त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
२२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
चक्षुर्नैतद्गोलकं ते मनश्चक्षुरुदाहृतम् ।
येन पश्यसि स्वप्नेषु तच्चक्षुर्मुख्यमुच्यते ॥ २७ ॥
तस्य प्रत्यावृत्तिरपि प्रोच्यते शृणु भूसुर ।
अप्रत्यावृत्तचक्षुर्वै नैव पश्यति किञ्चन ॥ २८ ॥
दिदृक्षुश्चक्षुषा किञ्चित्तदन्येभ्यो ह्यशेषतः ।
प्रत्यावृत्त्य दृढं तस्मिन्नेव संयोजयेद्यदि ॥ २९ ॥
तदा तद्भासते स्पष्टं नान्यदा तु कदाचन ।
अन्यदा तु पुरोवृत्ति न स्पष्टं भासते क्वचित् ॥ ३० ॥
आभातकल्पमेव स्यादप्रत्यावृत्तचक्षुषा ।
एवं श्रोत्रत्वगादीनां भूदेवाऽवेहि संस्थितिम् ॥ ३१ ॥
मनसाऽप्येवमेव स्यात् सुखदुःखाऽवभासनम् ।
अप्रत्यावृत्तमनसा किंस्विद्वेदितुमर्हति ॥ ३२ ॥
यहाँ 'दृष्टि' इन नेत्रगोलकोंको नहीं अपितु मानस-नेत्रोंके लिये
कहा गया है। जिसके द्वारा जीव स्वप्नोंमें देखता है वही नेत्र मुख्य
कहा जाता है ॥ २७ ॥
उस मानस-नेत्रको उलटना अर्थात् अन्तर्मुख करना क्या है—यह
भी बतलाया जाता है; क्योंकि उसे अन्तर्मुख किये बिना कोई कुछ
भी नहीं देख सकता ॥ २८ ॥
जो पुरुष नेत्रद्वारा कुछ देखना चाहता है वह दृष्टिको अन्य सब
ओरसे हटाकर यदि उस दर्शनीय वस्तुमें लगा देता है तो वह उसे
स्पष्टतया भासने लगती है, अन्यथा नहीं। ऐसा न होनेपर तो कभी-
कभी सामने रखी वस्तु भी स्पष्टतया नहीं भासती ॥ २९-३० ॥
जो नेत्र सब ओरसे हटाये हुए नहीं होते उनसे तो वस्तु न देखी
हुई-सी ही रहती है। विप्रदेव ! ऐसी ही बात श्रोत्र-त्वक् आदि अन्य
इन्द्रियोंके विषयमें भी जाननी चाहिये ॥ ३१ ॥
मनके द्वारा सुख-दुःखके भानमें भी ऐसा ही निश्चय है। जो
मन अन्य विषयोंकी ओरसे हटा हुआ नहीं है उससे पुरुष क्या जान
सकता है ? ॥ ३२ ॥
षोडशोऽध्यायः । २२६
तस्मात्तदेकपरता प्रत्यावृत्तिश्च चक्षुषः ।
प्रत्यावृत्तं मनः शुद्धं निजरूपावभासकम् ॥ ३३ ॥
अत्र ते सम्प्रवक्ष्यामि शृणु तन्नियताऽन्तरः ।
अगोचरश्चेदात्माऽसौ मनसा गोचरोऽपि च ॥ ३४ ॥
अत्र मुह्यन्ति बहवः श्रुत्यागमविवेचकाः ।
मनोगोचरता बाह्ये द्विप्रकारेण संस्थिता ॥ ३५ ॥
आद्याऽन्येभ्यः परावृत्तिः परा तत्परता भवेत् ।
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेऽपि मनसः सति ॥ ३६ ॥
न किञ्चिद्भासयेद्वस्तु तटस्थाऽवसरेषु तत् ।
तस्मात्तत्परताऽप्यत्र व्यापारो मानसः परः ॥ ३७ ॥
एवं व्यावृत्तभावानां व्यापारद्वयभासनम् ।
अन्यावृत्ता चितिर्यस्मात्तस्मान्मात्रं तथा भवेत् ॥ ३८ ॥
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेणैवाऽवभासयेत् ।
यथा पुरःस्थितादर्शे किञ्चिद्दर्शनहेतवे ॥ ३९ ॥
अतः एकमात्र अपने लक्ष्यपर दृष्टि रखना ही नेत्रकी अन्तर्मुखता
है। अन्तर्मुख शुद्ध चित्त ही अपने वास्तविक स्वरूपका साक्षात्कार
करानेवाला है ॥ ३३ ॥
अब मैं तुमसे जो बात कहता हूँ वह संयतचित्त होकर सुनो।
यह आत्मा मनका अविषय भी है और उसका विषय भी ॥ ३४ ॥
अनेकों वेद-शास्त्रोंकी आलोचना करनेवाले भी इस विषयमें मोह-
ग्रस्त ही रहते हैं। बाह्य पदार्थोंमें मनकी विषयता दो प्रकारसे है ॥ ३५॥
प्रथम तो अन्य विषयोंसे मनको मोड़ना और दूसरे उसे अपने
लक्ष्यमें जोड़ देना। मनके अन्य पदार्थोंसे केवल हट जानेपर भी
तटस्थ अवस्थाओंमें कोई वस्तु नहीं भासती। अतः इसके लिये मनका
अपने विषयमें जुड़ना-यह दूसरा व्यापार भी आवश्यक है ॥ ३६-३७ ॥
इस प्रकार जो परिच्छिन्न पदार्थ हैं उनका भान तो उक्त दोनों
व्यापारोंसे होता है। किन्तु चिति तो अपरिच्छिन्ना है, इसलिये इसके
अनुभवके लिये ऐसा नियम नहीं है ॥ ३८ ॥
यह तो अन्य पदार्थोंसे चित्तके हट जानेपर ही भासित हो जाती
है। जिस प्रकार सामने रखे दर्पणमें यदि कोई पदार्थ देखना हो तो
२३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिराभिमुख्यञ्च तस्य वै ।
अपेक्ष्यते दर्पणस्य प्रतिबिम्बदिदृक्षुणा ॥ ४० ॥
गगनं दर्पणे द्रष्टुं यदा समभिवाञ्छति ।
तदाऽन्येभ्यः परावृत्तिमात्रेण हि कृतार्थता ॥ ४१ ॥
गगनं सर्वतो व्याप्तं दर्पणे सर्वदा स्थितम् ।
अन्यावृत्तं किन्तु चाऽन्यैरभिच्छन्नं न भासते ॥ ४२ ॥
सर्वाश्रयं सर्वगतमपि तैश्छादितं यतः ।
अतस्तेभ्यः परावृत्तिमात्रेणैव विभासते ॥ ४३ ॥
एवं चितिः सर्वगता सर्वाश्रयतया स्थिता ।
सर्वकाले समापूर्णा मनसि व्योमवद् द्विज ॥ ४४ ॥
तस्मादन्यपरावृत्तिमात्रं मनस इष्यते ।
पश्य विप्र चितिः कुत्र कदा नास्त्यवभासिनी ॥ ४५ ॥
उसका प्रतिबिम्ब देखनेकी इच्छावाले पुरुषको अन्य पदार्थोंसे दर्पणको
हटाने और उस पदार्थके सामने लानेकी आवश्यकता होगी ॥ ३६-४०॥
पर यदि दर्पणमें आकाशको देखनेकी ही इच्छा हो तो अन्य
पदार्थोंसे दर्पणको हटा लेनेसे ही अपना काम बन जायगा ॥ ४१ ॥
क्योंकि सर्वत्र व्याप्त आकाश दर्पणमें भी सर्वदा विद्यमान है।
किन्तु दूसरे पदार्थोंसे बिना हटाये उनसे आच्छादित रहनेके कारण वह
भासता नहीं है ॥ ४२ ॥
वह सबका आश्रय और सर्वगत होनेपर भी क्योंकि उन पदार्थोंसे
'ढका रहता है, इस लिये उनकी ओरसे हटा लेने मात्रसे ही भासने
लगता है ॥ ४३ ॥
इसी प्रकार चिति भी सर्वव्यापिका है और सबकी आश्रयरूपसे
स्थित है । ब्रह्मन् ! वह आकाशके समान सभी समय मनमें भर-
पूर है ॥ ४४ ॥
इसलिये अपने साक्षात्कारके लिये उसे केवल मनको अन्य पदार्थोंसे
मोड़ लेनेकी ही अपेक्षा है । विप्रवर ! विचार तो करो कि सर्वप्रकाशिनी
चिति कब और कहाँ नहीं है ॥ ४५ ॥
षोडशोऽध्यायः। २३१
यदा यत्र च सा नास्ति न यदा नापि यत्र च ।
तस्माच्चिदात्मावभासे मनसोऽन्यपरावृत्तिः ॥ ४६ ॥
केवलाऽपेक्षिता नैवाभिमुख्यं नूतनं क्वचित् ।
आभिमुख्याभावहेतोरेवाऽवेद्यत्वमिष्यते ॥ ४७ ॥
अतएव शुद्धमनोवेद्यं तत्तत्त्वमुच्यते ।
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिरेव शुद्धिर्हि मानसी ॥ ४८ ॥
एतदेव परं तत्त्वज्ञाने साधनमुच्यते ।
यावन्न हि मनः शुद्धं तावज्ज्ञानं कथं भवेत् ॥ ४९ ॥
शुद्धे मनसि वै ज्ञानं कथं वा न भवेद् ध्रुवम् ।
उपक्षीर्णं सर्वमत्र साधनं तस्य शोधने ॥ ५० ॥
कर्म वोपासनं वाऽपि वैराग्यादिकमेव वा ।
मनसः शोधने एव विनियुक्तं न चाऽन्यथा ॥ ५१ ॥
तस्माच्छुद्धेन मनसा भासते तत् परं वपुः ।
इति राज्ञेरितं श्रुत्वा त्वष्टावक्रः पुनर्जगौ ॥ ५२ ॥
वह जब और जहाँ नहीं है तब वे 'जब' और 'जहाँ' भी सिद्ध
नहीं हो सकते । अतः चेतन आत्माका भान होनेके लिये केवल अन्य
( अनात्म ) पदार्थोंके निषेधकी ही अपेक्षा है, किसी नवीन वस्तुको
सामने लानेकी नहीं ॥ ४६-४७ पू० ॥
किसी वस्तुकी अभिमुखता न होनेके कारण ही उस परमतत्त्वको
अज्ञेय कहा जाता है । इसीसे वह तत्त्व शुद्धचित्तद्वारा ज्ञेय कहा
गया है । मनका अन्य वस्तुओंसे विमुख हो जाना ही मनकी शुद्धि
है और यही तत्त्वज्ञानकी सबसे प्रधान साधन कही गयी
है ॥ ४७ उ०-४९ पू० ॥
जबतक मन शुद्ध न हो तबतक ज्ञान कैसे हो सकता है । और
यदि मन शुद्ध है तो निश्चय ज्ञान क्यों नहीं होगा ? इस मनकी
शुद्धिमें ही अन्य सम्पूर्ण साधनोंकी समाप्ति हो जाती है ॥ ४९ उ०-५० ॥
कर्म, उपासना तथा वैराग्य आदिका भी उपयोग मनको शुद्ध
करनेमें ही है, किसी अन्य प्रयोजनमें नहीं ॥ ५१ ॥
अतः वह परमात्मा शुद्ध चित्तसे ही भासता है।" राजाका यह
प्रवचन सुनकर अष्टावक्रने पुनः प्रश्न किया—॥ ५२ ॥
१३२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
राजंस्त्वयोक्तमन्येभ्यः परावृत्तिर्हि मानसी ।
केवला चेत् सा परा चिन्मनसा प्रतिभासते ॥ ५३ ॥
तत् सुषुप्तौ विभासेत परावृत्तं मनस्तदा ।
तत्र किं साधनैरन्यैः सुप्तिमात्रात् कृतार्थता ॥ ५४ ॥
इति पर्यनुयुक्तोऽथ विप्रेणोवाच भूपतिः ।
समाहितः शृणु ब्रह्मन् समाधानं वदामि ते ॥ ५५ ॥
सत्यं सुषुप्तौ मनसः परावृत्तिस्तु सर्वथा ।
लीनं मनस्त्वथाप्यस्य कथं तामवभासयेत् ॥ ५६ ॥
कज्जलेन समालिप्ते दर्पणे गगनं न हि ।
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेण भासते क्वचित् ॥ ५७ ॥
“राजन् ! आपने कहा कि यदि मनकी अन्य पदार्थोंसे केवल
विमुखता हो जाय तो उस शुद्ध मनसे परम चेतनका भान हो
जाता है ॥ ५३ ॥
तब तो सुषुप्तिमें उसका भान होना चाहिये, क्योंकि उस अवस्थामें
मन विषयोंसे विमुख रहता ही है। फिर अन्य साधनोंकी क्या अपेक्षा
है; काम तो सुषुप्तिमात्रसे ही बन जायगा” ॥ ५४ ॥
अष्टावक्र मुनिके इस प्रकार शंका करनेपर राजा जनक बोले,
“ब्रह्मन् ! मैं आपकी शंकाका समाधान करता हूँ, आप एकाग्रचित्त
होकर सुनें ॥ ५५ ॥
यह तो ठीक है कि सुषुप्तिमें मनकी विषयोंसे पूर्ण विमुखता हो
जाती है, किन्तु उस समय उसकी मनःस्वरूपता¹ भी तो लीन हो
जाती है, फिर वह उसे किस प्रकार भासित करेगा ॥ ५६ ॥
यदि दर्पणपर काजल पोत दिया जाय तो अन्य प्रतिबिम्बोंकी निवृत्ति
हो जानेपर भी उससे आकाशका भान कभी नहीं हो सकता ॥ ५७ ॥
१. मन पाँचों भूतोंके सात्त्विक अंशका परिणाम है। इसीलिये उससे विषयोंका
ज्ञान होता है, क्योंकि ज्ञान सत्त्वगुणका ही धर्म है। सुषुप्तिमें तमोगुणके द्वारा यह
सात्त्विक अंश ढक जाता है। अतः जिस प्रकार अन्धकारसे आच्छादित दर्पणमें कोई
प्रतिबिम्ब नहीं भासता उसी प्रकार सुषुप्तिमें तमोगुणसे आच्छादित मनमें न तो
विषय ही भासते हैं और न शुद्ध चेतन ही।
षोडशोऽध्यायः। २३३
एवं विलिप्ते मनसि निद्रयाऽन्यपरावृतेः।
अयोग्यत्वादेव मनो भासयेन्न चितिं क्वचित् ॥ ५८ ॥
अन्यथा लोष्टकुड्यादेरपि भायात् कुतो न सा।
तस्माद्योग्येन मनसा शुद्धेन भासते हि सा ॥ ५९ ॥
अतः सद्योजातशिशोर्भासते न हि किञ्चन।
अथाऽपि शृणु वक्ष्यामि मषीलिप्ते हि दर्पणे ॥ ६० ॥
अलक्षितं चाऽपि मषीप्रतिबिम्बनमस्ति वै।
संश्लेषान्न विलक्षेत स्वभावस्याऽनपोहनात् ॥ ६१ ॥
तथा मनः सुषुप्तिस्थं संश्लिष्टं निद्रयैव हि।
अतोऽन्येभ्यः परावृत्तेरभावाद्भासयेन्न ताम् ॥ ६२ ॥
अतो निद्रास्मृतिरपि व्युत्थितस्य हि सम्भवेत् ।
मूढताऽपि च या तस्यां दशायामनुभूयते ॥ ६३ ॥
इसी प्रकार मनपर निद्राका लेप चढ़ जानेपर अन्य विषयोंसे
विमुखता हो जानेपर भी, प्रकाशनकी योग्यता न रहनेके कारण वह
चितिको कभी भासित नहीं कर सकता ॥ ५८ ॥
यदि ऐसा न होता तो ढेले और भीत आदिको भी चितिका भान
क्यों नहीं हो जाता ? अतः योग्य और शुद्ध मनके द्वारा ही उसका
भान होता है ॥ ५९ ॥
इसीसे तत्काल उत्पन्न हुए शिशुको भी कुछ नहीं भासता । तथापि
एक बात कहता हूं, सुनो, काजल पुते हुए दर्पणमें भी काजलका प्रति-
बिम्ब तो रहता ही है, भले ही वह दिखायी न दे, क्योंकि जो जिसका
स्वभाव होता है उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती । हाँ, काजलके संसर्गके
कारण वह दीख नहीं पड़ता ॥ ६०-६१ ॥
इसी प्रकार सुषुप्तावस्थामें मन निद्रासे ही संश्लिष्ट रहता है।
[ इसलिये अलक्षितरूपसे उसमें निद्राका प्रतिबिम्ब तो पड़ता ही है । ]
अतः निद्रारूप अन्य विषयसे विमुखता न होनेके कारण वह उस
चितिको भासित नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥
इसीसे जगे हुए व्यक्तिको निद्राकी स्मृति होती है। तथा उस
अवस्थामें जिसका अनुभव होता है उस मूढ़ता (अज्ञान) का भी
स्मरण होता है ॥ ६३ ॥
२३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तत्ते सम्यक् प्रवक्ष्यामि शृणु सम्यक् समाहितः ।
मनसस्तु द्विधाऽवस्था प्रकाशामर्शभेदतः ॥ ६४ ॥
बहिरर्थेषु विश्रान्तिर्या प्रकाशः स उच्यते ।
यस्तद्विचारः स्वस्मिन् वै स विमर्श उदाहृतः ॥ ६५ ॥
प्रकाशो निर्विकल्पः स्याद्वस्तूनामविभेदतः ।
विमर्शः शब्दसम्भेदद्विभेदात् सविकल्पकः ॥ ६६ ॥
अयमेवंविध इति शब्दसम्भेदवर्जितः ।
वस्तुदर्शनरूपोऽसौ प्रकाशो निर्विकल्पकः ॥ ६७ ॥
अयमेवंविध इति वस्तुदर्शनमूलकः ।
शब्दसम्भिन्नरूपोऽसौ विचारात्माऽवभासनः ॥ ६८ ॥
आन्तरोऽभिनवोऽन्यो वा विमर्श इति कीर्त्तितः ।
अब मैं तुमसे स्पष्टतया कहता हूँ, खूब सावधान होकर सुनो।
मनकी दो प्रकारकी अवस्थाएं होती हैं—(१) प्रकाशावस्था और
(२) विमर्शावस्था ॥ ६४ ॥
मनका बाह्य विषयोंकी ओरसे शान्त (संकल्पहीन) हो जाना
प्रकाशावस्था है और उनका अपनेमें संकल्प होना विमर्श कहा
गया है ॥ ६५ ॥
प्रकाश अवस्था निर्विकल्प होती है, क्योंकि उस समय वस्तुओंका
भेद नहीं रहता। और वस्तुओंका भेद होनेके कारण शब्दोंका भी भेद
रहनेके कारण विमर्शावस्था सविकल्प है ॥ ६६ ॥
‘यह ऐसा है’ इस प्रकारके शब्दभेदसे रहित और वस्तुतत्त्वका
दर्शन करानेवाली यह प्रकाशावस्था निर्विकल्प होती है ॥ ६७ ॥
तथा वस्तुतत्त्वका दर्शन जिसके मूलमें रहता है¹ और ‘यह ऐसा है’
इस प्रकार शब्दभेदमय विचाररूपसे जो भासती है [वह विमर्शावस्था
सविकल्प होती है ] ॥ ६८ ॥
विमर्श आन्तर होता है। [अर्थात् मनपर जो बाह्यपदार्थोंका
१. क्योंकि प्रत्येक पदार्थकी प्रतीतिके मूलमें उसके अधिष्ठानरूपसे पर-
मार्थतत्त्वका स्फुरण होता है; जैसे दर्पणके ज्ञानके बिना प्रतिबिम्बका ज्ञान नहीं हो
सकता उसी प्रकार सर्वाश्रयभूता चितिके स्फुरणके बिना किसी भी वस्तुका ज्ञान
नहीं हो सकता।
षोडशोऽध्यायः । २३५
तत्र योऽभिनवाऽऽभासः स प्रोक्तोऽनुभवात्मकः ॥ ६९ ॥
अन्यस्मृत्यनुसन्धानात्मकः संस्कारसम्भवः ।
एवं मनो द्विप्रकारशक्तियुक्तं सदा स्थितम् ॥ ७० ॥
निद्रा प्रकाशरूपाऽसौ सुषुप्तिश्चिरसंस्थिता ।
जागरामर्शबहुला चेतयमूढदशोच्यते ॥ ७१ ॥
प्रकाशनिबिडा यस्मात् सुषुप्तिर्मूढतात्मिका ।
अतएव हि दीपादेः प्रकाशनिबिडत्वतः ॥ ७२ ॥
निश्चिता मूढता सर्वैर्विद्वद्भिरपि सर्वथा ।
प्रतिबिम्ब पड़ता है उसको आश्रय करके होता है ।] यह अभिनव और
अन्य रूपसे दो प्रकारका है। इनमें जो अभिनव आभास है वह
प्रत्यक्ष अनुभवरूप कहा गया है ॥ ६९ ॥
तथा अन्य जो स्मृति कहा जाता है, अनुसन्धानात्मक होता है ।
यह पहले अनुभव की हुई वस्तुओंके संस्कारोंसे होता है । इस प्रकार
मन सर्वदा इन दो प्रकारकी शक्तियोंसे युक्त रहता है ॥ ७० ॥
यह सुषुप्तावस्था प्रकाश अर्थात् निर्विकल्प ज्ञानरूप होती है तथा
चिरकाल तक रहती है तथा जाग्रत् अवस्था में विमर्श (सवि-
कल्प ज्ञान) की अधिकता रहती है । इसलिये यह अमूढ अवस्था
कहलाती है ॥ ७१ ॥
क्योंकि सुषुप्तिमें घनीभूत प्रकाश (निर्विकल्प ज्ञान) रहता है
इसलिये वह मूढतारूप है।१ इसीसे प्रकाशकी प्रचुरता रहनेके कारण
सभी विद्वानोंने दीपक आदिकी सर्वथा मूढता ही निश्चय की है।
[अर्थात् प्रकाशक होनेपर भी निर्विकल्पताके कारण उन्हें जड ही
माना है ] ॥ ७२-७३ पू० ॥
१. सुषुप्तिमें घनीभूत प्रकाश अर्थात् निर्विकल्प ज्ञान रहता है—इसका तात्पर्य
यह है कि उस समय विमर्श या सविकल्प ज्ञान बिलकुल नहीं रहता। इसलिये
वह मूढतारूप अर्थात् जड होती है । इसी कारण दीपक तथा घट-पटादि भी जड
हैं। परन्तु शुद्ध चिति केवल घनीभूत प्रकाश नहीं है अपि तु स्फुरत-प्रकाशनूप हैं ।
यह स्फुरद्रूपता ही उसकी चितिशक्ति है। इसीको आगमशास्त्रों में स्पन्द या पूर्णा-
हम्ता कहा है । इससे सम्पन्न होनेके कारण ही वह अपने संकल्पमात्रसे दर्पणमें
प्रतिबिम्बके समान अपने ही स्वरूपमें दृश्य प्रपञ्च को आभासित कर देती है ।
२३६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
निद्रा प्रथमजा व्यक्तं महाशून्यमिहोच्यते ॥ ७३ ॥
नास्ति सामान्यपदवी सुषुप्तिस्तत्प्रकाशनम् ।
वस्तुदर्शनकालेऽपि जाग्रत्येवंविधं मनः ॥ ७४ ॥
किन्तूत्तरक्षणोद्भूतविकल्पैवैस्तिरोहितम् ।
सुषुप्ताव्यक्तशक्तिप्रकाशनिविडत्वतः ॥ ७५ ॥
मनो विलीनमित्येवं विविञ्चन्ति विवेचकाः ।
वस्तुदर्शनकालेऽपि चैवं लीनं मनो भवेत् ॥ ७६ ॥
शृणु ब्रह्मन् रहस्यं ते वक्ष्यामि स्वानुभूतितः ।
यत्र मुह्यन्ति विद्वांसोऽप्यतिसूक्ष्मविवेचकाः ॥ ७७ ॥
निर्विकल्पसमाधिश्च सुषुप्तिर्वस्तुदर्शनम् ।
त्रयमेतच्चैकविधं प्रकाशनिविडत्वतः ॥ ७८ ॥
सृष्टिके समय जो सबसे पहला स्वरूपका संकोच अवभासित हुआ
उसका नाम है निद्रा । उसीको अव्यक्त या महाशून्य भी कहा जाता
है । वह ‘नास्ति’ ( कुछ नहीं ) इस प्रतीतिकी सामान्य भूमि है और
सुषुप्तिमें उसकी उपलब्धि होती है ॥ ७३ उ०-७४ पू० ॥
जाग्रत् अवस्था में वस्तुओंको देखनेके समय भी मन ऐसा होता
है । किन्तु उसके पीछे दूसरे ही क्षणमें अनेकों विकल्पोंके प्रकट हो
जानेसे वह अवस्था लुप्त हो जाती है ॥ ७४ उ०-७५ पू० ॥
किन्तु सुषुप्तावस्था में अव्यक्तशक्तिकी घनीभूत निर्विकल्पताके कारण
मन लीन रहता है—ऐसा विचारकोंका निर्णय है । वास्तवमें तो वस्तुको
देखनेके समय भी मन इसी प्रकार लीन रहता है १ ॥ ७५ उ०-७६ ॥
ब्रह्मन् ! सुनो, मैं अपने अनुभवके आधार पर यह रहस्य बताता हूँ ।
यहाँ अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन करनेवाले विद्वान् भी मूढ बन जाते हैं ॥७७॥
निर्विकल्प समाधि, सुषुप्ति और वस्तुदर्शन प्रकाशनिविडता ( घनी-
भूत निर्विकल्पता ) की दृष्टिसे ये तीनों एक-से ही हैं ॥ ७८ ॥
१. मनका स्वभाव है कि वह अपने दृश्यके अनुरूप प्रतीत होता है । सुषुप्तिमें
दृश्य अव्यक्त होनेके कारण वह अव्यक्त जान पड़ता है और जाग्रत्में दृश्य व्यक्त
रहनेके कारण व्यक्त । परन्तु जाग्रत्में भी जब वह एक विषयको छोड़कर दूसरे विषय-
पर जाता है तो दोनोंके सन्धिकारलमें विषय-हीन रहनेके कारण अव्यक्त ही रहता
है । यह काल बहुत अल्प होता है, इसलिये सामान्य लोग इसे ग्रहण नहीं
कर पाते ।
षोडशोऽध्यायः । २३७
विमर्शभेदाद्भेदो हि लक्ष्यते व्यावहारिकैः ।
तत्र हेतुर्भास्यभेदादित्येव प्रनिश्चयः ॥ ७९ ॥
समाधौ केवलंचितिः सुप्तावव्यक्तमेव च ।
दर्शने भिन्नभासो हि भास्यमेवं त्रिधा स्थितम् ॥ ८० ॥
भास्यभेदेऽपि भासस्तु केवलं निर्विकल्पकः ।
अतः प्रकाशनिबिड इत्येव संप्रचक्षते ॥ ८१ ॥
समाधिश्च सुषुप्तिश्च चिरकालभवत्वतः ।
अनन्तरं स्पष्टतया सर्वैरपि विमृश्यते ॥ ८२ ॥
क्षणिकत्वाद्दर्शनं तु स्पष्टं न हि विमृश्यते ।
एवं समाधिः सुप्तिश्च क्षणिका न विमृश्यते ॥ ८३ ॥
सुषुप्तिः क्षणिका तद्वत् समाधिरपि विद्यते ।
सुषुप्तिर्लक्ष्यते सूक्ष्मदृग्भिः परिचयात् खलु ॥ ८४ ॥
किन्तु व्यावहारिक लोगोंको विमर्शका भेद होनेके कारण इनमें
भेद जान पड़ता है। इसमें निश्चित बात यह है कि इनका भेद
भास्यके भेदके कारण है [ स्वतः नहीं ] ॥ ७९ ॥
समाधिमें केवल शुद्ध चिति रहती है, सुषुप्तिमें अव्यक्त भी है और
वस्तुदर्शनमें विभिन्न अवभास रहते हैं । इस प्रकार इन अवस्थाओंमें
तीन प्रकारके भास्य हैं ॥ ८० ॥
परन्तु भास्योंका भेद होनेपर भी भास ( दृष्टि ) तो केवल निर्वि-
कल्प ही रहता है । इसीसे उसे तीनों अवस्थाओंमें प्रकाशनिबीड ही
कहा जाता है ॥ ८१ ॥
समाधि और सुषुप्ति दीर्घकालतक रहती हैं । इसलिये पीछे
सभी लोग उनकी स्पष्ट अनुभूति स्वीकार करते हैं ॥ ८२ ॥
किन्तु पदार्थदर्शन ( पदार्थदर्शनकी सन्धियोंमें रहनेवाली निर्वि-
कल्पता ) क्षणिक है; इसलिये उसका स्पष्ट परिचय नहीं होता ।
इसी प्रकार यदि समाधि और सुषुप्ति अवस्थाएँ भी क्षणिक होतीं तो
उनका भी परिचय नहीं हो सकता था ॥ ८३ ॥
व्यवहारमें कभी क्षणिक सुषुप्ति और समाधि भी हो जाती हैं।
किन्तु दीर्घ सुषुप्तिका परिचय रहनेके कारण सूक्ष्मदर्शी क्षणिक
२३८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
समाधिस्त्वपरिचयात् सूक्ष्मो न हि विमृश्यते ।
सर्वेषां प्राणिनां ब्रह्मन् व्यवहारदशास्वपि ॥ ८५ ॥
सूक्ष्माः समाधयः सन्ति चाव्युत्पत्त्या विभान्ति नो ।
जाग्रत्यविमृशिर्या स्यात् स समाधिरुदीरितः ॥ ८६ ॥
विमर्शाभावमात्रन्तु समाधिरभिधीयते ।
सुषुप्तौ दर्शने चापि समाधित्वमतः स्थितम् ॥ ८७ ॥
किन्तु मुख्यसमाधित्वमनयोर्न हि विद्यते ।
भेदामर्शनसंस्कारगर्भितत्वान्न मुख्यता ॥ ८८ ॥
दर्शनं जाग्रति भवेदविमर्शनरूपकम् ।
तथापि ते प्रवक्ष्यामि मुनिपुत्रादराच्छृणु ॥ ८९ ॥
अव्यक्तं यत् प्रथमजं नास्तिसामान्यकं हि तत् ।
नास्तीत्येव हि तद्भानमत्यन्ताभावरूपकम् ॥ ९० ॥
सुषुप्तिको तो पहचान लेते हैं। पर समाधिका परिचय है नहीं,
इसलिये वस्तुदर्शनके समय जो सूक्ष्म समाधि होती है वह पहचानी
नहीं जाती ॥ ८४-८५ पू० ॥
ब्रह्मन् ! व्यवहारके समय भी सभी प्राणियोंको सूक्ष्म समाधियाँ
हुआ करती हैं; किन्तु परिचय न होनेके कारण वह जान नहीं
पड़तीं ॥ ८५ उ०-८६ पू० ॥
जाग्रत् अवस्थामें जो विमर्श ( संकल्प ) शून्य स्थिति हो जाती है
वह समाधि ही कही गयी है। विमर्शका अभाव ही तो समाधि कहलाता
है ॥ ८६ उ०-८७ पू० ॥
अतः सुषुप्ति और वस्तुदर्शनके समय भी समाधि तो रहती ही है।
किन्तु ये मुख्य समाधि नहीं मानी जातीं। इन अवस्थाओंमें भेदका
उल्लेख करानेवाले संस्कार छिपे रहते हैं, इसलिये इन्हें मुख्य समाधि
नहीं माना जाता ॥ ८७ उ०-८८ ॥
जाग्रत् अवस्थामें जो पदार्थ-दर्शन है वह भी अविमर्शरूप ही है।
तथापि मैं इसका स्पष्टतया वर्णन करता हूँ। मुनिपुत्र ! आदरपूर्वक
सुनो ॥ ८९ ॥
सबसे पहले उत्पन्न हुआ जो अव्यक्त है वह नास्ति-सामान्यरूप है।
'कुछ भी नहीं है' इस प्रकार उसका भान अत्यन्त अभावरूप ही है ॥९०॥
षोडशोऽध्यायः । २३६
एषा सुषुप्तिरित्युक्ता जडशक्तिर्भवेच्चितः ।
दर्शने भासमानं च नास्त्याभासपदं यतः ॥ ९१ ॥
अतः सुषुप्तिरेव स्याज्जडदर्शनसङ्गता ।
समाधौ भासमाना या चितिः सा ब्रह्मरूपिणी ॥ ९२ ॥
भक्षिणी कालदेशानां नास्त्याभासविनाशिनी ।
सर्वथाऽस्तिमयी देवी सुषुप्तिः सा कथं भवेत् ॥ ९३ ॥
तस्मात् सुषुप्तिमात्रेण न भवेद्धि कृतार्थता ।
बोधयामास जनक इत्यष्टावक्रमुक्तिभिः ॥ ९४ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टावक्रीये
षोडशोऽध्यायः ।
इसीको सुषुप्ति कहा गया है। यह चेतनकी जडशक्ति है। क्योंकि
देखनेके समय यह नास्ति (अभाव) प्रतीतिकी भूमि है, इसलिये सुषुप्ति
ही जडता-ज्ञानयुक्त मानी गयी है ॥ ६१--६२ पू० ॥
किन्तु समाधिमें भासनेवाली जो चिति है वह ब्रह्मरूपिणी है। वह
देश-कालकी मर्यादाको भक्षण कर जानेवाली और नास्ति-प्रतीतिका
भी नाश कर देनेवाली है। अतः वह पूर्णतया सत्तास्वरूपिणी देवी
सुषुप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ६२ उ०--६३ ॥
इसलिये भला सुषुप्तिमात्रसे कृतकृत्यता कैसे प्राप्त हो सकती है ?"
इस प्रकार अनेकों प्रकारकी युक्तियोंसे राजा जनकने अष्टावक्रको
बोध कराया ॥ ६४ ॥
षोडश अध्याय समाप्त ।
सप्तदशोऽध्यायः
श्रुतवैवं जनकेनोक्तमष्टावक्रः पुनर्नृपम् ।
पप्रच्छ यत्तद्वदामि शृणु भार्गव यत्नतः ॥ १ ॥
राजन् यदुक्तं भवता व्यवहारदशास्वपि ।
सूक्ष्माः समाधयः सन्तीत्येतं तन्मे वद स्फुटम् ॥ २ ॥
दशासु कासु ते सन्ति निर्विकल्पचिदात्मकाः।
एवं तेनाऽनुयुक्तोऽथ प्राह राजा महाशयः ॥ ३ ॥
शृणु ब्रह्मन् प्रवक्ष्यामि व्यवहारे समाधयः ।
प्रियया सम्परिष्वक्तो नव्यया प्रथमं यदा ॥ ४ ॥
तदा न वेद बाह्यं वाप्यान्तरं वा क्षणं नरः ।
तिष्ठेन्न निद्रयाऽऽक्रान्तः स समाधिरुदीरितः ॥ ५ ॥
सप्तदश अध्याय ॥ १७ ॥
जनक द्वारा साधनक्रम और स्वानुभवका निरूपण
परशुरामजी ! जनकका यह कथन सुनकर अष्टावक्रजीने राजासे
पुनः जो प्रश्न किया वह बताता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ १ ॥
[अष्टावक्रजीने पूछा ] "राजन् ! आपने जो कहा कि व्यवहारके
समय भी सूक्ष्म समाधियाँ हुआ करती हैं, सो यह बात आप मुझसे
स्पष्ट करके कहिये ॥ २ ॥
वे निर्विकल्प चित्स्वरूपिणी समाधियाँ किन-किन स्थितियोंमें हुआ
करती हैं ?" अष्टावक्रके इस प्रकार प्रश्न करनेपर उदारचेता महाराज
जनक कहने लगे—॥ ३ ॥
"ब्रह्मन् ! सुनिये, मैं व्यवहारमें होनेवाली समाधियाँ बतलाता
हूँ। पुरुष जिस समय नवीन प्रियतमासे पहली बार गाढ़ आलिंगन
प्राप्त करता है उस समय एक क्षणके लिये उसे बाहर या भीतरकी
कुछ भी सुधि नहीं रहती और न निद्राके ही वशीभूत होता है। अतः
वह समाधि ही कही जाती है ॥ ४-५ ॥
सप्तदशोऽध्यायः। २४१
यच्चिराद्वाञ्छितं किञ्चिदलभ्यत्वेन निश्चितम् ।
अकस्मात्तस्य संप्राप्तिर्यदा भवति वै मुने ॥ ६ ॥
तदा न वेद बाह्यं वाप्यान्तरं वा क्षणं नरः ।
तिष्ठेन्न निद्रयाक्रान्तः स समाधिरुदीरितः ॥ ७ ॥
अतर्कितं व्रजन् क्वापि निर्भयो हृष्टमानसः ।
अकस्माद्यदि सम्पश्येद् व्याघ्रादिं मृत्युसम्मितम् ॥ ८ ॥
तदा न वेद बाह्यं वाप्यान्तरं वा क्षणं नरः ।
तिष्ठेन्न निद्रयाक्रान्तः स समाधिरुदीरितः ॥ ९ ॥
अतिप्रियं स्वपुत्रादि विभुं च गृहकर्मणि ।
अरोगिणं यदाऽकस्मात् संशृणोति मृतं किल ॥ १० ॥
तदा न वेद बाह्यं वाप्यान्तरं वा क्षणं नरः ।
तिष्ठेन्न निद्रयाक्रान्तः स समाधिरुदीरितः ॥ ११ ॥
अथान्यथापि वक्ष्यामि समाधेः सम्भवं शृणु ।
जिस वस्तुकी चिरकालसे लालसा रही हो और उसे अलभ्य समझ
बैठे हों, हे मुने ! उसकी जिस समय अकस्मात् प्राप्ति हो जाती है
उस समय भी मनुष्यको कुछ देरतक बाहर या भीतरकी सुधि नहीं
रहती और न वह निद्राके ही वशीभूत होता है । वह भी समाधि ही
कही गयी है ॥ ६-७ ॥
जिस समय मनसे किसी प्रकारकी कल्पना न हो तथा निर्भय
और प्रसन्न चित्तसे कहीं जा रहा हो, उसी समय अकस्मात् यदि मार्गमें
व्याघ्र आदि कोई कालके समान विकराल जीव दिखायी दे जाय,
तब भी एक क्षणके लिये बाहर-भीतरकी कोई सुधि नहीं रहती
और न निद्राके ही वशीभूत होता है । उसे भी समाधि ही कहा
जाता है ॥ ८-९ ॥
अपना पुत्रादि कोई अत्यन्त प्रिय हो, जो नीरोग और गृहकार्योंमें
भी अत्यन्त कुशल हो, उसके विषयमें यदि अकस्मात् सुन लिया
जाय कि वह मर गया, तो उस समय भी मनुष्यको एक क्षणके लिये
बाहर-भीतरकी कुछ भी सुधि नहीं रहती और न वह निद्रासे ही
आक्रान्त होता है। उसे भी समाधि ही कहा जाता है ॥ १०-११ ॥
इनके सिवा समाधिकी अन्य स्थितियाँ भी बतलाता हूँ, श्रवण
२४२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तीनां मध्ये सान्ते समाधयः ॥ १२ ॥
दूरे किञ्चित् पश्यतस्तु बुद्ध्या चैकाग्रया मुने ।
मनो दीर्घात्मतां याति जलूकेव तृणालिषु ॥ १३ ॥
देहे देहाभासमयं भावे भावात्मकं तथा ।
मध्ये तन्निर्विकल्पाख्यं मनो लक्ष्यं सर्वदा ॥ १४ ॥
वहुना किमिहोक्तेन शृणु सूक्ष्मविमर्शनम् ।
व्यवहारे न कस्यापि ज्ञानमेकन्तु भासते ॥ १५ ॥
खण्डज्ञानसमूहात्मा व्यवहारोऽयमाततः ।
अत एव वर्णयन्ति तैर्थिकाः सर्व एव हि ॥ १६ ॥
आत्मानं बुद्धिमपि वा क्षणभेदविभेदितम् ।
तदन्तरक्षणौघेषु निर्विकल्पदशा स्थिता ॥ १७ ॥
कहोलात्मज जानीहि जानतां तु प्रतिक्षणम् ।
समाधिरस्ति चान्यस्य समाधिः शशशृङ्गवत् ॥ १८ ॥
करो। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिके मध्यमें जो सन्धि-स्थान हैं उनमें
भी समाधियाँ रहती हैं ॥ १२ ॥
मुने ! जब एकाग्र चित्तसे कोई दूरकी वस्तु देखी जाती है तो
घासपर चलनेवाली जोंकके समान मन भी लम्बा हो जाता है। इसी
प्रकार वह शरीरमें रहते समय शरीराकार तथा अन्य किसी भावमें
रहनेपर तदाकार हो जाता है। किन्तु किसी भावमें न जाकर बीचमें
रहता है तो मनको सर्वदा निर्विकल्प पाओगे ॥ १३-१४ ॥
हे सूक्ष्मदर्शिन् ! इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय; सुनो।
व्यवहारके समय किसीको भी सर्वदा एक ही ज्ञान तो भासता नहीं है।
यह विस्तृत व्यवहार खण्ड-खण्ड ज्ञानोंका समूह ही तो है। अतः
सभी मतवादी आचार्य आत्मा और बुद्धिको भी क्षण-क्षणमें भिन्न-
भिन्न बताते हैं। इन समस्त क्षणोंके बीचमें जो क्षणिक अवकाश
रहता है उसमें निर्विकल्प स्थिति रहती है ॥ १५-१७ ॥
अष्टावक्र ! याद रखो, जिन्हें समाधिके स्वरूपका ज्ञान है उनके
लिये तो प्रत्येक क्षणमें समाधि रहती है; नहीं तो दूसरे पुरुषोंके लिये
तो समाधि खरगोशके सींगकी तरह है ही नहीं” ॥ १८ ॥
सप्तदशोऽध्यायः । २४३
जनकोक्तमिति श्रुत्वा भूयः पप्रच्छ स द्विजः ।
राजन्नेवं व्यवहृतौ समाधिर्निर्विकल्पकः ॥ १९ ॥
सर्वेषामस्ति यदि चेत्तत् कुतः संसृतिर्भवेत् ।
सुषुप्तौ दर्शने चापि जडाव्यक्तविभासतः ॥ २० ॥
पुरुषार्थसाधनत्वं समाधिस्त्वविकल्पकः ।
शुद्धसंविद्विभासात्मा तद्भूयः संसृतिः कथम् ॥ २१ ॥
एतदेव हि विज्ञानमज्ञानकुलनाशनम् ।
निर्विकल्पसमाध्याख्यं यन्निःश्रेयसकारणम् ॥ २२ ॥
एतन्मे शंस राजेन्द्र सर्वसंशयनाशनम् ।
इत्यापृष्टो महीपालः प्राह तं मुनिपुङ्गवम् ॥ २३ ॥
शृणु ब्रह्मन् प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमन्त्विदम् ।
अज्ञानात् संसृतिरियं प्रवृत्ताऽनादिकालतः ॥ २४ ॥
सुखदुःखावभासानां प्रवाहात्मतया स्थिता ।
स्वप्नवत् सन्तता सर्वैः सर्वदा ह्यनुभूयते ॥ २५ ॥
जनकका ऐसा कथन सुनकर अष्टावक्रने पुनः पूछा, “राजन् ! इस
प्रकार व्यवहारमें यदि सभीको निर्विकल्प समाधि होती रहती है तो
यह संसार कैसे चलता रहता है ? ॥ १९-२० पू० ॥
ज्ञानात्मक वस्तुओंके दर्शन और सुषुप्तिमें तो घटादि जड पदार्थों
और अव्यक्तका भाव होता है; इसलिये वे तो मोक्षरूप पुरुषार्थके
साधन नहीं हो सकते। तथापि निर्विकल्प समाधि तो शुद्ध चेतनका
ही अनुभव है। फिर यह संसारचक्र कैसे चल रहा है ? ॥ २० उ०-२१॥
और जिसका नाम निर्विकल्प समाधि है वही अज्ञान-परम्परा-
का नाश करनेवाला तथा निःश्रेयस (मोक्ष) का कारण विशुद्ध ज्ञान
है । [ फिर यह संसार क्यों ? ] ॥ २२ ॥
राजेश्वर ! सम्पूर्ण संशयोंको नष्ट करनेवाला यह रहस्य मुझे सम-
झाइये ।” इस प्रकार पूछे जानेपर राजाने उन मुनिश्रेष्ठसे कहा—॥२३॥
“ब्रह्मन् ! सुनिये, मैं आपको यह अत्यन्त गूढ रहस्य समझाता
हूँ । यह संसार अज्ञानके कारण अनादि कालसे चला आ रहा है ॥२४॥
यह सुख-दुःखमयी प्रतीतियोंमें प्रवाहरूपसे स्थित है और सब
जीव स्वप्नके समान सर्वदा निरन्तर इसका अनुभव करते हैं ॥ २५ ॥
२४४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
निवृत्तिस्तस्य तु ज्ञानादेवेति प्रविभावितम् ।
तज्ज्ञानं सविकल्पं स्यादज्ञानस्य प्रबाधनम् ॥ २६ ॥
निर्विकल्पकविज्ञानादज्ञानं न निवर्तते ।
निर्विकल्पकविज्ञानं केनचिन्न विरुद्ध्यते ॥ २७ ॥
निर्विकल्पकविज्ञानं सविकल्पसमाश्रयम् ।
विचित्रचित्राभासानां भित्तिवत् सुव्यवस्थितम् ॥ २८ ॥
निर्विकल्पं ज्ञानमिति केवलं ज्ञानमुच्यते ।
तत्रैव हि विकल्पानामुल्लेखात् सविकल्पकम् ॥ २९ ॥
अज्ञानं सविकल्पाख्यज्ञानमेव न चेतरत् ।
तदनेकविधं कार्यकारणात्मतया स्थितम् ॥ ३० ॥
कारणं स्वात्मपूर्णत्वाख्यातिरूपमुदीरितम् ।
चिदात्मा पूर्ण एव स्यादवच्छेदविवर्जनात् ॥ ३१ ॥
अवच्छेदनहेतूनां कालादीनां हि साधकः ।
इसकी निवृत्ति केवल ज्ञानसे ही मानी गयी है । वह अज्ञानकी
निवृत्ति करनेवाला ज्ञान सविकल्प होना चाहिये ॥ २६ ॥
निर्विकल्प ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि निर्विकल्प
ज्ञानका किसीसे विरोध नहीं होता ॥ २७ ॥
जिस प्रकार तरह-तरहके चित्रोंकी आश्रय भित्ति होती हैउ सी प्रकार
निर्विकल्प विज्ञान तो सम्पूर्ण विकल्पोंके आश्रय रूपसे स्थित है ॥२८॥
निर्विकल्प ज्ञान ही 'केवल ज्ञान' ( शुद्ध ज्ञान ) कहा जाता है और
उसीमें जब विकल्पोंका उदय होता है तब वह सविकल्प हो जाता है ॥
अज्ञान भी सविकल्प कहलानेवाला ज्ञान ही है, और कुछ नहीं।
वह कार्य-कारण भावसे अनेक रूपोंमें स्थित है ॥ ३० ॥
अपने आत्माकी पूर्णताका भान न होना ही कारण अज्ञान कहा
गया है। चिदात्मा तो पूर्ण ही है, क्योंकि उसकी कोई सीमा नहीं
है, प्रत्युत वह तो सीमाके हेतुभूत कालादिको भी सिद्ध करनेवाला
है। [ अर्थात् सीमा या अवच्छेदक हेतु जो देश, काल और वस्तु हैं
उनकी सत्ता तो चेतनके आश्रित ही भासती है, फिर वे उसके अवच्छेद-
दक कैसे हो सकते हैं ? ] ॥ ३१-३२ पू० ॥
सप्तदशोऽध्यायः। २४५
तथाविधात्मनः ख्यातिरपूर्णत्वेन या स्थिता ॥ ३२ ॥
अत्राधुनास्मीतिरूपा मूलाज्ञानं हि सा भवेत् ।
तस्यैवं पल्लवप्रायं देहात्मत्वादिभासनम् ॥ ३३ ॥
अज्ञानस्य निवृत्त्यन्तं संसारो न निवर्त्तते ।
पूर्णात्मविज्ञानमृते त्वज्ञानं नातिवर्त्तते ॥ ३४ ॥
तच्च पूर्णात्मविज्ञानं द्विविधं सुव्यवस्थितम् ।
परोक्षमपरोक्षञ्च परोक्षं गुरुशास्त्रतः ॥ ३५ ॥
तत् साक्षात् पुरुषार्थस्य न कारणमिति स्थितम् ।
यादृशं ते भवेज्ज्ञानं शास्त्रश्रुतिसमुद्भवम् ॥ ३६ ॥
श्रद्धामात्राभ्युपगतं फलदं न प्रचक्षते ।
अपरोक्षं हि विज्ञानं समाधिपरिपाकजम् ॥ ३७ ॥
सप्रपञ्चाज्ञाननाशक्षमं शुभफलावहम् ।
इस प्रकारके आत्माका जो 'उस समय मैं यहाँ हूँ' इस प्रकार अपूर्ण-
रूपसे भान होना है वही मूल (कारण) अज्ञान है। देहात्मत्वादि¹
रूपसे भासना उसीका कार्य है ॥ ३२ उ०-३३ ॥
जबतक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती तबतक संसारका अन्त नहीं
होता और आत्माको पूर्णताका ज्ञान हुए बिना अज्ञानकी निवृत्ति नहीं
होती ॥ ३४ ॥
वह आत्माकी पूर्णताका ज्ञान दो प्रकारका है—परोक्ष और
अपरोक्ष। इनमें परोक्ष ज्ञान तो गुरु या शास्त्रसे होता है। परन्तु
वह मोक्षरूप पुरुषार्थका साक्षात् साधन नहीं है—यह बात निश्चित
है ॥ ३५-३६ पू० ॥
जैसा शास्त्र और श्रुतिसे उत्पन्न हुआ तुम्हारा ज्ञान है, जो केवल
श्रद्धासे ही मान लिया गया है, वह मोक्षरूप फल देनेवाला नहीं कहा
गया ॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥
अपरोक्ष ज्ञान तो समाधिका परिपाक होने पर उत्पन्न होता है। तथा
वही प्रपञ्चसहित अज्ञानका नाश करनेमें समर्थ और मोक्षरूप शुभ फल
१. देहके धर्म स्थूलत्व गौरत्वादिको अपनेमें आरोपित 'मैं मोटा हूँ' 'मैं
गोरा' इत्यादि रूपसे भासना।
२४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
समाधिर्ज्ञानपूर्वस्तु विज्ञानं जनयेत् खलु ॥ ३८ ॥
तस्मादज्ञानिनां नार्थः समाधौ सम्भवत्यपि ।
यथाऽविदितमाणिक्यः पश्यन् कोशगृहे मणिम् ॥ ३९ ॥
न जानाति यथान्यस्तु श्रुतज्ञातमणिः कचित् ।
दृष्ट्वा प्रत्यभिजानाति तत्परो मणिमञ्जसा ॥ ४० ॥
अतः परः श्रुतमपि भूयः पश्यन् मणिं कचित् ।
न विजानाति तदिह ब्रह्मन् सुनिपुणोऽपि सन् ॥ ४१ ॥
तथा मूढा न विन्दन्ति फलं विज्ञानसंश्रयम् ।
अज्ञातत्वात् पण्डितास्तु श्रुतज्ञानयुता अपि ॥ ४२ ॥
अतत्परत्वहेतोस्तु न विजानन्ति सर्वथा ।
यथा हि तारकां पश्यन्नपि जानाति न कचित् ॥ ४३ ॥
मूढः श्रुतज्ञानहीनः श्रुतज्ञानयुतोऽपि वै ।
देनेवाला होता है । जो समाधि ज्ञानपूर्वक होती है निश्चय वही अप-
रोक्ष ज्ञान उत्पन्न कर सकती है ॥ ३७ उ०-३८ ॥
अतः व्यवहारकालमें अज्ञानियोंको समाधि होते रहनेपर भी
उनसे मोक्षरूप पुरुषार्थकी प्राप्ति नहीं होती । जिस प्रकार मणिके विषय-
में कुछ भी न जाननेवाला पुरुष खजानेमें मणिको देखनेपर पहचान
नहीं सकता, किन्तु जिसने सुनकर मणिकी जानकारी प्राप्त कर ली है और
उसकी खोजमें लगा हुआ है, वह उसे देखनेपर सुगमतासे ही पहचान
लेता है ॥ ३६-४० ॥
किन्तु ब्रह्मन् ! जिसे उसकी खोज नहीं है उसने भले ही मणिके
विषयमें सुन रखा हो और स्वयं भी बड़ा चतुर हो, तो भी मणिको
देखनेपर उसे पहचान नहीं सकता ॥ ४१ ॥
उसी प्रकार अज्ञानी पुरुषोंको तो परिचय न होनेके कारण
[ व्यवहारमें समाधि होते रहनेपर भी ] तत्त्वज्ञानसे होनेवाला फल
प्राप्त नहीं होता । और जो पण्डित हैं, वे श्रवणजनित ज्ञानसे सम्पन्न
होनेपर भी, उसकी खोजमें लगे न होनेके कारण उसे ठीक-ठीक नहीं
जान पाते ॥ ४२-४३ पू० ॥
[ यह बात ऐसी ही है ] जैसे आकाशमें तारेको देखनेपर भी
सप्तदशोऽध्यायः । २४७
पश्यन्नपि च नो वेत्ति तत्परत्वविवर्जनात् ॥ ४४ ॥
यस्तु श्रुत्वा शुक्रतारां दिगाकारादिलक्षणैः ।
मया ज्ञेयं सर्वथेति तत्परो बुद्धिमान् नरः ॥ ४५ ॥
एकाग्रमानसः पश्यन् प्रत्यभिज्ञास्यति स्फुटम् ।
एवमज्ञानतो मूढाश्चान्ये तात्पर्यवर्जनात् ॥ ४६ ॥
न विजानन्ति स्वात्मानं ब्रह्मन् सत्सु समाधिषु ।
भिक्षामटति दुर्दैवाद् यथा वै विस्मृताकरः ॥ ४७ ॥
तस्मादेता दशाः सर्वाः समाधीनां निरर्थकाः ।
अत एव शिशूनां हि सर्वदा निर्विकल्पकम् ॥ ४८ ॥
न फलं साधयेद् ब्रह्मन्नज्ञानस्यानिवृत्तितः ।
अज्ञानी तो श्रवणजनित ज्ञानसे हीन होनेके कारण नहीं पहचान पाता ।
और जिसे श्रवणजनित ज्ञान है, उसमें उसे देखने की उत्कण्ठा न
होनेके कारण, वह भले ही उसे देखता रहे परन्तु पहचान नहीं
सकता ॥ ४३ उ०-४४ ॥
जिसने शुक्र तारेके विषयमें 'वह अमुक दिशामें रहता है और
उसका ऐसा आकार है' इत्यादि लक्षणोंसे सुन रखा है और जिसे ऐसी
उत्कण्ठा भी है कि मैं उसे अपरोक्ष रूपसे जानूँ, वह बुद्धिमान्
पुरुष ही एकाग्रचित्तसे देखनेपर उसे स्पष्टरूपसे जान सकेगा [ अन्य
नहीं ] ॥ ४५-४६ पू० ॥
ब्रह्मन् ! इसी प्रकार 'समाधियोंके होते रहनेपर भी अज्ञानी
तो अज्ञानके कारण और दूसरे लोग तत्परता न होनेके कारण
अपने आत्माको नहीं जान पाते, जिस प्रकार दुर्भाग्यवश घरमें
गड़े खजानेका पता न होनेके कारण कोई पुरुष भीख माँगता
फिरे ॥ ४६ उ०-४७ ॥
इसलिये समाधिकी ये सब दशाएँ निरर्थक ही रहती हैं । इसीसे
शिशुओंको यद्यपि सर्वदा निर्विकल्प स्थिति ही रहती है तथापि
उनके अज्ञानकी निवृत्ति न होनेके कारण उन्हें उसका मोक्षरूप फल
प्राप्त नहीं होता ॥ ४८-४९ पू० ॥