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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 244

२३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिराभिमुख्यञ्च तस्य वै ।
अपेक्ष्यते दर्पणस्य प्रतिबिम्बदिदृक्षुणा ॥ ४० ॥
गगनं दर्पणे द्रष्टुं यदा समभिवाञ्छति ।
तदाऽन्येभ्यः परावृत्तिमात्रेण हि कृतार्थता ॥ ४१ ॥
गगनं सर्वतो व्याप्तं दर्पणे सर्वदा स्थितम् ।
अन्यावृत्तं किन्तु चाऽन्यैरभिच्छन्नं न भासते ॥ ४२ ॥
सर्वाश्रयं सर्वगतमपि तैश्छादितं यतः ।
अतस्तेभ्यः परावृत्तिमात्रेणैव विभासते ॥ ४३ ॥
एवं चितिः सर्वगता सर्वाश्रयतया स्थिता ।
सर्वकाले समापूर्णा मनसि व्योमवद् द्विज ॥ ४४ ॥
तस्मादन्यपरावृत्तिमात्रं मनस इष्यते ।
पश्य विप्र चितिः कुत्र कदा नास्त्यवभासिनी ॥ ४५ ॥
उसका प्रतिबिम्ब देखनेकी इच्छावाले पुरुषको अन्य पदार्थोंसे दर्पणको
हटाने और उस पदार्थके सामने लानेकी आवश्यकता होगी ॥ ३६-४०॥
पर यदि दर्पणमें आकाशको देखनेकी ही इच्छा हो तो अन्य
पदार्थोंसे दर्पणको हटा लेनेसे ही अपना काम बन जायगा ॥ ४१ ॥
क्योंकि सर्वत्र व्याप्त आकाश दर्पणमें भी सर्वदा विद्यमान है।
किन्तु दूसरे पदार्थोंसे बिना हटाये उनसे आच्छादित रहनेके कारण वह
भासता नहीं है ॥ ४२ ॥
वह सबका आश्रय और सर्वगत होनेपर भी क्योंकि उन पदार्थोंसे
'ढका रहता है, इस लिये उनकी ओरसे हटा लेने मात्रसे ही भासने
लगता है ॥ ४३ ॥
इसी प्रकार चिति भी सर्वव्यापिका है और सबकी आश्रयरूपसे
स्थित है । ब्रह्मन् ! वह आकाशके समान सभी समय मनमें भर-
पूर है ॥ ४४ ॥
इसलिये अपने साक्षात्कारके लिये उसे केवल मनको अन्य पदार्थोंसे
मोड़ लेनेकी ही अपेक्षा है । विप्रवर ! विचार तो करो कि सर्वप्रकाशिनी
चिति कब और कहाँ नहीं है ॥ ४५ ॥