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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

षोडशोऽध्यायः। २३३
एवं विलिप्ते मनसि निद्रयाऽन्यपरावृतेः।
अयोग्यत्वादेव मनो भासयेन्न चितिं क्वचित् ॥ ५८ ॥
अन्यथा लोष्टकुड्यादेरपि भायात् कुतो न सा।
तस्माद्योग्येन मनसा शुद्धेन भासते हि सा ॥ ५९ ॥
अतः सद्योजातशिशोर्भासते न हि किञ्चन।
अथाऽपि शृणु वक्ष्यामि मषीलिप्ते हि दर्पणे ॥ ६० ॥
अलक्षितं चाऽपि मषीप्रतिबिम्बनमस्ति वै।
संश्लेषान्न विलक्षेत स्वभावस्याऽनपोहनात् ॥ ६१ ॥
तथा मनः सुषुप्तिस्थं संश्लिष्टं निद्रयैव हि।
अतोऽन्येभ्यः परावृत्तेरभावाद्भासयेन्न ताम् ॥ ६२ ॥
अतो निद्रास्मृतिरपि व्युत्थितस्य हि सम्भवेत् ।
मूढताऽपि च या तस्यां दशायामनुभूयते ॥ ६३ ॥
इसी प्रकार मनपर निद्राका लेप चढ़ जानेपर अन्य विषयोंसे
विमुखता हो जानेपर भी, प्रकाशनकी योग्यता न रहनेके कारण वह
चितिको कभी भासित नहीं कर सकता ॥ ५८ ॥
यदि ऐसा न होता तो ढेले और भीत आदिको भी चितिका भान
क्यों नहीं हो जाता ? अतः योग्य और शुद्ध मनके द्वारा ही उसका
भान होता है ॥ ५९ ॥
इसीसे तत्काल उत्पन्न हुए शिशुको भी कुछ नहीं भासता । तथापि
एक बात कहता हूं, सुनो, काजल पुते हुए दर्पणमें भी काजलका प्रति-
बिम्ब तो रहता ही है, भले ही वह दिखायी न दे, क्योंकि जो जिसका
स्वभाव होता है उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती । हाँ, काजलके संसर्गके
कारण वह दीख नहीं पड़ता ॥ ६०-६१ ॥
इसी प्रकार सुषुप्तावस्थामें मन निद्रासे ही संश्लिष्ट रहता है।
[ इसलिये अलक्षितरूपसे उसमें निद्राका प्रतिबिम्ब तो पड़ता ही है । ]
अतः निद्रारूप अन्य विषयसे विमुखता न होनेके कारण वह उस
चितिको भासित नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥
इसीसे जगे हुए व्यक्तिको निद्राकी स्मृति होती है। तथा उस
अवस्थामें जिसका अनुभव होता है उस मूढ़ता (अज्ञान) का भी
स्मरण होता है ॥ ६३ ॥