सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 237

षोडशोऽध्यायः
श्रुत्वैतद्भार्गवो रामः प्राप्य विस्मयमान्तरे ।
भूयः पप्रच्छाऽत्रिसूनुमवितृप्तः कथाश्रुतेः ॥ १ ॥
भगवन्नद्भुतं ह्येतच्छ्रुतं वृत्तं पुरातनम् ।
भूयः पप्रच्छ राजानमष्टावक्रो महामुनिः ॥ २ ॥
यद्राजा प्रत्युवाचैनं तच्च मे वद सर्वशः ।
अहोऽद्भुतं समाख्यानं न क्वचिच्च मया श्रुतम् ॥ ३ ॥
विज्ञानवृत्तसर्वस्वं दयया वद मे गुरो !
इत्येवमनुयुक्तोऽथ दत्तात्रेयो महामुनिः ॥ ४ ॥
भार्गवाय समाचख्यौ कथां परमपावनीम् ।
शृणु भार्गव यत् प्रोक्तं जनकेन महात्मना ॥ ५ ॥
निर्गतायां तु तापस्यामष्टावक्रो मुनेः सुतः ।
षोडश अध्याय ॥ १६ ॥
जनक और अष्टावक्रका संवाद
भृगुनन्दन परशुरामजीको यह सब सुन मन ही मन बड़ा आश्चर्य
हुआ। कथाश्रवणसे अभी उनकी तृप्ति नहीं हुई थी; अतः उन्होंने
अत्रिनन्दन भगवान् दत्तसे पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥
"भगवन् ! यह तो बड़ा ही अद्भुत पुरातन इतिहास सुना। अब
आप दयापूर्वक सांगोपांग वह प्रसंग सुनाइये कि महामुनि अष्टा-
वक्रने राजासे फिर क्या प्रश्न किया और राजाने उनसे क्या कहा।
अहो ! यह आख्यान तो बड़ा ही विचित्र है, ऐसा तो मैंने कहीं
नहीं सुना ॥ २-३ ॥
गुरुदेव ! यह प्रसंग विज्ञानवार्ताका सारभूत है। दया करके मुझे
यह सुनाइये।" इस प्रकार प्रश्न किये जानेपर महामुनि दत्तात्रेयने
परशुरामको परम पवित्र कथा सुनाना आरम्भ किया— "भृगुनन्दन !
महात्मा जनकने जो कुछ सुनाया वह सुनो ॥ ४-५ ॥
तपस्विनीके चले जानेपर मुनिपुत्र अष्टावक्र अनेकों ब्राह्मणोंको