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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पञ्चदशोऽध्यायः । २२१
अप्रकाशो यथा भाति सा न भायात्कथं वद ।
भाति चेत्सा कथं भाति विमृशैतत्सुसूक्ष्मतः ॥ ९२ ॥
अत्र सर्वे न पश्यन्ति कुशला अपि पण्डिताः ।
अनन्तर्दृष्टयस्तेन मोहिताः संसरन्ति च ॥ ९३ ॥
यावद् दृष्टिः प्रवृत्तिं तु न परित्यज्य तिष्ठति ।
तावदन्तर्दृष्टितापि न स्यादेव कथञ्चन ॥ ९४ ॥
यावन्नान्तर्दृष्टिमेति तावत्तां न प्रपश्यति ।
अन्तर्दृष्टिर्निरीहा स्यात् सेहायाः सा कथं भवेत् ॥ ९५ ॥
परिहृत्य तु तां सम्यक् स्वभावमुपसंश्रय ।
क्षणं स्वभावमाश्रित्य निर्विमर्शस्ततः परम् ॥ ९६ ॥
विमृश्य स्मरणद्वारा ततो वेत्सि समस्तकम् ।
असंवेद्यं सुवेद्यं च तदेवं तत्त्वमुच्यते ॥ ९७ ॥
विदित्वैवमवेद्यं च प्राप्नुयादमृतां स्थितिम् ।
अप्रकाशरूपसे भी तो वह चितिशक्ति ही प्रकाशित होती है ॥ ९१ ॥
भला, जिससे अप्रकाशका भी भान होता है वह स्वयं क्यों
भासित नहीं होगी ? और यदि भासती है तो किस प्रकार भासती
है—इसपर सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो ॥ ९२ ॥
अन्तर्दृष्टि हुए बिना इस रहस्यको बड़े निपुण विद्वान् भी नहीं
समझ पाते । इसीसे वे मोहग्रस्त रहकर संसार-चक्रमें पड़े रहते हैं ॥९३॥
जबतक दृष्टि बाह्य प्रवृत्तिको त्यागकर स्थिर नहीं होती तबतक
किसी प्रकार अन्तर्दृष्टिता भी प्राप्त नहीं हो सकती ॥ ९४ ॥
और जबतक अन्तर्दृष्टि नहीं होती तबतक उसका साक्षात्कार नहीं
होता । अन्तर्दृष्टि तो निःसंकल्पता है अतः संकल्पोंके रहते हुए वह कैसे
हो सकती है ॥ ९५ ॥
अतः तुम संकल्पोंको अच्छी तरह त्यागकर अपने स्वरूपका आश्रय
लो और एक क्षण स्वरूपमें स्थित रहकर फिर निश्चिन्त हो जाओ ॥९६॥
फिर उस अवस्थाके स्मरण द्वारा तुम यह सब कुछ जान जाओगे कि
वह तत्त्व अज्ञेय है और सुज्ञेय भी है—ऐसा क्यों कहा जाता है ॥९७॥
इस प्रकार उस अविज्ञेय तत्त्वको जानकर तुम अमृत-स्थिति

२२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
एतत्तेऽभिहितं सर्वं मुनिपुत्र नमोऽस्तु ते ॥ ९८ ॥
व्रजाम्यहं त्वयः चैतन्न विज्ञातं सकृच्छ्रुतेः ।
बोधयिष्यति त्यामेष राजा बुद्धिमतां वरः ॥ ९९ ॥
पृच्छ भूयः संशयं ते सर्वं छेत्स्यति वै नृपः ।
इत्युक्त्वा पूजिता राज्ञा प्रणता च सभासदैः ॥ १०० ॥
वातनुन्नाभ्रलेखेव क्षणादन्तर्द्धिमाययौ ।
एतत्तेऽभिहितं राम वेदनप्रक्रियात्मनः ॥ १०१ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टावकीये
पञ्चदशोऽध्यायः ।
प्राप्त कर लोगे। यह मैंने तुमसे सारा रहस्य कह दिया। मुनिपुत्र !
तुम्हें नमस्कार है ॥ ९८ ॥
अब मैं जाती हूँ। एक बार सुन लेनेसे ही तुम इसे जान नहीं
सकोगे। ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज जनक तुम्हें इसका बोध
करायेंगे। तुम इनसे पुनः प्रश्न करना। महाराज तुम्हारे सब संशयोंका
छेदन कर देंगे” ॥ ९९-१०० पू० ॥
ऐसा कहकर वह उठी। राजाने उसका पूजन किया तथा अन्य
सभासदोंने प्रणाम। फिर वह वायुसे विचलित हुई मेघमालाके समान
एक क्षणमें ही अन्तर्धान हो गयी। परशुराम ! मैंने तुम्हें यह आत्माका
ज्ञान होनेकी प्रक्रिया सुना दी ॥ १०० उ०-१०१ ॥
पञ्चदश अध्याय समाप्त।

षोडशोऽध्यायः
श्रुत्वैतद्भार्गवो रामः प्राप्य विस्मयमान्तरे ।
भूयः पप्रच्छाऽत्रिसूनुमवितृप्तः कथाश्रुतेः ॥ १ ॥
भगवन्नद्भुतं ह्येतच्छ्रुतं वृत्तं पुरातनम् ।
भूयः पप्रच्छ राजानमष्टावक्रो महामुनिः ॥ २ ॥
यद्राजा प्रत्युवाचैनं तच्च मे वद सर्वशः ।
अहोऽद्भुतं समाख्यानं न क्वचिच्च मया श्रुतम् ॥ ३ ॥
विज्ञानवृत्तसर्वस्वं दयया वद मे गुरो !
इत्येवमनुयुक्तोऽथ दत्तात्रेयो महामुनिः ॥ ४ ॥
भार्गवाय समाचख्यौ कथां परमपावनीम् ।
शृणु भार्गव यत् प्रोक्तं जनकेन महात्मना ॥ ५ ॥
निर्गतायां तु तापस्यामष्टावक्रो मुनेः सुतः ।
षोडश अध्याय ॥ १६ ॥
जनक और अष्टावक्रका संवाद
भृगुनन्दन परशुरामजीको यह सब सुन मन ही मन बड़ा आश्चर्य
हुआ। कथाश्रवणसे अभी उनकी तृप्ति नहीं हुई थी; अतः उन्होंने
अत्रिनन्दन भगवान् दत्तसे पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥
"भगवन् ! यह तो बड़ा ही अद्भुत पुरातन इतिहास सुना। अब
आप दयापूर्वक सांगोपांग वह प्रसंग सुनाइये कि महामुनि अष्टा-
वक्रने राजासे फिर क्या प्रश्न किया और राजाने उनसे क्या कहा।
अहो ! यह आख्यान तो बड़ा ही विचित्र है, ऐसा तो मैंने कहीं
नहीं सुना ॥ २-३ ॥
गुरुदेव ! यह प्रसंग विज्ञानवार्ताका सारभूत है। दया करके मुझे
यह सुनाइये।" इस प्रकार प्रश्न किये जानेपर महामुनि दत्तात्रेयने
परशुरामको परम पवित्र कथा सुनाना आरम्भ किया— "भृगुनन्दन !
महात्मा जनकने जो कुछ सुनाया वह सुनो ॥ ४-५ ॥
तपस्विनीके चले जानेपर मुनिपुत्र अष्टावक्र अनेकों ब्राह्मणोंको

२२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
संवृतो बहुभिर्विप्रैः समेत्य नृपपुङ्गवम् ॥ ६ ॥
पप्रच्छ यत्तु तापस्या सङ्क्षिप्तोक्तं महार्थकम् ।
तदुच्यमानन्तु मया सम्यक् शृणु समाहितः ॥ ७ ॥
राजन् विदेहाधिपते तापस्योक्तं तु यत्तया ।
तदहं नाऽविदं सम्यक् सङ्क्षेपोक्तत्वहेतुतः ॥ ८ ॥
कथं विद्यामवेद्यं तत् समाचक्ष्व दयानिधे ।
एवं जनक आपृष्टः प्राह तं विस्मयन्निव ॥ ९ ॥
मुनिपुत्र शृणु वचो मया यत् प्रोच्यतेऽधुना ।
नाऽवेद्यं सर्वथा तद्धि वेद्यञ्चापि न सर्वथा ॥ १० ॥
अवेद्यं चेत् सर्वथैव तद् गुरुः किं वदेद्वद ।
गुरुरावेदयेत्तत्त्वमत आदौ गुरुं श्रयेत् ॥ ११ ॥
एतद्वेदनमत्यन्तं सुलभं दुःशकं च हि ।
यः परावृत्तदृष्टिः स्यात्तस्य तत् सुलभं भवेत् ॥ १२ ॥
साथ ले नृपश्रेष्ठ जनकके पास आये और तपस्विनीने जो परम पुरुषार्थ
सम्बन्धी प्रसंग संक्षेपसे कहा था उसीके विषयमें प्रश्न किया।
वही बात मैं तुम्हें सुनाता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सावधानीसे
श्रवण करो ॥ ६-७ ॥
[परशुरामने पूछा—] “विदेहराज महाराज जनक ! उस तपस्वि-
नीने जो कुछ कहा था वह बहुत संक्षिप्त होनेके कारण मैं उसे अच्छी
तरह समझ नहीं सका। दयानिधे ! यह बात समझाकर कहिये कि मैं
उस अज्ञेय तत्त्वको कैसे जान सकता हूँ ?” इस प्रकार पूछे जानेपर
जनकने कुछ विस्मित होकर कहा—॥ ८-९ ॥
“मुनिपुत्र ! अब मैं जो बात कहता हूँ सुनो। वह पद न तो सर्वथा
अज्ञेय है और न सभी प्रकार ज्ञेय ही है ॥ १० ॥
यदि वह सर्वथा अज्ञेय ही होता तो बताओ गुरुदेव क्या बतलाते।
उस तत्त्व का ज्ञान तो गुरुदेव ही कराते हैं, इसलिये सबसे पहले
उनकी शरणमें जाना चाहिये ॥ ११ ॥
उस पदको जानना अत्यन्त सरल भी है और कठिन भी। जिसकी
दृष्टि लौट गयी है [अर्थात् बाह्य विषयोंसे विमुख होकर अन्तर्मुख हो

यः पराग्दृष्टिरेवास्ते तस्य तच्चातिदुर्लभम् ।
अनिरूप्यं केवलं तदवेद्यमपि सर्वथा ॥ १३ ॥
कथञ्चिदन्यरूपेण निरूप्यं वेद्यमप्युत ।
यद्यद् दृश्यं पश्यसीह तेन तद्वेद्यमुच्यते ॥ १४ ॥
यत्तेऽवभासते किञ्चित् तद्विभावय सद्‌धिया ।
भानशक्तिर्भास्यहीना सर्वभानसमाश्रया ॥ १५ ॥
सैव तत्तत्त्वमित्येव विजानीहि मुनेः सुत ।
वेद्यमेव न वित्तिः स्यात् स्वतो यन्न प्रकाशते ॥ १६ ॥
वित्तिरन्या यया वेद्यं वेद्यते न स्वतः क्वचित् ।
वेद्यं विभिन्नरूपं वै वित्त्यैव वेद्यते खलु ॥ १७ ॥
तत्तद्रूपविभेदेन वित्तिर्नो भिद्यते क्वचित् ।
गयी है] उसके लिये वह सरल है। और जो बहिर्मुख दृष्टिवाला ही
है उसके लिये उसका ज्ञान अत्यन्त कठिन है ॥ १२-१३ पू० ॥
वास्तवमें तो वह पद एकदम अनिर्वचनीय और सर्वथा अज्ञेय भी
है। तथापि किसी प्रकार अन्य रूपसे उसका निरूपण भी किया जाता
है और उसे जान भी सकते हैं ॥ १३ उ०-१४ पू० ॥
तुम यहाँ जो-जो दृश्य देखते हो उस घट-पटादि दृश्यमें ज्ञान
सामान्यरूपसे वह तत्त्व ही ज्ञेय कहा जाता है।१ तुम्हें जो कुछ भासता
है उसपर शुद्ध बुद्धिसे विचार करो। जो भास्यपदार्थसे रहित भान-
शक्ति है वही तो सम्पूर्ण भानकी आश्रय है ॥ १४ उ०-१५ ॥
मुनिपुत्र ! वही वह परतत्त्व है—ऐसा तुम जानो। जो ज्ञेय पदार्थ है
वही ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशित नहीं होता ॥ १६॥
ज्ञान, जिससे कि ज्ञेय जाना जाता है ज्ञेयसे भिन्न है। ज्ञेय
स्वतः कभी नहीं जाना जाता। वह भिन्न-भिन्न रूपोंवाला होता है
और निश्चय ज्ञानके द्वारा ही जाना जाता है ॥ १७ ॥
ज्ञेय पदार्थोंके रूपभेदोंसे ज्ञानमें कभी भेद नहीं होता।
१. दृश्यरूपसे जो घट-पट आदिके ज्ञान होते हैं उन घटज्ञान-पटज्ञान आदिमें
घट-पटादि तो ज्ञेय हैं और उन सबमें अनुस्यूत जो ज्ञानसामान्य है वह वास्तवमें
परतत्त्व ही है। इसीका श्रुतिने 'प्रतिबोधविदितं मतम्' कहकर निरूपण
किया है।

२२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
भेदो हि वेद्यधर्मः स्यान्न वित्तिं संस्पृशेत् क्वचित् ॥ १८ ॥
यत आकारभेदो हि वेद्यपक्षे विभासते ।
पश्य वेद्यं पृथक्कृत्यं बुद्ध्याकारविवर्जितम् ॥ १९ ॥
बिम्बानुकृतिरादर्शो यद्वत्तद्वदियं चितिः ।
दृश्याकारधृतेर्नानारूपतां प्रतिपद्यते ॥ २० ॥
एवं वित्तिरियं वेद्या वेद्यव्यावृत्तरूपतः ।
न तु स्वभावतो वेद्या सा वित्तिर्विश्वसंश्रया ॥ २१ ॥
यत एतद्वेदितुः स्याद्रूपं तस्मान्न वेद्यते ।
विमृशाऽष्टावक्र रूपं निजमेवंविधं स्फुटम् ॥ २२ ॥
न त्वं शरीरं प्राणो वा मनो वाऽप्यस्थिरत्वतः ।
शरीरं धातुनिकरं तत्ते रूपं कथं भवेत् ॥ २३ ॥
तच्चाऽन्यविषयाभासे त्वहंधियमतित्रजेत् ।
भेद तो ज्ञेय-पदार्थोंका ही धर्म है, वह ज्ञानको कभी स्पर्श नहीं
करता ॥ १८ ॥
क्योंकि आकारका भेद ज्ञेयपदार्थोंमें ही भासता है। अतः तुम
ज्ञेयवर्गको अलग करके शुद्ध बुद्धिके द्वारा आकारशून्य ज्ञानका साक्षा-
त्कार कर लो ॥ १९ ॥
जिस प्रकार दर्पण बिम्बके आकारको [ प्रतिबिम्बरूपसे ] स्वीकार
कर लेता है, उसी प्रकार यह शुद्ध चेतन दृश्यके आकारोंको स्वीकार
करके अनेक रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥ २० ॥
इस प्रकार ज्ञेयपदार्थोंके निषेधपूर्वक इस चेतनतत्त्वको जाना जा
सकता है। सम्पूर्ण जगत्का आधारभूत वह चेतन स्वभावसे ज्ञेय
नहीं है ॥ २१ ॥
क्योंकि यह चेतन ज्ञाताका स्वरूप है इसलिये यह ज्ञानका
विषय नहीं होता। अष्टावक्र ! तुम अपने ऐसे स्वरूपका स्पष्टतया
विचार करो ॥ २२ ॥
तुम न शरीर हो, न प्राण हो और न मन ही हो, क्योंकि ये सब
अस्थिर हैं। शरीर तो वात-पित्त आदि धातुओंका समूह है। वह
तुम्हारा स्वरूप कैसे हो सकता है ? ॥ २३ ॥
इसके सिवा जब अन्य विषयोंका भास होता है तब देहमें अहं-

षोडशोऽध्यायः । :२९७
एवं प्राणो मनोऽपि स्यादहंबुद्धिव्यतिक्रमात् ॥ २४ ॥
अहंबुद्धिं न व्यतीत्य तिष्ठत्येषा परा चितिः ।
तस्माच्चितिः सर्ववेत्री त्वमष्टावक्र तत्त्वतः ॥ २५ ॥
पश्य प्रत्यावृत्तचक्षुः स्वात्मानं केवलं चितिम् ।
आदेशकाल एव स्वं पश्यन्त्युत्तमबुद्धयः ॥ २६ ॥
बुद्धि नहीं रहती । इसी प्रकार अहंबुद्धिसे शून्य होनेके कारण प्राण
और मन भी आत्मा नहीं हैं ॥ २४ ॥
यह परा चिति किसी भी समय अहंबुद्धिको त्यागकर नहीं रहती ।२
इसलिये यह सभीको जाननेवाली है । अष्टावक्र ! तुम दृष्टिको अन्तर्मुख
करके तत्त्वतः अपनेको शुद्ध चितिरूप ही देखो । जो उत्तम बुद्धिवाले
जिज्ञासु होते हैं वे तो उपदेशके समय ही अपने स्वरूपको लख लेते
हैं ॥ २५-२६ ॥
१. आत्मा सर्वदा अहं (मैं) रूपसे स्फुरित होता है। शरीरादिके साथ ऐसी
बात नहीं है। जब घटादि अन्य पदार्थ भासते हैं तो शरीरादि अहंरूपसे स्फुरित
नहीं होते। यदि उस समय भी वे अहंरूपसे भासते तो उनके ज्ञानकालमें हमें
ऐसा ज्ञान भी होता कि मैं गोरा-काला या लंबा हूँ। परन्तु ठीक उस समय ऐसा
कोई स्फुरण नहीं होता। इसे और स्पष्ट समझनेके लिये यह देखना चाहिये कि
जैसे रूपकी प्रतीतिके समय नेत्रोंका और शब्दकी प्रतीतिके समय कानोंका अनु-
सन्धान नहीं होता इसी प्रकार घटादिका भान होते समय देहादिका अनुसन्धान
नहीं होता ।
अथवा इसका ऐसा अर्थ भी हो सकता है कि जब इन देहादिका अन्य अर्थात्
दृश्यरूपसे भास होता है तब ये 'मैं' रूपसे नहीं भासते अपि तु 'मेरे' रूपसे भासते
हैं । अतः अहंबुद्धिसे रहित होनेके कारण ये आत्मा नहीं हैं ।
२. यहाँ यह शंका हो सकती है कि सुषुप्ति और समाधिके समय तो चेतनमें अहंबुद्धि
नहीं देखी जाती । इसका उत्तर यह है कि अहंबुद्धि सविकल्प और निर्विकल्प रूपसे
दो प्रकारकी है । जाग्रत् और स्वप्नमें भेदका भान होनेके कारण वह सविकल्प रहती
है तथा सुषुप्ति और समाधिके समय भेदका भान न होनेसे निर्विकल्प । यदि उस
समय भी सविकल्प अहंस्फूर्ति होती तो त्रिपुटीका लय नहीं हो सकता था । शास्त्रों
में उसे 'पूर्णाहंता' कहा है । यदि उन अवस्थाओंमें अहन्ताका सर्वथा अभाव हो
जाता तो 'मैं सुखसे सोया' 'मैं समाधिस्थ रहा' इस प्रकार अहन्ताके उल्लेखपूर्वक
स्मृति नहीं हो सकती थी । अतः उन अवस्थाओंमें भी अहन्ता रहती ही है ।

२२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
चक्षुर्नैतद्गोलकं ते मनश्चक्षुरुदाहृतम् ।
येन पश्यसि स्वप्नेषु तच्चक्षुर्मुख्यमुच्यते ॥ २७ ॥
तस्य प्रत्यावृत्तिरपि प्रोच्यते शृणु भूसुर ।
अप्रत्यावृत्तचक्षुर्वै नैव पश्यति किञ्चन ॥ २८ ॥
दिदृक्षुश्चक्षुषा किञ्चित्तदन्येभ्यो ह्यशेषतः ।
प्रत्यावृत्त्य दृढं तस्मिन्नेव संयोजयेद्यदि ॥ २९ ॥
तदा तद्भासते स्पष्टं नान्यदा तु कदाचन ।
अन्यदा तु पुरोवृत्ति न स्पष्टं भासते क्वचित् ॥ ३० ॥
आभातकल्पमेव स्यादप्रत्यावृत्तचक्षुषा ।
एवं श्रोत्रत्वगादीनां भूदेवाऽवेहि संस्थितिम् ॥ ३१ ॥
मनसाऽप्येवमेव स्यात् सुखदुःखाऽवभासनम् ।
अप्रत्यावृत्तमनसा किंस्विद्वेदितुमर्हति ॥ ३२ ॥
यहाँ 'दृष्टि' इन नेत्रगोलकोंको नहीं अपितु मानस-नेत्रोंके लिये
कहा गया है। जिसके द्वारा जीव स्वप्नोंमें देखता है वही नेत्र मुख्य
कहा जाता है ॥ २७ ॥
उस मानस-नेत्रको उलटना अर्थात् अन्तर्मुख करना क्या है—यह
भी बतलाया जाता है; क्योंकि उसे अन्तर्मुख किये बिना कोई कुछ
भी नहीं देख सकता ॥ २८ ॥
जो पुरुष नेत्रद्वारा कुछ देखना चाहता है वह दृष्टिको अन्य सब
ओरसे हटाकर यदि उस दर्शनीय वस्तुमें लगा देता है तो वह उसे
स्पष्टतया भासने लगती है, अन्यथा नहीं। ऐसा न होनेपर तो कभी-
कभी सामने रखी वस्तु भी स्पष्टतया नहीं भासती ॥ २९-३० ॥
जो नेत्र सब ओरसे हटाये हुए नहीं होते उनसे तो वस्तु न देखी
हुई-सी ही रहती है। विप्रदेव ! ऐसी ही बात श्रोत्र-त्वक् आदि अन्य
इन्द्रियोंके विषयमें भी जाननी चाहिये ॥ ३१ ॥
मनके द्वारा सुख-दुःखके भानमें भी ऐसा ही निश्चय है। जो
मन अन्य विषयोंकी ओरसे हटा हुआ नहीं है उससे पुरुष क्या जान
सकता है ? ॥ ३२ ॥

षोडशोऽध्यायः । २२६
तस्मात्तदेकपरता प्रत्यावृत्तिश्च चक्षुषः ।
प्रत्यावृत्तं मनः शुद्धं निजरूपावभासकम् ॥ ३३ ॥
अत्र ते सम्प्रवक्ष्यामि शृणु तन्नियताऽन्तरः ।
अगोचरश्चेदात्माऽसौ मनसा गोचरोऽपि च ॥ ३४ ॥
अत्र मुह्यन्ति बहवः श्रुत्यागमविवेचकाः ।
मनोगोचरता बाह्ये द्विप्रकारेण संस्थिता ॥ ३५ ॥
आद्याऽन्येभ्यः परावृत्तिः परा तत्परता भवेत् ।
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेऽपि मनसः सति ॥ ३६ ॥
न किञ्चिद्भासयेद्वस्तु तटस्थाऽवसरेषु तत् ।
तस्मात्तत्परताऽप्यत्र व्यापारो मानसः परः ॥ ३७ ॥
एवं व्यावृत्तभावानां व्यापारद्वयभासनम् ।
अन्यावृत्ता चितिर्यस्मात्तस्मान्मात्रं तथा भवेत् ॥ ३८ ॥
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेणैवाऽवभासयेत् ।
यथा पुरःस्थितादर्शे किञ्चिद्दर्शनहेतवे ॥ ३९ ॥
अतः एकमात्र अपने लक्ष्यपर दृष्टि रखना ही नेत्रकी अन्तर्मुखता
है। अन्तर्मुख शुद्ध चित्त ही अपने वास्तविक स्वरूपका साक्षात्कार
करानेवाला है ॥ ३३ ॥
अब मैं तुमसे जो बात कहता हूँ वह संयतचित्त होकर सुनो।
यह आत्मा मनका अविषय भी है और उसका विषय भी ॥ ३४ ॥
अनेकों वेद-शास्त्रोंकी आलोचना करनेवाले भी इस विषयमें मोह-
ग्रस्त ही रहते हैं। बाह्य पदार्थोंमें मनकी विषयता दो प्रकारसे है ॥ ३५॥
प्रथम तो अन्य विषयोंसे मनको मोड़ना और दूसरे उसे अपने
लक्ष्यमें जोड़ देना। मनके अन्य पदार्थोंसे केवल हट जानेपर भी
तटस्थ अवस्थाओंमें कोई वस्तु नहीं भासती। अतः इसके लिये मनका
अपने विषयमें जुड़ना-यह दूसरा व्यापार भी आवश्यक है ॥ ३६-३७ ॥
इस प्रकार जो परिच्छिन्न पदार्थ हैं उनका भान तो उक्त दोनों
व्यापारोंसे होता है। किन्तु चिति तो अपरिच्छिन्ना है, इसलिये इसके
अनुभवके लिये ऐसा नियम नहीं है ॥ ३८ ॥
यह तो अन्य पदार्थोंसे चित्तके हट जानेपर ही भासित हो जाती
है। जिस प्रकार सामने रखे दर्पणमें यदि कोई पदार्थ देखना हो तो

२३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिराभिमुख्यञ्च तस्य वै ।
अपेक्ष्यते दर्पणस्य प्रतिबिम्बदिदृक्षुणा ॥ ४० ॥
गगनं दर्पणे द्रष्टुं यदा समभिवाञ्छति ।
तदाऽन्येभ्यः परावृत्तिमात्रेण हि कृतार्थता ॥ ४१ ॥
गगनं सर्वतो व्याप्तं दर्पणे सर्वदा स्थितम् ।
अन्यावृत्तं किन्तु चाऽन्यैरभिच्छन्नं न भासते ॥ ४२ ॥
सर्वाश्रयं सर्वगतमपि तैश्छादितं यतः ।
अतस्तेभ्यः परावृत्तिमात्रेणैव विभासते ॥ ४३ ॥
एवं चितिः सर्वगता सर्वाश्रयतया स्थिता ।
सर्वकाले समापूर्णा मनसि व्योमवद् द्विज ॥ ४४ ॥
तस्मादन्यपरावृत्तिमात्रं मनस इष्यते ।
पश्य विप्र चितिः कुत्र कदा नास्त्यवभासिनी ॥ ४५ ॥
उसका प्रतिबिम्ब देखनेकी इच्छावाले पुरुषको अन्य पदार्थोंसे दर्पणको
हटाने और उस पदार्थके सामने लानेकी आवश्यकता होगी ॥ ३६-४०॥
पर यदि दर्पणमें आकाशको देखनेकी ही इच्छा हो तो अन्य
पदार्थोंसे दर्पणको हटा लेनेसे ही अपना काम बन जायगा ॥ ४१ ॥
क्योंकि सर्वत्र व्याप्त आकाश दर्पणमें भी सर्वदा विद्यमान है।
किन्तु दूसरे पदार्थोंसे बिना हटाये उनसे आच्छादित रहनेके कारण वह
भासता नहीं है ॥ ४२ ॥
वह सबका आश्रय और सर्वगत होनेपर भी क्योंकि उन पदार्थोंसे
'ढका रहता है, इस लिये उनकी ओरसे हटा लेने मात्रसे ही भासने
लगता है ॥ ४३ ॥
इसी प्रकार चिति भी सर्वव्यापिका है और सबकी आश्रयरूपसे
स्थित है । ब्रह्मन् ! वह आकाशके समान सभी समय मनमें भर-
पूर है ॥ ४४ ॥
इसलिये अपने साक्षात्कारके लिये उसे केवल मनको अन्य पदार्थोंसे
मोड़ लेनेकी ही अपेक्षा है । विप्रवर ! विचार तो करो कि सर्वप्रकाशिनी
चिति कब और कहाँ नहीं है ॥ ४५ ॥

षोडशोऽध्यायः। २३१
यदा यत्र च सा नास्ति न यदा नापि यत्र च ।
तस्माच्चिदात्मावभासे मनसोऽन्यपरावृत्तिः ॥ ४६ ॥
केवलाऽपेक्षिता नैवाभिमुख्यं नूतनं क्वचित् ।
आभिमुख्याभावहेतोरेवाऽवेद्यत्वमिष्यते ॥ ४७ ॥
अतएव शुद्धमनोवेद्यं तत्तत्त्वमुच्यते ।
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिरेव शुद्धिर्हि मानसी ॥ ४८ ॥
एतदेव परं तत्त्वज्ञाने साधनमुच्यते ।
यावन्न हि मनः शुद्धं तावज्ज्ञानं कथं भवेत् ॥ ४९ ॥
शुद्धे मनसि वै ज्ञानं कथं वा न भवेद् ध्रुवम् ।
उपक्षीर्णं सर्वमत्र साधनं तस्य शोधने ॥ ५० ॥
कर्म वोपासनं वाऽपि वैराग्यादिकमेव वा ।
मनसः शोधने एव विनियुक्तं न चाऽन्यथा ॥ ५१ ॥
तस्माच्छुद्धेन मनसा भासते तत् परं वपुः ।
इति राज्ञेरितं श्रुत्वा त्वष्टावक्रः पुनर्जगौ ॥ ५२ ॥
वह जब और जहाँ नहीं है तब वे 'जब' और 'जहाँ' भी सिद्ध
नहीं हो सकते । अतः चेतन आत्माका भान होनेके लिये केवल अन्य
( अनात्म ) पदार्थोंके निषेधकी ही अपेक्षा है, किसी नवीन वस्तुको
सामने लानेकी नहीं ॥ ४६-४७ पू० ॥
किसी वस्तुकी अभिमुखता न होनेके कारण ही उस परमतत्त्वको
अज्ञेय कहा जाता है । इसीसे वह तत्त्व शुद्धचित्तद्वारा ज्ञेय कहा
गया है । मनका अन्य वस्तुओंसे विमुख हो जाना ही मनकी शुद्धि
है और यही तत्त्वज्ञानकी सबसे प्रधान साधन कही गयी
है ॥ ४७ उ०-४९ पू० ॥
जबतक मन शुद्ध न हो तबतक ज्ञान कैसे हो सकता है । और
यदि मन शुद्ध है तो निश्चय ज्ञान क्यों नहीं होगा ? इस मनकी
शुद्धिमें ही अन्य सम्पूर्ण साधनोंकी समाप्ति हो जाती है ॥ ४९ उ०-५० ॥
कर्म, उपासना तथा वैराग्य आदिका भी उपयोग मनको शुद्ध
करनेमें ही है, किसी अन्य प्रयोजनमें नहीं ॥ ५१ ॥
अतः वह परमात्मा शुद्ध चित्तसे ही भासता है।" राजाका यह
प्रवचन सुनकर अष्टावक्रने पुनः प्रश्न किया—॥ ५२ ॥

१३२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
राजंस्त्वयोक्तमन्येभ्यः परावृत्तिर्हि मानसी ।
केवला चेत् सा परा चिन्मनसा प्रतिभासते ॥ ५३ ॥
तत् सुषुप्तौ विभासेत परावृत्तं मनस्तदा ।
तत्र किं साधनैरन्यैः सुप्तिमात्रात् कृतार्थता ॥ ५४ ॥
इति पर्यनुयुक्तोऽथ विप्रेणोवाच भूपतिः ।
समाहितः शृणु ब्रह्मन् समाधानं वदामि ते ॥ ५५ ॥
सत्यं सुषुप्तौ मनसः परावृत्तिस्तु सर्वथा ।
लीनं मनस्त्वथाप्यस्य कथं तामवभासयेत् ॥ ५६ ॥
कज्जलेन समालिप्ते दर्पणे गगनं न हि ।
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेण भासते क्वचित् ॥ ५७ ॥
“राजन् ! आपने कहा कि यदि मनकी अन्य पदार्थोंसे केवल
विमुखता हो जाय तो उस शुद्ध मनसे परम चेतनका भान हो
जाता है ॥ ५३ ॥
तब तो सुषुप्तिमें उसका भान होना चाहिये, क्योंकि उस अवस्थामें
मन विषयोंसे विमुख रहता ही है। फिर अन्य साधनोंकी क्या अपेक्षा
है; काम तो सुषुप्तिमात्रसे ही बन जायगा” ॥ ५४ ॥
अष्टावक्र मुनिके इस प्रकार शंका करनेपर राजा जनक बोले,
“ब्रह्मन् ! मैं आपकी शंकाका समाधान करता हूँ, आप एकाग्रचित्त
होकर सुनें ॥ ५५ ॥
यह तो ठीक है कि सुषुप्तिमें मनकी विषयोंसे पूर्ण विमुखता हो
जाती है, किन्तु उस समय उसकी मनःस्वरूपता¹ भी तो लीन हो
जाती है, फिर वह उसे किस प्रकार भासित करेगा ॥ ५६ ॥
यदि दर्पणपर काजल पोत दिया जाय तो अन्य प्रतिबिम्बोंकी निवृत्ति
हो जानेपर भी उससे आकाशका भान कभी नहीं हो सकता ॥ ५७ ॥
१. मन पाँचों भूतोंके सात्त्विक अंशका परिणाम है। इसीलिये उससे विषयोंका
ज्ञान होता है, क्योंकि ज्ञान सत्त्वगुणका ही धर्म है। सुषुप्तिमें तमोगुणके द्वारा यह
सात्त्विक अंश ढक जाता है। अतः जिस प्रकार अन्धकारसे आच्छादित दर्पणमें कोई
प्रतिबिम्ब नहीं भासता उसी प्रकार सुषुप्तिमें तमोगुणसे आच्छादित मनमें न तो
विषय ही भासते हैं और न शुद्ध चेतन ही।

षोडशोऽध्यायः। २३३
एवं विलिप्ते मनसि निद्रयाऽन्यपरावृतेः।
अयोग्यत्वादेव मनो भासयेन्न चितिं क्वचित् ॥ ५८ ॥
अन्यथा लोष्टकुड्यादेरपि भायात् कुतो न सा।
तस्माद्योग्येन मनसा शुद्धेन भासते हि सा ॥ ५९ ॥
अतः सद्योजातशिशोर्भासते न हि किञ्चन।
अथाऽपि शृणु वक्ष्यामि मषीलिप्ते हि दर्पणे ॥ ६० ॥
अलक्षितं चाऽपि मषीप्रतिबिम्बनमस्ति वै।
संश्लेषान्न विलक्षेत स्वभावस्याऽनपोहनात् ॥ ६१ ॥
तथा मनः सुषुप्तिस्थं संश्लिष्टं निद्रयैव हि।
अतोऽन्येभ्यः परावृत्तेरभावाद्भासयेन्न ताम् ॥ ६२ ॥
अतो निद्रास्मृतिरपि व्युत्थितस्य हि सम्भवेत् ।
मूढताऽपि च या तस्यां दशायामनुभूयते ॥ ६३ ॥
इसी प्रकार मनपर निद्राका लेप चढ़ जानेपर अन्य विषयोंसे
विमुखता हो जानेपर भी, प्रकाशनकी योग्यता न रहनेके कारण वह
चितिको कभी भासित नहीं कर सकता ॥ ५८ ॥
यदि ऐसा न होता तो ढेले और भीत आदिको भी चितिका भान
क्यों नहीं हो जाता ? अतः योग्य और शुद्ध मनके द्वारा ही उसका
भान होता है ॥ ५९ ॥
इसीसे तत्काल उत्पन्न हुए शिशुको भी कुछ नहीं भासता । तथापि
एक बात कहता हूं, सुनो, काजल पुते हुए दर्पणमें भी काजलका प्रति-
बिम्ब तो रहता ही है, भले ही वह दिखायी न दे, क्योंकि जो जिसका
स्वभाव होता है उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती । हाँ, काजलके संसर्गके
कारण वह दीख नहीं पड़ता ॥ ६०-६१ ॥
इसी प्रकार सुषुप्तावस्थामें मन निद्रासे ही संश्लिष्ट रहता है।
[ इसलिये अलक्षितरूपसे उसमें निद्राका प्रतिबिम्ब तो पड़ता ही है । ]
अतः निद्रारूप अन्य विषयसे विमुखता न होनेके कारण वह उस
चितिको भासित नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥
इसीसे जगे हुए व्यक्तिको निद्राकी स्मृति होती है। तथा उस
अवस्थामें जिसका अनुभव होता है उस मूढ़ता (अज्ञान) का भी
स्मरण होता है ॥ ६३ ॥

२३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तत्ते सम्यक् प्रवक्ष्यामि शृणु सम्यक् समाहितः ।
मनसस्तु द्विधाऽवस्था प्रकाशामर्शभेदतः ॥ ६४ ॥
बहिरर्थेषु विश्रान्तिर्या प्रकाशः स उच्यते ।
यस्तद्विचारः स्वस्मिन् वै स विमर्श उदाहृतः ॥ ६५ ॥
प्रकाशो निर्विकल्पः स्याद्वस्तूनामविभेदतः ।
विमर्शः शब्दसम्भेदद्विभेदात् सविकल्पकः ॥ ६६ ॥
अयमेवंविध इति शब्दसम्भेदवर्जितः ।
वस्तुदर्शनरूपोऽसौ प्रकाशो निर्विकल्पकः ॥ ६७ ॥
अयमेवंविध इति वस्तुदर्शनमूलकः ।
शब्दसम्भिन्नरूपोऽसौ विचारात्माऽवभासनः ॥ ६८ ॥
आन्तरोऽभिनवोऽन्यो वा विमर्श इति कीर्त्तितः ।
अब मैं तुमसे स्पष्टतया कहता हूँ, खूब सावधान होकर सुनो।
मनकी दो प्रकारकी अवस्थाएं होती हैं—(१) प्रकाशावस्था और
(२) विमर्शावस्था ॥ ६४ ॥
मनका बाह्य विषयोंकी ओरसे शान्त (संकल्पहीन) हो जाना
प्रकाशावस्था है और उनका अपनेमें संकल्प होना विमर्श कहा
गया है ॥ ६५ ॥
प्रकाश अवस्था निर्विकल्प होती है, क्योंकि उस समय वस्तुओंका
भेद नहीं रहता। और वस्तुओंका भेद होनेके कारण शब्दोंका भी भेद
रहनेके कारण विमर्शावस्था सविकल्प है ॥ ६६ ॥
‘यह ऐसा है’ इस प्रकारके शब्दभेदसे रहित और वस्तुतत्त्वका
दर्शन करानेवाली यह प्रकाशावस्था निर्विकल्प होती है ॥ ६७ ॥
तथा वस्तुतत्त्वका दर्शन जिसके मूलमें रहता है¹ और ‘यह ऐसा है’
इस प्रकार शब्दभेदमय विचाररूपसे जो भासती है [वह विमर्शावस्था
सविकल्प होती है ] ॥ ६८ ॥
विमर्श आन्तर होता है। [अर्थात् मनपर जो बाह्यपदार्थोंका
१. क्योंकि प्रत्येक पदार्थकी प्रतीतिके मूलमें उसके अधिष्ठानरूपसे पर-
मार्थतत्त्वका स्फुरण होता है; जैसे दर्पणके ज्ञानके बिना प्रतिबिम्बका ज्ञान नहीं हो
सकता उसी प्रकार सर्वाश्रयभूता चितिके स्फुरणके बिना किसी भी वस्तुका ज्ञान
नहीं हो सकता।

षोडशोऽध्यायः । २३५
तत्र योऽभिनवाऽऽभासः स प्रोक्तोऽनुभवात्मकः ॥ ६९ ॥
अन्यस्मृत्यनुसन्धानात्मकः संस्कारसम्भवः ।
एवं मनो द्विप्रकारशक्तियुक्तं सदा स्थितम् ॥ ७० ॥
निद्रा प्रकाशरूपाऽसौ सुषुप्तिश्चिरसंस्थिता ।
जागरामर्शबहुला चेतयमूढदशोच्यते ॥ ७१ ॥
प्रकाशनिबिडा यस्मात् सुषुप्तिर्मूढतात्मिका ।
अतएव हि दीपादेः प्रकाशनिबिडत्वतः ॥ ७२ ॥
निश्चिता मूढता सर्वैर्विद्वद्भिरपि सर्वथा ।
प्रतिबिम्ब पड़ता है उसको आश्रय करके होता है ।] यह अभिनव और
अन्य रूपसे दो प्रकारका है। इनमें जो अभिनव आभास है वह
प्रत्यक्ष अनुभवरूप कहा गया है ॥ ६९ ॥
तथा अन्य जो स्मृति कहा जाता है, अनुसन्धानात्मक होता है ।
यह पहले अनुभव की हुई वस्तुओंके संस्कारोंसे होता है । इस प्रकार
मन सर्वदा इन दो प्रकारकी शक्तियोंसे युक्त रहता है ॥ ७० ॥
यह सुषुप्तावस्था प्रकाश अर्थात् निर्विकल्प ज्ञानरूप होती है तथा
चिरकाल तक रहती है तथा जाग्रत् अवस्था में विमर्श (सवि-
कल्प ज्ञान) की अधिकता रहती है । इसलिये यह अमूढ अवस्था
कहलाती है ॥ ७१ ॥
क्योंकि सुषुप्तिमें घनीभूत प्रकाश (निर्विकल्प ज्ञान) रहता है
इसलिये वह मूढतारूप है।१ इसीसे प्रकाशकी प्रचुरता रहनेके कारण
सभी विद्वानोंने दीपक आदिकी सर्वथा मूढता ही निश्चय की है।
[अर्थात् प्रकाशक होनेपर भी निर्विकल्पताके कारण उन्हें जड ही
माना है ] ॥ ७२-७३ पू० ॥
१. सुषुप्तिमें घनीभूत प्रकाश अर्थात् निर्विकल्प ज्ञान रहता है—इसका तात्पर्य
यह है कि उस समय विमर्श या सविकल्प ज्ञान बिलकुल नहीं रहता। इसलिये
वह मूढतारूप अर्थात् जड होती है । इसी कारण दीपक तथा घट-पटादि भी जड
हैं। परन्तु शुद्ध चिति केवल घनीभूत प्रकाश नहीं है अपि तु स्फुरत-प्रकाशनूप हैं ।
यह स्फुरद्रूपता ही उसकी चितिशक्ति है। इसीको आगमशास्त्रों में स्पन्द या पूर्णा-
हम्ता कहा है । इससे सम्पन्न होनेके कारण ही वह अपने संकल्पमात्रसे दर्पणमें
प्रतिबिम्बके समान अपने ही स्वरूपमें दृश्य प्रपञ्च को आभासित कर देती है ।

२३६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
निद्रा प्रथमजा व्यक्तं महाशून्यमिहोच्यते ॥ ७३ ॥
नास्ति सामान्यपदवी सुषुप्तिस्तत्प्रकाशनम् ।
वस्तुदर्शनकालेऽपि जाग्रत्येवंविधं मनः ॥ ७४ ॥
किन्तूत्तरक्षणोद्भूतविकल्पैवैस्तिरोहितम् ।
सुषुप्ताव्यक्तशक्तिप्रकाशनिविडत्वतः ॥ ७५ ॥
मनो विलीनमित्येवं विविञ्चन्ति विवेचकाः ।
वस्तुदर्शनकालेऽपि चैवं लीनं मनो भवेत् ॥ ७६ ॥
शृणु ब्रह्मन् रहस्यं ते वक्ष्यामि स्वानुभूतितः ।
यत्र मुह्यन्ति विद्वांसोऽप्यतिसूक्ष्मविवेचकाः ॥ ७७ ॥
निर्विकल्पसमाधिश्च सुषुप्तिर्वस्तुदर्शनम् ।
त्रयमेतच्चैकविधं प्रकाशनिविडत्वतः ॥ ७८ ॥
सृष्टिके समय जो सबसे पहला स्वरूपका संकोच अवभासित हुआ
उसका नाम है निद्रा । उसीको अव्यक्त या महाशून्य भी कहा जाता
है । वह ‘नास्ति’ ( कुछ नहीं ) इस प्रतीतिकी सामान्य भूमि है और
सुषुप्तिमें उसकी उपलब्धि होती है ॥ ७३ उ०-७४ पू० ॥
जाग्रत् अवस्था में वस्तुओंको देखनेके समय भी मन ऐसा होता
है । किन्तु उसके पीछे दूसरे ही क्षणमें अनेकों विकल्पोंके प्रकट हो
जानेसे वह अवस्था लुप्त हो जाती है ॥ ७४ उ०-७५ पू० ॥
किन्तु सुषुप्तावस्था में अव्यक्तशक्तिकी घनीभूत निर्विकल्पताके कारण
मन लीन रहता है—ऐसा विचारकोंका निर्णय है । वास्तवमें तो वस्तुको
देखनेके समय भी मन इसी प्रकार लीन रहता है १ ॥ ७५ उ०-७६ ॥
ब्रह्मन् ! सुनो, मैं अपने अनुभवके आधार पर यह रहस्य बताता हूँ ।
यहाँ अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन करनेवाले विद्वान् भी मूढ बन जाते हैं ॥७७॥
निर्विकल्प समाधि, सुषुप्ति और वस्तुदर्शन प्रकाशनिविडता ( घनी-
भूत निर्विकल्पता ) की दृष्टिसे ये तीनों एक-से ही हैं ॥ ७८ ॥
१. मनका स्वभाव है कि वह अपने दृश्यके अनुरूप प्रतीत होता है । सुषुप्तिमें
दृश्य अव्यक्त होनेके कारण वह अव्यक्त जान पड़ता है और जाग्रत्में दृश्य व्यक्त
रहनेके कारण व्यक्त । परन्तु जाग्रत्में भी जब वह एक विषयको छोड़कर दूसरे विषय-
पर जाता है तो दोनोंके सन्धिकारलमें विषय-हीन रहनेके कारण अव्यक्त ही रहता
है । यह काल बहुत अल्प होता है, इसलिये सामान्य लोग इसे ग्रहण नहीं
कर पाते ।

षोडशोऽध्यायः । २३७
विमर्शभेदाद्भेदो हि लक्ष्यते व्यावहारिकैः ।
तत्र हेतुर्भास्यभेदादित्येव प्रनिश्चयः ॥ ७९ ॥
समाधौ केवलंचितिः सुप्तावव्यक्तमेव च ।
दर्शने भिन्नभासो हि भास्यमेवं त्रिधा स्थितम् ॥ ८० ॥
भास्यभेदेऽपि भासस्तु केवलं निर्विकल्पकः ।
अतः प्रकाशनिबिड इत्येव संप्रचक्षते ॥ ८१ ॥
समाधिश्च सुषुप्तिश्च चिरकालभवत्वतः ।
अनन्तरं स्पष्टतया सर्वैरपि विमृश्यते ॥ ८२ ॥
क्षणिकत्वाद्दर्शनं तु स्पष्टं न हि विमृश्यते ।
एवं समाधिः सुप्तिश्च क्षणिका न विमृश्यते ॥ ८३ ॥
सुषुप्तिः क्षणिका तद्वत् समाधिरपि विद्यते ।
सुषुप्तिर्लक्ष्यते सूक्ष्मदृग्भिः परिचयात् खलु ॥ ८४ ॥
किन्तु व्यावहारिक लोगोंको विमर्शका भेद होनेके कारण इनमें
भेद जान पड़ता है। इसमें निश्चित बात यह है कि इनका भेद
भास्यके भेदके कारण है [ स्वतः नहीं ] ॥ ७९ ॥
समाधिमें केवल शुद्ध चिति रहती है, सुषुप्तिमें अव्यक्त भी है और
वस्तुदर्शनमें विभिन्न अवभास रहते हैं । इस प्रकार इन अवस्थाओंमें
तीन प्रकारके भास्य हैं ॥ ८० ॥
परन्तु भास्योंका भेद होनेपर भी भास ( दृष्टि ) तो केवल निर्वि-
कल्प ही रहता है । इसीसे उसे तीनों अवस्थाओंमें प्रकाशनिबीड ही
कहा जाता है ॥ ८१ ॥
समाधि और सुषुप्ति दीर्घकालतक रहती हैं । इसलिये पीछे
सभी लोग उनकी स्पष्ट अनुभूति स्वीकार करते हैं ॥ ८२ ॥
किन्तु पदार्थदर्शन ( पदार्थदर्शनकी सन्धियोंमें रहनेवाली निर्वि-
कल्पता ) क्षणिक है; इसलिये उसका स्पष्ट परिचय नहीं होता ।
इसी प्रकार यदि समाधि और सुषुप्ति अवस्थाएँ भी क्षणिक होतीं तो
उनका भी परिचय नहीं हो सकता था ॥ ८३ ॥
व्यवहारमें कभी क्षणिक सुषुप्ति और समाधि भी हो जाती हैं।
किन्तु दीर्घ सुषुप्तिका परिचय रहनेके कारण सूक्ष्मदर्शी क्षणिक

२३८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
समाधिस्त्वपरिचयात् सूक्ष्मो न हि विमृश्यते ।
सर्वेषां प्राणिनां ब्रह्मन् व्यवहारदशास्वपि ॥ ८५ ॥
सूक्ष्माः समाधयः सन्ति चाव्युत्पत्त्या विभान्ति नो ।
जाग्रत्यविमृशिर्या स्यात् स समाधिरुदीरितः ॥ ८६ ॥
विमर्शाभावमात्रन्तु समाधिरभिधीयते ।
सुषुप्तौ दर्शने चापि समाधित्वमतः स्थितम् ॥ ८७ ॥
किन्तु मुख्यसमाधित्वमनयोर्न हि विद्यते ।
भेदामर्शनसंस्कारगर्भितत्वान्न मुख्यता ॥ ८८ ॥
दर्शनं जाग्रति भवेदविमर्शनरूपकम् ।
तथापि ते प्रवक्ष्यामि मुनिपुत्रादराच्छृणु ॥ ८९ ॥
अव्यक्तं यत् प्रथमजं नास्तिसामान्यकं हि तत् ।
नास्तीत्येव हि तद्भानमत्यन्ताभावरूपकम् ॥ ९० ॥
सुषुप्तिको तो पहचान लेते हैं। पर समाधिका परिचय है नहीं,
इसलिये वस्तुदर्शनके समय जो सूक्ष्म समाधि होती है वह पहचानी
नहीं जाती ॥ ८४-८५ पू० ॥
ब्रह्मन् ! व्यवहारके समय भी सभी प्राणियोंको सूक्ष्म समाधियाँ
हुआ करती हैं; किन्तु परिचय न होनेके कारण वह जान नहीं
पड़तीं ॥ ८५ उ०-८६ पू० ॥
जाग्रत् अवस्थामें जो विमर्श ( संकल्प ) शून्य स्थिति हो जाती है
वह समाधि ही कही गयी है। विमर्शका अभाव ही तो समाधि कहलाता
है ॥ ८६ उ०-८७ पू० ॥
अतः सुषुप्ति और वस्तुदर्शनके समय भी समाधि तो रहती ही है।
किन्तु ये मुख्य समाधि नहीं मानी जातीं। इन अवस्थाओंमें भेदका
उल्लेख करानेवाले संस्कार छिपे रहते हैं, इसलिये इन्हें मुख्य समाधि
नहीं माना जाता ॥ ८७ उ०-८८ ॥
जाग्रत् अवस्थामें जो पदार्थ-दर्शन है वह भी अविमर्शरूप ही है।
तथापि मैं इसका स्पष्टतया वर्णन करता हूँ। मुनिपुत्र ! आदरपूर्वक
सुनो ॥ ८९ ॥
सबसे पहले उत्पन्न हुआ जो अव्यक्त है वह नास्ति-सामान्यरूप है।
'कुछ भी नहीं है' इस प्रकार उसका भान अत्यन्त अभावरूप ही है ॥९०॥

षोडशोऽध्यायः । २३६
एषा सुषुप्तिरित्युक्ता जडशक्तिर्भवेच्चितः ।
दर्शने भासमानं च नास्त्याभासपदं यतः ॥ ९१ ॥
अतः सुषुप्तिरेव स्याज्जडदर्शनसङ्गता ।
समाधौ भासमाना या चितिः सा ब्रह्मरूपिणी ॥ ९२ ॥
भक्षिणी कालदेशानां नास्त्याभासविनाशिनी ।
सर्वथाऽस्तिमयी देवी सुषुप्तिः सा कथं भवेत् ॥ ९३ ॥
तस्मात् सुषुप्तिमात्रेण न भवेद्धि कृतार्थता ।
बोधयामास जनक इत्यष्टावक्रमुक्तिभिः ॥ ९४ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टावक्रीये
षोडशोऽध्यायः ।
इसीको सुषुप्ति कहा गया है। यह चेतनकी जडशक्ति है। क्योंकि
देखनेके समय यह नास्ति (अभाव) प्रतीतिकी भूमि है, इसलिये सुषुप्ति
ही जडता-ज्ञानयुक्त मानी गयी है ॥ ६१--६२ पू० ॥
किन्तु समाधिमें भासनेवाली जो चिति है वह ब्रह्मरूपिणी है। वह
देश-कालकी मर्यादाको भक्षण कर जानेवाली और नास्ति-प्रतीतिका
भी नाश कर देनेवाली है। अतः वह पूर्णतया सत्तास्वरूपिणी देवी
सुषुप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ६२ उ०--६३ ॥
इसलिये भला सुषुप्तिमात्रसे कृतकृत्यता कैसे प्राप्त हो सकती है ?"
इस प्रकार अनेकों प्रकारकी युक्तियोंसे राजा जनकने अष्टावक्रको
बोध कराया ॥ ६४ ॥
षोडश अध्याय समाप्त ।

सप्तदशोऽध्यायः
श्रुतवैवं जनकेनोक्तमष्टावक्रः पुनर्नृपम् ।
पप्रच्छ यत्तद्वदामि शृणु भार्गव यत्नतः ॥ १ ॥
राजन् यदुक्तं भवता व्यवहारदशास्वपि ।
सूक्ष्माः समाधयः सन्तीत्येतं तन्मे वद स्फुटम् ॥ २ ॥
दशासु कासु ते सन्ति निर्विकल्पचिदात्मकाः।
एवं तेनाऽनुयुक्तोऽथ प्राह राजा महाशयः ॥ ३ ॥
शृणु ब्रह्मन् प्रवक्ष्यामि व्यवहारे समाधयः ।
प्रियया सम्परिष्वक्तो नव्यया प्रथमं यदा ॥ ४ ॥
तदा न वेद बाह्यं वाप्यान्तरं वा क्षणं नरः ।
तिष्ठेन्न निद्रयाऽऽक्रान्तः स समाधिरुदीरितः ॥ ५ ॥
सप्तदश अध्याय ॥ १७ ॥
जनक द्वारा साधनक्रम और स्वानुभवका निरूपण
परशुरामजी ! जनकका यह कथन सुनकर अष्टावक्रजीने राजासे
पुनः जो प्रश्न किया वह बताता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ १ ॥
[अष्टावक्रजीने पूछा ] "राजन् ! आपने जो कहा कि व्यवहारके
समय भी सूक्ष्म समाधियाँ हुआ करती हैं, सो यह बात आप मुझसे
स्पष्ट करके कहिये ॥ २ ॥
वे निर्विकल्प चित्स्वरूपिणी समाधियाँ किन-किन स्थितियोंमें हुआ
करती हैं ?" अष्टावक्रके इस प्रकार प्रश्न करनेपर उदारचेता महाराज
जनक कहने लगे—॥ ३ ॥
"ब्रह्मन् ! सुनिये, मैं व्यवहारमें होनेवाली समाधियाँ बतलाता
हूँ। पुरुष जिस समय नवीन प्रियतमासे पहली बार गाढ़ आलिंगन
प्राप्त करता है उस समय एक क्षणके लिये उसे बाहर या भीतरकी
कुछ भी सुधि नहीं रहती और न निद्राके ही वशीभूत होता है। अतः
वह समाधि ही कही जाती है ॥ ४-५ ॥