त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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चक्षुर्नैतद्गोलकं ते मनश्चक्षुरुदाहृतम् ।
येन पश्यसि स्वप्नेषु तच्चक्षुर्मुख्यमुच्यते ॥ २७ ॥
तस्य प्रत्यावृत्तिरपि प्रोच्यते शृणु भूसुर ।
अप्रत्यावृत्तचक्षुर्वै नैव पश्यति किञ्चन ॥ २८ ॥
दिदृक्षुश्चक्षुषा किञ्चित्तदन्येभ्यो ह्यशेषतः ।
प्रत्यावृत्त्य दृढं तस्मिन्नेव संयोजयेद्यदि ॥ २९ ॥
तदा तद्भासते स्पष्टं नान्यदा तु कदाचन ।
अन्यदा तु पुरोवृत्ति न स्पष्टं भासते क्वचित् ॥ ३० ॥
आभातकल्पमेव स्यादप्रत्यावृत्तचक्षुषा ।
एवं श्रोत्रत्वगादीनां भूदेवाऽवेहि संस्थितिम् ॥ ३१ ॥
मनसाऽप्येवमेव स्यात् सुखदुःखाऽवभासनम् ।
अप्रत्यावृत्तमनसा किंस्विद्वेदितुमर्हति ॥ ३२ ॥
यहाँ 'दृष्टि' इन नेत्रगोलकोंको नहीं अपितु मानस-नेत्रोंके लिये
कहा गया है। जिसके द्वारा जीव स्वप्नोंमें देखता है वही नेत्र मुख्य
कहा जाता है ॥ २७ ॥
उस मानस-नेत्रको उलटना अर्थात् अन्तर्मुख करना क्या है—यह
भी बतलाया जाता है; क्योंकि उसे अन्तर्मुख किये बिना कोई कुछ
भी नहीं देख सकता ॥ २८ ॥
जो पुरुष नेत्रद्वारा कुछ देखना चाहता है वह दृष्टिको अन्य सब
ओरसे हटाकर यदि उस दर्शनीय वस्तुमें लगा देता है तो वह उसे
स्पष्टतया भासने लगती है, अन्यथा नहीं। ऐसा न होनेपर तो कभी-
कभी सामने रखी वस्तु भी स्पष्टतया नहीं भासती ॥ २९-३० ॥
जो नेत्र सब ओरसे हटाये हुए नहीं होते उनसे तो वस्तु न देखी
हुई-सी ही रहती है। विप्रदेव ! ऐसी ही बात श्रोत्र-त्वक् आदि अन्य
इन्द्रियोंके विषयमें भी जाननी चाहिये ॥ ३१ ॥
मनके द्वारा सुख-दुःखके भानमें भी ऐसा ही निश्चय है। जो
मन अन्य विषयोंकी ओरसे हटा हुआ नहीं है उससे पुरुष क्या जान
सकता है ? ॥ ३२ ॥