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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग ७: बुद्ध्यारूढप्रकरणम्

बुद्ध्यारूढप्रकरणम्
बुद्ध्यारूढं सदा सर्वं दृश्यते यत्र तत्र वा ।
मया तस्मात्परं ब्रह्म सर्वज्ञश्चास्मि सर्वगः ॥१॥
बुद्ध्यारूढमिति—मुझे जहाँ-तहाँ, सर्वत्र, सर्वदा बुद्धिवृत्ति पर आरूढ़ हुई ही समस्त वस्तुओं की प्रतीति हुआ
करती है, अतः मैं (समस्त दृश्य प्रपञ्च से विलक्षण) सब का साक्षी, सर्वगत ब्रह्म ही हूँ ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अन्वय-व्यतिरेक द्वारा पदार्थों का पर्यालोचन (शोधन) करने वाले को वाक्य से ही वाक्यार्थज्ञान होता
है, इस नियम के अनुसार ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इस प्रकार के वाक्यार्थज्ञान का होना निश्चित है, तथापि अपने अनुभव
के बलपर उसे स्पष्ट करने के लिये इस प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है ।
सर्वत्र (जाग्रत् अवस्था में हो या स्वप्नावस्था में हो, इस लोक में हो या परलोक में हो) और सर्वदा, जो
कुछ भी (चाहे वह अध्यात्म हो या अधिभूत हो या अधिदैव हो) प्रत्यक्ष होता है या शास्त्र के द्वारा जाना जाता है, वह
सब बुद्धिगत विषय ही उपलब्ध होता रहता है। उन विषयों का प्राप्तिकर्त्ता मैं तो निर्विकार हूँ, साक्षी हूँ। निर्विशेष
निर्विकार होने से मैं ही परब्रह्म हूँ। सर्व दृश्य विषयों से विलक्षण होने से ‘पर’ हूँ, और प्रपञ्चातीत होने से ‘ब्रह्म’
हूँ। सर्वार्थप्रकाशक (सर्वज्ञ) और अपरिच्छिन्न (सर्वग) हूँ ॥ १ ॥
यथात्मबुद्धिचाराणां साक्षी तद्वत् परेष्वपि ।
नैवापोढुं न चाऽऽदातुं शक्यस्तस्मात्परो ह्यहम् ॥२॥
यथेति—जिस प्रकार अपनी बुद्धि के स्थूल-सूक्ष्मादि देहरूप विषयों का मैं साक्षी हूँ, उसी प्रकार दूसरों के
शरीरों में भी मैं उनका साक्षी हूँ। अतः सर्वगत होने के कारण मेरा ग्रहण या त्याग नहीं किया जा सकता, अतएव
मैं समस्त प्रपञ्च से विलक्षण परमात्मा ही हूँ ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा को सर्वज्ञ (सर्वार्थप्रकाशक) कहा गया है, किन्तु वह कैसे संभव हो सकता है? क्योंकि अन्य
पुरुष की बुद्धि में स्थित वस्तु (विषय) की उपलब्धि या स्मरण किसी अन्य पुरुष को होना कभी संभव नहीं, अतः
एक आत्मा में सब की बुद्धियों की अध्यक्षता का कथन संगत नहीं है। कल्पना किये हुए (कल्पित) आत्मीय संघात
में बुद्धि और उसकी वृत्तियों का जिस प्रकार मैं साक्षी हूँ, उसी प्रकार परकीयत्वेन कल्पित संघात में भी तत्तद् बुद्धि
और उनकी वृत्तियों का मैं ही साक्षी हूँ, क्योंकि भिन्न-भिन्न साक्षी के होने में कोई प्रमाण नहीं है। अभिप्राय यह
है कि आत्मा के साथ बुद्धि का संबंध सर्वव्यवहारप्रवर्तक होने के कारण है। ऐसी आत्मबुद्धि (आत्मसंबन्धिनी
बुद्धि) का प्रचार (चार) जिनमें है, ऐसे उन अध्यात्म, अधिदैवरूप स्थूल, सूक्ष्म देहों (आत्मबुद्धिचारों) का साक्षी
(स्फोरक) जैसे मैं हूँ, वैसे ही परकीय बुद्धिचारों का भी मैं ही साक्षी हूँ। यही अभिप्राय श्रुति से भी अवगत होता
है कि एकमात्र चिदेकरस मुझ आत्मा में ही समस्त प्रमातृतद्बुद्धितत्प्रचारगोचर प्रपञ्च कल्पित किया गया है, इस
कारण मुझे ‘सर्वज्ञ’ समझना ठीक ही है। इस प्रकार से जब कि मैं सर्वसाक्षी होने के कारण और सर्वाधिष्ठान होने के
कारण सर्वज्ञ और सर्वगत हूँ, अतः उसका अपोह (निराकरण) करना उचित नहीं है, अर्थात् ‘यह इसका द्रष्टा
नहीं है, यहाँ वह नहीं है, ऐसा निराकरण करना किसी के द्वारा भी संभव नहीं है। इसी प्रकार ज्ञान या क्रिया के
द्वारा मुझे प्रकाशित करना या उत्पन्न करना भी संभव नहीं है। क्योंकि मैं ग्राह्य-ग्राहकादि प्रपञ्च से विलक्षण हूँ,
अर्थात् हानोपादानादि समस्त सांसारिक व्यवहार के परे हूँ। इसलिये मैं पर (परमात्मा) ही हूँ, क्योंकि भेद की
निन्दा शास्त्र में की गई है ॥ २ ॥

बुद्ध्यारूढप्रकरणम् ३१
विकारित्वमशुद्धत्वं भौतिकत्वं न चात्मनः।
अशेषबुद्धिसाक्षित्वाद्, बुद्धिवच्चाल्पवेदना ॥३॥
विकारित्वमिति—आत्मा में विकारित्व, अशुद्धत्व तथा भौतिकत्व नहीं है। तथा समस्त बुद्धियों का साक्षी
होने से उसमें बुद्धि के समान अल्पज्ञता भी नहीं है ॥ ३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
बुद्ध्यारूढ (बुद्धिगत) समस्त विषयों को यदि वह क्षेत्रज्ञ प्रकाशित करता है, तो उसे दर्शनक्रिया
का कर्ता कहना होगा। कर्ता होने से उसमें विकारित्वादि दोषों का होना अपरिहार्य है, तब तो उसे 'अनात्मा' ही
कहना होगा। किन्तु ऐसी आशंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि बुद्धि की तरह उसमें सावयवत्व न होने से उसे
विकारी नहीं कह सकते, वह तो समस्त विकारों का साक्षी है। अतएव क्रियागुणयोगित्व (दर्शनक्रियाकर्तृत्व)
उसमें न होने से उसकी अशुद्धता का भी निरसन हो जाता है। वह तो सकलगुणक्रियाविशिष्ट वस्तुओं का साक्षी
है। उसी तरह रूपरहित होने से उसे भौतिक भी नहीं कह सकते। दूसरी बात यह भी है कि बुद्धि की तरह उस
आत्मा में अल्पज्ञान (वेदना) भी नहीं है। जैसे बुद्धि को बुद्धि और उसके संसर्गादिविषयों का ही ज्ञान रहता है,
वैसा आत्मा को उतना ही सीमित ज्ञान नहीं है। वह तो अशेष (समस्त) बुद्धियों का साक्षी है, इतना ही नहीं,
उसके समस्त विकारों का भी वह साक्षी है। एवंच आत्मा में विकारित्व, सगुणत्व, भौतिकत्व और बुद्धि की तरह
अल्पद्रष्टृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि अशेष विकारों का साक्षी होने से विकारित्व नहीं, अशेष अशुद्धियों का साक्षी
होने से अशुद्धत्व नहीं, उसी तरह सगुणत्व, सदोषत्व भी नहीं है। समस्त भौतिक पदार्थों का साक्षी होने से वह भौतिक
भी नहीं है। सर्व बुद्धियों का साक्षी होने से बुद्धि की तरह अल्पज्ञ भी नहीं है ॥ ३ ॥
मणौ प्रकाश्यते यद्वद्रक्ताद्याकारताऽऽतपे ।
मयि संदृश्यते सर्वमातपेनेव तन्मया ॥४॥
मणाविति—जिस प्रकार स्फटिक में लालिमा की प्रतीति सूर्य के प्रकाश में होती है, उसी तरह मेरी विद्या-
मानता में ही बुद्धिस्थ सम्पूर्ण विषय प्रकाशित होते रहते हैं ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह क्षेत्रज्ञ आत्मा, बुद्धि की तरह अल्पज्ञ नहीं है, यह बताया। जबकि क्षेत्रज्ञ, बुद्धि के समस्त विषयों
का ग्राहक है तब तो उसके लिये कोई कर्तव्य बचा ही नहीं। और उसे द्रष्टा मानने पर उसमें विकारित्व तो अर्थात्
प्राप्त होता है। निष्कर्ष यह है कि यदि आत्मा को निर्विकार ही मानें तो वह सर्वार्थप्रकाशक कैसे कहा जा सकता
है? इस आशंका का समाधान एक दृष्टान्त के द्वारा करते हुए 'निर्विकार' ही सर्वार्थ प्रकाशक हो सकता है यह
बता रहे हैं। जैसे स्फटिकमणि में जपापुष्परूप रक्ताकारता के न रहने पर भी, वह सूर्य के प्रकाश में ही अभिव्यक्त
होती है, वैसे ही सूर्यस्थानापन्न मुझ क्षेत्रज्ञ के विद्यमान रहने पर ही स्फटिकमणि के स्थानापन्न बुद्धि में जपापुष्प-
रक्तता आदि के स्थानापन्न सम्पूर्ण विषय दिखलाई पड़ता है। तस्मात् आतप के समान निष्प्रकम्प मेरे द्वारा ही सब
कुछ प्रकाशित किया जाता है। निष्कर्ष यह है कि सूर्यप्रकाश से लालिमा (रक्ताकारता) की प्रतीति की तरह बुद्धिस्थ
सम्पूर्ण विषय क्षेत्रज्ञ के द्वारा ही प्रकाशित होने योग्य हैं। अतः क्षेत्रज्ञ का होना आवश्यक है। अतः बुद्धि की तरह
वह विकारवान् नहीं है। उसके द्रष्टृत्व को सुनकर उसमें विकारित्व की शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि सूर्य के
समान कुछ बिना किये ही अपने व्यापार के बिना ही केवल अपनी सन्निधिमात्र से ही उसमें सर्वविषयप्रकाशकत्व
संगत हो जाता है। यदि कदाचित् द्रष्टृत्व के कारण उसके विकारी होने की आशंका से 'बुद्धि' को ही द्रष्ट्री कहें तो
वह उचित न होगा। इस रीति से बुद्धि को द्रष्ट्री न मानने पर उसका (बुद्धि का) उपयोग (आवश्यकता) ही
क्या है? यह शंका होना स्वाभाविक है, किन्तु उसका समाधान यह है कि 'चैतन्य' में विषयविशेष का आकार देने के
लिये उसका (बुद्धिका) उपयोग होता है ॥ ४ ॥
१. ज्ञाल्य.-पाठान्तरम् ।

३२ उपदेशसाहस्री
बुद्धौ दृश्यं भवेद्बुद्धौ सत्यां नास्ति विपर्यये ।
द्रष्टा यस्मात्सदा द्रष्टा तस्माद्द्वैतं न विद्यते ॥ ५ ॥
बुद्धाविति—बुद्धि के रहने पर ही बुद्धि में दृश्य की प्रतीति होती है। उसके न रहने पर नहीं होती, किन्तु
साक्षी आत्मा तो सर्वदा ही साक्षी रहता है। इस कारण 'द्वैत' की सत्ता नहीं है ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अब प्रत्यगात्मा की अद्वितीयता को बताते हुए उसकी शुद्धता को बता रहे हैं। जाग्रत् ( जागरित ) अवस्था
में अविद्या के द्वारा कल्पित ( अध्यस्त ) उस बुद्धि में आरूढ़ हुआ दृश्य ही द्वैतरूप में भासित होता है। सुषुप्ति
अवस्था में बुद्धि के न रहनेपर (अविद्या के द्वारा बुद्धि के अध्यस्त न रहनेपर ) वह द्वैतरूप दृश्य नहीं रहता है।
अर्थात् द्वैत की सत्ता नहीं रहती। इस व्यभिचार के कारण द्वैत की सत्ता वास्तविक नहीं है। किन्तु साक्षी सभी
अवस्थाओं में सर्वदा द्रष्टा ही रहता है, दृश्य की तरह उसकी सत्ता कभी व्यभिचरित नहीं होती। एवंच प्रत्यगात्मा
की सत्ता से प्रकाशमानत्व का कहीं व्यभिचार नहीं है। और प्रकाशमानता के साथ व्यभिचार होनेपर 'सत्ता' का
होना कभी संभव नहीं हो सकता। तस्मात् सर्वदा प्रकाशमान न होने के कारण द्वैत की सत्ता वास्तविक नहीं है,
किन्तु नित्य, शुद्ध, अद्वितीय प्रत्यगात्मा (प्रत्यक् चैतन्य) ही सर्वदा विद्यमान है ॥ ५ ॥
अविवेकात् पराभावं यथा बुद्धिरवैत्तथा।
विवेकात्तु परादन्यः स्वयं चापि न विद्यते ॥ ६ ॥
अविवेकादिति—जिस प्रकार अविवेक के कारण बुद्धि को परात्मा के अभाव की प्रतीति होती थी, उसी
प्रकार अब विवेक हो जाने पर उस परात्मा से भिन्न वह बुद्धि स्वयं भी नहीं रहती ॥ ६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अविद्या से द्वैत की प्रतीति होती है और विद्या से द्वैत की प्रतीति नहीं होती, यह बता चुके; उसी
तरह आत्मा के साथ उनका (विद्या, अविद्या का) संसर्ग न होने से प्रत्यगात्मा की शुद्धता में कोई हानि नहीं है।
किन्तु वह विद्या और अविद्या साभास बुद्धि की ही हैं। द्वैत की वास्तविक सत्ता न होने से द्वैतसंसर्गकृत 'अशुद्धता'
आत्मा में नहीं है, तथापि विद्या-अविद्या के सम्बन्ध होने से आत्मा में अशुद्धि हो सकती है। अविवेक उसे कहते हैं कि जहाँ
भेद (विवेक) की प्रतीति (ज्ञान) नहीं हो पाती, जैसे अनात्मा (देह आदि) में आत्माभिमान (आत्मबुद्धि), अर्थात्
विपर्ययज्ञान । इस अविवेक (मिथ्या ज्ञान ) के कारण असंसारी तथा सर्वसाक्षी होने के कारण अनात्मवर्ग से भिन्न
उस 'पर' आत्मा के अभाव (असत्त्व) को रजस्तमोगुण की अधिकता के कारण बुद्धि ने समझा था, वैसे ही विवेक
के हो जाने पर (समस्त अनात्म पदार्थों का निरसन करते हुए आत्मस्वरूप का निर्धारण होनेपर) असंसारी परमात्मा
से भिन्न कोई नहीं है। यह जीवात्मा भी उससे भिन्न नहीं है। विवेक के समय 'सत्त्व' का उद्रेक हो जाता है। अतएव
श्रवणादि का अनुष्ठान करते हुए ब्रह्मात्मैकत्वविषयक वेदान्तवाक्योत्पन्न उस विवेकज्ञान से परमात्मा के अतिरिक्त
कुछ भी उसे दिखाई नहीं देता। अपने कारण सहित वह साभास बुद्धि भी अपना अस्तित्व खो बैठती है, क्योंकि
उस समय सभी कुछ प्रत्यग् ब्रह्मरूप हो जाता है। एवञ्च विद्या-अविद्यारूप सम्यग् ज्ञान और भ्रान्तिज्ञान भी बुद्धि
के होने के कारण आत्मा में अशुद्धि का गन्ध भी नहीं है ॥ ६ ॥
॥ इति सप्तमं बुद्ध्यारूढप्रकरणं समाप्तम् ॥