त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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निद्रा प्रथमजा व्यक्तं महाशून्यमिहोच्यते ॥ ७३ ॥
नास्ति सामान्यपदवी सुषुप्तिस्तत्प्रकाशनम् ।
वस्तुदर्शनकालेऽपि जाग्रत्येवंविधं मनः ॥ ७४ ॥
किन्तूत्तरक्षणोद्भूतविकल्पैवैस्तिरोहितम् ।
सुषुप्ताव्यक्तशक्तिप्रकाशनिविडत्वतः ॥ ७५ ॥
मनो विलीनमित्येवं विविञ्चन्ति विवेचकाः ।
वस्तुदर्शनकालेऽपि चैवं लीनं मनो भवेत् ॥ ७६ ॥
शृणु ब्रह्मन् रहस्यं ते वक्ष्यामि स्वानुभूतितः ।
यत्र मुह्यन्ति विद्वांसोऽप्यतिसूक्ष्मविवेचकाः ॥ ७७ ॥
निर्विकल्पसमाधिश्च सुषुप्तिर्वस्तुदर्शनम् ।
त्रयमेतच्चैकविधं प्रकाशनिविडत्वतः ॥ ७८ ॥
सृष्टिके समय जो सबसे पहला स्वरूपका संकोच अवभासित हुआ
उसका नाम है निद्रा । उसीको अव्यक्त या महाशून्य भी कहा जाता
है । वह ‘नास्ति’ ( कुछ नहीं ) इस प्रतीतिकी सामान्य भूमि है और
सुषुप्तिमें उसकी उपलब्धि होती है ॥ ७३ उ०-७४ पू० ॥
जाग्रत् अवस्था में वस्तुओंको देखनेके समय भी मन ऐसा होता
है । किन्तु उसके पीछे दूसरे ही क्षणमें अनेकों विकल्पोंके प्रकट हो
जानेसे वह अवस्था लुप्त हो जाती है ॥ ७४ उ०-७५ पू० ॥
किन्तु सुषुप्तावस्था में अव्यक्तशक्तिकी घनीभूत निर्विकल्पताके कारण
मन लीन रहता है—ऐसा विचारकोंका निर्णय है । वास्तवमें तो वस्तुको
देखनेके समय भी मन इसी प्रकार लीन रहता है १ ॥ ७५ उ०-७६ ॥
ब्रह्मन् ! सुनो, मैं अपने अनुभवके आधार पर यह रहस्य बताता हूँ ।
यहाँ अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन करनेवाले विद्वान् भी मूढ बन जाते हैं ॥७७॥
निर्विकल्प समाधि, सुषुप्ति और वस्तुदर्शन प्रकाशनिविडता ( घनी-
भूत निर्विकल्पता ) की दृष्टिसे ये तीनों एक-से ही हैं ॥ ७८ ॥
१. मनका स्वभाव है कि वह अपने दृश्यके अनुरूप प्रतीत होता है । सुषुप्तिमें
दृश्य अव्यक्त होनेके कारण वह अव्यक्त जान पड़ता है और जाग्रत्में दृश्य व्यक्त
रहनेके कारण व्यक्त । परन्तु जाग्रत्में भी जब वह एक विषयको छोड़कर दूसरे विषय-
पर जाता है तो दोनोंके सन्धिकारलमें विषय-हीन रहनेके कारण अव्यक्त ही रहता
है । यह काल बहुत अल्प होता है, इसलिये सामान्य लोग इसे ग्रहण नहीं
कर पाते ।