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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

सप्तदशोऽध्यायः । २४३
जनकोक्तमिति श्रुत्वा भूयः पप्रच्छ स द्विजः ।
राजन्नेवं व्यवहृतौ समाधिर्निर्विकल्पकः ॥ १९ ॥
सर्वेषामस्ति यदि चेत्तत् कुतः संसृतिर्भवेत् ।
सुषुप्तौ दर्शने चापि जडाव्यक्तविभासतः ॥ २० ॥
पुरुषार्थसाधनत्वं समाधिस्त्वविकल्पकः ।
शुद्धसंविद्विभासात्मा तद्भूयः संसृतिः कथम् ॥ २१ ॥
एतदेव हि विज्ञानमज्ञानकुलनाशनम् ।
निर्विकल्पसमाध्याख्यं यन्निःश्रेयसकारणम् ॥ २२ ॥
एतन्मे शंस राजेन्द्र सर्वसंशयनाशनम् ।
इत्यापृष्टो महीपालः प्राह तं मुनिपुङ्गवम् ॥ २३ ॥
शृणु ब्रह्मन् प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमन्त्विदम् ।
अज्ञानात् संसृतिरियं प्रवृत्ताऽनादिकालतः ॥ २४ ॥
सुखदुःखावभासानां प्रवाहात्मतया स्थिता ।
स्वप्नवत् सन्तता सर्वैः सर्वदा ह्यनुभूयते ॥ २५ ॥
जनकका ऐसा कथन सुनकर अष्टावक्रने पुनः पूछा, “राजन् ! इस
प्रकार व्यवहारमें यदि सभीको निर्विकल्प समाधि होती रहती है तो
यह संसार कैसे चलता रहता है ? ॥ १९-२० पू० ॥
ज्ञानात्मक वस्तुओंके दर्शन और सुषुप्तिमें तो घटादि जड पदार्थों
और अव्यक्तका भाव होता है; इसलिये वे तो मोक्षरूप पुरुषार्थके
साधन नहीं हो सकते। तथापि निर्विकल्प समाधि तो शुद्ध चेतनका
ही अनुभव है। फिर यह संसारचक्र कैसे चल रहा है ? ॥ २० उ०-२१॥
और जिसका नाम निर्विकल्प समाधि है वही अज्ञान-परम्परा-
का नाश करनेवाला तथा निःश्रेयस (मोक्ष) का कारण विशुद्ध ज्ञान
है । [ फिर यह संसार क्यों ? ] ॥ २२ ॥
राजेश्वर ! सम्पूर्ण संशयोंको नष्ट करनेवाला यह रहस्य मुझे सम-
झाइये ।” इस प्रकार पूछे जानेपर राजाने उन मुनिश्रेष्ठसे कहा—॥२३॥
“ब्रह्मन् ! सुनिये, मैं आपको यह अत्यन्त गूढ रहस्य समझाता
हूँ । यह संसार अज्ञानके कारण अनादि कालसे चला आ रहा है ॥२४॥
यह सुख-दुःखमयी प्रतीतियोंमें प्रवाहरूपसे स्थित है और सब
जीव स्वप्नके समान सर्वदा निरन्तर इसका अनुभव करते हैं ॥ २५ ॥