त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः । २३६
एषा सुषुप्तिरित्युक्ता जडशक्तिर्भवेच्चितः ।
दर्शने भासमानं च नास्त्याभासपदं यतः ॥ ९१ ॥
अतः सुषुप्तिरेव स्याज्जडदर्शनसङ्गता ।
समाधौ भासमाना या चितिः सा ब्रह्मरूपिणी ॥ ९२ ॥
भक्षिणी कालदेशानां नास्त्याभासविनाशिनी ।
सर्वथाऽस्तिमयी देवी सुषुप्तिः सा कथं भवेत् ॥ ९३ ॥
तस्मात् सुषुप्तिमात्रेण न भवेद्धि कृतार्थता ।
बोधयामास जनक इत्यष्टावक्रमुक्तिभिः ॥ ९४ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टावक्रीये
षोडशोऽध्यायः ।
इसीको सुषुप्ति कहा गया है। यह चेतनकी जडशक्ति है। क्योंकि
देखनेके समय यह नास्ति (अभाव) प्रतीतिकी भूमि है, इसलिये सुषुप्ति
ही जडता-ज्ञानयुक्त मानी गयी है ॥ ६१--६२ पू० ॥
किन्तु समाधिमें भासनेवाली जो चिति है वह ब्रह्मरूपिणी है। वह
देश-कालकी मर्यादाको भक्षण कर जानेवाली और नास्ति-प्रतीतिका
भी नाश कर देनेवाली है। अतः वह पूर्णतया सत्तास्वरूपिणी देवी
सुषुप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ६२ उ०--६३ ॥
इसलिये भला सुषुप्तिमात्रसे कृतकृत्यता कैसे प्राप्त हो सकती है ?"
इस प्रकार अनेकों प्रकारकी युक्तियोंसे राजा जनकने अष्टावक्रको
बोध कराया ॥ ६४ ॥
षोडश अध्याय समाप्त ।