्पत्ति है, वह अन्य कारण से है। अर्थात् कृष्णलों की अमृदुलता (कठोरता) ही उसमें कारण
है। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य में वैसी बात नहीं है, क्योंकि उसमें कोई ऐसा विरोध नहीं है। अर्थात् कृष्णलों के उबाले
जाने पर भी उनमें पाकक्रिया नहीं होती, किन्तु तत्त्वमस्यादि वाक्यों में ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनमें ऐसा कोई विरोध
नहीं है। अतः 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों से प्रमा की अनुत्पत्ति होती है, यह नहीं कह सकते ॥ १९४ ॥
वाक्ये तत्त्वमसीत्यस्मिन् ज्ञातार्थं तदसिद्वयम् ।
त्वमर्थे सत्यसाहाय्याद्वाक्यं नोत्पादयेत्प्रमाम् ॥१९५॥
वाक्य इति—प्रकृत में वैसा विरोध नहीं है। पूर्वोक्त श्लोक (१८१) में जो कहा गया था, उसी को विस्तृत
करते हुए त्वं-पदार्थ के विवेचन में अधिक प्रयत्न करने के लिये कहा जा रहा है—'तत्त्वमसि' वाक्य में 'तत्' और 'असि'
इन दो पदों का अर्थ तो ज्ञात है, किन्तु 'त्वम्' पद का अर्थ ज्ञात न होने पर उसकी सहायता न होने के कारण उस वाक्य
से अपरोक्ष निश्चयरूप प्रमा की उत्पत्ति नहीं हो सकती। अतः 'त्वम्' पद का शोधन करने के लिये विशेष प्रयत्न की
आवश्यकता है ॥ १९५ ॥
तत्त्वमोस्तुल्यनीडार्थमसीत्येतत्पदं भवेत् ॥१९६॥
तत्त्वमोरिति—'तत्' और 'त्वम्' पदों का सामानाधिकरण्य प्रदर्शित करने के लिये ही 'असि' पद का उपयोग
किया गया है। तुल्यनीडार्थ अर्थात् 'कुरु' 'चिन्तय' इत्यादि क्रिया की आकांक्षा का निवारण हो जाने से सामानाधिकरण्य
की सिद्धि हो जाती है। अतः ऐक्यावलम्बनत्व के स्पष्टीकरणार्थ 'असि' और 'अस्मि' इत्यादि पदों का उपयोग किया
गया है ॥ १९६ ॥
तच्छब्दः प्रत्यगात्मार्थस्तच्छब्दार्थस्त्वमस्तथा ।
*दुःखित्वाप्रत्यगात्मत्वं वारयेतामुभावपि ॥१९७॥
तच्छब्द इति—सामानाधिकरण्य के निराकांक्ष होने से क्या लाभ है? लाभ यह है कि 'तत्' और 'त्वम्' पदों
का सामानाधिकरण्य होने से ही 'तत्' शब्द का अर्थ प्रत्यगात्मा है, और 'त्वम्' शब्द का अर्थ 'तत्' शब्दार्थभूत वस्तु है।

  • दुःखित्वात्—पाठान्तरम् ।
    ३२

२५० - उपदेशसाहस्री -
इस रीति से 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थ का अभेद होने के कारण वे दोनों पद 'त्वम्' पदार्थ के दुःखित्व और 'तत्' पदार्थ के
अनात्मत्व तथा परोक्षत्व का बाध करते हैं ॥ १९७ ॥
एवं च नेति नेत्यर्थं गमयेतां परस्परम् ॥१९८॥
एवमिति—इस प्रकार वाक्यार्थ करने पर अद्वितीयत्वपरक श्रुति से अविरोध सम्पन्न हो जाता है। अर्थात् वे
परस्पर 'नेति-नेति' वाक्य के अर्थ का बोध कराते हैं ॥ १९८ ॥
एवं तत्त्वमसीत्यस्य गम्यमाने फले कथम् ।
अप्रमाणत्वमस्यो*क्त्वा क्रियापेक्षत्वमुच्यते ॥१९९॥
एवं तत्त्वमसीति—पूर्वपक्षी के मत में अकारण (प्रमाणरहित) ही श्रुतहानि और अश्रुतकल्पना करनी
पड़ती है। इस तरह 'तत्त्वमसि' वाक्य के फल का ज्ञान हो जाने पर उसका अप्रामाण्य अथवा क्रियापेक्षत्व कैसे कहा जा
सकता है ? उसके प्रामाण्य को पूर्व बता चुके हैं ॥ १९९ ॥
तस्मादाद्यन्तमध्येषु कुर्वित्येतद्विरोध्यतः ।
न कल्पाऽमोऽश्रुतत्वाच्च श्रुतत्यागोऽप्यनर्थकः ॥२००॥
तस्मादिति—आरंभ में 'तत्त्वमसि' इस प्रथमोपदेश में, मध्य में अर्थात् पदार्थ परिशोधन के अन्वय-व्यतिरेक-
ग्रहण काल में और अन्त में अर्थात् निर्विचिकित्स ब्रह्मानुभाव के काल में 'कुरु'=करो—इस प्रकार की विधि का विरोध
होने से और उसके श्रुतिमूलक न होने के कारण इसके क्रियापेक्षत्व की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी अवस्था
में ब्रह्मात्मैक्य रूप श्रुत अर्थ का त्याग करना भी व्यर्थ ही है ॥ २०० ॥
यथानुभूयते तृप्तिर्भुजेर्वाक्यान्न गम्यते ।
वाक्यस्य विधित्तिस्तद्वद्गोशकृत्पायसीक्रिया ॥२०१॥
यथेति—उक्त अर्थ को न समझ कर पुनः आक्षेप कर रहा है—जिस प्रकार भोजन करने से ही तृप्तिरूप फल
का अनुभव होता है, केवल वाक्यार्थ के ज्ञान मात्र से नहीं, तथा जैसे गोशकृत् (गोमय) से पायस (खीर) नहीं बनती,
क्योंकि वह पायस का साधन नहीं है। उसी प्रकार वाक्यार्थ के अवधारण मात्र से ब्रह्मात्मैक्य साक्षात्कार नहीं हो सकता।
क्योंकि वह भी उसका साधन नहीं है ॥ २०१ ॥
सत्यमेवमनात्मार्थवाक्यात्पारोक्ष्यबोधनम् ।
प्रत्यगात्मनि न त्वेवं संख्याप्राप्तिवदध्रुवम् ॥२०२॥
सत्यमेवमिति—इस प्रकार सिद्धान्ती कहता है कि अनात्म वस्तु के प्रतिपादक वाक्य से परोक्ष ज्ञान ही होता
है, यह कहना तो ठीक है, किन्तु 'दशमस्त्वमसि' वाक्य से दशम संख्या की प्राप्ति के समान प्रत्यगात्मा के विषय में वैसा
अनिश्चित ज्ञान नहीं होता, अपितु निश्चित ही होता है। एवंच वाक्य, निश्चित रूप से अपरोक्ष ज्ञान का साधन है ॥२०२॥
†स्वसंवेद्यत्वपर्यायः स्वप्रमाणक इष्यताम् ।
निवृत्ता‡वहम्ः सिद्धः स्वात्मनोऽनुभवश्च नः ॥२०३॥
स्वयमिति—'आत्मा' को स्वयंप्रकाश और स्वतःप्रमाण समझो, जिसका अहंकार नष्ट हो गया है, उसे
आत्मा का अनुभव होना सिद्ध ही है—यह हमारा सिद्धान्त है ॥ २०३ ॥
हृदयस्पशिनी
'स्वतः अपरोक्ष प्रत्यगात्मा ही ब्रह्म है',—इस उपदेश से अपरोक्ष ज्ञान होता है। आत्मा को स्वयंप्रकाश
और स्वतःप्रमाण समझो। क्योंकि 'स्वयं ज्योतिष्ट्वादि' श्रुति १ इसमें प्रमाण है। तथाच वाक्य से ब्रह्मभेदक अहंकार
१. (बृ. उ. ४।३।९, १४)

  • क्त्वा—पाठान्तरम् । † स्वयं वे०—पाठान्तरम् । ‡ विदमः—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५१
की निवृत्ति होनेपर हमारे मत में स्वात्मानुभव तो सिद्ध ही है। कोई किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं है। पूर्वपक्षी के
अनुमान 'विमतं परोक्षार्थज्ञानजनकं वाक्यत्वात् संमतवत्' में 'अनात्मविषयत्व' उपाधि है, और दशमस्त्वमसि में
व्यभिचार भी है ॥ २०३ ॥
बुद्धीनां विषयो दुःखं नो यस्य विषया मताः ।
कुतोऽस्य दुःखसंबन्धो दृशेः स्यात्प्रत्यगात्मनः ॥२०४॥
बुद्धीनामिति—दुःख तो बुद्धिवृत्तियों का विषय है। तब जिसको विषय अभिमत ही नहीं है, उस साक्षीरूप
प्रत्यगात्मा का दुःख के साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है ? ॥ २०४॥
हृदयस्पर्शिनी
पहले की हुई दुःखानुभवविरोध की आशंका भी उचित नहीं है, क्योंकि दुःख तो व्यभिचारी होने से वह
आत्मा का धर्म नहीं है, वह तो विषय का धर्म है। दुःख तो बुद्धिवृत्तियों का विषय है। जिसे विषय अभिमत नहीं है,
उस साक्षी प्रत्यगात्मा का दुःख से संबंध कैसे हो सकता है। 'दुःखी अहमस्मि' सुनने पर अहंकार ही दुःखधर्मवान् है,
ऐसा अनुभव होता है, अतः वह उसीका विषय है। बुद्धिवृत्त्याश्रय अहंकार का साक्षी जो आत्मा है, उसका वह धर्म
नहीं है ॥ २०४ ॥
दृशिरेवाऽनुभूयेत स्वेनैवाऽनुभवात्मना ।
तदाभासतया जन्म धियोऽस्याऽनुभवः स्मृतः ॥२०५॥
दृशिरेवेति—ज्ञानस्वरूप आत्मा स्वयं अनुभवरूप है, वह अपने द्वारा ही अनुभव किया जाता है। चिदाभास
की व्याप्ति से बुद्धिवृत्ति का उत्पन्न होना ही उसका अनुभव माना गया है ॥ २०५॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि प्रत्यगात्मा सर्वधर्मरहित है, तो उसका अनुभव कैसे हो पाता है ? ज्ञानस्वरूप आत्मा स्वयं अनुभव-
स्वरूप है, अतः उसके स्वरूप के लिये अन्य किस अनुभव की अपेक्षा होगी ? अर्थात् वह अपने द्वारा ही अनुभव किया
जाता है। चिदाभास की व्याप्ति से बुद्धिवृत्ति का उदय होना ही उसका विशेष अनुभव (आगन्तुक अनुभव) कहा
गया है ॥ २०५ ॥
अशनायादिनिर्मुक्तः सिद्धो मोक्षस्त्वमेव सः ।
श्रोतव्यादि तवेत्येतद्विरुद्धं कथमुच्यते ॥२०६॥
अशनायादीति—क्षुधा-तृष्णा आदि से रहित जो नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) है, वह तुम ही हो। तब 'तुम्हारे
लिये श्रवणादि अनुष्ठेय हैं'—यह विरुद्ध बात क्यों कह रहे हैं ? ॥ २०६॥
हृदयस्पर्शिनी
क्षुधादि से रहित जो नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्मत्व) है, वह तुम ही हो अर्थात् सर्वसंसारविनिर्मुक्त नित्यसिद्ध
मोक्ष (ब्रह्म) तुम ही हो, इस प्रकार आचार्य के द्वारा उपदेश दिये जानेपर पुनः यह कहना कि तुम्हारे लिये श्रवणादि
अनुष्ठेय हैं, ऐसी विरुद्ध बात क्यों कही जाती है ? इससे तो यही अभिप्राय होगा कि 'तुम अविक्रिय ब्रह्म नहीं हो', और
'तुम कर्ता हो' आदि वाक्य ही प्रमाण होंगे ॥ २०६ ॥
सेत्स्यतीत्येव चेत्तत्स्याच्छ्रवणादि तदा भवेत् ।
मोक्षस्यानित्यता स्याद्विरोधे नान्यथा वचः ॥२०७॥
सेत्स्यतीति—यदि यह कहो कि 'आत्मा' में क्रिया तो सिद्ध ही है, इसलिये श्रवणादि को अनुष्ठेय कहा गया
है। तब तो 'मोक्ष' को अनित्य कहना पड़ेगा। यह विरोध होने से उक्त महावाक्य की अन्य प्रकार से योजना नहीं कर
सकते ॥ २०७॥

२५२ उपदेशसाहस्री
हृदयस्पार्शिनी
यदि कहो कि 'तत्त्वमसि' इस उपदेशवाक्य में 'तत् त्वं सेत्स्यसि' ऐसा विपरिणाम करके उक्त महावाक्य की
योजना कर लेंगे, तो 'एकं सन्धित्सतः अपरं प्रच्यवते'१—न्याय से मोक्ष की अनित्यता प्राप्त होगी । इस प्रकार उभयथा
विरोध होने के कारण वाक्य में विपरिणाम करना उचित नहीं है । अभिप्राय यह है कि आत्मा में क्रिया सिद्ध होने
के कारण श्रवणादि किये जाते हैं, ऐसा यदि कहें तो उस अवस्था में मोक्ष की अनित्यता का प्रसंग प्राप्त होगा । इस
प्रकार विरोध उपस्थित होने के कारण उक्त वाक्य की योजना किसी अन्य प्रकार से नहीं करनी चाहिये ॥ २०७ ॥
श्रोतृत्वश्रोतव्ययोर्भेदो यदीष्टः स्याद्भवेदिदम् ।
इष्टार्थकोप एवं स्यान्न युक्तं सर्वथा वचः ॥२०८॥
श्रोत्रिति—श्रोता और श्रोतव्य विषय का भेद अभीष्ट रहने पर ही प्रसंख्यान (श्रवणादि कर्म) का अनुष्ठान
हो सकता है, किन्तु ऐसा मानने पर अभीष्ट अर्थ की हानि हो जायगी । इसलिये भेद की अभीष्टता किसी प्रकार भी उचित
नहीं है ॥ २०८ ॥
हृदयस्पार्शिनी
यदि श्रोता और श्रोतव्य विषय का भेद अभीष्ट हो तो इस प्रकार का प्रसंख्यान अर्थात् श्रवणादि कर्म
का संभव हो भी सकेगा, क्योंकि कार्य की उपपत्ति, कर्तृ-कर्म के भिन्न होनेपर ही हो पाती है, अन्यथा नहीं । कार्योपपत्ति
के लिये भेद माननेपर इष्ट अर्थ (जीव का ब्रह्मभाव) का विनाश हो जायगा । क्योंकि अन्य में अन्य भाव नहीं होता ।
अतः प्रसंख्यान पक्ष में वाक्य सर्वथैव अप्रमाण होगा । एवं च प्रसंख्यानवाद भी उपपन्न नहीं है ॥ २०८ ॥
सिद्धो मोक्षोऽहमित्येवं ज्ञात्वाऽऽत्मानं भवेद्यदि ।
चिकीर्षुर्यः स मूढात्मा शास्त्रं चोद्घाटयत्यपि
॥२०९॥
सिद्ध इति—जो व्यक्ति 'मैं नित्य सिद्ध मोक्ष हूँ' इस प्रकार आत्मा को जानकर भी पुनः कर्मानुष्ठान की इच्छा
करता है, वह मूढमति तो शास्त्र का उच्छेद ही कर रहा है, ऐसा समझना चाहिये ॥ २०९ ॥
न हि सिद्धस्य कर्तव्यं सकार्यस्य न सिद्धता ।
उभयालम्बनं कुर्वन्नाऽऽत्मानं वञ्चयत्यपि† ॥२१०॥
न हीति—सिद्ध वस्तु का कोई कर्तव्य नहीं होता तथा सक्रिय वस्तु (साध्य वस्तु) की सिद्धता नहीं हुआ
करती। जो लोग दोनों का एकसाथ (युगपत्) आलम्बन (आश्रय) करते हैं, वे स्वयं ही अपने को धोखे में डालते हैं ॥२१०॥
हृदयस्पार्शिनी
सिद्ध और साध्य के भेद से वस्तु दो प्रकार की होती है । घट-पटादि वस्तु विद्यमान रहती है, इस कारण
वह सिद्ध है, और धर्मादि वस्तु अनुष्ठेय होने से साध्य कहलाती है । 'मोक्ष' तो आत्मा का स्वरूप ही है, अतः वह सिद्ध
वस्तु है । सिद्ध वस्तु भी नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार की रहती है । नित्य वस्तु 'जन्य' नहीं हुआ करती । अतः
जो लोग मोक्ष को जन्य मानते हैं, उनके मत से तो वह अनित्य सिद्ध होता है । अतः उनका इस प्रकार मानना कोरा
भ्रम ही है । सिद्ध वस्तु कर्तव्य कोटि में नहीं आती, और कर्तव्य कोटि में आनेवाली वस्तु की सिद्धता नहीं कही जाती ।
किन्तु यह मूढ़बुद्धि व्यक्ति दोनों का एकसाथ आलम्बन करके अपनी ही वञ्चना करता रहता है ॥ २१० ॥
सिद्धो मोक्षस्त्वमित्येतद्वस्तुमात्रं प्रदर्श्यते ।
श्रोतुस्तथात्वविज्ञाने प्रवृत्तिः स्यात्कथं ‡न्त्विति ॥२११॥
१. इस न्याय का प्रयोग खण्डनखण्डखाद्य में अनैकान्तिक खण्डन के अवसर पर किया गया है । 'अनुसन्धित्सतः' इस पाठ भेद से
उक्त न्याय का उपयोग सर्वदर्शनसंग्रह के आर्हत और अक्षपाददर्शन में भी हुआ है ।

  • त्येव०—पाठान्तरम् । † त्यसो०—पाठान्तरम् । ‡ त्विति०—पाठान्तरम् ।